मध्यपाषाण, संस्कृति, प्रौद्योगिकी में नवीन विकास, नवपाषाण संस्कृति की अवधारणा, अंत्येष्टि प्रथा के प्रकार

बी.ए. के छात्रों के लिए मध्यपाषाण, नवपाषाण संस्कृति की अवधारणा, प्रौद्योगिकी में नवीन विकास, और अंत्येष्टि प्रथा के प्रकार पर विस्तृत नोट्स और दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर यहाँ दिए गए स्रोतों के आधार पर प्रस्तुत हैं:


मध्यपाषाण एवं नवपाषाण संस्कृति: नोट्स एवं प्रश्नोत्तर

पुरापाषाण और मध्यपाषाण काल सामाजिक विकास की आखेटक-संग्राहक अवस्था को दर्शाते हैं। मध्यपाषाण युग पुरापाषाण युग के बाद और नवपाषाण युग से पहले का संक्रमण काल है।

भाग अ: संक्षिप्त टिप्पणी (Notes)

1. मध्यपाषाण संस्कृति (Mesolithic Culture)

मध्यपाषाण काल को होलोसीन युग की शुरुआत के साथ जोड़ा जाता है। इस सभ्यता की अवधि लगभग ईसा पूर्व 8000 से ईसा पूर्व 4000 तक रही।

  • औजार एवं प्रौद्योगिकी में नवीन विकास:
    • इस काल की प्रमुख पहचान लघुपषाण (Microliths) हैं। ये छोटे-छोटे पत्थर के खंडों के टुकड़ों से बने उपकरण होते थे, जिनकी लंबाई 1 से 8 सेंटीमीटर तक होती थी।
    • इन औजारों में तक्षणी (Burin), अर्धचंद्रक (Lunate), बालचंद्रक, त्रिकोण (Triangle), नोकदार और समलंब (Trapeze) आकार की पत्तियाँ (Blades) शामिल थीं।
    • ये लघुपषाण उपकरण अस्थियों या काष्ठ के हत्थे (Handle) पर जड़ दिए जाते थे। फिलिस्तीन की नतूफी संस्कृति में हड्डी के हँसिये (Sickle) का उपयोग होता था, जिसमें लघुपषाण उपकरण के दाँत लगाए जाते थे, संभवतः जंगली घास काटने के लिए।
    • औजार बनाने के लिए दबाव तकनीक (Pressure Technique) का प्रयोग किया जाता था।
  • जीवनशैली और अर्थव्यवस्था:
    • जलवायु में परिवर्तन के कारण पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं में बदलाव आया, और शिकार करने तथा खाद्य सामग्री का संग्रहण करने वाले समुदाय तेजी से भारत भर में फैल गए।
    • मानव ने शिकार के साथ-साथ जंगली अनाज के दानों का संग्रह करना शुरू कर दिया, इसलिए इसे शिकार एवं खाद्य संग्रहण की अवस्था भी कहा जाता है।
    • खाद्य सामग्री की प्राप्ति के लिए आखेट, संग्रहण के अतिरिक्त मछली मारना भी एक मुख्य साधन था।
    • पशुपालन की ओर बढ़ते कदम की शुरुआत इसी युग में पाते हैं। बागौड़ (राजस्थान) में पालतू भेड़ और बकरियों की अस्थियाँ ईसा पूर्व 5वीं सदी की बताई जाती हैं।
    • भीमबेटका, आदमगढ़, प्रतापगढ़, और मिर्जापुर जैसे स्थलों पर प्राप्त शैल चित्र इस काल के सामाजिक जीवन की झलक देते हैं। चित्रों में आखेट करते, पौधों को चुनते, जानवरों को फँसाते, साथ बैठकर खाते, नाचते और बाजे बजाते लोगों को दर्शाया गया है।

2. नवपाषाण संस्कृति की अवधारणा (Concept of Neolithic Culture)

नवपाषाण युग (Neolithic Age) पाषाण युग की अंतिम अवस्था है, जो मध्यपाषाण युग के बाद आती है।

  • पहचान और विशेषताएँ:
    • इस काल की पहचान घिसे हुए एवं पॉलिश किए औजारों (Polished Tools) और मृद्भांडों से की जाती है।
    • नवपाषाण युग का आगमन कृषि की शुरुआत (खाद्य उत्पादन) के साथ हुआ, जिसे “नवपाषाण क्रांति” (Neolithic Revolution) कहा जाता है।
    • गॉर्डन वी. चाईल्ड (Gordon V. Childe) ने कृषि और पशुपालन गतिविधियों के विकास को रेखांकित करते हुए, मानव द्वारा की गई इस प्रगति पर जोर देते हुए इसे ‘नवपाषाण क्रांति’ की संज्ञा दी थी।
    • हालांकि, आलोचक इसे रक्तपात से भरा आकस्मिक परिवर्तन मानने के बजाय, क्रमिक विकास या रूपांतरण के रूप में देखते हैं, जो पाषाण युग का चरमोत्कर्ष था।
  • खाद्य उत्पादन का महत्व (जीवनशैली परिवर्तन):
    • नवपाषाणकालीन लोग शिकार और संग्रहण पर निर्भर अपने पूर्ववर्तियों के विपरीत, कृषि (गेहूँ, जौ, चावल, बाजरा, मक्का) और पशुपालन (गाय-बैल, भेड़-बकरी) पर निर्भर करते थे।
    • इस युग की एक अन्य विशेषता स्थानबद्ध जीवन (Sedentary Life) का आरंभ होना था, जिसके कारण गाँवों, कस्बों और अंत में नगरों का निर्माण संभव हुआ।
    • नवपाषाण काल में शवाधानों के साथ दैनिक आवश्यकता की वस्तुएं भी प्राप्त हुई हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि इस काल का मानव पुनर्जन्म अथवा मृत्यु के बाद के जीवन में विश्वास करता था।

3. प्रौद्योगिकी में नवीन विकास (Neolithic Innovations)

नवपाषाण काल में प्रौद्योगिकी का विकास केवल औजारों तक सीमित नहीं था, बल्कि जीवनशैली के हर पहलू में क्रांतिकारी परिवर्तन आया।

  • पत्थर के औजारों में उन्नति:
    • इस युग में औजार घिसकर पॉलिशदार बनाए जाने लगे। इनकी सतह चिकनी और गोल होती थी, जिससे बेहतर धार बनती थी।
    • पत्थर की कुल्हाड़ियाँ (Celts/Kulhadi) प्रमुख औजार थीं।
    • खाद्य उत्पादन से संबंधित नए औजार जैसे मूसल, खरल, चक्की (कूटना-पीसना), कुठार और हँसिया (फसल काटने के लिए) काम में लाए जाने लगे।
  • कुंभकारी (Pottery) और शिल्प:
    • मिट्टी के बर्तन बनाना इस युग का महत्वपूर्ण आविष्कार था।
    • शुरुआती मृद्भांड हाथ से बनाए गए, बेड़ौल और अधपके होते थे। बाद में चाक पर बने मृणपात्रों के चिह्न मिलने लगे, जिसने कुंभकारी उद्योग में क्रांति ला दी।
    • कताई, बुनाई और माल निर्माण जैसे शिल्पों का आविष्कार भी हुआ।
  • धातु प्रौद्योगिकी (Iron Age Context):
    • उत्तर भारत में छठी शताब्दी ईसा पूर्व से कुछ पहले लोहे का प्रयोग बड़े पैमाने पर होने लगा, जिससे लोह उपकरणों के प्रकारों में बढ़ोतरी हुई।
    • कृषि कार्य में लोहे के उपकरणों के प्रयोग के फलस्वरूप मध्य गंगा घाटी के क्षेत्रों में खेती करना संभव हो सका।
    • लोहे के व्यापक प्रचलन ने न केवल कृषि बल्कि वास्तुकला और घरेलू धंधों पर भी प्रभाव डाला, और छठी शताब्दी ईसा पूर्व में द्वितीय नगरीकरण (Second Urbanization) में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
    • सतपथ ब्राह्मण में लोहे का संबंध कृषक वर्ग से बताया गया है, और अथर्ववेद में लोहे की फाल (हल का) का उल्लेख आता है। कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता में छह अथवा बारह बैलों द्वारा खींचे जाने वाले हलों का उल्लेख मिलता है, जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि फाल लोहे का रहा होगा।

4. अंत्येष्टि प्रथा के प्रकार (Types of Burial Practices) (महापाषाण संस्कृति के संदर्भ में)

महापाषाण (Megalithic) संस्कृति, जिसका उदय नवपाषाण युग की समाप्ति के पश्चात् दक्षिण भारत में हुआ, मुख्य रूप से अपनी शवाधान प्रथा के लिए जानी जाती है। मेगालिथ यूनानी भाषा के शब्द ‘मेगास’ (विशाल) और ‘लिथॉस’ (पाषाण) से बना है, जिसका अर्थ विशाल पाषाण है।

इन शवाधानों की पहचान लौह उपकरण और काले व लाल मृद्भाण्डों की बड़ी संख्या से होती है, हालांकि इनका प्रयोग इससे पहले और बाद में भी होता रहा।

दिए गए स्रोतों के अनुसार, महापाषाणकालीन अंत्येष्टि प्रथाओं के निम्नलिखित प्रकार हैं:

  1. छत्र शिला (Umbrella Stone):
    • यह वह समाधि है जिसमें शव सामग्री रखने के बाद गड्ढे के ऊपर गुंबदाकार एक बड़ा शिलाखंड रख दिया जाता था।
    • दूर से देखने पर यह खुले हुए छत्र (छाते) की तरह प्रतीत होता है, इसलिए इसे ‘छत्र शिला’ कहा जाता है।
    • इसके साक्ष्य केरल के अरियून्नूर और चेरमनद में मिले हैं।
  2. फण शिला (Cobra Hood Stone/Kudayikall):
    • इन समाधियों में मानव अस्थियों और अन्य सामग्री को गड्ढे में रखकर, ऊपर मिट्टी भर दी जाती थी, और उस पर गोलाकार एक शिला उल्टी करके रख दी जाती थी।
    • दूर से देखने पर यह सर्प के फैले हुए फण की तरह दिखाई देती हैं। स्थानीय भाषा में इसे कुडाईकल कहा जाता है।
  3. गुफा समाधि (Rock-cut Cave Burials):
    • इनमें केरल प्रदेश में पहाड़ियों को काटकर शैल उत्कीर्ण गुफाओं का निर्माण किया गया है।
    • ये गुफाएँ आयताकार अथवा वर्गाकार होती हैं, जिनकी छत प्रायः गुंबदाकार होती है। प्रवेश द्वार छोटे (30-35 सेंटीमीटर) होते थे।
    • इनमें एक से अधिक मृतकों को दफनाने के साक्ष्य मिले हैं, साथ ही मिट्टी के बर्तन और लोहे के उपकरण भी प्राप्त हुए हैं।
  4. अंत्येष्टि कलश (Urn Burial):
    • इनमें बच्चों को दफनाने के लिए बड़े मृद्भांडों (अस्थि कलश) का उपयोग किया जाता था।
    • अंत्येष्टि सामग्री के रूप में मिट्टी के बर्तन, लोहे व तांबे के औजार कभी-कभी कलश के भीतर या बाहर अगल-बगल रख दिए जाते थे। शव मंजूषा भी रखी जाती थी।
    • इस प्रकार के साक्ष्य ब्रह्मगिरि, मास्की, और आदिचनुल्लूर से मिले हैं, जबकि शान्नूर (चिंगलपट्टू) से शव मंजूषा के साक्ष्य उल्लेखनीय हैं।
  5. विस्तृत शवाधान (Extended Burial):
    • मध्यपाषाण काल में, विशेष रूप से सराय नाहर राय, महदहा जैसे स्थलों से, शवों को विस्तृत रूप से (लंबाई में) दफनाया गया है।
    • इनका दिग्-विन्यास पूर्व-पश्चिम या पश्चिम-पूर्व दिशा में होता था।

भाग ब: दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर (Long Question-Answer)

प्रश्न: मध्यपाषाण संस्कृति की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए नवपाषाण संस्कृति की अवधारणा, प्रौद्योगिकी में नवीन विकास और अंत्येष्टि प्रथा के प्रकारों का विस्तृत वर्णन कीजिए।

परिचय

मध्यपाषाण काल (Mesolithic, लगभग 8000 ईसा पूर्व से 4000 ईसा पूर्व) और नवपाषाण काल (Neolithic) प्रागैतिहासिक मानव के क्रमिक विकास के महत्वपूर्ण चरण हैं। मध्यपाषाण युग आखेटक-संग्राहक अवस्था का अंतिम दौर था जिसने नवपाषाण संस्कृति (खाद्य उत्पादक अवस्था) के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

1. मध्यपाषाण संस्कृति और प्रौद्योगिकी में क्रमिक विकास

मध्यपाषाण संस्कृति को होलोसीन युग के आगमन और जलवायु में आए परिवर्तनों की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाता है।

क. औजारों में सूक्ष्मता (लघुपषाण प्रौद्योगिकी): मध्यपाषाण युग में पत्थर के उपकरणों के निर्माण में एक बड़ा तकनीकी बदलाव देखा गया, जहाँ पुरापाषाण काल के भारी, स्थूल उपकरणों के स्थान पर लघुपषाण (Microliths) नामक छोटे, तराशे हुए उपकरणों का प्रयोग शुरू हुआ। इन औजारों को दबाव तकनीक (Pressure Technique) से बनाया जाता था। इन छोटे उपकरणों को हड्डी या लकड़ी के हत्थे पर जड़कर मिश्रित औजार (Composite Tools) बनाए जाते थे।

ख. जीवनशैली एवं अर्थव्यवस्था में बदलाव: शिकार और खाद्य संग्रहण (कंदमूल, फल, शहद) इस काल की जीविका का मुख्य आधार था। हालांकि, इस काल में खाद्य संग्रहण की प्रवृत्ति बढ़ी। राजस्थान के बागौड़ जैसे स्थलों से पालतू भेड़ और बकरियों की अस्थियाँ मिली हैं, जो ईसा पूर्व 5वीं सदी की हैं। यह पशुपालन की ओर बढ़ते हुए चरण को दर्शाता है। नर्मदा घाटी में मछली पकड़ना भी खाद्य आपूर्ति का मुख्य साधन था। भीमबेटका और आदमगढ़ जैसे स्थलों पर प्राप्त शैल चित्र, शिकार, भोजन साझा करने और सामुदायिक गतिविधियों को दर्शाते हैं।

2. नवपाषाण संस्कृति की अवधारणा एवं क्रांति

नवपाषाण युग पाषाण काल का वह अंतिम चरण है, जिसकी पहचान कृषि (खाद्य उत्पादन) के आरंभ और पॉलिशदार पत्थरों के औजारों से होती है।

क. नवपाषाण क्रांति (Neolithic Revolution) की अवधारणा: प्रागैतिहासविद् गॉर्डन वी. चाईल्ड ने इस दौर को ‘नवपाषाण क्रांति’ की संज्ञा दी थी। उनका मानना था कि कृषि और पशुपालन के विकास ने भोजन प्राप्त करने की प्रक्रिया को मौलिक रूप से बदल दिया और मनुष्य के जीवन में एक विकासवादी परिणाम लेकर आया। चाईल्ड की एक पुरानी परिकल्पना यह थी कि कृषि का विकास केवल एक ‘लघु-केंद्रिक क्षेत्र’ (जैसे मेसोपोटामिया का फर्टाइल क्रेसेंट) में हुआ और फिर वहाँ से यह विचार अन्य भागों में फैल गया (जिसे विकिरणवादी धारणा – Diffusionist Paradigm कहा जाता है)। हालांकि, आधुनिक अनुसंधान यह स्पष्ट करते हैं कि कृषि और पशुपालन का विकास स्वतंत्र और स्वाभाविक तौर पर कई क्षेत्रों में हुआ। यह विकास जलवायु परिवर्तन (होलोसीन युग), बढ़ती आबादी, और मानव समूहों की विकसित होती तकनीकी रणनीतियों के सम्मिश्रण का परिणाम था।

ख. तकनीकी और सांस्कृतिक विशेषताएँ: नवपाषाण युग के लोगों ने स्थानबद्ध जीवन अपना लिया। वे स्थायी अधिवासी बन गए।

  1. औजारों में पॉलिश: इस युग के औजार घिसकर और पॉलिश करके बनाए जाते थे, जिससे उनकी धार बेहतर हो जाती थी। पॉलिशदार कुल्हाड़ियाँ (सेल्ट) प्रमुख थीं।
  2. कृषि उपकरण: कूचने-पीसने वाले उपकरण जैसे मूसल, खरल, और चक्की इस काल की प्रमुख पहचान हैं।
  3. कुंभकारी (बर्तन): अनाज रखने, पकाने और खाने के लिए मिट्टी के बर्तनों की आवश्यकता हुई। हाथ से बनाए गए मृद्भांडों के बाद चाक से बने मृणपात्रों का प्रयोग शुरू हुआ।
  4. धातु का ज्ञान: पाकिस्तान में मेहरगढ़ के नवपाषाण युग (अवधि I, II, III) में ताँबे के पदार्थ मिले हैं, जिससे संकेत मिलता है कि वहाँ के लोग ताँबा गलाना जानते थे।

3. लौह प्रौद्योगिकी का नवीन विकास (Megalithic/Later Vedic context)

नवपाषाण काल के बाद दक्षिण भारत में महापाषाण संस्कृति का उदय हुआ। इसी अवधि (उत्तर वैदिक काल, 1000 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व) के दौरान लोहे का प्रयोग एक क्रांतिकारी तकनीकी विकास बन गया।

  • कृषि में लोहे का प्रयोग: छठी शताब्दी ईसा पूर्व से लोहे का प्रयोग बड़े पैमाने पर होने लगा, जिससे लोह उपकरणों के प्रकारों में वृद्धि हुई। लोहे के औजारों के कारण मध्य गंगा घाटी के सघन वनों को साफ करना और धान, गन्ना, कपास, गेहूँ आदि की खेती करना संभव हो सका।
  • वैदिक साहित्य में इसका उल्लेख है। अथर्ववेद में लोहे की फाल का उल्लेख है। शतपथ ब्राह्मण में लोहे का संबंध कृषक वर्ग से बताया गया है। तैत्तिरीय संहिता में भारी हलों का उल्लेख है, जो संभवतः लोहे के फाल वाले थे।
  • व्यापार और नगरीकरण: लोह तकनीक के व्यापक प्रचलन ने वास्तुकला, घरेलू धंधों और कृषि पर व्यापक प्रभाव डाला। यह तकनीक द्वितीय नगरीकरण (6वीं शताब्दी ईसा पूर्व) के पीछे एक महत्वपूर्ण कारक रही, जिसमें चम्पा, राजगृह, श्रावस्ती, कौशाम्बी जैसे नगरों का विकास हुआ।

4. अंत्येष्टि प्रथा के प्रकार (Burial Practices)

क. मध्यपाषाणकालीन अंत्येष्टि: मध्यपाषाण काल में मानव शवों को दफनाने की परंपरा थी, जिसके साथ अंत्येष्टि सामग्री भी रखी जाती थी।

  • सराय नाहर राय और महदहा (उत्तर प्रदेश) में प्राप्त शवाधान आवास क्षेत्र के अंदर बने थे।
  • शव को प्रायः विस्तृत रूप से (सीधा लिटाकर) पश्चिम-पूर्व या पूर्व-पश्चिम दिशा में दफनाया जाता था, जो संभवतः सूर्योदय या सूर्यास्त से प्रभावित था।
  • अंत्येष्टि सामग्री में लघुपषाण उपकरण, जानवरों की हड्डियाँ, और घोंघे रखे हुए मिलते थे, जो मृत्यु के बाद के जीवन में विश्वास को दर्शाते हैं।

ख. महापाषाणकालीन अंत्येष्टि (मुख्यतः लौह युग, दक्षिण भारत): महापाषाण संस्कृति (Megalithic Culture) अपने विशाल पाषाणों (Megas + Lithos) के उपयोग के कारण जानी जाती है, जो मृतकों के अवशेषों को सुरक्षित रखने के लिए इस्तेमाल होते थे। दक्षिण भारत में यह मुख्यतः लौह युग की संस्कृति थी, जिसमें बड़ी संख्या में लौह उपकरण और काले-लाल मृद्भाण्ड शवाधानों में रखे जाते थे।

प्रमुख महापाषाणिक अंत्येष्टि प्रथाएँ (प्रकार) निम्नलिखित हैं:

  1. छत्र शिला (Umbrella Stone): एक विशाल गुंबदाकार शिलाखंड जो गड्ढे वाली समाधि पर रखा जाता था।
  2. फण शिला (Kudayikall): गोल शिलाखंड जो उल्टे फण की तरह दिखाई देता था, अस्थियों के ऊपर रखा जाता था।
  3. गुफा समाधि (Rock-cut Caves): केरल में पहाड़ियों को काटकर बनाई गई आयताकार या वर्गाकार समाधि गुफाएँ, जहाँ लोहे के उपकरण और मिट्टी के बर्तन पाए गए हैं।
  4. अंत्येष्टि कलश (Urn Burial): बच्चों को दफनाने के लिए बड़े मिट्टी के बर्तनों (कलशों) का उपयोग, जिनमें लोहे या तांबे के औजार भी रखे जाते थे। इसके साक्ष्य ब्रह्मगिरि और मास्की से मिले हैं।
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