मौर्य साम्राज्य राज्य-प्रशासन अर्थव्यवस्था अशोक का धम्म उसका स्वरूप और प्रचार
मौर्य साम्राज्य (Mauryan Empire)
I. मौर्य साम्राज्य का उदय और विस्तार
A. परिचय एवं संस्थापक
मौर्य काल का उदय प्राचीन भारतीय इतिहास में एक मील का पत्थर है, क्योंकि इस काल में पहली बार राजनीतिक एकता (political unity) प्राप्त हुई थी।
- संस्थापक: मौर्य वंश की स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने 322 ईसा पूर्व में कौटिल्य (चाणक्य/विष्णुगुप्त) के मार्गदर्शन में नंद वंश के अंतिम शासक धनानंद को पराजित करके की थी।
- राजधानी: मौर्य वंश ने पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) से शासन किया।
- साम्राज्य का विस्तार: मौर्य साम्राज्य का विस्तार उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में मैसूर तक और पूर्व में असम से लेकर पश्चिम में अफगानिस्तान तक फैला हुआ था। चंद्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस निकेटर को हराकर ट्रांस-सिंधु क्षेत्र (आर्या, अराकोसिया और गेड्रोसिया) प्राप्त किए थे।
- प्रमुख शासक:
- बिंदुसार (298-273 ईसा पूर्व): यूनानियों द्वारा इन्हें “अमित्रघात” (शत्रुओं का संहारक) कहा जाता था। तिब्बती भिक्षु तारानाथ के अनुसार, बिंदुसार ने ‘दो समुद्रों के बीच की भूमि’ वाले सोलह राज्यों को जीता था। उन्होंने अपने पुत्र अशोक को उज्जयिनी का राज्यपाल नियुक्त किया था।
- अशोक (273-232 ईसा पूर्व): इनके राज्याभिषेक (269 ईसा पूर्व) और सिंहासनारूढ़ (273 ईसा पूर्व) के बीच चार साल का अंतर था, जिससे यह प्रतीत होता है कि उत्तराधिकार विवादास्पद था।
B. कलिंग युद्ध और अशोक का बौद्ध धर्म ग्रहण
- कलिंग युद्ध (261 ईसा पूर्व): अशोक के शासनकाल की सबसे महत्वपूर्ण घटना 261 ईसा पूर्व में कलिंग के साथ हुआ उनका विजयी युद्ध था। रॉक एडिक्ट XIII में अशोक ने स्वयं युद्ध के भीषण परिणामों का वर्णन किया है: “एक लाख पचास हज़ार लोग निर्वासित हुए, एक लाख मारे गए और उससे कई गुना अधिक नष्ट हो गए”।
- धार्मिक परिवर्तन: कलिंग युद्ध के बाद, अशोक को गहरा पश्चाताप हुआ और उन्होंने बौद्ध भिक्षु उपगुप्त के प्रभाव में बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। लगभग 261 ईसा पूर्व में वह एक शाक्य उपासक (lay disciple) और ढाई साल बाद एक भिक्षु बन गए।
II. मौर्य साम्राज्य: राज्य प्रशासन (Mauryan Administration)
मौर्य प्रशासन, जिसका विवरण कौटिल्य के अर्थशास्त्र, यूनानी वृत्तांतों (मेगस्थनीज की इंडिका), और अशोक के अभिलेखों में मिलता है, एक अत्यधिक केंद्रीकृत (highly centralized) और कुशल नौकरशाही प्रणाली थी। यह प्राचीन भारत में शासन के नए मानक स्थापित करता है।
A. केंद्रीय प्रशासन (Central Administration)
- राजा की स्थिति: राजा प्रशासन का केंद्रीय व्यक्ति था और सभी शक्तियों का सर्वोच्च स्रोत था। उसके पास सर्वोच्च कार्यकारी, विधायी और न्यायिक शक्तियाँ निहित थीं। कौटिल्य ने राजा को ‘धर्मप्रवर्तक’ (सामाजिक व्यवस्था का प्रचारक) कहा है। राजा से अपेक्षा की जाती थी कि वह धर्म के रक्षक के रूप में धार्मिक मार्ग का पालन करे।
- मंत्री परिषद् (Council of Ministers): राजा को एक मंत्री परिषद् (‘Mantriparishad’) सहायता और सलाह देती थी, जिसका नेतृत्व ‘मंत्रीपरिषद्-अध्यक्ष’ (आज के प्रधानमंत्री के समान) करता था।
- उच्च अधिकारी (तीर्थ और अध्यक्ष):
- तीर्थ (Tirthas): प्रशासन में अधिकारियों की सर्वोच्च श्रेणी (18 तीर्थ)। इनमें मंत्री (Chief Minister), पुरोहित (Chief Priest), सेनापति (Commander-in-chief), और युवराज (Crown Prince) शामिल थे। युवराज तीर्थों में सर्वोच्च पदाधिकारी था।
- अमात्य (Amatyas): उच्च पदस्थ अधिकारी जो प्रशासनिक और न्यायिक भूमिकाएँ निभाते थे, ये वर्तमान सचिवों के समान थे।
- अध्यक्ष (Adhyakshas): 27 अधीक्षक (Superintendents) थे, जो मुख्य रूप से आर्थिक गतिविधियों को नियंत्रित करते थे। उदाहरण: सीताध्यक्ष (कृषि के अधीक्षक), पण्यध्यक्ष (व्यापार और वाणिज्य के प्रभारी), लोहाध्यक्ष (लोहे के अधीक्षक), और आकराध्यक्ष (खनन अधिकारी)।
- जासूसी प्रणाली: अर्थशास्त्र में जासूसी प्रणाली की विस्तृत जानकारी मिलती है। जासूस दो प्रकार के होते थे: संस्था (स्थायी रूप से कार्य करने वाले) और संचारि (भटकने वाले)।
B. प्रांतीय और स्थानीय प्रशासन
- प्रांतीय विभाजन: साम्राज्य को पाँच भागों (अशोक के अधीन) में विभाजित किया गया था।
- उत्तरापथ (उत्तरी): तक्षशिला।
- अवंति राष्ट्र (पश्चिमी): उज्जयिनी।
- दक्षिणापथ (दक्षिणी): सुवर्णगिरि।
- कलिंग (पूर्वी): तोसली।
- प्राची (केंद्रीय): राजधानी पाटलिपुत्र का क्षेत्र।
- प्रांतीय राज्यपाल: प्रांतों का शासन प्रायः शाही परिवार के सदस्य या राजकुमारों द्वारा किया जाता था, जिन्हें वायसराय या कुमार/आर्यपुत्र कहा जाता था।
- जिला प्रशासन: जिलों का प्रभार राजुक (Rajukas) के पास होता था, जिनकी स्थिति और कार्य आज के जिला कलेक्टरों के समान थे। राजुक को अधीनस्थ अधिकारी युक्त (Yuktas) सहायता करते थे।
- ग्राम प्रशासन: प्रशासन की सबसे छोटी इकाई गाँव थी, जिसका मुखिया ग्रामणी होता था। गाँवों को पर्याप्त स्वायत्तता प्राप्त थी।
- नगर प्रशासन (पाटलिपुत्र): मेगस्थनीज के अनुसार, राजधानी पाटलिपुत्र का प्रशासन छह समितियों द्वारा किया जाता था, जिनमें से प्रत्येक में पाँच सदस्य होते थे। ये समितियाँ उद्योग, विदेशियों की देखभाल, जन्म और मृत्यु का पंजीकरण, व्यापार और वाणिज्य, निर्मित वस्तुओं की बिक्री और बिक्री कर संग्रह जैसे कार्य संभालती थीं।
C. सैन्य और न्यायिक प्रशासन
- सैन्य प्रशासन: मौर्य सेना सुव्यवस्थित थी और सेनापति के नियंत्रण में थी। राजा सेना का सर्वोच्च कमांडर होता था। प्लिनी के अनुसार, मौर्य सेना में 6 लाख पैदल सैनिक, 30 हज़ार घुड़सवार और 9 हज़ार हाथी शामिल थे। मेगस्थनीज के अनुसार, सेना छह समितियों (पैदल सेना, घुड़सवार सेना, युद्ध रथ, हाथी, नौसेना और परिवहन) द्वारा प्रशासित थी, जिनमें से प्रत्येक में पाँच सदस्य होते थे।
- न्यायिक प्रशासन: न्याय का सर्वोच्च न्यायालय राजधानी में था, जिसका मुख्य न्यायाधीश ‘धर्मस्थिकारिन’ कहलाता था। दो प्रकार के न्यायालय थे: धर्मस्थीय न्यायालय (दीवानी मामले) और कंटकशोधन न्यायालय (आपराधिक/असामाजिक तत्वों को हटाना)। अपराधों के लिए सज़ाएँ आमतौर पर कठोर होती थीं।
III. मौर्य साम्राज्य: अर्थव्यवस्था (Mauryan Economy)
मौर्य काल की अर्थव्यवस्था कृषि और उद्योग के समन्वय पर आधारित थी।
- कृषि और भूमि राजस्व:
- मुख्य आधार: कृषि और औद्योगिक दोनों क्षेत्रों ने काफी प्रगति की। खेती के लिए बड़े पैमाने पर भूमि का उपनिवेशीकरण किया गया। शूद्रों को भी कृषि कार्य में लगाया गया और नए भूखंडों को खेती के लिए उपलब्ध कराया गया।
- सिंचाई: कौटिल्य ने सिंचाई सुविधाओं के प्रावधान का उल्लेख किया है, जिसके लिए किसानों को भुगतान करना पड़ता था।
- राजस्व: राज्य की आय का मुख्य स्रोत भूमि राजस्व था, जो आमतौर पर उपज का एक-छठा भाग (1/6th) निर्धारित किया गया था। हालांकि, कुछ स्थानों पर यह उपज का एक-चौथाई (1/4th) भी हो सकता था।
- राजस्व अधिकारी: समाहर्ता (Samaharta) राजस्व निर्धारण का सर्वोच्च अधिकारी था, और सन्निधाता (Sannidhata) राज्य के खजाने का मुख्य संरक्षक (Chief Treasurer) होता था।
- अन्य कर और आय के स्रोत:
- विभिन्न कर: भूमि राजस्व के अलावा, बलि (Bali) नामक एक अतिरिक्त कर, पिंडकर (गाँवों के समूह पर कर), सिंचाई कर, कस्टम, दुकान कर, जंगल, खानों और चरागाहों से राजस्व एकत्र किया जाता था।
- राज्य एकाधिकार: खनन, शराब की बिक्री, और हथियारों के निर्माण पर राज्य का एकाधिकार (monopoly) था।
- खनन का महत्व: कौटिल्य का मानना था कि खनन (mining) खजाने और सैन्य शक्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
- उद्योग और व्यापार:
- मुद्रा: इस अवधि में पंच-चिह्नित सिक्के (punched marked coins) प्रचलित थे, जिन पर मोर, पहाड़ी और अर्धचंद्र के प्रतीक थे। अधिकारियों को नकद में वेतन दिया जाता था।
- गिल्ड और श्रेणी: कारीगर ‘श्रेणी’ (Guilds) में संगठित थे, जो शहरी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण थे। ये श्रेणियाँ बैंकों, फाइनेंसरों और न्यासियों के रूप में भी कार्य करती थीं।
IV. अशोक का धम्म (Ashoka’s Dhamma)
A. धम्म का स्वरूप और सिद्धांत (Nature and Principles of Dhamma)
अशोक का धम्म विश्व इतिहास में एक प्रसिद्ध नैतिक प्रयास है, जो कलिंग युद्ध के बाद मानव कल्याण की ओर उनके ध्यान का परिणाम था।
- धम्म की परिभाषा: धम्म संस्कृत शब्द ‘धर्म’ का पालि रूप है। धम्म कोई विशेष धार्मिक आस्था या अभ्यास नहीं था, बल्कि यह मानव कल्याण और सामाजिक नैतिकता को स्थापित करने के उद्देश्य से एक नैतिक संहिता (ethical code) था।
- मूल तत्व: अशोक ने दूसरे और सातवें स्तंभ-लेखों में धम्म की व्याख्या की है:
- साधुता और कल्याण: धम्म है साधुता (piety), बहुत से कल्याणकारी अच्छे कार्य करना (Bahukayane)।
- पापरहित होना: पापरहित होना (Apasinve) तथा क्रोध, मान, ईर्ष्या, चंडता और निष्ठुरता जैसे पाप लक्षणों से बचना चाहिए।
- दया और दान: दूसरों के प्रति व्यवहार में मृदुता (Madhave), दया-दान (Dayadane) तथा शुचिता (Sauchye)।
- आचरण संबंधी नियम:
- अहिंसा: प्राणियों का वध न करना, जीव हिंसा न करना।
- आदर: माता-पिता तथा बड़ों की आज्ञा मानना, गुरुजनों के प्रति आदर।
- उचित व्यवहार: मित्र, परिचित, संबंधी, ब्राह्मण, श्रवण (बौद्ध भिक्षु) और दास तथा भृत्यों के प्रति उचित व्यवहार।
- सहिष्णुता (Tolerance): अशोक ने सभी संप्रदायों में सामंजस्य स्थापित करने के लिए ज़ोर दिया। वह धर्म की सार-वृद्धि (सार तत्व की वृद्धि) पर बल देता था।
- आत्म-नियंत्रण: धम्म में अल्प व्यय और अल्प संग्रह पर बल दिया गया है।
B. धम्म का उद्देश्य (Purpose and Context)
- मानव कल्याण: धम्म का मुख्य उद्देश्य मानव कल्याण और लोगों का नैतिक उत्थान करना था। अशोक का मानना था कि उसकी प्रजा उसकी संतान है (सारी प्रजा मेरी संतान है)।
- राजनीतिक उद्देश्य: धम्म की नीति अशोक के विशाल साम्राज्य को सैन्य बल के बजाय वैचारिक स्तर पर एकजुट रखने का एक प्रयास था।
- शांति और एकता: कलिंग विजय के बाद, अशोक का लक्ष्य प्रजा में विद्रोह की भावना को कम करना, आसपास के राज्यों को आक्रमण से रोकना और शांति बनाए रखना था। यह जटिल, विविध समाज में सद्भाव और सहिष्णुता स्थापित करने के लिए आवश्यक था।
- धम्म विजय: अशोक ने युद्ध (Bherighosha) के स्थान पर धम्म द्वारा विजय (Dhammavijaya) को वास्तविक विजय माना।
- व्यावहारिकता: हालाँकि अशोक ने अहिंसा पर बल दिया, लेकिन वह पूरी तरह से अहिंसावादी नहीं थे। उन्होंने अपनी सेना को भंग नहीं किया और जनजातियों को चेतावनी दी कि यदि वे नैतिक व्यवस्था का पालन नहीं करेंगे तो उन्हें बल प्रयोग करना पड़ सकता है। उन्होंने अधिकारियों को दंड देने का अधिकार भी दिया।
C. धम्म का प्रचार (Propagation of Dhamma)
अशोक ने अपने धम्म के प्रचार के लिए अनेक महत्वपूर्ण प्रयास किए।
- अभिलेखों का प्रयोग: अशोक ने अपने संदेश को जनता तक पहुँचाने के लिए चट्टानों और पॉलिश किए गए पत्थरों पर धर्मोपदेश उत्कीर्ण करवाए। ये अभिलेख पूरे साम्राज्य में प्रमुख राजमार्गों और पहुंच योग्य स्थानों पर रखे गए थे।
- धम्म महामात्रों की नियुक्ति: अशोक ने अपने शासनकाल के 14वें वर्ष में धम्म महामात्रों (Dhamma-mahamattas) नामक एक नए प्रकार के उच्च अधिकारियों की नियुक्ति की।
- कार्य: इनका मुख्य कार्य जनता में धम्म का प्रचार करना, सभी संप्रदायों के हितों की देखभाल करना, और सामाजिक कल्याण (जैसे कैदियों को वित्तीय सहायता देना और दंड कम करवाने का प्रयास करना) सुनिश्चित करना था।
- यात्राएँ और निरीक्षाटन:
- धम्म यात्राएँ: अशोक ने शिकार यात्राओं (Viharayatra) को रोककर धम्म यात्राएँ (Dhammayatras) शुरू कीं, जिससे उन्हें लोगों के साथ सीधा संपर्क स्थापित करने का अवसर मिला।
- अनुसंधान: प्रादेशिक, राजुक, और युक्तक जैसे अधिकारियों को प्रशासनिक कार्य के अतिरिक्त धर्म प्रचार के लिए हर पाँचवें वर्ष (तक्षशिला और उज्जयिनी में हर तीसरे वर्ष) यात्रा पर भेजा जाता था, जिसे अनुसंधान कहा गया।
- लोक कल्याणकारी कार्य: अशोक ने मनुष्यों और पशुओं के लिए चिकित्सालय खुलवाए। जहाँ उपयोगी औषधियाँ उपलब्ध नहीं थीं, वहाँ बाहर से मँगाकर लगवाई गईं। सड़कों के किनारे पेड़ लगाए गए, और कुएँ खुदवाए तथा प्याऊ स्थापित किए गए।
- विदेशी प्रचार: अशोक ने धम्म के प्रचार के लिए अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को सीलोन (श्रीलंका) भेजा। इसके अलावा, मिशन सीरिया, मिस्र, मैसेडोनिया, एपिरस और खतान (मध्य एशिया) जैसे दूर-दराज के स्थानों पर भी भेजे गए।
यह नोट्स मौर्य साम्राज्य की संरचना और अशोक की नैतिक शासन नीति की गहराई को दर्शाते हैं। इसे एक नैतिक पुल (Ethical Bridge) की तरह समझा जा सकता है जो विशाल साम्राज्य के विभिन्न जातीय, धार्मिक और सामाजिक समूहों को एक साथ जोड़कर, राजा और प्रजा के बीच एक पिता-पुत्र जैसा संबंध स्थापित करने का प्रयास करता है।