अध्याय 2 – वन और वन्य जीवन संसाधन
1. जैव विविधता (Biodiversity)
- हमारे आस-पास विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे, जानवर और सूक्ष्म जीव पाए जाते हैं।
- यह सब मिलकर जैव विविधता कहलाते हैं।
- मनुष्य और अन्य जीव एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं।
- वायु, जल और भूमि के बिना जीवन संभव नहीं।
- पौधे, पशु और सूक्ष्मजीव प्राकृतिक संतुलन बनाए रखते हैं।
2. भारत की जैव विविधता
- भारत विश्व के सबसे समृद्ध जैव विविधता वाले देशों में से एक है।
- यहाँ दुनिया की कुल जीव प्रजातियों का लगभग 8% हिस्सा पाया जाता है (लगभग 16 लाख प्रजातियाँ)।
- इनमें से बहुत-सी प्रजातियाँ लुप्त होने के खतरे में हैं।
- कारण:
- जंगलों की कटाई
- शिकार
- प्रदूषण
- आबादी बढ़ने से प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव
3. संरक्षण की आवश्यकता
- तेजी से घटते जंगल और वन्य जीवन को बचाना जरूरी है।
- संरक्षण से:
- पारिस्थितिकी संतुलन बना रहता है।
- जैव विविधता सुरक्षित रहती है।
- आने वाली पीढ़ियों को भी लाभ मिलेगा।
4. भारत में वन और वन्य जीवन का संरक्षण
1. संरक्षण की आवश्यकता
- वनों और वन्य जीवों का तेज़ी से नष्ट होना एक बड़ी समस्या है।
- कारण:
- खेती का विस्तार
- औद्योगिकीकरण
- शहरीकरण
- शिकार और अवैध व्यापार
2. सरकार के प्रयास
- 1972 – भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (Wildlife Protection Act) लागू।
- इसके अंतर्गत संरक्षित प्रजातियों की सूची बनाई गई।
- शिकार और व्यापार पर रोक लगाई गई।
- राष्ट्रीय उद्यान (National Parks) और वन्यजीव अभयारण्य (Sanctuaries) स्थापित किए गए।
- विशेष प्रजातियों को बचाने के लिए प्रोजेक्ट शुरू हुए:
- 1973 – प्रोजेक्ट टाइगर (Project Tiger)
- कश्मीर में हंगुल, असम में गोल्डन लंगूर, गंगा में डॉल्फिन, पश्चिमी घाट में शेर इत्यादि की सुरक्षा योजनाएँ।
3. संरक्षित वन क्षेत्र
भारत में संरक्षित क्षेत्रों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया:
- आरक्षित वन (Reserved Forests): सबसे कड़ी सुरक्षा, यहाँ वनों का उपयोग सरकार के नियंत्रण में।
- संरक्षित वन (Protected Forests): कुछ सीमा तक जनता को उपयोग की अनुमति।
- अवर्गीकृत वन (Unclassed Forests): निजी और सामुदायिक स्वामित्व वाले वन।
4. वन संरक्षण में समुदाय की भूमिका
- कई जगह लोगों ने स्वयं आगे आकर जंगलों और वन्यजीवों की रक्षा की।
- उदाहरण:
- राजस्थान का बिश्नोई समाज → हिरण और पेड़ों की रक्षा करता है।
- उत्तराखंड का चिपको आंदोलन → पेड़ों को कटने से बचाया गया।
- नागालैंड, मिज़ोरम, झारखंड आदि में स्थानीय आदिवासी समुदाय अपने पारंपरिक तरीकों से वनों की रक्षा करते हैं।
5. वन और वन्यजीव संरक्षण के प्रकार व सामुदायिक प्रयास
1. संरक्षण के प्रकार
वनों और वन्यजीवों की रक्षा अलग-अलग तरीकों से की जाती है:
- राष्ट्रीय उद्यान (National Parks):
- यहाँ शिकार, चराई, पेड़ों की कटाई आदि पूरी तरह निषिद्ध।
- केवल संरक्षण और अनुसंधान की अनुमति।
- उदाहरण: जिम कॉर्बेट, काज़ीरंगा, रणथंभौर।
- वन्यजीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuaries):
- यहाँ वन्यजीव सुरक्षित रहते हैं।
- कुछ मानवीय गतिविधियाँ (जैसे लकड़ी इकट्ठा करना, चराई) नियंत्रित रूप से अनुमति प्राप्त।
- उदाहरण: सरिस्का (राजस्थान), बांदीपुर (कर्नाटक)।
- बायोस्फीयर रिज़र्व (Biosphere Reserves):
- बड़े क्षेत्र जो जैव विविधता के लिए सुरक्षित रखे जाते हैं।
- अनुसंधान, शिक्षा और पर्यटन की भी सुविधा।
- उदाहरण: नीलगिरी, सुंदरबन, नंदा देवी।
2. सामुदायिक प्रयास
स्थानीय समाज ने भी वनों और वन्यजीवों की रक्षा में योगदान दिया है:
- बिश्नोई समाज (राजस्थान):
- हिरण और पेड़ों की रक्षा।
- महिलाओं ने पेड़ों को काटने से रोकने के लिए बलिदान भी दिया।
- चिपको आंदोलन (उत्तराखंड):
- गाँव के लोगों ने पेड़ों को काटने से रोकने के लिए उन्हें गले लगाया।
- नारा: “पेड़ नहीं कटने देंगे।”
- नर्मदा बचाओ आंदोलन:
- बड़े बाँधों के कारण होने वाली पर्यावरणीय क्षति पर आवाज़ उठाई।
- असम, नागालैंड, झारखंड, मिज़ोरम:
- आदिवासी समाज अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों से जंगलों और पवित्र उपवनों की रक्षा करता है।
3. संरक्षण की महत्ता
- पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना।
- आने वाली पीढ़ियों को प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध कराना।
- जैव विविधता और सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करना।
6. समाज और वनों का संयुक्त प्रबंधन (Joint Forest Management – JFM)
1. पृष्ठभूमि
- पहले वनों का प्रबंधन केवल सरकार करती थी।
- स्थानीय लोगों की भागीदारी न होने से संरक्षण सफल नहीं हो पा रहा था।
- इसलिए संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) की शुरुआत हुई।
2. संयुक्त वन प्रबंधन (JFM) क्या है?
- यह सरकार और स्थानीय समाज की साझेदारी पर आधारित कार्यक्रम है।
- उद्देश्य –
- वनों का संरक्षण
- वनों का पुनर्जीवन (regeneration)
- स्थानीय लोगों को वनों से लाभ पहुँचाना
3. शुरुआत
- सबसे पहले 1988 में ओडिशा सरकार ने JFM की शुरुआत की।
- इसके बाद अन्य राज्यों ने भी इसे अपनाया।
4. कार्यप्रणाली
- गाँव के स्तर पर समितियाँ बनाई जाती हैं।
- ये समितियाँ जंगल की देखभाल करती हैं।
- इसके बदले स्थानीय लोगों को –
- सूखी लकड़ी, चारा, फल-फूल, पत्तियाँ आदि उपयोग की अनुमति।
- कभी-कभी वन उपज का हिस्सा भी दिया जाता है।
5. लाभ
- वनों का संरक्षण अधिक प्रभावी हुआ।
- ग्रामीणों को आर्थिक लाभ मिला।
- वन्यजीवों की रक्षा संभव हुई।
- लोगों में “जंगल हमारे हैं” की भावना विकसित हुई।
Notes Summary
1. जैव विविधता (Biodiversity)
- पेड़-पौधे, पशु, पक्षी, सूक्ष्मजीव – सब मिलकर जैव विविधता कहलाते हैं।
- भारत में विश्व की लगभग 8% प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
- जंगलों की कटाई, शिकार, प्रदूषण और जनसंख्या वृद्धि से संकट बढ़ा।
2. संरक्षण की आवश्यकता
- जैव विविधता पारिस्थितिक संतुलन के लिए जरूरी।
- पेड़ → ऑक्सीजन, वर्षा, मिट्टी की उर्वरता।
- वन्यजीव → प्राकृतिक श्रृंखला (food chain) को संतुलित रखते हैं।
- संरक्षण से आने वाली पीढ़ियों को भी लाभ।
3. भारत में संरक्षण के प्रयास
- 1972 – वन्यजीव संरक्षण अधिनियम लागू।
- शिकार और अवैध व्यापार पर रोक।
- राष्ट्रीय उद्यान व अभयारण्य स्थापित।
- 1973 – प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत।
- कश्मीर का हंगुल, गंगा डॉल्फिन, शेर, गोल्डन लंगूर जैसी प्रजातियों के लिए विशेष योजनाएँ।
4. वन क्षेत्रों के प्रकार
- आरक्षित वन (Reserved Forest): सबसे अधिक सुरक्षा, सरकारी नियंत्रण।
- संरक्षित वन (Protected Forest): सीमित गतिविधियाँ, आंशिक उपयोग।
- अवर्गीकृत वन (Unclassed Forest): निजी व सामुदायिक स्वामित्व।
5. संरक्षण के अन्य प्रकार
- राष्ट्रीय उद्यान (National Parks): पूरी तरह सुरक्षित क्षेत्र।
- अभयारण्य (Sanctuaries): नियंत्रित उपयोग + वन्यजीव सुरक्षा।
- बायोस्फीयर रिज़र्व: बड़े क्षेत्र, अनुसंधान व शिक्षा हेतु।
6. सामुदायिक प्रयास
- बिश्नोई समाज (राजस्थान): हिरण और पेड़ों की रक्षा।
- चिपको आंदोलन (उत्तराखंड): पेड़ों को गले लगाकर कटाई रोकी।
- पवित्र उपवन (Sacred Groves): आदिवासी समाज द्वारा धार्मिक आस्था से संरक्षित जंगल।
- नर्मदा बचाओ आंदोलन: बाँध निर्माण से होने वाले नुकसान के विरुद्ध।
7. संयुक्त वन प्रबंधन (Joint Forest Management – JFM)
- शुरुआत – ओडिशा, 1988।
- सरकार और स्थानीय समाज मिलकर जंगल की रक्षा करते हैं।
- बदले में ग्रामीणों को लकड़ी, चारा, फल-फूल आदि मिलते हैं।
- लाभ – वन संरक्षण सफल, ग्रामीणों को रोज़गार और आय।
✅ निष्कर्ष
- वन और वन्यजीव हमारे जीवन का आधार हैं।
- संरक्षण न केवल पर्यावरणीय संतुलन के लिए, बल्कि आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी आवश्यक है।
- सरकार और समाज दोनों की संयुक्त भागीदारी से ही इनका दीर्घकालिक संरक्षण संभव है।