कक्षा 10 संस्कृत अध्याय 4 जननी तुल्यवत्सला

कक्षा 10 संस्कृत अध्याय 4 जननी तुल्यवत्सला

चतुर्थः पाठः जननी तुल्यवत्सला

First paragraph

संस्कृत शब्दहिन्दी अर्थ
प्रस्तुतःप्रस्तुत / दिया गया
पाठःपाठ
महर्षिमहान ऋषि
वेदव्यासवेदव्यास (ऋषि का नाम)
विरचितस्यद्वारा रचित
ऐतिहासिकइतिहास संबंधी
ग्रन्थस्यग्रंथ का
महाभारतस्यमहाभारत का
वनपर्ववन पर्व (महाभारत का एक भाग)
इत्यतःइससे / इस अंश से
गृहीतःलिया गया
कथाकहानी
सर्वेषुसभी में
प्राणिसमदृष्टिषुप्राणियों में समान दृष्टि
भावनांभावना को
प्रबोधयतिजगाती है / सिखाती है
अस्याःइस की
अभीप्सितःअभिप्राय / इच्छित
यत्कि
समाजेसमाज में
विद्यमानान्विद्यमान / उपस्थित
दुर्बलान्दुर्बल / कमज़ोर
प्रत्यपिके प्रति भी
मातुःमाँ का
वात्सल्यस्नेह / ममता
प्रकर्षेणअत्यधिक रूप में
एवही
भवतिहोता है / घटित

Second Paragraph 

कश्चित्कोई एक / निश्चित
कृषकःकिसान
बलीवर्दाभ्यांदो बैलों से / वृषभाभ्याम्
क्षेत्रकर्षणम्खेत जोतना
कुर्वन्कर रहा था
आसीत्था
तयोःउन दोनों में
बलीवर्दयोःबैलों में
एकःएक
शरीरेणशरीर से
दुर्बलःकमजोर
जवेनतेज़ी से
गन्तुम्चलने में / जाने में
अशक्तः चअसमर्थ भी
अतःइसलिए
कृषकःकिसान
तम्उस (वृषभ को)
दुर्बलं वृषभंदुर्बल बैल
तोदनेनडंडे से / चुभन से
नुदन्हाँकता हुआ
अवर्ततचलाता रहा / घूमता रहा
सःवह
ऋषभःबैल
हलमुष्ट्याहल की मूठ (जुते हुए हल से)
गन्तुम् अशक्तःचलने में असमर्थ
क्षेत्रेखेत में
पपातगिर गया
कुद्धःक्रोधित
कृषीवलःकिसान
तम्उसे
उत्थापयितुंउठाने के लिए
बहुवारम्कई बार
यत्नम् अकरोत्प्रयास किया
तथापिफिर भी
वृषभःबैल
न उत्थितःनहीं उठा

Third Paragraph

संस्कृत शब्दहिन्दी अर्थ
भूमौभूमि पर / ज़मीन पर
पतितंगिरा हुआ
स्वपुत्रंअपने पुत्र को
दृष्ट्वादेखकर
सर्वधेनूनांसभी गायों की
मातुःमाता (यहाँ – गायों की माता सुरभि)
सुरभेःसुरभि का (गायों की देवी)
नेत्राभ्याम्दोनों नेत्रों (आंखों) से
अश्रूणिआँसू
आविरासन्प्रकट हुए / निकल आए
सुरभेःसुरभि (फिर से)
इमाम् अवस्थाम्इस स्थिति को
दृष्ट्वादेखकर
सुराधिपःदेवताओं का स्वामी / इंद्र
ताम्उससे (सुरभि से)
अपृच्छत्पूछा
अयि शुभेहे शुभे! (हे शुभवती / सज्जन स्त्री)
किम्क्यों
एवम्इस प्रकार
रोदिषिरो रही हो
उच्यताम्बताया जाए / कहो
सा चऔर वह (सुरभि)

Shlok

विनिपातःपतन / दुर्घटना
न वः कश्चित्आप (देवताओं) में से कोई भी नहीं
दृश्यतेदिखाई देता
त्रिदशाधिपदेवताओं के स्वामी (इंद्र के लिए)
अहं तुकिंतु मैं
पुत्रं शोचामिपुत्र के लिए दुखी हूँ
तेनइस कारण
रोदिमिमैं रोती हूँ
कौशिकहे कौशिक! (इंद्र का एक नाम)

Forth  paragraph

भो वासव!हे वासव! (हे इन्द्र!)
पुत्रस्यपुत्र का
दैन्यंदयनीय अवस्था / दुर्बलता
दृष्ट्वादेखकर
अहंमैं
रोदिमिरोती हूँ
सःवह
दीनःदीन / दुर्बल
इति जानन् अपिऐसा जानकर भी
कृषकःकिसान
तंउसे (उस बैल को)
बहुधाबार-बार / अनेक प्रकार से
पीडयतिकष्ट देता है / पीड़ा देता है
कृच्छ्रेणकठिनाई से
भारम्बोझ
उद्वहतिढोता है / उठाता है
इतरम् इवदूसरे (बैल) की तरह
धुरंजुए का बोझ / हल का भार
वोढुंढोने के लिए
न शक्नोतिसमर्थ नहीं है
एतत्यह
भवान्आप
पश्यति नक्या नहीं देखते?
इतिऐसा कहकर
प्रत्यवोचत्उत्तर दिया




Fifth Paragraph 
भद्रे!हे शुभे! / हे पूज्ये!
नूनम्निश्चय ही
सहस्राधिकेषुहजारों से भी अधिक (पुत्रों) में
पुत्रेषुपुत्रों में
सन्त्स्वपिहोते हुए भी
तवतुम्हारा
अस्मिन् एवकेवल इस (बैल) में ही
एतादृशंऐसा (वात्सल्य)
वात्सल्यंममता / स्नेह
कथम्कैसे?
इन्द्रेण पृष्टाइन्द्र द्वारा पूछे जाने पर
सुरभिः प्रत्यवोचत्सुरभि ने उत्तर दिया

Shlok

यद्यपियद्यपि / भले ही
पुत्रसहस्रंहजारों पुत्र
मेमेरे हैं
वात्सल्यंममता / स्नेह
सर्वत्रसभी में
समम् एवसमान ही
दीनेदुर्बल / दीन
तनयेपुत्र में
देवहे देव!
प्रकृत्यास्वभाव से
अति-अधिकाअत्यधिक
कृपादया / करुणा


Sixth Paragraph 
बहूनिबहुत से
अपत्यानिपुत्र / संतान
मममेरी
सत्यम्सत्य है
तथापिफिर भी
अहम्मैं
अतस्मिन् पुत्रेइस पुत्र में

विशिष्य
विशेष रूप से
आत्मवत्अपने समान
अनानुभवानिअनुभव करती हूँ
यतःक्योंकि
हिनिश्चय ही
अयम्यह
अन्येभ्यःअन्यों की अपेक्षा
दुर्वलःदुर्बल / कमज़ोर
सर्वेषु अपत्येषुसभी संतानों में
जननीमाता
तुल्यवत्सलासमान ममता रखने वाली
अभ्यधिकाअधिक
कृपाकरुणा / दया
सहज एवस्वाभाविक ही
सुरभिवचनंसुरभि के वचन
श्रुत्वासुनकर
भृशंबहुत अधिक
विस्मितस्यआश्चर्यचकित
अखण्डलस्यइन्द्र (एक नाम)
हृदयं अद्रवत्हृदय पिघल गया / करुणा से भर गया
सःवह (इन्द्र)
ताम्उस (सुरभि) को
एवम् असान्त्वयत्इस प्रकार से सांत्वना दी
गच्छ वत्से!जाओ, बेटी!
सर्वं भद्रं जायेत्सब शुभ हो

Seventh Paragraph 

अचिरात् एवशीघ्र ही
चण्डवातेनतेज़ हवा से
मेघरवैः च सहबादलों की गर्जना के साथ
प्रवर्षःवर्षा
समजायतआरंभ हुई / हो गई
लोकानांलोगों के
पश्यताम् एवदेखते-देखते ही
सर्वत्रहर जगह
जलोपप्लवःजल का फैलाव / बाढ़
सञ्जातःउत्पन्न हो गया
कृषकःकिसान
हर्षातिरेकेणअत्यधिक प्रसन्नता से
कर्षणविमुखः सन्खेत जोतने से विमुख होकर
वृषभौदोनों बैलों को
नीत्वाले जाकर
गृहम् अगात्घर चला गया



Shlok
अपत्येषुसंतान में / पुत्रों में
च सर्वेषुऔर सभी में
जननीमाता
तुल्यवत्सलासमान ममता रखने वाली
पुत्रे दीने तुकिंतु जब पुत्र दीन हो (दुर्बल हो)
सा मातावह माता
कृपार्द्रहृदया भवेत्करुणा से पिघले हुए हृदय वाली हो जाती है

पाठ : जननी तुल्यवत्सला

(महाभारत – वनपर्व से लिया गया अंश)

प्रस्तुतः पाठः महर्षिवेदव्यासविरचितस्य ऐतिहासिकग्रन्थस्य महाभारतस्य “वनपर्व” इत्यतः गृहीतः।


यह पाठ महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित ऐतिहासिक ग्रंथ महाभारत के “वनपर्व” से लिया गया है।

इयं कथा सर्वेषु प्राणिषु समदृष्टिभावनां प्रबोधयति।


यह कथा सभी प्राणियों के प्रति समान दृष्टिकोण रखने की शिक्षा देती है।

अस्याः अभीप्सितः अर्थोऽस्ति यत् समाजे विद्यमानान् दुर्बलान् प्राणिनः प्रत्यपि मातुः वात्सल्यं प्रकर्षेणैव भवति।


इसका अभिप्रेत अर्थ यह है कि समाज में रहने वाले दुर्बल प्राणियों के प्रति भी माँ जैसा वात्सल्य होना चाहिए।

कश्चित् कृषकः बलीवर्दाभ्या क्षेत्रकर्षण कुर्वन्नासीत्।


एक किसान दो बैलों से खेत जोत रहा था।

तयोः बलीवर्दयोः एकः शरीरेण दुर्बलः जवेन गन्तुमशक्तश्चासीत्।


उन दोनों बैलों में से एक बैल शरीर से दुर्बल था और तेज़ चलने में असमर्थ था।

अतः कृषकः त दुर्बलं वृषभ तोदनेन नुदन् अवर्तत।


इसलिए किसान उस दुर्बल बैल को डंडे से मारते हुए हाँकता रहा।

सः ऋषभः हलमूह्वा गन्तुमशक्तः क्षेत्रे पपात।


वह बैल हल खींचते हुए चलने में असमर्थ होकर खेत में गिर पड़ा।

कुद्धः कृषीवलः तमुत्थापयितुं बहुवारम् यत्नमकरोत्। तथापि वृषः नोत्थितः ।


क्रोधित किसान ने उसे उठाने के लिए कई बार प्रयत्न किया, किन्तु वह बैल उठ न सका।

भूमौ पतितं स्वपुत्रं दृष्ट्वा सर्वधेनूनां मातुः सुरभेः नेत्राभ्यामश्रूणि आविरासन्।


भूमि पर गिरे हुए अपने पुत्र को देखकर सब गौओं की माता सुरभि की आँखों से आँसू प्रकट हो गए

सुरभेरिमामवस्था दृष्ट्वा सुराधिपः तामपृच्छत्- “अयि शुभे! किमेवं रोदिषि? उच्यताम्” इति।


सुरभि की यह अवस्था देखकर देवराज इन्द्र ने उससे पूछा – “हे शुभे! तुम इस प्रकार क्यों रो रही हो? बताओ।”


सा च विनिपातो न वः कश्चिद् दृश्यते त्रिदशाधिप !।  

अहं तु पुत्रं शोचामि, तेन रोदिमि कौशिक !॥


सुरभि ने कहा – “हे त्रिदशाधिप (देवताओं के राजा)! आपके लिए तो यह कोई बड़ा संकट नहीं है। परन्तु मैं अपने पुत्र को देखकर शोक करती हूँ, इसी कारण रो रही हूँ हे कौशिक (इन्द्र)!”

भो वासव! पुत्रस्य दैन्य दृष्ट्वा अहं रोदिमि।  

सः दीन इति जानन्नपि कृषकः तं बहुधा पीडयति।  

सः कृच्छ्रेण भारमुद्वहति।  

इतरमिव धुरं वोढुं सः न शक्नोति ।  

एतत् भवान् पश्यति न?” इति प्रत्यवोचत्।


सुरभि ने आगे कहा – “हे वासव (इन्द्र)! अपने पुत्र की दयनीय अवस्था देखकर मैं रो रही हूँ। वह दीन है, यह जानते हुए भी किसान उसे बार-बार पीड़ा देता है। वह कठिनाई से भार वहन करता है। दूसरे बैल की तरह जुए का भार उठाने में असमर्थ है। क्या आप यह नहीं देखते?” – इस प्रकार उसने उत्तर दिया।

 (संस्कृत)

‘भद्रे! नूनम्। सहस्राधिकेषु पुत्रेषु सत्स्वपि तव अस्मिन्नेव एतादृशं वात्सल्यं कथम्?” इति इन्द्रेण पृष्टा सुरभिः प्रत्यवोचत् –


“हे भद्रे (सुरभि)! जब तुम्हारे हज़ारों पुत्र हैं, तो केवल इस पर ही इतना अधिक वात्सल्य क्यों?” – इन्द्र के इस प्रश्न पर सुरभि ने उत्तर दिया –

यदि पुत्रसहस्रं मे, वात्सल्यं सर्वत्र सममेव मे।  

दीने च तनये देव, प्रकृत्या अधिका कृपा।


“मेरे पास भले ही हज़ारों पुत्र हों, पर मेरा वात्सल्य सभी पर समान ही है। किन्तु, हे देव! जब कोई पुत्र दीन (दुर्बल) होता है तो उस पर स्वभावतः अधिक करुणा उमड़ आती है।”

बहून्यपत्यानि मे सन्ति इति सत्यम्।  

तथाप्यहमेतस्मिन् पुत्रे विशेष्य आत्मवेदनामनुभवामि।  

यतो हि अयम् अन्येभ्यः दुर्बलः।  


“यह सत्य है कि मेरे बहुत से संतानें (पुत्र) हैं। फिर भी मैं इस पुत्र के लिए विशेष आत्मीय वेदना अनुभव करती हूँ, क्योंकि यह दूसरों से अधिक दुर्बल है।”

सर्वेषु अपत्येषु जननी तुल्यवत्सला एव।  

तथापि दुर्बले सुते मातुः अभ्यधिका कृपा सहजैव।


“माता तो सभी संतान पर समान वात्सल्य रखती है, परन्तु दुर्बल पुत्र पर उसकी करुणा सहज रूप से अधिक हो जाती है।”

सुरभिवचनं श्रुत्वा भृशं विस्मितस्य अखण्डलस्य अपि हृदयम् अद्रवत्।  

स च तामेवम् असान्त्वयत् – “गच्छ वत्से! सर्वं भद्रं जायेत।”


सुरभि के ये वचन सुनकर बहुत चकित हुए इन्द्र (अखण्डल) का हृदय भी पिघल गया। उन्होंने उसे इस प्रकार सांत्वना दी – “जाओ वत्से! सब शुभ होगा।”

अचिरादेव चण्डवातेन मेघरवैश्च सह प्रवर्षः समजायत।  

लोकानां पश्यतामेव सर्वत्र जलोपप्लवः सञ्जातः।


कुछ ही समय में प्रचण्ड वायु और बादलों की गर्जना के साथ वर्षा होने लगी। लोगों के देखते-देखते ही सब ओर जल से भर गया।

कृषकः हर्षातिरेकेण कर्षणविमुखः सन् वृषभौ नीत्वा गृहमगात्।


किसान अत्यधिक प्रसन्न होकर हल चलाना छोड़कर उन बैलों को ले जाकर घर चला गया।

 (उपसंहार श्लोक)

अपत्येषु च सर्वेषु जननी तुल्यवत्सला।  

पुत्रे दीने तु सा माता कृपार्द्रहृदया भवेत्॥


माता सभी संतान पर समान वात्सल्य रखती है, परन्तु जब कोई पुत्र दीन-दुर्बल होता है, तब माता का हृदय करुणा से और भी अधिक द्रवित हो उठता है।

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