व्यापार संतुलन Balance of Trade

व्यापार संतुलन Balance of Trade पर विस्तृत नोट्स

यद्यपि दिए गए स्रोतों में “व्यापार संतुलन” की औपचारिक परिभाषा कम दी गई है, यह अवधारणा विदेशी व्यापार (Foreign Trade) और भुगतान शेष (Balance of Payments) के संदर्भ में प्रमुखता से दिखाई देती है, जो किसी देश के निर्यात (Exports) और आयात (Imports) के बीच के अंतर को दर्शाता है।

1. पंचवर्षीय योजनाओं में व्यापार शेष और भुगतान शेष की स्थिति

भारतीय आर्थिक नियोजन में, व्यापार संतुलन को मजबूत करना और भुगतान शेष (Balance of Payments) के चालू खाते पर घाटे को नियंत्रण में रखना एक महत्वपूर्ण उद्देश्य रहा है।

(A) सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985–90) के आंकड़े

सातवीं योजना के दौरान व्यापार शेष की स्थिति चिंताजनक थी:

  1. निर्यात और आयात: वर्ष 1989-90 के दौरान, भारत का कुल निर्यात 26,892 करोड़ रुपये था, जबकि कुल आयात 40,642 करोड़ रुपये था।
  2. व्यापार शेष घाटा: इसके परिणामस्वरूप, व्यापार शेष (Trade Balance) पर (-) 13,750 करोड़ रुपये का घाटा दर्ज किया गया।
  3. व्यापार वृद्धि दरें: योजना अवधि (1985-90) के दौरान, निर्यात में रुपए के संदर्भ में 68.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि आयात में 87 प्रतिशत की वृद्धि हुई। आयात में उच्च वृद्धि दर ने व्यापार घाटे को बढ़ाने में योगदान दिया।
  4. चालू खाता घाटा (Current Account Deficit): सातवीं योजना में चालू खाते के घाटे को सकल देशीय उत्पाद (Gross Domestic Product) के औसतन 1.5 प्रतिशत के आस-पास रखने का लक्ष्य था, हालांकि यह योजना अवधि के लिए अनुमानित 2.3 प्रतिशत और 1989-90 के लिए 3.2 प्रतिशत पर लक्षित था।

(B) आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992–97) के लक्ष्य और प्रदर्शन

आठवीं योजना की अवधि में विदेशी व्यापार की वृद्धि दर में सुधार दिखा, लेकिन व्यापार संतुलन को नियंत्रण में रखने का प्रयास जारी रहा:

  1. वृद्धि दर की उपलब्धि: आठवीं योजना की अवधि (1992-97) के दौरान, निर्यात में औसत वार्षिक वृद्धि दर 14.7 प्रतिशत रही, जो कि लक्ष्यित औसत वृद्धि दर 13.1 प्रतिशत से अधिक थी।
  2. चालू खाते का लक्ष्य: आठवीं योजना का उद्देश्य चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit – CAD) को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के औसतन 1.24 प्रतिशत तक नीचे लाना था, जबकि वास्तविक उपलब्धि 1.42 प्रतिशत रही। यह घाटा सीमा के भीतर रखने का प्रयास था।
  3. विदेशी मुद्रा संकट का संदर्भ: आठवीं योजना की शुरुआत के समय (1991-92), देश एक गंभीर भुगतान शेष संकट से गुजर रहा था, जिसके कारण सरकार को अपनी स्वर्ण आरक्षित निधि (Gold Reserves) गिरवी रखनी पड़ी थी।

2. विकास रणनीति में व्यापार संतुलन का महत्व

व्यापार संतुलन की स्थिति देश की समग्र आर्थिक विकास रणनीति को प्रभावित करती है:

  1. भुगतान शेष पर प्रभाव: विदेशी पूंजी (Foreign capital) प्राप्त करने की आवश्यकता है जो भुगतान-शेष की स्थिति (Balance of Payments) को अनुकूल बनाने में सहायक हो।
  2. आयात प्रतिस्थापन और निर्यात संवर्धन: भारतीय नियोजन की रणनीति में, आयात प्रतिस्थापन (Import substitution) और निर्यात संवर्धन (Export promotion) को महत्वपूर्ण घटक माना गया है।
  3. सार्वजनिक क्षेत्र का योगदान: सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (Public Sector Undertakings) के लक्ष्यों में निर्यात निष्पादन (Export performance) में योगदान देना और आयात प्रतिस्थापन (Import substitution) करना भी शामिल था। 1995-96 में सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा कुल निर्यात 15,281 करोड़ रुपये मूल्य का था।
  4. विदेशी मुद्रा की आवश्यकता: विकासशील अर्थव्यवस्थाओं (जैसे भारत) के लिए यह आवश्यक है कि वे उपभोग वस्तुओं (Consumption goods) के आयात को कम करें और पूंजीगत वस्तुओं (Capital goods) के आयात पर जोर दें।
  5. द्वितीय योजना में संकट: द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61) की कठिनाइयों का एक मुख्य कारण विदेशी मुद्रा आरक्षित निधि (Foreign exchange reserve) का गंभीर संकट था, जो 1957-58 में घटकर केवल 100 करोड़ रुपये रह गई थी।
  6. विदेशी सहयोग और पूंजी प्रवाह: यह स्वीकार किया गया है कि भुगतान-शेष को मजबूत बनाने के लिए विदेशी सहयोग और पूंजी प्रवाह आवश्यक हैं। विदेशी निवेश (Foreign Investment) और विदेशी सहयोग (Foreign collaboration) का प्रवाह व्यापारिक और पूंजीगत शेष को संतुलित करने में मदद करता है।
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