कक्षा 10 संस्कृत सप्तमः पाठः विचित्रः साक्षी

कक्षा 10 संस्कृत सप्तमः पाठः विचित्रः साक्षी


🕉️ सप्तमः पाठः — विचित्रः साक्षी

1️⃣ संस्कृत पंक्ति:
अयं पाठः ओम्प्रकाशठक्करविरचिताया कथायाः सम्पादित अंशः अस्ति।

शब्दार्थ:
अयम् – यह, पाठः – पाठ, ओम्‌प्रकाशठक्करविरचितायाः – ओम्‌प्रकाश ठक्कर द्वारा रचित, कथायाः – कहानी का, सम्पादित – संपादित, अंशः – भाग, अस्ति – है।

अनुवाद:
यह पाठ ओम्‌प्रकाश ठक्कर द्वारा रचित कहानी का संपादित अंश है।


2️⃣ संस्कृत पंक्ति:
इयं कथा बङ्गसाहित्यकार बकिमचन्द्रचटर्जीद्वारा न्यायाधीशरूपेण प्रदत्तनिर्णयोपरि आधारिता अस्ति।

शब्दार्थ:
इयम् – यह, कथा – कहानी, बङ्गसाहित्यकार – बंगाल के साहित्यकार, बकिमचन्द्रचटर्जीद्वारा – बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा, न्यायाधीशरूपेण – न्यायाधीश के रूप में, प्रदत्त – दिया गया, निर्णयस्य उपरि – निर्णय पर, आधारिता – आधारित, अस्ति – है।

अनुवाद:
यह कहानी बंगाल के साहित्यकार बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा न्यायाधीश के रूप में दिए गए निर्णय पर आधारित है।


3️⃣ संस्कृत पंक्ति:
न्यायकर्तारः सत्यासत्यनिर्णयार्थं यदा कदा तादृशीनां युक्तीनां प्रयोगं कुर्वन्ति याभिः प्रमाणं विनापि न्यायः स्यात्।

शब्दार्थ:
न्यायकर्तारः – न्याय करने वाले (न्यायाधीश), सत्यासत्यनिर्णयार्थम् – सत्य और असत्य के निर्णय के लिए, यदा कदा – कभी-कभी, तादृशीनाम् – ऐसे, युक्तीनाम् – तर्कों का, प्रयोगम् – उपयोग, कुर्वन्ति – करते हैं, याभिः – जिनसे, प्रमाणम् – प्रमाण (सबूत), विना अपि – बिना भी, न्यायः – न्याय, स्यात् – हो सके।

अनुवाद:
न्यायाधीश कभी-कभी ऐसे तर्कों का प्रयोग करते हैं जिनसे बिना प्रमाण के भी न्याय किया जा सके।


4️⃣ संस्कृत पंक्ति:
अस्यां कथायामपि न्यायाधीशेन तथैव मार्गः आचरितः।

शब्दार्थ:
अस्याम् – इस, कथायाम् – कहानी में, अपि – भी, न्यायाधीशेन – न्यायाधीश द्वारा, तथैव – उसी प्रकार, मार्गः – तरीका, आचरितः – अपनाया गया।

अनुवाद:
इस कहानी में भी न्यायाधीश ने उसी प्रकार का तरीका अपनाया है।


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🕉️ संस्कृत पंक्ति 1

कश्चन निर्धनो जनः भूरि परिश्रम्य किञ्चिद् वित्तमुपार्जितवान्।

शब्दार्थ:
कश्चन – कोई, निर्धनः – गरीब व्यक्ति, जनः – मनुष्य, भूरि – बहुत अधिक, परिश्रम्य – परिश्रम करके, किञ्चित् – थोड़ा, वित्तम् – धन, उपार्जितवान् – अर्जित किया (कमाया)।

अनुवाद (हिन्दी में):
एक गरीब व्यक्ति ने बहुत परिश्रम करके थोड़ा-सा धन कमाया।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 2

तेन वित्तेन स्वपुत्रम् एकस्मिन् महाविद्यालये प्रवेशं दापयितुं सफलो जातः।

शब्दार्थ:
तेन – उस (धन) से, वित्तेन – धन से, स्वपुत्रम् – अपने पुत्र को, एकस्मिन् – एक, महाविद्यालये – महाविद्यालय (कॉलेज) में, प्रवेशम् – प्रवेश, दापयितुम् – दिलाने में, सफलः – सफल, जातः – हुआ।

अनुवाद:
उस धन से वह अपने पुत्र को एक महाविद्यालय में प्रवेश दिलाने में सफल हुआ।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 3

तत्तनयः तत्रैव छात्रावासे निवसन् अध्ययने संलग्नः समभूत्।

शब्दार्थ:
तत्-तनयः – उसका पुत्र, तत्र एव – वहीं, छात्रावासे – छात्रावास (हॉस्टल) में, निवसन् – निवास करते हुए, अध्ययने – अध्ययन में, संलग्नः – लगा हुआ, समभूत् – हो गया।

अनुवाद:
वह पुत्र वहीं छात्रावास में रहते हुए अध्ययन में लगा रहा।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 4

एकदा स पिता तनूजस्य रुग्णताम् आकर्ण्य व्याकुलः जातः पुत्रं द्रष्टुं च प्रस्थितः।

शब्दार्थ:
एकदा – एक बार, स – वह (पिता), पिता – पिता, तनूजस्य – पुत्र के, रुग्णताम् – बीमारी को, आकर्ण्य – सुनकर, व्याकुलः – चिंतित, जातः – हो गया, पुत्रम् – पुत्र को, द्रष्टुम् – देखने के लिए, च – और, प्रस्थितः – निकल पड़ा।

अनुवाद:
एक दिन उस पिता ने अपने पुत्र की बीमारी की खबर सुनी, तो वह बहुत चिंतित होकर उसे देखने के लिए निकल पड़ा।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 5

परमर्थकाश्येन पीडितः स बसयानं विहाय पदातिरेव प्राचलत्।

शब्दार्थ:
परम-अर्थ-काश्येन – अत्यधिक आर्थिक तंगी से, पीडितः – पीड़ित, सः – वह, बसयानम् – बस का सफर, विहाय – छोड़कर, पदातिः एव – पैदल ही, प्राचलत् – चल पड़ा।

अनुवाद:
अत्यधिक आर्थिक तंगी से पीड़ित वह व्यक्ति बस यात्रा छोड़कर पैदल ही चल पड़ा।


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🕉️ संस्कृत पंक्ति 1

पदातिक्रमेण सचलन् सायं समयेऽप्यसौ गन्तव्याद् दूरे आसीत्।

शब्दार्थ:
पदातिक्रमेण – पैदल चलते-चलते, सचलन् – चलते हुए, सायं समये अपि – सायंकाल (शाम) के समय भी, असौ – वह व्यक्ति, गन्तव्यात् – अपने गंतव्य (लक्ष्य स्थान) से, दूरे – दूर, आसीत् – था।

अनुवाद (हिन्दी में):
पैदल चलते-चलते शाम होने पर भी वह अपने गंतव्य से बहुत दूर था।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 2

‘निशान्धकारे प्रसृते विजने प्रदेशे पदयात्रा न शुभावहा’

शब्दार्थ:
निशा-अन्धकारे – रात के अंधकार में, प्रसृते – फैल जाने पर, विजने – निर्जन (सुनसान) प्रदेशे – स्थान में, पदयात्रा – पैदल यात्रा, न – नहीं, शुभावहा – शुभ फल देने वाली (शुभ)।

अनुवाद:
“रात के अंधकार में फैल जाने पर, सुनसान स्थान में पैदल यात्रा करना शुभ नहीं होता।”


🕉️ संस्कृत पंक्ति 3

एवं विचार्य स पार्श्वस्थिते ग्रामे रात्रिनिवास कर्तुं कञ्चिद् गृहस्थमुपागतः।

शब्दार्थ:
एवम् – इस प्रकार, विचार्य – सोचकर, सः – वह (मनुष्य), पार्श्वस्थिते – पास स्थित, ग्रामे – गाँव में, रात्रि-निवासम् – रात बिताने के लिए, कञ्चित् – किसी, गृहस्थम् – गृहस्थ (घर वाले व्यक्ति) को, उपागतः – पहुँचा।

अनुवाद:
ऐसा सोचकर वह पास के गाँव में रात बिताने के लिए एक गृहस्थ के पास पहुँचा।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 4

करुणापरो गृही तस्मै आश्रयं प्रायच्छत्।

शब्दार्थ:
करुणा-परः – दयालु, गृही – गृहस्थ (घर का स्वामी), तस्मै – उस (अतिथि) को, आश्रयम् – ठहरने का स्थान, प्रायच्छत् – दे दिया / प्रदान किया।

अनुवाद:
दयालु गृहस्थ ने उसे अपने घर में ठहरने का स्थान प्रदान किया।



🕉️ संस्कृत पंक्ति 1

विचित्रा दैवगतिः।

शब्दार्थ:
विचित्रा – अजीब, अद्भुत, दैवगतिः – भाग्य की गति / विधि का खेल।

अनुवाद:
भाग्य का खेल बड़ा विचित्र होता है।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 2

तस्यामेव रात्रौ तस्मिन् गृहे कश्चन चौरः गृहाभ्यन्तरं प्रविष्टः।

शब्दार्थ:
तस्याम् एव – उसी, रात्रौ – रात में, तस्मिन् गृहे – उसी घर में, कश्चन – कोई, चौरः – चोर, गृहाभ्यन्तरम् – घर के अंदर, प्रविष्टः – प्रवेश किया।

अनुवाद:
उसी रात उसी घर में एक चोर घर के अंदर घुस आया।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 3

तत्र निहिताम् एकां मञ्जूषाम् आदाय पलायितः।

शब्दार्थ:
तत्र – वहाँ से, निहिताम् – रखी हुई, एकाम् – एक, मञ्जूषाम् – संदूक/डिब्बी, आदाय – लेकर, पलायितः – भाग गया।

अनुवाद:
वहाँ रखी हुई एक संदूक लेकर वह भाग गया।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 4

चौरस्य पादध्वनिना प्रबुद्धोऽतिथिः चौरशङ्कया तमन्वधावत् अगृ‌ह्णाच्च।

शब्दार्थ:
चौरस्य – चोर के, पादध्वनिना – पैरों की आवाज से, प्रबुद्धः – जाग गया, अतिथिः – अतिथि, चौर-शङ्कया – चोर होने के संदेह से, तम् – उसे, अन्वधावत् – पीछे दौड़ा, अगृ‌ह्णात् च – और पकड़ लिया।

अनुवाद:
चोर के पैरों की आवाज से अतिथि जाग गया, उसने उसे चोर समझकर पीछा किया और पकड़ लिया।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 5

परं तदानीमेव किञ्चिद् विचित्रम् अघटत।

शब्दार्थ:
परम् – लेकिन, तदानीम् एव – उसी समय, किञ्चित् – कुछ, विचित्रम् – अजीब, अघटत – घटा।

अनुवाद:
लेकिन उसी समय कुछ अजीब घट गया।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 6

चौरः एव उच्चैः क्रोशितुम् आरभत “चौरोऽयं चौरोऽयम्” इति।

शब्दार्थ:
चौरः एव – वही चोर, उच्चैः – ऊँचे स्वर में, क्रोशितुम् – चिल्लाने लगा, आरभत – प्रारम्भ किया, “चौरोऽयम् चौरोऽयम्” – “यह चोर है! यह चोर है!” इति – ऐसा कहकर।

अनुवाद:
स्वयं वही चोर ऊँचे स्वर में चिल्लाने लगा — “यह चोर है! यह चोर है!”


🕉️ संस्कृत पंक्ति 7

तस्य तारस्वरेण प्रबुद्धाः ग्रामवासिनः स्वगृहाद् निष्क्रम्य तत्र आगच्छन् वराकम् अतिथिम् एव चौरं मत्वा अभर्त्सयन्।

शब्दार्थ:
तस्य – उसकी, तारस्वरेण – तीखी आवाज से, प्रबुद्धाः – जाग गए, ग्रामवासिनः – गाँववाले, स्वगृहात् – अपने घरों से, निष्क्रम्य – निकलकर, तत्र – वहाँ, आगच्छन् – आए, वराकम् – बेचारे, अतिथिम् एव – उसी अतिथि को, चौरम् मत्वा – चोर समझकर, अभर्त्सयन् – डाँटने लगे / फटकारने लगे।

अनुवाद:
उसकी तीखी आवाज सुनकर गाँववाले जाग गए, घरों से निकलकर वहाँ पहुँचे और बेचारे अतिथि को ही चोर समझकर डाँटने लगे।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 8

यद्यपि ग्रामस्य आरक्षी एव चौरः आसीत्।

शब्दार्थ:
यद्यपि – यद्यपि / यद्यपि वास्तव में, ग्रामस्य – गाँव का, आरक्षी एव – चौकीदार ही, चौरः – चोर, आसीत् – था।

अनुवाद:
हालाँकि, वास्तव में गाँव का चौकीदार ही चोर था।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 9

तत्क्षणमेव रक्षापुरुषः तम् अतिथिं “चौरोऽयम्” इति प्रख्याप्य कारागृहे प्राक्षिपत्।

शब्दार्थ:
तत्क्षणम् एव – उसी क्षण, रक्षापुरुषः – प्रहरी / चौकीदार, तम् – उसे (अतिथि को), “चौरोऽयम्” – यह चोर है, इति – ऐसा कहकर, प्रख्याप्य – घोषित करके, कारागृहे – जेल में, प्राक्षिपत् – डाल दिया।

अनुवाद:
उसी क्षण चौकीदार ने उस अतिथि को “यह चोर है” कहकर घोषित किया और उसे जेल में डाल दिया।



🕉️ संस्कृत पंक्ति 1

अग्रिमे दिने स आरक्षी चौर्याभियोगे तं न्यायालयं नीतवान्।

शब्दार्थ:
अग्रिमे दिने – अगले दिन, सः – वह, आरक्षी – चौकीदार / सिपाही, चौर्याभियोगे – चोरी के आरोप में, तम् – उस (अतिथि) को, न्यायालयम् – न्यायालय में, नीतवान् – ले गया / प्रस्तुत किया।

अनुवाद:
अगले दिन वह सिपाही उस अतिथि को चोरी के आरोप में न्यायालय में ले गया।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 2

न्यायाधीशो बंकिमचन्द्रः उभाभ्यां पृथक् पृथक् विवरणं श्रुतवान्।

शब्दार्थ:
न्यायाधीशः – न्यायाधीश, बंकिमचन्द्रः – बंकिमचन्द्र (चटर्जी), उभाभ्याम् – दोनों से, पृथक् पृथक् – अलग-अलग, विवरणम् – विवरण / बयान, श्रुतवान् – सुना।

अनुवाद:
न्यायाधीश बंकिमचन्द्र ने दोनों पक्षों से अलग-अलग बयान सुने।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 3

सर्वं वृत्तम् अवगत्य स तं निर्दोषम् अमन्यत आरक्षिणं च दोषभाजनम्।

शब्दार्थ:
सर्वम् – सब कुछ, वृत्तम् – घटना / घटनाक्रम, अवगत्य – समझकर, सः – न्यायाधीश, तम् – उस (अतिथि) को, निर्दोषम् – निर्दोष (बेकसूर), अमन्यत – माना, आरक्षिणम् च – और सिपाही को, दोषभाजनम् – दोषी माना।

अनुवाद:
सारी घटना समझकर न्यायाधीश ने उस अतिथि को निर्दोष और सिपाही को दोषी माना।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 4

किन्तु प्रमाणाभावात् स निर्णेतुं न अशक्नोत्।

शब्दार्थ:
किन्तु – लेकिन, प्रमाण-अभावात् – सबूत के अभाव में, सः – वह (न्यायाधीश), निर्णेतुम् – निर्णय करने में, न अशक्नोत् – असमर्थ रहा / नहीं कर सका।

अनुवाद:
लेकिन सबूतों के अभाव में वह निर्णय नहीं कर सका।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 5

ततोऽसौ तौ अग्रिमे दिने उपस्थातुम् आदिष्टवान्।

शब्दार्थ:
ततः – तब, असौ – उस (न्यायाधीश) ने, तौ – उन दोनों को, अग्रिमे दिने – अगले दिन, उपस्थातुम् – उपस्थित होने के लिए, आदिष्टवान् – आदेश दिया।

अनुवाद:
तब न्यायाधीश ने उन दोनों को अगले दिन उपस्थित होने का आदेश दिया।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 6

अन्येद्युः तौ न्यायालये स्व-स्व-पक्षं पुनः स्थापितवन्तौ।

शब्दार्थ:
अन्येद्युः – अगले दिन, तौ – वे दोनों, न्यायालये – अदालत में, स्व-स्व-पक्षम् – अपने-अपने पक्ष (बयान), पुनः – फिर से, स्थापितवन्तौ – प्रस्तुत किए / रखे।

अनुवाद:
अगले दिन वे दोनों फिर से अदालत में अपने-अपने पक्ष प्रस्तुत करने आए।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 7

तदैव कश्चित् तत्रत्यः कर्मचारी समागत्य न्यवेदयत् यत् इतः क्रोशद्वयान्तराले कश्चिज्जनः केनापि हतः।

शब्दार्थ:
तदैव – उसी समय, कश्चित् – कोई, तत्रत्यः – वहाँ का, कर्मचारी – कर्मचारी / नौकर, समागत्य – आकर, न्यवेदयत् – निवेदन किया / बताया, यत् – कि, इतः – यहाँ से, क्रोश-द्वय-अन्तराले – लगभग दो कोस की दूरी पर, कश्चित् जनः – कोई व्यक्ति, केनापि – किसी के द्वारा, हतः – मारा गया है।

अनुवाद:
उसी समय वहाँ के एक कर्मचारी ने आकर बताया कि यहाँ से लगभग दो कोस की दूरी पर किसी व्यक्ति की हत्या हुई है।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 8

तस्य मृतशरीरं राजमार्ग निकषा वर्तते। आदिश्यतां किं करणीयमिति।

शब्दार्थ:
तस्य – उसका, मृतशरीरम् – मृत शरीर (लाश), राजमार्ग – मुख्य सड़क के, निकषा – पास, वर्तते – पड़ा हुआ है, आदिश्यताम् – आदेश दीजिए, किम् करणीयम् इति – क्या किया जाए? ऐसा कहा।

अनुवाद:
उसका मृत शरीर मुख्य सड़क के पास पड़ा है — कृपया आदेश दें कि क्या किया जाए।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 9

न्यायाधीश आरक्षिणम् अभियुक्तं च तं शवं न्यायालये आनेतुम् आदिष्टवान्।

शब्दार्थ:
न्यायाधीशः – न्यायाधीश, आरक्षिणम् – सिपाही को, अभियुक्तम् च – और अभियुक्त (अतिथि) को, तम् शवं – उस शव को, न्यायालये – अदालत में, आनेतुम् – लाने के लिए, आदिष्टवान् – आदेश दिया।

अनुवाद:
न्यायाधीश ने सिपाही और अभियुक्त दोनों को उस शव को अदालत में लाने का आदेश दिया।



🕉️ संस्कृत पंक्ति 1

आदेशं प्राप्य उभौ प्राचलताम्।

शब्दार्थ:
आदेशं – आदेश (न्यायाधीश का आदेश), प्राप्य – प्राप्त करके, उभौ – दोनों (आरक्षी और अभियुक्त), प्राचलताम् – चल पड़े।

अनुवाद:
आदेश प्राप्त करके दोनों (सिपाही और अभियुक्त) चल पड़े।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 2

तत्रोपेत्य काष्ठपटले निहितं पटाच्छादितं देहं स्कन्धेन वहन्तौ न्यायाधिकरणं प्रति प्रस्थितौ।

शब्दार्थ:
तत्र उपेत्य – वहाँ जाकर, काष्ठ-पटले – लकड़ी के तख्ते पर, निहितं – रखा हुआ, पट-आच्छादितं – कपड़े से ढका हुआ, देहं – शरीर (शव), स्कन्धेन – कंधे पर, वहन्तौ – उठाए हुए, न्यायाधिकरणं प्रति – न्यायालय की ओर, प्रस्थितौ – चल पड़े।

अनुवाद:
वहाँ पहुँचकर उन्होंने लकड़ी के तख्ते पर रखे और कपड़े से ढके शव को कंधे पर उठाकर न्यायालय की ओर प्रस्थान किया।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 3

आरक्षी सुपुष्टदेह आसीत्, अभियुक्तश्च अतीव कृशकायः।

शब्दार्थ:
आरक्षी – सिपाही, सुपुष्टदेहः – बलवान शरीर वाला, आसीत् – था; अभियुक्तः च – और अभियुक्त (अतिथि), अतीव – बहुत, कृशकायः – दुबला शरीर वाला, था।

अनुवाद:
सिपाही बलवान शरीर वाला था और अभियुक्त बहुत ही दुबला-पतला था।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 4

भारवतः शवस्य स्कन्धेन वहन तत्कृते दुष्करम् आसीत्।

शब्दार्थ:
भारवतः – भारी, शवस्य – शव का, स्कन्धेन – कंधे से, वहन – उठाना, तत्कृते – उसके (दुबले व्यक्ति) लिए, दुष्करम् – कठिन, आसीत् – था।

अनुवाद:
भारी शव को कंधे पर उठाना उस दुबले व्यक्ति के लिए बहुत कठिन था।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 5

स भारवेदनया क्रन्दति स्म।

शब्दार्थ:
सः – वह (अभियुक्त), भार-वेदनया – बोझ के दर्द से, क्रन्दति स्म – रो रहा था / कराह रहा था।

अनुवाद:
वह बोझ के दर्द से कराह रहा था।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 6

तस्य क्रन्दनं निशम्य मुदित आरक्षी तमुवाच — “रे दुष्ट ! तस्मिन् दिने त्वयाऽहं चोरिताया मञ्जूषाया ग्रहणाद् वारितः।

शब्दार्थ:
तस्य – उसका, क्रन्दनं – रोने की आवाज, निशम्य – सुनकर, मुदितः – प्रसन्न होकर, आरक्षी – सिपाही, तम् – उससे, उवाच – बोला: “रे दुष्ट!” – हे दुष्ट!; तस्मिन् दिने – उस दिन, त्वया – तेरे द्वारा, अहम् – मैं, चोरितायाः – चोरी की गई, मञ्जूषायाः – संदूक की, ग्रहणात् – पकड़ने से, वारितः – रोका गया।

अनुवाद:
उसकी कराह सुनकर प्रसन्न सिपाही बोला — “अरे दुष्ट! उस दिन तूने मुझे चोरी की गई संदूक को पकड़ने से रोक दिया था।”


🕉️ संस्कृत पंक्ति 7

इदानीं निजकृत्यस्य फलं भुङ्क्ष्व। अस्मिन् चौर्याभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे” इति प्रोच्य उच्चैः अहसत्।

शब्दार्थ:
इदानीं – अब, निज-कृत्यस्य – अपने कर्म का, फलं – फल, भुङ्क्ष्व – भोग, अस्मिन् चौर्य-अभियोगे – इस चोरी के आरोप में, त्वम् – तू, वर्ष-त्रयस्य – तीन वर्ष का, कारा-दण्डम् – कारावास दण्ड, लप्स्यसे – पाएगा / भुगतेगा, इति – ऐसा कहकर, प्रोच्य – बोलकर, उच्चैः – ऊँचे स्वर में, अहसत् – हँसा।

अनुवाद:
“अब अपने कर्म का फल भोग! इस चोरी के अपराध में तुझे तीन वर्ष का कारावास मिलेगा।” — यह कहकर वह जोर से हँसा।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 8

यथाकथञ्चिद् उभौ शवम् आनयि‍य एकस्मिन् चत्वरे स्थापितवन्तौ।

शब्दार्थ:
यथा-कथञ्चित् – किसी प्रकार, उभौ – दोनों, शवम् – शव को, आनयित्वा – लाकर, एकस्मिन् चत्वरे – एक चौराहे पर, स्थापितवन्तौ – रख दिया।

अनुवाद:
किसी तरह दोनों ने शव को लाकर एक चौराहे पर रख दिया।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 1

न्यायाधीशेन पुनः तौ घटनायाः विषये वक्तुम् आदिष्टौ।

शब्दार्थ:
न्यायाधीशेन – न्यायाधीश द्वारा, पुनः – फिर से, तौ – उन दोनों को (आरक्षी और अभियुक्त), घटनायाः विषये – घटना के विषय में, वक्तुम् – बोलने के लिए, आदिष्टौ – आदेश दिया गया।

अनुवाद:
न्यायाधीश ने उन दोनों को फिर से घटना के विषय में बताने का आदेश दिया।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 2

आरक्षिणि निजपक्षं प्रस्तुतवति आश्चर्यम् अघटत्।

शब्दार्थ:
आरक्षिणि – सिपाही के, निज-पक्षम् – अपना पक्ष (कथन), प्रस्तुतवति – प्रस्तुत करते समय, आश्चर्यम् – अचरज, अघटत् – घटित हुआ / हुआ।

अनुवाद:
जब सिपाही अपना पक्ष प्रस्तुत कर रहा था, तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी।


🕉️ संस्कृत पंक्ति 3

स शवः प्रावारकम् अपसार्य न्यायाधीशम् अभिवाद्य निवेदितवान् –
“मान्यवर ! एतेन आरक्षिणा अध्वनि यदुक्तं तद् वर्णयामि — ‘त्वयाऽहं चोरितायाः मञ्जूषायाः ग्रहणाद् वारितः। अतः निजकृत्यस्य फलं भुङ्क्ष्व। अस्मिन् चौर्याभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे’ इति।”

शब्दार्थ:
सः – वह, शवः – शव (मृत व्यक्ति), प्रावारकम् – कपड़ा, अपसार्य – हटाकर, न्यायाधीशम् – न्यायाधीश को, अभिवाद्य – नमस्कार करके, निवेदितवान् – निवेदन किया;
मान्यवर – हे सम्माननीय!; एतेन – इस (आरक्षी) द्वारा, अध्वनि – रास्ते में, यत् उक्तं – जो कहा गया, तत् वर्णयामि – मैं बताता हूँ;
‘त्वया अहम् – तेरे द्वारा मैं, चोरितायाः मञ्जूषायाः – चोरी की गई संदूक को, ग्रहणात् – पकड़ने से, वारितः – रोका गया; अतः – इसलिए, निजकृत्यस्य – अपने कर्म का, फलं – फल, भुङ्क्ष्व – भोग; अस्मिन् चौर्य-अभियोगे – इस चोरी के मामले में, त्वम् – तू, वर्ष-त्रयस्य – तीन वर्ष के, कारा-दण्डम् – जेल दंड, लप्स्यसे – पाएगा’ इति – ऐसा कहा।’

अनुवाद:
वह शव कपड़ा हटाकर उठ बैठा, न्यायाधीश को प्रणाम किया और बोला —
“मान्यवर! रास्ते में इस सिपाही ने मुझसे कहा था —
‘मैं उस दिन तेरे कारण चोरी की गई संदूक को पकड़ने से रह गया था,
अब तू अपने कर्म का फल भोग।
इस चोरी के अपराध में तू तीन वर्ष की जेल काटेगा।’”


🕉️ संस्कृत पंक्ति 4

न्यायाधीशः आरक्षिणे कारादण्डम् आदिश्य तं जनं ससम्मानं मुक्तवान्।

शब्दार्थ:
न्यायाधीशः – न्यायाधीश, आरक्षिणे – सिपाही को, कारा-दण्डम् – जेल की सजा, आदिश्य – देकर, तं जनं – उस व्यक्ति को (अतिथि को), स-सम्मानं – सम्मानपूर्वक, मुक्तवान् – मुक्त कर दिया।

अनुवाद:
न्यायाधीश ने सिपाही को कारावास का दंड दिया और उस व्यक्ति को सम्मानपूर्वक मुक्त कर दिया।


🕉️ अंतिम श्लोक (नैतिक संदेश)

अत एव उच्यते —
दुष्कराण्यपि कर्माणि मतिवैभवशालिनः।
नीतिं युक्तिं समालम्ब्य लीलयैव प्रकुर्वते॥

शब्दार्थ:
अत एव – इसलिए ही, उच्यते – कहा जाता है;
दुष्कराणि अपि – कठिन से कठिन भी, कर्माणि – कार्य,
मतिवैभव-शालिनः – बुद्धिमानों द्वारा,
नीतिं युक्तिं समालम्ब्य – नीति और युक्ति का सहारा लेकर,
लीलया एव – सरलता से (खेल की तरह), प्रकुर्वते – पूरा करते हैं।

अनुवाद (सार):
इसलिए कहा गया है कि बुद्धिमान व्यक्ति नीति और युक्ति का सहारा लेकर कठिन से कठिन कार्य भी सहजता से कर लेते हैं।


भावार्थ (सारांश):
यह कहानी बताती है कि बंकिमचन्द्र जैसे बुद्धिमान न्यायाधीश केवल तर्क और बुद्धि के बल पर बिना किसी प्रमाण के भी सच्चे अपराधी को पकड़ सकते हैं।
“विचित्रः साक्षी” — अर्थात् अनोखा साक्षी — यहाँ स्वयं “मृत व्यक्ति” ही था, जिसने अपनी वाणी से सच्चाई प्रकट कर दी।


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