प्रबंध एक परिचय

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economics accounts business study tution in beawarप्रबंध :– एक परिचय

 

आवश्यकता पूर्ति के लिए संसाधनों का उपयोग कुशलता से हो इसके लिए प्रयुक्त ज्ञान – विज्ञान, दर्शन एवं कौशल को ही प्रबंध व प्रबंध अध्ययन माना गया है।
ऐतिहासिक सभ्यताओं से प्रमाण मिलते हैं कि उनके निर्माण एवं विकास में भी प्रबंध का प्रयोग हुआ था। अर्थात प्रबंध भी मानव सभ्यता के विकास जितना प्राचीन है।
विविध संसाधनों को जोड़ते समय उनकी उपादेयता एवं सीमाओं को ध्यान रखते हुए लक्ष्य के लिए विशेष ज्ञान – चातुर्य की प्राप्ति “प्रबंध अध्ययन” से ही हो सकती है।
जीवन की समस्त आवश्यकता व इच्छाओं को पूरा करने के लिए विश्व में बहुत से उपक्रम या संगठन काम कर रहे हैं। इनकी समस्त क्रियाएं एक मात्र तत्व “प्रबंध” के कारण संभव हो पा रही है।
Case study :- किसी कंपनी द्वारा उपलब्ध (उत्पादित) की जा रही समस्त वस्तुओं व सेवाओं को बाजार एवं ग्राहक तक पहुंचाने की समस्त गतिविधियों के संपन्न होने तक की प्रक्रिया व कार्यप्रणाली तथा उसमें प्रबंध की उपयोगिता का विवरण या अध्ययन ही case study कहलाता है।



प्रभावी प्रबंध एवं कुशल प्रबंधक विश्व स्तर पर आर्थिक एवं तकनीकी प्रगति की ओर ले जाने वाला एकमात्र महत्वपूर्ण तत्व है।

प्रबंध अन्य व्यक्तियों से मापदंड के अनुरूप कार्य करवाने एवं चुनौतियों को पूरा करते हुए लक्ष्य को प्राप्त करने की एक विशेष कला है।

न्यूनतम लागत से अधिकतम उत्पादन तथा लाभ प्राप्त करना ही प्रबंध है।

निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु नियोजन, संगठन, नियुक्ति, निर्देशन एवं नियंत्रण की प्रक्रिया को प्रबंध के रूप में जाना जाता है।

प्रबंध की परिभाषाएं

लॉरेंस एप्पले के अनुसार, “अन्य व्यक्तियों के प्रयासों से परिणाम प्राप्त करना ही प्रबंध है।”

क्रीटनर के अनुसार, “प्रबंध परिवर्तनशील वातावरण में दूसरों के साथ तथा दूसरों से कार्य करवाने की प्रक्रिया है। सीमित संसाधनों का प्रभावी एवं कुशलतापूर्वक उपयोग करना इस प्रक्रिया का आधार है।”

सामान्य शब्दों में प्रबंध एक कला एवं विज्ञान है, जो सम्मिलित प्रयासों की सहायता से कम लागत पर संस्था के उद्देश्यों की प्राप्ति में नियोजन से लेकर नियंत्रण तक सभी क्रियाओं में शामिल है।

प्रबंध विशेषताएं एवं लक्षण

प्रबंध उद्देश्य

प्रबंध प्रत्येक क्षेत्र में आवश्यक है किंतु उद्देश्यों के आधार पर प्रबंध को 4 वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-
1 प्राथमिक उद्देश्य
2 सहायक उद्देश्य

3 व्यक्तिगत उद्देश्य

4 सामाजिक उद्देश्य

1 प्राथमिक उद्देश्य
वे उद्देश्य जिन्हें उपक्रम द्वारा प्राथमिकता दी जाती है, प्राथमिक उद्देश्य कहलाते हैं। किसी प्रबंध के प्राथमिक उद्देश्य निम्नलिखित होते हैं –
1उचित लागत पर उत्पादन करना
2 उचित मूल्य पर वितरण करना
3 उचित पारिश्रमिक देना
4 उचित मात्रा में लाभार्जन करना ।
2 सहायक उद्देश्य
वे उद्देश्य जो प्राथमिक उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायता करते हैं, सहायक उद्देश्य कहलाते हैं। सहायक उद्देश्य उपक्रम की आंतरिक कार्यप्रणाली से संबंधित होते हैं। यह संसाधनों के योगदान को अधिकतम करने का प्रयास करते हैं। प्रमुख सहायक उद्देश्य निम्नलिखित होते हैं-
1 संसाधनों में गुणवत्ता उत्पन्न करना
2 संसाधनों का उचित समय एवं स्थान पर प्रयोग करना
3 संसाधनों के उपयोग में सामंजस्य स्थापित करना 4 कार्य क्षमता को प्रभावशाली बनाना।
3 व्यक्तिगत उद्देश्य
प्रबंध का व्यक्तिगत उद्देश्य यह माना जाता है कि समस्त मानवीय संसाधन संतुष्टि से हैं अथवा संतुष्ट हैं। इसके अंतर्गत उपक्रम में ऐसा वातावरण एवं कार्यप्रणाली विकसित की जाए जिससे सभी व्यक्तियों को संतुष्टि प्राप्त हो और वे अपनी संपूर्ण क्षमता से कार्य कर सकें।
4 सामाजिक उद्देश्य
समाज के विभिन्न संसाधनों का विकास एवं उनका समुचित उपयोग समाज के प्रत्येक घटक की इच्छापूर्ति, आचरण इत्यादि प्रबंध के सामाजिक उद्देश्य हैं।



प्रबंध का महत्व

मानव सभ्यता के प्रारंभ से ही व्यवसायिक तथा गैर व्यवसायिक क्षेत्रों में तथा संगठनों में प्रबंध का अत्यधिक महत्व रहा है। प्रत्येक व्यवसाय में प्रबंध का महत्व निम्नलिखित विवरणों से समझा जा सकता है-
1 प्रतिस्पर्धा का सामना करना
वर्तमान प्रतिस्पर्धा के युग में प्रतिद्वंदी उपक्रमों के सामने टिके रहने और गुणवत्ता, लागत और कीमत इत्यादि में बेहतर प्रदर्शन करना प्रबंध द्वारा ही संभव हो पाता है।
2 संसाधनों का विकास
प्रबंध के अभाव में संसाधनों का समुचित विकास संभव नहीं हो पाता है, क्योंकि संस्था का विकास इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उसके पास कितने संसाधन उपलब्ध हैं बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि उपलब्ध संसाधनों का प्रबंध किस प्रकार किया गया है।
3 संसाधनों का समुचित उपयोग
किसी भी संस्था में संसाधनों की मात्रा सीमित होती है किंतु इसके साथ ही उनके वैकल्पिक उपयोग भी संभव होते हैं।
4 नवप्रवर्तन एवं उसका उपयोग
किसी संस्था के बहुमुखी विकास के लिए नवप्रवर्तन एवं उसका उपयोग आवश्यक है। नवर्तन का उद्देश्य ग्राहकों को अधिकतम संतुष्टि प्रदान करना है। जो संस्था अपने प्रबंध में नवप्रवर्तन पर जितना अधिक ध्यान देती है, वह संस्था उतनी ही अधिक अग्रणी व सफल होती है।
5 संगठन का अस्तित्व संरक्षण एवं वृद्धि
अस्तित्व संरक्षण, वृद्धि एवं लाभ प्रत्येक संगठन के प्रमुख उद्देश्य होते हैं। यह तीनों उद्देश्य परस्पर निर्भर होते हैं। इनमें सामंजस्य स्थापित करके संगठन के अस्तित्व एवं वृद्धि को सुनिश्चित किया जाता है। भारत में 1907 में स्थापित टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी व सफल कंपनी है।
6 देश का आर्थिक विकास किसी भी देश के आर्थिक विकास में सबसे प्रमुख योगदान प्रबंध का होता है। माइकेल पोर्टर के अनुसार किसी देश के किसी उद्योग में प्रतिस्पर्धी योग्यता चार कारकों पर निर्भर होती हैं- 1संसाधनों की स्थिति, 2 उत्पादों व सेवाओं की मांग की स्थिति, 3 संबंधित एवं सहायक उद्योगों की स्थिति, 4 विभिन्न संगठनों के बीच प्रतिस्पर्धा। यदि यह सभी कारक अनुकूल हो तो देश का विकास तीव्र गति से होता है। देश के विकास के लिए स्थानीय संगठनों के प्रबंध को प्रभावी बनाना आवश्यक है।
7 विभिन्न रुचि समूहों में समन्वय
किसी संगठन में बहुत से रूचि समूह होते हैं इन सभी समूहों की संगठन से अलग अलग अपेक्षाएं होती है। ऐसी अवस्था में प्रबंध संगठन से संबंधित समूहों की अपेक्षाओं में समन्वय स्थापित करता है ताकि प्रत्येक समूह की अपेक्षाएं उसके योगदान के बराबर हो।
8 समाज में स्थिरता
समाज में स्थिरता लाने के लिए प्रबंध बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। यह स्थिरता समाज में परिवर्तन की निरंतरता द्वारा प्राप्त होती हैं। यदि यह परिवर्तन तेज गति से होते हैं तो निरंतरता के अभाव में समाज में विखंडन प्रारंभ हो जाता है। ऐसी स्थिति में प्रबंध ही समाज को विखंडन के दुष्परिणामों से बचाता है।



प्रबंध की प्रकृति

समय के साथ-साथ प्रबंध की प्रकृति भी परिवर्तित होती रही है। वर्तमान में प्रबंध को निम्नलिखित रूपों में देखा जा सकता है-
1 प्रबंध बहु-विधा के रूप में
2 प्रबंध विज्ञान एवं कला के रूप में
3 प्रबंध पेशे के रूप में
4 प्रबंध की सार्वभौमिक प्रक्रिया
1प्रबंध विधा के रूप में
ज्ञान की प्रत्येक स्वतंत्र शाखा को विधा कहा जाता है। प्रत्येक विधा का अपना उद्देश्य होता है और उनकी पूर्ति के लिए विभिन्न सिद्धांतों का विकास किया जाता है। प्रबंध अपने आप में एक स्वतंत्र विधा है किंतु सिद्धांतों को विकसित करने में विभिन्न विधाओं के योगदान के कारण उसे बहु-विधा के रूप मे जाना जाता है। यह विधाएं निम्नलिखित हो सकती है- भौतिक विज्ञान, जीव विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, राजनीतिक शास्त्र, इतिहास व्यवहार विज्ञान, मनोविज्ञान इत्यादि।
2 प्रबंध विज्ञान एवं कला के रूम में

प्रबंध को कला एवं विज्ञान दोनों माना जाता है



1 विज्ञान के रूप में
प्रबंध को विज्ञान के रूप में मानने के लिए निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं-
1प्रबंध के सिद्धांतों को प्रयोगों के आधार पर प्रतिपादित किया जाता है।
2 प्रबंध के सिद्धांतों का प्रयोग विभिन्न समस्याओं के समाधान हेतु होता है।
3 प्रबंध के सिद्धांत परिवर्तनीय एवं परिस्थितिजन्य होते हैं।
4 प्रबंध में वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग किया जाता है।
उपरोक्त विशेषताओं एवं तर्कों की सहायता से प्रबंध को विज्ञान कहा जा सकता है।

प्रबंध के सिद्धांत परिवर्तनीय एवं परिस्थितिजन्य होते हैं। अतः प्रबंध को शुद्ध विज्ञान की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है।

प्रबंध कला के रूप में

प्रबंध में कला की समस्त विशेषताएं पाई जाती है जो कि निम्नलिखित हैं :-

1 प्रबंध अन्य कलाओं जैसे संगीत, नृत्य, चित्रकारी आदि की भांति व्यक्तिगत गुणों पर आधारित है।

2 अन्य कलाओं की भांति प्रबंध में निरंतर अभ्यास से दक्षता प्राप्त की जा सकती हैं।

3 अन्य कलाओं की भाँति प्रबंध मे सृजनात्मकता प्राप्त  की जा सकती है, जिसका उपयोग समस्याओं के समाधान में हो सकता है।

उपरोक्त विशेषताओं के आधार पर प्रबंध को कला की श्रेणी में रखा जा सकता है।

संक्षिप्त में हम प्रबंध को विज्ञान एवं कला दोनों की श्रेणी में रख सकते हैं। क्योंकि प्रबंध में सिद्धांतों का ज्ञान जितना आवश्यक है, उतना ही उन सिद्धांतों का प्रयोग में लाने की कला का। वर्तमान में दोनों एक दूसरे के पूरक हैं इसलिए एक कहावत में कहा गया है कि “प्रायोगिक ज्ञान शक्ति है”

प्रबंध पेशे के रूप में

वर्तमान में प्रबंध के अध्यन को भी एक पेशेवर शास्त्र की श्रेणी में डाल दिया गया है। प्रबंध वास्तव में एक पेशा है या नहीं तथा यदि हैं तो इस पेशे का स्वरूप किस प्रकार का है यह जानने के लिए पेशे की विशेषताओं को समझना आवश्यक है।