RAIN WATER HARVESTING वर्षा जल संग्रहण

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RAIN WATER HARVESTING वर्षा जल संग्रहण

RAIN WATER HARVESTING वर्षा जल संग्रहण                                                                                                              Many thought that given the disadvantages and rising resistance against the multi-purpose projects, water harvesting system was a viable alternative, both socio-economically and environmentally. In ancient India, along with the sophisticated hydraulic structures, there existed an extraordinary tradition of water-harvesting system. People had in-depth knowledge of rainfall regimes and soil types and developed wide ranging techniques to harvest rainwater, groundwater, river water and flood water in keeping with the local ecological conditions and their water needs. In hill and mountainous regions, people built diversion channels like the ‘guls’ or ‘kuls’ of the Western Himalayas for agriculture. ‘Rooftop rainwater harvesting’ was commonly practised to store drinking water, particularly in Rajasthan. In the flood plains of Bengal, people developed inundation channels to irrigate their fields. In arid and semi-arid regions, agricultural fields were converted into rain fed storage structures that allowed the water to stand and moisten the soil like the ‘khadins’ in Jaisalmer and ‘Johads’ in other parts of Rajasthan.

वर्षा जल संग्रहण

बहुत से लोगों का मानना है कि बहुउद्देशीय परियोजनाओं के अलाभप्रद असर और उन पर उठे विवादों के चलते वर्षाजल संग्रहण तंत्र इनके सामाजिक-आर्थिक और पारिस्थितिक तौर पर व्यवहार्थ विकल्प हो सकते हैं। प्राचीन भारत में उत्कृष्ट जलीय निर्माणों के साथ-साथ जल संग्रहण ढाँचे भी पाए जाते थे। लोगों को वर्षा पद्धति और मृदा के गुणों के बारे में गहरा ज्ञान था। उन्होंने स्थानीय पारिस्थितिकीय परिस्थितियों और उनकी जल आवश्यकतानुसार वर्षाजल, भौमजल, नदी जल और बाढ़ जल संग्रहण के अनेक तरीके विकसित कर लिए थे। पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रें में लोगों ने ‘गुल’ अथवा ‘कुल’ (पश्चिमी हिमालय) जैसी वाहिकाएँ, नदी की धारा का रास्ता बदलकर खेतों में सिंचाई के लिए बनाई हैं। पश्चिमी भारत, विशेषकर राजस्थान में पीने का जल एकत्रित करने के लिए ‘छत वर्षा जल संग्रहण’ का तरीका आम था। पश्चिम बंगाल में बाढ़ के मैदान में लोग अपने खेतों की सिंचाई के लिए बाढ़ जल वाहिकाएँ बनाते थे। शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्रें में खेतों में वर्षा जल एकत्रित करने के लिए गड्ढे बनाए जाते थे ताकि मृदा को सिंचित किया जा सके और संरक्षित जल को खेती के लिए उपयोग में लाया जा सके। राजस्थान के जिले जैसलमेर में ‘खादीन’ और अन्य क्षेत्रें में ‘जोहड़’ इसके उदाहरण हैं।

 

 

In the semi-arid and arid regions of Rajasthan, particularly in Bikaner, Phalodi and Barmer, almost all the houses traditionally had underground tanks or tankas for storing drinking water. The tanks could be as large as a big room; one household in Phalodi had a tank that was 6.1 metres deep, 4.27 metres long and 2.44 metres wide. The tankas were part of the well-developed rooftop rainwater harvesting system and were built inside the main house or the courtyard. They were connected to the sloping roofs of the houses through a pipe. Rain falling on the rooftops would travel down the pipe and was stored in these underground ‘tankas’. The first spell of rain was usually not collected as this would clean the roofs and the pipes. The rainwater from the subsequent  showers was then collected.

राजस्थान के अर्ध-शुष्क और शुष्क क्षेत्रें विशेषकर बीकानेर, फलोदी और बाड़मेर में, लगभग हर घर में पीने का पानी संग्रहित करने के लिए भूमिगत टैंक अथवा ‘टाँका’ हुआ करते थे। इसका आकार एक बड़े कमरे जितना हो सकता है। फलोदी में एक घर में 6-1 मीटर गहरा, 4-27 मीटर लंबा और 2-44 मीटर चौड़ा टाँका था। टांका यहाँ सुविकसित छत वर्षाजल संग्रहण तंत्र का अभिन्न हिस्सा होता है जिसे मुख्य घर या आँगन में बनाया जाता था। वे घरों की ढलवाँ छतों से पाइप द्वारा जुड़े हुए थे। छत से वर्षा का पानी इन नलों से होकर भूमिगत टाँका तक पहुँचता था जहाँ इसे एकत्रित किया जाता था। वर्षा का पहला जल छत और नलों को साफ करने में प्रयोग होता था और उसे संग्रहित नहीं किया जाता था। इसके बाद होने वाली वर्षा का जल संग्रह किया जाता था।

 

The rainwater can be stored in the tankas till the next rainfall making it an extremely reliable source of drinking water when all other sources are dried up, particularly in the summers. Rainwater, or palar pani, as commonly referred to in these parts, is considered the purest form of natural water. Many houses constructed underground rooms adjoining the ‘tanka’ to beat the summer heat as it would keep the room cool.

टाँका में वर्षा जल अगली वर्षा ट्टतु तक संग्रहित किया जा सकता है। यह इसे जल की कमी वाली ग्रीष्म ट्टतु तक पीने का जल उपलब्ध करवाने वाला जल स्रोत बनाता है। वर्षाजल अथवा ‘पालर पानी’ जैसा कि इसे इन क्षेत्रें में पुकारा जाता है, प्राकृतिक जल का शुद्धतम रूप समझा जाता है। कुछ घरों में तो टाँको के साथ भूमिगत कमरे भी बनाए जाते हैं क्योंकि जल का यह स्रोत इन कमरों को भी ठंडा रखता था जिससे ग्रीष्म ट्टतु में गर्मी से राहत मिलती है।

 

Today, in western Rajasthan, sadly the practice of rooftop rainwater harvesting is on the decline as plenty of water is available due to the perennial Indira Gandhi Canal, though some houses still maintain the tankas since they do not like the taste of tap water. Fortunately, in many parts of rural and urban India, rooftop rainwater harvesting is being successfully adapted to store and conserve water. In Gendathur, a remote backward village in Mysuru, Karnataka, villagers have installed, in their household’s rooftop, rainwater harvesting system to meet their water needs. Nearly 200 households have installed this system and the village has earned the rare distinction of being rich in rainwater. See Fig. 3.6 for a better understanding of the rooftop rainwater harvesting system which is adapted here. Gendathur receives an annual precipitation of 1,000 mm, and with 80 per cent of collection efficiency and of about 10 fillings, every house can collect and use about 50,000 litres of water annually. From the 200 houses, the net amount of rainwater harvested annually amounts to 1,00,000 litres.

 

यह दुख की बात है कि आज पश्चिमी राजस्थान में छत वर्षाजल संग्रहण की रीति इंदिरा गांधी नहर से उपलब्ध बारहमासी पेयजल के कारण कम होती जा रही है। हालाँकि कुछ घरों में टाँकों की सुविधा अभी भी है क्योंकि उन्हें नल के पानी का स्वाद पसन्द नहीं है। सौभाग्य से आज भी भारत के कई ग्रामीण और शहरी क्षेत्रें में जल संरक्षण और संग्रहण का यह तरीका प्रयोग में लाया जा रहा है। कर्नाटक के मैसूरु जिले में स्थित एक सूदूर गाँव गंडाथूर में ग्रामीणों ने अपने घर में जल आवश्यकता पूर्ति छत वर्षाजल संग्रहण की व्यवस्था की हुई है। गाँव के लगभग 200 घरों में यह व्यवस्था है और इस गाँव ने वर्षा जल संपन्न गाँव की ख्याति अर्जित की है। यहाँ प्रयोग किए जा रहे वर्षा जल संग्रहण ढाँचों के बारे में अधिक जानकारी के लिए चित्र 3-4 को देखें। इस गाँव में हर वर्ष लगभग 1,000 मिलीमीटर वर्षा होती है और 10 भराई के साथ यहाँ संग्रहण दक्षता 80 प्रतिशत है। यहाँ हर घर लगभग प्रत्येक वर्ष 50,000 मीटर जल का संग्रह और उपयोग कर सकता है। 200 घरों द्वारा हर वर्ष लगभग 1000,000 लीटर जल एकत्रित किया जाता है।