📘 अष्टमः पाठः — सूक्तयः (Suktayah)
(मूलतः तमिलग्रन्थ “तिरुक्कुरल्” से अनूदित)
1️⃣
संस्कृत पंक्ति:
अष्टमः पाठः — सूक्तयः
शब्दार्थ:
अष्टमः – आठवाँ, पाठः – पाठ, सूक्तयः – अच्छे वचन / नीतिवचन
अनुवाद:
आठवाँ पाठ अच्छे वचनों (नीतियों) से संबंधित है।
2️⃣
संस्कृत पंक्ति:
अब पाठः मूलतः तमिलभाषायाः “तिरुक्कुरल्” नामक ग्रन्थात् गृहीतः अस्ति।
शब्दार्थ:
अब – यह, पाठः – पाठ, मूलतः – मूल रूप से, तमिलभाषायाः – तमिल भाषा से, “तिरुक्कुरल्” – ग्रन्थ का नाम, नामक – कहलाने वाले, ग्रन्थात् – ग्रन्थ से, गृहीतः अस्ति – लिया गया है।
अनुवाद:
यह पाठ मूल रूप से तमिल भाषा के “तिरुक्कुरल” नामक ग्रन्थ से लिया गया है।
3️⃣
संस्कृत पंक्ति:
अयं ग्रन्थः तमिलभाषायाः वेदः इति कथ्यते।
शब्दार्थ:
अयं – यह, ग्रन्थः – ग्रन्थ, तमिलभाषायाः – तमिल भाषा का, वेदः – वेद, इति – ऐसा, कथ्यते – कहा जाता है।
अनुवाद:
इस ग्रन्थ को तमिल भाषा का वेद कहा जाता है।
4️⃣
संस्कृत पंक्ति:
अस्य प्रणेता तिरुवल्लुवरः वर्तते।
शब्दार्थ:
अस्य – इसका, प्रणेता – रचयिता, तिरुवल्लुवरः – तिरुवल्लुवर, वर्तते – हैं।
अनुवाद:
इस ग्रन्थ के रचयिता तिरुवल्लुवर हैं।
5️⃣
संस्कृत पंक्ति:
प्रथमशताब्दी अस्य कालः स्वीकृतः अस्ति।
शब्दार्थ:
प्रथम – पहला, शताब्दी – सदी, अस्य – इसका, कालः – समय, स्वीकृतः अस्ति – माना गया है।
अनुवाद:
इसका समय प्रथम शताब्दी माना गया है।
6️⃣
संस्कृत पंक्ति:
धर्मार्थकामप्रतिपादकोऽयम् ग्रन्थः त्रिषु भागेषु विभक्तः अस्ति।
शब्दार्थ:
धर्म – धर्म, अर्थ – धन, काम – इच्छा, प्रतिपादकः – वर्णन करने वाला, अयम् – यह, ग्रन्थः – ग्रन्थ, त्रिषु – तीन, भागेषु – भागों में, विभक्तः अस्ति – विभाजित है।
अनुवाद:
यह ग्रन्थ धर्म, अर्थ और काम का प्रतिपादन करने वाला है तथा तीन भागों में विभाजित है।
7️⃣
संस्कृत पंक्ति:
तिरुशब्दः श्रीवाचकः अस्ति।
शब्दार्थ:
तिरुशब्दः – ‘तिरु’ शब्द, श्रीवाचकः – श्री (शुभता) सूचक, अस्ति – है।
अनुवाद:
‘तिरु’ शब्द का अर्थ ‘श्री’ या ‘शुभता’ होता है।
8️⃣
संस्कृत पंक्ति:
अतः तिरुक्कुरलशब्दस्य अभिप्रायः भवति श्रिया युक्ता वाणी।
शब्दार्थ:
अतः – इसलिए, तिरुक्कुरलशब्दस्य – ‘तिरुक्कुरल’ शब्द का, अभिप्रायः – अर्थ, भवति – होता है, श्रिया युक्ता – श्री (मंगल) से युक्त, वाणी – वाणी / वचन।
अनुवाद:
अतः ‘तिरुक्कुरल’ शब्द का अर्थ है – श्री (शुभता) से युक्त वाणी।
9️⃣
संस्कृत पंक्ति:
अस्मिन् ग्रन्थे मानवानां कृते जीवनोपयोगि सत्य सरस बोधगम्य पद्यैः प्रतिपादितम् अस्ति।
शब्दार्थ:
अस्मिन् ग्रन्थे – इस ग्रन्थ में, मानवानाम् – मनुष्यों के लिए, कृते – हेतु, जीवनोपयोगि – जीवन के उपयोगी, सत्य – सत्य, सरस – मधुर, बोधगम्य – समझने योग्य, पद्यैः – श्लोकों द्वारा, प्रतिपादितम् अस्ति – बताया गया है।
अनुवाद:
इस ग्रन्थ में मनुष्यों के लिए जीवनोपयोगी, मधुर और समझने योग्य सत्य बातों को पद्यों द्वारा प्रस्तुत किया गया है।
🕉️ श्लोक १
संस्कृत पंक्ति:
पिता यच्छति पुत्राय बाल्ये विद्याधनं महत्।
पिताऽस्य कि तपस्तेपे इत्युक्तिस्तत्कृतज्ञता ॥१॥
🔹 शब्दार्थ (Word Meanings):
- पिता — पिता (Father)
- यच्छति — देता है / प्रदान करता है (gives)
- पुत्राय — पुत्र को (to his son)
- बाल्ये — बचपन में (in childhood)
- विद्याधनं — विद्या रूपी धन (the wealth of knowledge)
- महत् — महान (great)
- पिता — पिता (father)
- अस्य — उसके (of him)
- किम् — क्या (what)
- तपः — तप (penance)
- तेपे — किया (performed)
- इति — ऐसा (thus)
- उक्तिः — कथन (statement/saying)
- तत् — वह (that)
- कृतज्ञता — कृतज्ञता / आभार (gratitude)
💬 अनुवाद (Translation in Hindi):
जो पिता अपने पुत्र को बचपन में महान विद्याधन (ज्ञान का अमूल्य खजाना) प्रदान करता है,
उसके प्रति यह कहना कि — “उस पिता ने कौन-सा तप किया होगा जो उसे ऐसा पुत्र मिला?” —
यही उस पुत्र की सच्ची कृतज्ञता है।
🪔 सरल भावार्थ (Explanation):
विद्या सबसे बड़ा धन है। जो पिता अपने पुत्र को बचपन में शिक्षा देता है, उसका आभार व्यक्त करने का श्रेष्ठ तरीका यही है कि पुत्र उसके गुणों की सराहना करे और कहे — “पिता ने अवश्य ही महान तपस्या की होगी जो उन्हें ऐसा अवसर मिला।”
👉 यह श्लोक पिता के प्रति कृतज्ञता और शिक्षा के महत्त्व को बताता है।
🕉️ श्लोक २
संस्कृत पंक्ति:
अवक्रता यथा चित्ते तथा वाचि भवेद् यदि।
तदेवाहुः महात्मानः समत्वमिति तथ्यतः।।२।।
🔹 शब्दार्थ (Word Meanings):
- अवक्रता — सीधापन, सरलता (straightforwardness, honesty)
- यथा — जैसे (as)
- चित्ते — मन में (in the mind)
- तथा — वैसे ही (so also)
- वाचि — वाणी में (in speech)
- भवेत् — हो (should be / is)
- यदि — यदि / अगर (if)
- तत् — वही (that)
- एव — ही (indeed)
- आहु: — कहा गया है (is called / said to be)
- महात्मानः — महात्मा लोग (great souls)
- समत्वम् — समानता, समभाव (equanimity, harmony)
- इति — ऐसा (thus)
- तथ्यतः — वास्तव में (truly / in reality)
💬 अनुवाद (Translation in Hindi):
यदि मन में जैसी सीधाई और सच्चाई हो,
वैसी ही वाणी (बोल) में भी हो,
तो महात्मा लोग उसे वास्तविक समत्व (समानता / सच्चा संतुलन) कहते हैं।
🪔 सरल भावार्थ (Explanation):
मन में एक बात और वाणी में दूसरी बात न होनी चाहिए।
जिस व्यक्ति के मन और वचन दोनों एक समान होते हैं —
वही सच्चे अर्थों में समभावी, निष्कपट और महात्मा कहलाता है।
👉 यह श्लोक मन-वचन की एकरूपता और सच्चाई का संदेश देता है।
🕉️ श्लोक ३
संस्कृत पंक्ति:
त्यक्त्वा धर्मप्रदां वाचं परुषां योऽभ्युदीरयेत्।
परित्यज्य फलं पक्वं भुङ्क्तेऽपक्वं विमूढधीः॥३॥
🔹 शब्दार्थ (Word Meanings):
- त्यक्त्वा — त्यागकर / छोड़कर (leaving)
- धर्मप्रदाम् — धर्म देने वाली, सद् वाणी (righteous speech)
- वाचम् — वाणी (speech)
- परुषाम् — कठोर / कड़वी (harsh)
- यः — जो व्यक्ति (who)
- अभ्युदीरयेत् — बोलता है / उच्चारित करता है (utters / speaks)
- परित्यज्य — छोड़कर (having abandoned)
- फलं — फल (fruit)
- पक्वम् — पका हुआ (ripe)
- भुङ्क्ते — खाता है / उपभोग करता है (eats / enjoys)
- अपक्वम् — कच्चा (unripe)
- विमूढधीः — मूर्ख बुद्धि वाला / अविवेकी (foolish-minded person)
💬 अनुवाद (Translation in Hindi):
जो व्यक्ति धर्मप्रद (सदाचारपूर्ण, कोमल) वाणी को छोड़कर कठोर वचन बोलता है,
वह ऐसा है जैसे पके हुए फल को छोड़कर कच्चा फल खाने वाला मूर्ख।
🪔 सरल भावार्थ (Explanation):
सौम्य, मधुर और धर्मयुक्त वाणी बोलना ही सच्चा आचरण है।
जो व्यक्ति इसको छोड़कर कड़वे या कटु शब्दों का प्रयोग करता है,
वह ऐसा ही मूर्ख है जैसे कोई व्यक्ति पका हुआ मीठा फल छोड़कर कच्चा फल खाए।
👉 यह श्लोक वाणी की मधुरता और संयम के महत्व को सिखाता है।
🕉️ श्लोक ४
संस्कृत पंक्ति:
विद्वांस एव लोकेऽस्मिन् चक्षुष्मन्तः प्रकीर्तिताः।
अन्येषां वदने ये तु ते चक्षुर्नामनी मते॥४॥
🔹 शब्दार्थ (Word Meanings):
- विद्वांसः — विद्वान लोग (learned persons)
- एव — ही (indeed)
- लोकेऽस्मिन् — इस संसार में (in this world)
- चक्षुष्मन्तः — दृष्टिवान, जिनके पास सच्ची दृष्टि है (those who truly have eyes)
- प्रकीर्तिताः — कहे गए हैं / प्रसिद्ध हैं (are called / regarded)
- अन्येषाम् — दूसरों के (of others)
- वदने — मुख पर (in their faces / mouths)
- ये तु — जो तो (those who)
- ते — वे (they)
- चक्षुः — आँखें (eyes)
- नामनि — केवल नाम मात्र से (only by name)
- मते — माने गए हैं / समझे जाते हैं (are considered)
💬 अनुवाद (Translation in Hindi):
इस संसार में केवल विद्वान व्यक्ति ही वास्तव में दृष्टिवान (सच्चे आँखों वाले) कहलाते हैं।
बाकी जिनके मुख पर (चेहरे पर) आँखें तो हैं,
वे तो केवल नाममात्र के चक्षु वाले (दृष्टिहीन समान) माने गए हैं।
🪔 सरल भावार्थ (Explanation):
यह श्लोक बताता है कि सच्ची दृष्टि ज्ञान से आती है, आँखों से नहीं।
जिसके पास विद्या है वही संसार की सच्चाई देख सकता है।
अन्य लोग, भले ही उनके पास आँखें हों, लेकिन ज्ञान के बिना वे अंधे समान हैं।
👉 यह श्लोक ज्ञान की महत्ता और विद्या के प्रकाश पर जोर देता है।
🕉️ श्लोक ५
संस्कृत पंक्ति:
यत् प्रोक्तं येन केनापि तस्य तत्त्वार्थनिर्णयः।
कर्तुं शक्यो भवेद्येन स विवेक इतीरितः॥५॥
🔹 शब्दार्थ (Word Meanings):
- यत् — जो (whatever / that which)
- प्रोक्तं — कहा गया (spoken / stated)
- येन केनापि — किसी भी व्यक्ति द्वारा (by anyone)
- तस्य — उसका (of that)
- तत्त्वार्थनिर्णयः — सच्चे अर्थ का निर्णय (judgment of true meaning)
- कर्तुं — करना (to make / to do)
- शक्यः — संभव (possible)
- भवेत् — हो (may be)
- येन — जिसके द्वारा (by whom)
- सः — वही (that person)
- विवेकः — विवेकशील, बुद्धिमान (wise / discerning one)
- इतीरितः — कहा गया है (is said / called)
💬 अनुवाद (Translation in Hindi):
जो व्यक्ति किसी भी कही गई बात के सत्य और तात्त्विक अर्थ का निर्णय करने में समर्थ होता है,
उसी को विवेकी (बुद्धिमान) कहा गया है।
🪔 सरल भावार्थ (Explanation):
यह श्लोक बताता है कि विवेक केवल ज्ञान का नाम नहीं है, बल्कि सही और गलत में भेद करने की क्षमता है।
जो व्यक्ति किसी भी कही हुई बात का सार समझकर उसका सच्चा अर्थ निकाल सकता है,
वही वास्तव में बुद्धिमान और विवेकी कहलाता है।
👉 यह श्लोक विवेक, विचारशक्ति और तर्कशीलता के महत्व को सिखाता है।
🕉️ श्लोक ६
संस्कृत पंक्ति:
वाक्पटुधैर्यवान् मन्त्री सभायामप्यकातरः।
स केनापि प्रकारेण परैर्न परिभूयते॥६॥
🔹 शब्दार्थ (Word Meanings):
- वाक्पटुः — वाणी में निपुण, प्रभावशाली वक्ता (eloquent / skilful in speech)
- धैर्यवान् — धैर्ययुक्त, शांतचित्त (patient / courageous)
- मन्त्री — सलाह देने वाला, बुद्धिमान व्यक्ति (minister / counsellor / wise man)
- सभायाम् — सभा में (in an assembly / gathering)
- अपि — भी (even)
- अकातरः — निडर, निर्भीक (fearless)
- सः — वह (he)
- केनापि — किसी भी (by any)
- प्रकारेण — तरीके से (means / way)
- परैः — दूसरों द्वारा (by others)
- न परिभूयते — अपमानित नहीं किया जाता / पराजित नहीं होता (is not insulted / defeated)
💬 अनुवाद (Translation in Hindi):
जो व्यक्ति वाणी में निपुण, धैर्यवान और सभा में निर्भीक होता है,
उसे कोई भी व्यक्ति किसी भी प्रकार से पराजित या अपमानित नहीं कर सकता।
🪔 सरल भावार्थ (Explanation):
सभा या समाज में वही व्यक्ति सम्मान पाता है जो सुगठित वाणी, धैर्य और आत्मविश्वास से युक्त होता है।
ऐसा व्यक्ति सही समय पर सही बात कहने में सक्षम होता है,
इसलिए कोई भी उसे वाणी या तर्क के द्वारा हराने या नीचा दिखाने में सफल नहीं होता।
👉 यह श्लोक वाणी की कुशलता, धैर्य और आत्मविश्वास के महत्व को बताता है।
🕉️ श्लोक ७
संस्कृत पंक्ति:
य इच्छत्यात्मनः श्रेयः प्रभूतानि सुखानि च।
न कुर्याद् अहितं कर्म स परेभ्यः कदापि च ॥७॥
🔹 शब्दार्थ (Word Meanings):
| संस्कृत शब्द | हिन्दी अर्थ | English Meaning |
|---|---|---|
| यः | जो (वह व्यक्ति जो) | who |
| इच्छति | चाहता है / अभिलाषा रखता है | desires / wishes |
| आत्मनः | अपने लिए | for oneself |
| श्रेयः | कल्याण, उत्तम फल | welfare / good |
| प्रभूतानि | अधिक मात्रा में, बहुत से | abundant / many |
| सुखानि | सुख, आनंद | pleasures / happiness |
| च | और | and |
| न कुर्यात् | नहीं करना चाहिए | should not do |
| अहितं | हानिकारक / बुरा | harmful / wrong |
| कर्म | कार्य / कर्म | action / deed |
| सः | वह | he |
| परेभ्यः | दूसरों के प्रति / दूसरों के लिए | towards others |
| कदापि | कभी भी | ever / at any time |
| च | भी | also |
💬 अनुवाद (Translation in Hindi):
जो व्यक्ति अपने लिए कल्याण और बहुत-से सुख चाहता है,
उसे कभी भी दूसरों के प्रति बुरा या हानिकारक कार्य नहीं करना चाहिए।
🪔 सरल भावार्थ (Explanation):
यह श्लोक सिखाता है कि अपने जीवन में सुख और कल्याण की इच्छा रखने वाला व्यक्ति
कभी भी दूसरों का अहित या नुकसान नहीं करे।
दूसरों को कष्ट पहुँचाकर या अन्याय करके कोई भी स्थायी सुख या सफलता नहीं पा सकता।
👉 इसलिए हमें हमेशा सभी के प्रति शुभभाव, न्याय और सदाचार का व्यवहार रखना चाहिए।
🕉️ श्लोक ८
संस्कृत पंक्ति:
आचारः प्रथमो धर्मः इत्येतद् विदुषां वचः।
तस्माद् रक्षेत् सदाचारं प्राणेभ्योऽपि विशेषतः ॥८॥
🔹 शब्दार्थ (Word Meanings):
| संस्कृत शब्द | हिन्दी अर्थ | English Meaning |
|---|---|---|
| आचारः | आचरण, व्यवहार | conduct / behaviour |
| प्रथमो | प्रथम, सबसे पहले | first / foremost |
| धर्मः | कर्तव्य, धार्मिकता | duty / righteousness |
| इति | ऐसा | thus / this |
| एतत् | यह | this |
| विदुषाम् | ज्ञानी जनों का | of the wise |
| वचः | वचन, कथन | saying / statement |
| तस्मात् | इसलिए | therefore |
| रक्षेत् | रक्षा करे, बनाए रखे | should protect / preserve |
| सदाचारम् | अच्छा आचरण, श्रेष्ठ व्यवहार | good conduct / virtuous behaviour |
| प्राणेभ्यः | प्राणों से | than life |
| अपि | भी | even |
| विशेषतः | विशेष रूप से | especially / more than anything |
💬 अनुवाद (Translation in Hindi):
ज्ञानी लोगों का कहना है कि अच्छा आचरण ही धर्म का प्रथम अंग है।
इसलिए मनुष्य को अपने श्रेष्ठ आचरण की रक्षा प्राणों से भी अधिक करनी चाहिए।
🪔 सरल भावार्थ (Explanation):
यह श्लोक बताता है कि धर्म की शुरुआत अच्छे आचरण से होती है।
सच्चा धर्म केवल पूजा या कर्मकांड में नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार, वाणी और कर्मों में होता है।
👉 जो व्यक्ति अपने सदाचार (good conduct) को सबसे ऊपर रखता है, वही सच्चे अर्थों में धर्म का पालन करता है।
इसलिए हमें अपने अच्छे आचरण की रक्षा जीवन से भी अधिक करनी चाहिए।