कक्षा 10 अध्याय 2 संघवाद
✍️ अध्याय 2 : संघवाद
🌍 संघवाद का परिचय
- लोकतांत्रिक देशों में सत्ता का बँटवारा आम बात है।
- सत्ता को ऊपरी स्तर (केंद्रीय) और निचले स्तर (राज्यों/स्थानीय) में बाँटा जाता है।
- जब सत्ता का यह बँटवारा संविधान द्वारा तय हो और दोनों स्तर अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र हों, तो ऐसी व्यवस्था को संघवाद (Federalism) कहते हैं।
🏛 संघीय शासन व्यवस्था क्या है?
- इसमें सत्ता दो स्तरों में बाँटी जाती है:
- केंद्र सरकार (Union Government) – पूरे देश के लिए।
- राज्य सरकारें (State Governments) – राज्यों के लिए।
- दोनों स्तर की सरकारें स्वतंत्र रूप से काम करती हैं।
- यह व्यवस्था एकात्मक शासन (Unitary System) से भिन्न है, क्योंकि उसमें केंद्र सरकार ही सभी अधिकार रखती है।
🌐 संघीय व्यवस्था वाले देश
- जैसे – अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, स्विट्ज़रलैंड, भारत आदि।
- संघीय देशों में आम तौर पर बड़े भौगोलिक क्षेत्र और विविध भाषाएँ, धर्म व संस्कृतियाँ होती हैं।
- विश्व के केवल 25 देशों में संघीय व्यवस्था है, लेकिन इनमें विश्व की लगभग 40% जनसंख्या रहती है।
⚖️ संघीय शासन की मुख्य विशेषताएँ
- दो स्तर की सरकारें (केंद्र और राज्य)।
- दोनों सरकारें नागरिकों पर सीधे शासन करती हैं।
- संविधान में दोनों के अधिकार स्पष्ट रूप से लिखे गए हैं।
- किसी भी बदलाव के लिए दोनों स्तरों की सहमति आवश्यक।
- सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) विवाद सुलझाता है।
- दोनों स्तरों के लिए अलग-अलग राजस्व स्रोत होते हैं।
- उद्देश्य – देश की एकता और विविधता दोनों को बनाए रखना।
📘 भारत में संघीय व्यवस्था
भारत का संघीय ढांचा
- भारत का संविधान संघीय शासन प्रणाली की व्यवस्था करता है।
- संविधान ने केंद्र और राज्यों के बीच सत्ता का स्पष्ट विभाजन किया है।
- भारत को एक संघीय राज्य (Union of States) घोषित किया गया है।
📑 सत्ता का विभाजन (तीन सूचियाँ)
संविधान ने विषयों को तीन सूचियों में बाँटा है –
- संघ सूची (Union List)
- इसमें वे विषय आते हैं जिन पर केवल केंद्र सरकार कानून बना सकती है।
- जैसे – रक्षा, विदेश नीति, रेल, डाक, बैंकिंग, संचार, मुद्रा इत्यादि।
- राज्य सूची (State List)
- इसमें वे विषय शामिल हैं जिन पर केवल राज्य सरकारें कानून बना सकती हैं।
- जैसे – पुलिस, व्यापार, कृषि, सिंचाई, स्थानीय सरकार।
- समवर्ती सूची (Concurrent List)
- इस सूची के विषयों पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।
- जैसे – शिक्षा, विवाह, तलाक, वन, मजदूर संघ।
- लेकिन यदि दोनों में टकराव हो, तो केंद्र का कानून मान्य होगा।
🗂 बची हुई शक्तियाँ (Residuary Powers)
- जो विषय किसी सूची में नहीं आते, उन पर कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार को है।
- जैसे – कंप्यूटर, सॉफ्टवेयर, सूचना प्रौद्योगिकी आदि।
🏞 विशेष प्रावधान
- कुछ राज्यों को विशेष अधिकार दिए गए हैं।
- जैसे – असम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम आदि (अनुच्छेद 371 के तहत)।
- केंद्र शासित प्रदेश (Union Territories) जैसे – चंडीगढ़, लक्षद्वीप, दिल्ली आदि सीधे केंद्र के अधीन होते हैं।
⚖️ संविधान की रक्षा
- यदि केंद्र और राज्यों में विवाद होता है तो सर्वोच्च न्यायालय उसका निपटारा करता है।
- संविधान के संशोधन के लिए केंद्र के साथ-साथ आधे राज्यों की सहमति भी आवश्यक है।
📘 भारत में संघवाद
🗣 भाषाई राज्यों का गठन
🔹 स्वतंत्रता के बाद की स्थिति
- 1947 में आज़ादी मिलने के बाद भारत में कई रियासतें और प्रांत आपस में मिलकर भारतीय संघ बने।
- उस समय राज्यों की सीमाएँ अंग्रेजों के प्रशासनिक ढाँचे पर आधारित थीं, न कि भाषा या संस्कृति पर।
- जनता की माँग थी कि राज्यों का गठन भाषा के आधार पर किया जाए।
🔹 भाषाई राज्यों की माँग
- आंध्र प्रदेश पहला ऐसा राज्य था, जिसे भाषा (तेलुगु) के आधार पर बनाया गया।
- इसके बाद संविधान में संशोधन कर राज्यों के पुनर्गठन के लिए 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग (States Reorganisation Commission) बनाया गया।
- इस आयोग की सिफारिश पर राज्यों का पुनर्गठन हुआ।
🔹 भाषाई राज्यों का महत्व
- इससे भारत और मज़बूत और एकजुट हुआ।
- लोगों को अपनी भाषा और संस्कृति के अनुसार जीने का अधिकार मिला।
- शासन अधिक प्रभावी और जनहितैषी बना।
- भाषाई राज्यों ने भारत की एकता में विविधता (Unity in Diversity) को और मजबूत किया।
🔹 बाद के नए राज्य
- समय-समय पर भारत में नए राज्यों का निर्माण होता रहा।
- उदाहरण:
- 1960 – महाराष्ट्र और गुजरात (बॉम्बे राज्य से)।
- 1966 – हरियाणा, पंजाब से अलग।
- 1972 – मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा।
- 1987 – मिज़ोरम, अरुणाचल प्रदेश और गोवा।
- 2000 – झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़।
- 2014 – तेलंगाना।
📘 भारत में संघवाद
🗣 भाषा नीति (Language Policy)
🔹 संविधान में भाषा का प्रावधान
- भारत एक बहुभाषी देश है, यहाँ 1300 से अधिक भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं।
- संविधान ने किसी एक भाषा को पूरे भारत की राष्ट्रीय भाषा नहीं बनाया है।
- बल्कि, संविधान में 22 अनुसूचित भाषाओं को मान्यता दी गई है।
- हिंदी को राजभाषा (Official Language) का दर्जा दिया गया है।
🔹 हिंदी और अंग्रेज़ी का प्रयोग
- संविधान के अनुसार केंद्र सरकार का कामकाज हिंदी में होना चाहिए।
- लेकिन गैर-हिंदी भाषी राज्यों के विरोध के कारण अंग्रेज़ी को भी हिंदी के साथ-साथ राजकीय कार्यों में मान्यता दी गई।
- आज केंद्र सरकार हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों का उपयोग करती है।
🔹 राज्यों की भाषाएँ
- हर राज्य अपनी-अपनी राजभाषा तय कर सकता है।
- अधिकांश राज्यों ने अपनी स्थानीय भाषा को राजभाषा घोषित किया है।
- उदाहरण:
- तमिलनाडु – तमिल
- पश्चिम बंगाल – बंगाली
- कर्नाटक – कन्नड़
- केरल – मलयालम
🔹 भाषा नीति का महत्व
- इससे सभी भाषाओं और संस्कृतियों का सम्मान सुनिश्चित हुआ।
- हिंदी को बढ़ावा मिला लेकिन अन्य भाषाओं पर थोपने का प्रयास नहीं किया गया।
- इस लचीली नीति से भारत श्रीलंका जैसे संकट से बच गया, जहाँ एक भाषा को थोपने से गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनी थी।
- भारत की भाषा नीति ने राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में मदद की।
📘 भारत में संघवाद
🏛 केंद्र-राज्य संबंध (Centre-State Relations)
🔹 संविधान का प्रावधान
- भारत में केंद्र और राज्यों के बीच संबंध संविधान द्वारा तय किए गए हैं।
- इन संबंधों का मुख्य उद्देश्य है –
- केंद्र और राज्यों की शक्तियों का संतुलन बनाए रखना।
- देश की एकता और अखंडता सुनिश्चित करना।
🔹 आरंभिक दशकों की स्थिति
- आज़ादी के बाद कई दशकों तक केंद्र और अधिकांश राज्यों में एक ही राजनीतिक दल (कांग्रेस) की सरकारें रहीं।
- इस कारण व्यावहारिक रूप से राज्यों ने केंद्र की अधीनता स्वीकार कर ली।
- केंद्र सरकार ने कई बार अपने विशेष अधिकारों का दुरुपयोग करके विपक्षी दलों की राज्य सरकारों को बर्खास्त किया।
🔹 1990 के बाद का दौर
- 1990 के दशक से राज्यों में क्षेत्रीय दल (Regional Parties) मज़बूत हुए।
- केंद्र में भी गठबंधन सरकारें (Coalition Governments) बनने लगीं।
- इस कारण केंद्र सरकार को राज्यों के साथ समझौता करना पड़ा और उनकी शक्तियों का सम्मान करना पड़ा।
- सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने भी कई बार अपने फैसलों से राज्यों के अधिकारों की रक्षा की।
🔹 केंद्र-राज्य संबंधों का महत्व
- इससे संघवाद और मज़बूत हुआ।
- राज्यों को अपने अधिकारों के प्रयोग का अवसर मिला।
- केंद्र सरकार की मनमानी पर रोक लगी।
- लोकतंत्र और सहयोग की भावना को बढ़ावा मिला।
📘 भारत में संघवाद
🏡 स्थानीय सरकार (Local Government / Panchayati Raj System)
🔹 स्थानीय सरकार की आवश्यकता
- भारत जैसे विशाल देश में केवल केंद्र और राज्य स्तर की सरकारें पर्याप्त नहीं हैं।
- गाँवों और शहरों की समस्याओं का हल वहीं रहने वाले लोग बेहतर ढंग से कर सकते हैं।
- इसलिए संविधान ने स्थानीय स्वशासन (Local Self Government) की व्यवस्था की।
🔹 पंचायत राज प्रणाली (ग्राम स्तर पर)
- ग्राम पंचायत –
- गाँव का सबसे निचला स्तर।
- सीधे जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि।
- सरपंच इसका प्रमुख होता है।
- पंचायत समिति (Block / Janpad) –
- कई ग्राम पंचायतों को मिलाकर बनती है।
- इसे ब्लॉक समिति भी कहते हैं।
- जिला परिषद (District Level) –
- पूरे जिले में पंचायत राज का सर्वोच्च निकाय।
- सांसद, विधायक और चुने गए प्रतिनिधि सदस्य होते हैं।
🔹 शहरी स्थानीय निकाय
- नगर पालिका – छोटे कस्बों/शहरों में।
- नगर निगम (Municipal Corporation) – बड़े शहरों में।
- इनका कार्य – सफाई, पानी, सड़कें, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी सुविधाएँ देना।
🔹 73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन (1992)
- स्थानीय सरकार को संवैधानिक दर्जा मिला।
- पंचायतों और नगर निकायों के चुनाव अनिवार्य किए गए।
- महिलाओं, अनुसूचित जाति/जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण सुनिश्चित किया गया।
- प्रत्येक राज्य में राज्य चुनाव आयोग बनाया गया, जो स्थानीय निकाय चुनाव करवाता है।
🔹 महत्व
- जनता को सीधा शासन में भाग लेने का अवसर मिला।
- लोकतंत्र की जड़ें मज़बूत हुईं।
- स्थानीय समस्याओं का समाधान आसान हुआ।
- नागरिकों में भागीदारी और जिम्मेदारी की भावना बढ़ी।