मौर्योत्तर काल – शुंग, पश्चिमी क्षत्रप, सातवाहन और कुषाण
मौर्योत्तर काल (ईसा पूर्व 200 – 300 ईस्वी)
I. परिचय एवं पृष्ठभूमि (Introduction and Background)
मौर्योत्तर काल वह अवधि है जो मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद शुरू होती है, जिसे सामान्यतः ईसा पूर्व 200 वर्ष से लेकर 300 ईस्वी तक की अवधि माना जाता है। इस काल में कोई विशाल केंद्रीयकृत साम्राज्य स्थापित नहीं हुआ, बल्कि कई क्षेत्रीय शक्तियों का उदय हुआ।
A. प्रमुख विशेषताएँ (Key Characteristics)
- राजनीतिक विखंडन: अशोक की मृत्यु के बाद, विशाल मौर्य साम्राज्य खंडित हो गया। गंगा घाटी में शुंगों ने, दक्कन में सातवाहनों ने, और सुदूर दक्षिण में चेर, चोल और पांड्यों ने शासन स्थापित किया।
- विदेशी आक्रमण: भारत के उत्तर-पश्चिमी और पश्चिमी भागों में मध्य एशिया से कई विदेशी राजवंशों (जैसे, शक, पहलव, और कुषाण) का आक्रमण हुआ।
- सांस्कृतिक समन्वय: इस काल में मध्य एशिया और भारत के बीच घनिष्ठ और व्यापक संपर्क स्थापित हुए। इससे कला, धर्म (विशेषकर महायान बौद्ध धर्म), और साहित्य में नए बदलाव आए।
- व्यापारिक समृद्धि: इस युग में व्यापार और वाणिज्य का विस्तार हुआ, जिसमें रोमन साम्राज्य के साथ समुद्री और उत्तरापथ (रेशम मार्ग) के माध्यम से भूमि व्यापार शामिल था।
II. शुंग राजवंश (Shunga Dynasty)
A. संस्थापक और विस्तार (Founder and Expansion)
- स्थापना: शुंग वंश की स्थापना पुष्यमित्र शुंग ने लगभग 185 ईसा पूर्व में की थी। वह मौर्य सेना का सेनापति था, जिसने अंतिम मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या करके सिंहासन पर कब्ज़ा किया।
- शासनावधि और क्षेत्र: शुंगों ने लगभग 100 वर्षों तक शासन किया। उनकी राजधानी पाटलिपुत्र (Pataliputra) थी, और विदिशा (Vidisha) भी एक प्रमुख केंद्र था। उनका राज्य अयोध्या, पूर्वी मालवा (विदिशा), और संभवतः पंजाब (शाकाला) तक फैला हुआ था।
- प्रमुख शासक: पुष्यमित्र का पुत्र अग्निमित्र कालिदास के नाटक मालविकाग्निमित्रम् का नायक था।
- युद्ध और चुनौतियाँ: पुष्यमित्र को कलिंग के राजा खारवेल के आक्रमण का सामना करना पड़ा। उन्हें उत्तर-पश्चिम से बैक्टीरियाई यूनानियों (Bactrian Greeks) के आक्रमणों से भी उत्तरी भारत की रक्षा करनी पड़ी।
B. धर्म और संस्कृति में योगदान (Contribution to Religion and Culture)
- वैदिक रिवाज़ों का पुनरुत्थान: शुंग शासकों ने ब्राह्मण धर्म (Brahmanism/Hinduism) का संरक्षण किया। पुष्यमित्र शुंग ने दो अश्वमेध यज्ञ किए, जिसका उल्लेख अयोध्या शिलालेख (Ayodhya Inscription) में मिलता है।
- बौद्ध धर्म के प्रति रुख: कुछ विद्वानों का मानना है कि पुष्यमित्र ने बौद्धों का उत्पीड़न किया और स्तूपों को नष्ट किया। हालांकि, साँची और भरहुत के बौद्ध स्मारकों का जीर्णोद्धार (renovation) शुंग काल में किया गया।
- साहित्य और भाषा: इस युग में संस्कृत भाषा को प्रोत्साहन मिला। पतंजलि, जिन्होंने योग सूत्र और महाभाष्य की रचना की, पुष्यमित्र शुंग के समकालीन थे।
III. पश्चिमी क्षत्रप (Western Kshatrapas)
पश्चिमी क्षत्रप शक (Saka/Scythian) मूल के शासक थे, जिन्होंने ईस्वी प्रथम शताब्दी से चौथी शताब्दी तक पश्चिमी और मध्य भारत पर शासन किया।
A. शासन और उपाधियाँ (Rule and Titles)
- क्षेत्र: वे सौराष्ट्र, मालवा, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के कुछ हिस्सों पर शासन करते थे। वे उत्तरी भारत में कुषाणों और मध्य भारत में सातवाहनों के समकालीन थे।
- उपाधि: ‘क्षत्रप’ (Kshatrapa), जो एक प्रारंभिक फ़ारसी शब्द Ksatrapavan का संस्कृत रूप है, का अर्थ है ‘भूमि का रक्षक’ या एक प्रांत का वायसराय/गवर्नर। शासक राजा को ‘महाक्षत्रप’ (Mahaksatrapa), जो महाराजा के समान होता था, की उपाधि दी जाती थी।
- मुद्रा: पश्चिमी क्षत्रपों को अपनी मुद्राओं का खनन और जारी करने की अनुमति थी। उनके सिक्कों पर शक युग (78 ईस्वी) की तिथि अंकित होती थी।
B. प्रमुख राजवंश और शासक (Main Dynasties and Rulers)
- क्षहरात वंश (Kshaharata Dynasty): यह एक अल्पकालिक राजवंश था।
- नहपान (Nahapana): इस वंश का सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली शासक था। उसके क्षेत्र में गुजरात से लेकर उज्जैन और नासिक तक का विशाल भाग शामिल था। उसने पश्चिमी दक्कन के बंदरगाहों पर कब्ज़ा करके सातवाहन क्षेत्र के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था।
- अंत: नहपान को सातवाहन राजा गौतमीपुत्र सातकर्णी ने पराजित किया। गौतमीपुत्र सातकर्णी ने नहपान के सिक्कों को पुनः जारी (overstruck) किया था।
- कार्दमक वंश (Kardamaka Dynasty): इसकी स्थापना चष्टन (Chastana) ने लगभग 78 ईस्वी में मालवा में की।
- रुद्रदामन प्रथम (Rudradaman I): चष्टन का पौत्र और इस वंश का सबसे प्रमुख शासक था। उसकी उपलब्धियाँ जूनागढ़ शिलालेख (Junagarh inscription) में वर्णित हैं, जो संस्कृत में लिखा गया भारत का पहला शिलालेख है।
- उसने सातवाहनों को दो बार हराया। संघर्ष को रोकने के लिए, रुद्रदामन ने अपनी पुत्री का विवाह सातवाहन राजा वशिष्ठीपुत्र सातकर्णी से कराया।
C. व्यापार और पतन (Trade and Decline)
- व्यापारिक केंद्र: गुजरात (विशेष रूप से भड़ौच/ब्रोच) भारत का समुद्री प्रवेश द्वार था, और क्षत्रपों ने रोम के साथ होने वाले सक्रिय समुद्री व्यापार को नियंत्रित किया।
- अंतिम पतन: रुद्रसिंह III (Rudrasimha III) अंतिम क्षत्रप शासक था। गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) ने 388-395 ईस्वी के आसपास शकों को पराजित किया, उनके क्षेत्रों को अपने साम्राज्य में मिला लिया।
IV. सातवाहन वंश (Satavahana Dynasty)
सातवाहन वंश मौर्योत्तर काल का दक्षिणी भारत (दक्कन) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और शक्तिशाली राजवंश था।
A. शासन और स्रोत (Rule and Sources)
- पहचान और क्षेत्र: उन्हें आंध्र या आंध्रभृत्य के नाम से भी जाना जाता था। उन्होंने दक्कन क्षेत्र (आधुनिक महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों) पर शासन किया।
- स्थापना: सिमुका (Simuka) इस वंश का संस्थापक था। वे शुरू में मौर्यों के सामंत थे।
- राजधानियाँ: प्रतिष्ठान (पैठन) और अमरावती/धरणिकोटा उनकी प्रमुख राजधानियाँ थीं।
- स्रोत: पुराण, नासिक और नाणेघाट (Nanaghad) अभिलेख उनके इतिहास के मुख्य स्रोत हैं।
B. प्रमुख शासक और उपलब्धियाँ (Key Rulers and Achievements)
- हाल (Hala): 17वें राजा। उन्होंने प्राकृत भाषा में गाथासप्तशती (Gatha Saptasati) नामक 700 छंदों का संकलन किया।
- गौतमीपुत्र सातकर्णी (Gautamiputra Satakarni): इन्हें सातवाहन वंश का सबसे महान शासक माना जाता है। उन्होंने शक, यवन और पहलवों को पराजित किया। उन्होंने क्षहरात वंश के शासक नहपान को पूरी तरह नष्ट कर दिया। उनकी उपलब्धियाँ उनकी माता गौतमी बालश्री द्वारा जारी नाशिक प्रशस्ति में दर्ज हैं।
- वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी (Vashishtiputra Pulomavi): गौतमीपुत्र सातकर्णी के उत्तराधिकारी। उन्होंने अमरावती स्तूप का जीर्णोद्धार और अलंकरण करवाया।
- यज्ञ श्री सातकर्णी (Yajna Sri Satakarni): अंतिम महान शासक। उन्होंने शकों से कुछ क्षेत्र वापस लिए। उनके सिक्कों पर जहाजों की छवि अंकित थी, जो उनके समुद्री व्यापार और शक्ति का संकेत देती है।
C. प्रशासन, अर्थव्यवस्था और संस्कृति (Administration, Economy, and Culture)
- प्रशासन: यह मौर्य मॉडल पर आधारित था, लेकिन सामंतवादी (feudalistic) प्रकृति का था। प्रशासनिक इकाइयाँ: जनपद > आहार > ग्राम। महारथी (Maharathis) और महाभोज (Mahabhojas) जैसे सामंतों का महत्वपूर्ण स्थान था।
- भाषा और धर्म: अधिकांश अभिलेख प्राकृत भाषा में थे। उन्होंने ब्राह्मण धर्म और बौद्ध धर्म दोनों को संरक्षण दिया।
- अर्थव्यवस्था और व्यापार: उन्होंने कृषि और समुद्री व्यापार को बढ़ावा दिया। उन्होंने मुख्य रूप से सीसा (Lead), तांबे और पोटिन (Potin) के सिक्के जारी किए। इटली में पोम्पेई से मिली लक्ष्मी की हाथीदांत की मूर्ति इंडो-रोमन व्यापार का प्रमाण है।
- कला: उनके शासनकाल में अमरावती स्कूल ऑफ आर्ट विकसित हुआ।
V. कुषाण साम्राज्य (Kushan Empire)
कुषाण मौर्योत्तर काल के सबसे शक्तिशाली बाहरी शासक थे, जिन्होंने उत्तर-पश्चिमी और उत्तरी भारत के बड़े हिस्से पर शासन किया।
A. संस्थापक और विस्तार (Founders and Expansion)
- उत्पत्ति: कुषाण यूची (Yuehchis) नामक मध्य एशियाई खानाबदोश जनजाति की एक शाखा थे। उन्होंने पहले बैक्ट्रिया में शकों को विस्थापित किया।
- संस्थापक: कुजुल कडफिसस I ने इस वंश की नींव रखी। उनके पुत्र विमा कडफिसस II ने उत्तर-पश्चिमी भारत को जीता और सोने के सिक्के जारी करने वाला पहला शासक थे।
- साम्राज्य का विस्तार: कुषाण साम्राज्य मध्य एशिया के खोरासान से लेकर भारत में वाराणसी (बनारस) तक फैला हुआ था।
B. कनिष्क (Kanishka) (78-120 ईस्वी)
- सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक: कनिष्क कुषाण वंश का सबसे महत्वपूर्ण/महान शासक था।
- शक युग का आरंभ: उन्हें शक युग (78 ईस्वी) की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है।
- राजधानियाँ: उनकी मुख्य राजधानी पुरुषपुर (पेशावर) थी, जबकि मथुरा दूसरी महत्वपूर्ण राजधानी थी।
- बौद्ध धर्म का संरक्षण: कनिष्क ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया और महायान बौद्ध धर्म का महान संरक्षक था।
- चतुर्थ बौद्ध संगीति: उन्होंने कश्मीर के कुंडलवन में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन किया। इस संगीति में महाविभाष नामक बौद्ध दर्शन का एक विश्वकोश संकलित किया गया।
- राज्याश्रित विद्वान: उनके दरबार में महान विद्वान अश्वघोष (बुद्धचरित के लेखक), नागार्जुन और प्रसिद्ध चिकित्सक चरक (Charaka) थे।
C. प्रशासन, अर्थव्यवस्था और कला (Administration, Economy, and Art)
- प्रशासन: उन्होंने क्षत्रप प्रणाली (Satrapa system) को अपनाया, जिसमें महाक्षत्रप (राजा) और क्षत्रप (युवराज) संयुक्त रूप से शासन करते थे। कुषाण शासकों ने ‘देवपुत्र’ जैसे उच्च-ध्वनि वाले शीर्षक अपनाए।
- व्यापार: उनके शासन में रेशम मार्ग (Silk Route) से भूमि व्यापार फला-फूला, जिसने भारत को रोमन साम्राज्य और मध्य एशिया से जोड़ा।
- कला और संस्कृति: कनिष्क के शासनकाल में गांधार (Gandhara) और मथुरा स्कूल ऑफ आर्ट का विकास हुआ। गांधार कला ग्रेको-रोमन कला शैली थी जिसे बौद्ध विषयों पर लागू किया गया था।
एक सरलीकृत तुलनात्मक दृष्टि से, मौर्योत्तर काल को एक चौराहे के रूप में देखा जा सकता है, जहाँ शुंगों ने वैदिक पुनर्जागरण का प्रतिनिधित्व किया, सातवाहनों ने दक्कन की स्थिरता बनाए रखी, और पश्चिमी क्षत्रप तथा कुषाणों ने मध्य एशियाई और भूमध्यसागरीय व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए एक पुल का काम किया। इस काल के अंत में यह सांस्कृतिक सम्मिश्रण ही था जिसने आगे चलकर गुप्त काल के ‘स्वर्ण युग’ की नींव रखी।