वास्तुकला – सुल्तानों के स्मारक (Architecture Monuments of the Sultans)

वास्तुकला – सुल्तानों के स्मारक (Architecture Monuments of the Sultans) दिल्ली सल्तनत (1206–1526 ईस्वी) के सुल्तानों के अधीन विकसित वास्तुकला भारत में इंडो-इस्लामिक वास्तुकला के उद्भव को चिह्नित करती है, जो तुर्की (मध्य और पश्चिम एशिया) और स्वदेशी भारतीय परंपराओं के बीच एक महत्वपूर्ण संश्लेषण को दर्शाती है।

यह कालक्रम वास्तुकला के विकास को प्रमुख राजवंशों के अनुसार तीन चरणों में विभाजित करता है:


I. सल्तनत वास्तुकला की सामान्य विशेषताएँ

  1. संश्लेषण और निर्माण की विधि (Synthesis and Construction Method):
    • तुर्कों द्वारा लाई गई परंपराएँ भारतीय परंपराओं के साथ समाहित हुईं, जिससे सुल्तानों के स्मारकों में भारत और तुर्की तत्वों का सुखद मिश्रण दिखाई देता है।
    • तुर्कों द्वारा सामान्यतः उपयोग किए जाने वाले वास्तुशिल्प तत्वों में मेहराब (arch) और गुंबद (dome) प्रमुख थे, जिन्होंने भारतीयों की सपाट छत वाली संरचनाओं का स्थान ले लिया।
    • मेहराब और गुंबद ने छत को सहारा देने के लिए बड़ी संख्या में खंभों की आवश्यकता को समाप्त कर दिया, जिससे सभाओं और प्रार्थनाओं के लिए बड़े हॉल का निर्माण संभव हो गया।
    • ऐसी संरचनाओं के लिए इमारतों में अच्छी गुणवत्ता वाले मोर्टार (good quality mortar) का उपयोग आवश्यक था।
    • तुर्की शासकों ने मेहराब और गुंबद विधि के साथ-साथ स्लैब और बीम विधि दोनों का उपयोग किया।
  2. सामग्री और सजावट (Materials and Decoration):
    • सामान्यतः लाल बलुआ पत्थर का उपयोग किया जाता था, जबकि पीले बलुआ पत्थर और संगमरमर का उपयोग कुछ विशेष विशेषताओं को उजागर करने के लिए किया जाता था।
    • तुर्की शैली में मानव और पशुओं का चित्रण वर्जित था, क्योंकि इसे गैर-इस्लामिक माना जाता था।
    • इमारतों को ज्यामितीय और पुष्प डिजाइनों के साथ-साथ कुरान के छंदों के उपयोग से सजाया गया, जिसे ‘अरेबेस्क’ (arabesque) कहा जाता था।
    • तुर्कों ने घंटी, स्वस्तिक, कमल, और पानी के बर्तन जैसे हिंदू रूपांकनों और विशेषताओं का भी खुलकर उपयोग किया।

II. प्रथम चरण (c.1206-1320 ईस्वी): मामलुक (ग़ुलाम) और ख़िलजी वंश

यह चरण ग़ुलाम वंश (1206–1290 ई.) से लेकर ख़िलजी वंश के अंत तक चला। इस काल की शैली को मामलुक शैली के नाम से जाना जाता था।

स्मारकशासक/वंशमुख्य वास्तुशिल्प विशेषताएँ
क़ुतुब मीनारकुतुबुद्दीन ऐबक (शुरुआत) और इल्तुतमिश (समापन)यह तुर्की सेनाओं की विजय का प्रतीक था। यह सूफी संत कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी को समर्पित था। मीनार में कुरान के छंदों की नक्काशीदार पट्टियाँ हैं और इसकी बेलनाकार पतली आकृति बढ़ी हुई ऊँचाई का भ्रम देती है।
क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिदकुतुबुद्दीन ऐबकयह दिल्ली में इस्लामी विजय के बाद निर्मित पहली मस्जिद थी। इसे 27 हिंदू और जैन मंदिरों के अवशेषों का उपयोग करके बनाया गया था।
अढ़ाई दिन का झोंपड़ाऐबकअजमेर में स्थित, यह भी इस काल का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जिसे ऐबक ने निर्मित करवाया।
इल्तुतमिश का मकबराइल्तुतमिशइसमें स्क्विंच आर्क (Squinch Arch) का प्रयोग किया गया था, जो एक वर्गाकार कमरे के ऊपरी कोनों को गोल करके गुंबद का आधार बनाने की विधि है। अंदर हिंदू रूपांकनों, जैसे कि घंटी-और-श्रृंखला और कमल का मिश्रण है।
बलबन का मकबराबलबनइस मकबरे में भारत में पहली बार सच्चे मेहराब (True Arch) का प्रयोग हुआ था।
अलाई दरवाज़ाअलाउद्दीन ख़िलजी (1305 ई.)यह कुतुब परिसर का मुख्य दक्षिणी प्रवेश द्वार है। इसमें सही वैज्ञानिक लाइनों पर निर्मित पहला गुंबद है। यह सच्चे मेहराबों और सच्चे गुंबदों का सबसे पहला उदाहरण है।
सीरीअलाउद्दीन ख़िलजीयह अलाउद्दीन ख़िलजी द्वारा स्थापित दिल्ली का दूसरा शहर था।

III. द्वितीय चरण (c.1320-1414 ईस्वी): तुगलक वंश

इस चरण में, इंडो-इस्लामिक शैली एक स्वतंत्र वास्तुकला शैली के रूप में उभरी।

  1. संरचनात्मक विकास और सामग्री:
    • तुगलक वास्तुकला की एक नई विशेषता ढलान वाली दीवारों (sloping walls) की “बैट्टर” (batter) तकनीक थी, जो संरचनाओं को मजबूती और ऊँचाई प्रदान करती थी। हालांकि, फ़िरोज़ शाह तुगलक की इमारतों में ‘बैट्टर’ नहीं पाया जाता है।
    • तुगलकों ने महँगे लाल बलुआ पत्थर के स्थान पर सस्ते और आसानी से उपलब्ध ग्रे पत्थरों (grey stones) का उपयोग किया।
    • कठिन ग्रे पत्थरों पर नक्काशी कठिन होने के कारण इमारतों में न्यूनतम सजावट होती थी।
    • इस काल की वास्तुकला में जानबूझकर मेहराब, लिंटेल और बीम के सिद्धांतों को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया गया।
    • नुकीला गुंबद या ‘टार्टर’ आकार का गुंबद दिखाई दिया, जिसकी एक दृश्यमान गर्दन होती थी।
  2. प्रमुख स्मारक:
    • तुगलकाबाद किला: ग़ियासुद्दीन तुगलक द्वारा निर्मित, यह दिल्ली का तीसरा शहर था, जिसमें एक शहर, किला और महल शामिल था।
    • ग़ियासुद्दीन तुगलक का मकबरा: यह मेहराब और बीम के सिद्धांतों को मिलाकर एक नया चलन दर्शाता है।
    • फ़िरोज़ाबाद: फ़िरोज़ शाह तुगलक द्वारा निर्मित दिल्ली का पाँचवाँ शहर, जिसमें कोटला फ़िरोज़ शाह नामक गढ़ शामिल था।
    • फ़िरोज़ शाह तुगलक ने क़ुतुब मीनार में दो और मंज़िलें जोड़ीं।
    • खान-ए-जहाँ तिलंगानी का मकबरा: यह मकबरा वर्गाकार के बजाय अष्टकोणीय आकार की नई वास्तुकला शैली को दर्शाता है।

IV. तृतीय चरण (c.1451-1526 ईस्वी): लोदी वंश

लोदी वंश के अधीन वास्तुकला गतिविधि में कमी आई, और ध्यान मुख्य रूप से मकबरों के निर्माण पर केंद्रित रहा।

  1. विशेषताएँ:
    • इमारतों को एक ऊंचे मंच (high platform) पर रखा गया, जिससे उन्हें भव्यता और बेहतर स्काईलाइन मिली।
    • इमारतों में राजस्थानी और गुजराती शैली से ली गई बालकनियाँ, कियोस्क (kiosks) और ईव्स (eaves) का भी उपयोग किया गया।
    • लोदी गार्डन में स्थित मकबरे इस शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
  2. दोहरे गुंबद का परिचय (Introduction of Double Dome):
    • इस काल का सबसे महत्वपूर्ण संरचनात्मक परिवर्तन दोहरे गुंबद (Double Dome) वास्तुकला की शुरुआत थी।
    • सिकंदर लोदी के मकबरे में पहली बार इस तकनीक का उपयोग किया गया, जिसमें बाहरी गुंबद को ऊँचा करने के लिए भीतरी और बाहरी चिनाई के खोल के बीच एक खाली जगह रखी गई।
    • मुगल काल के बाद के बड़े गुंबदों का निर्माण इसी सिद्धांत पर किया गया।

V. प्रांतीय वास्तुकला शैलियाँ (Provincial Architectural Styles)

बाद में जैसे-जैसे प्रांतों ने स्वतंत्रता की घोषणा की, विशिष्ट प्रांतीय शैलियाँ उभरीं, जिनमें स्थानीय परंपराओं और इंडो-इस्लामिक तत्वों का मिश्रण था।

शैलीप्रमुख विशेषताएँउदाहरण
मांडू शैली (Malwa)यह अपनी विशालता (massiveness) के लिए जानी जाती है, जिसके लिए इमारतों को बहुत ऊंचे चबूतरों (lofty plinths) पर रखा गया। इसमें भारतीय कार्यात्मकता थी और यह भारी अलंकरण से रहित थी।जामा मस्जिद (Jama Masjid), हिंडोला महल (Hindola Mahal), और जहाज महल (Jahaz Mahal)
गुजरात शैलीयह हिंदू और मुस्लिम वास्तुकला के सर्वोत्तम मिश्रण का प्रतिनिधित्व करती है, जो समृद्ध जैन वास्तुकला से प्रभावित थी। इसमें पतली बुर्जियाँ (slender turrets) और अति सुंदर पत्थर की नक्काशी थी।अहमदाबाद में जामी मस्जिद और चंपानेर में उत्कृष्ट पत्थर का काम।
बंगाल शैलीयह ईंटों और काले संगमरमर के उपयोग और ढलान वाली ‘बांग्ला छतों’ (स्थानीय मंदिर वास्तुकला की एक विशेषता) के लिए उल्लेखनीय है।पांडुआ में आमिना मस्जिद
जौनपुर शैली (Sharqi Style)यह शैली मीनारों के उपयोग से बचती थी। इसकी विशेषता प्रार्थना हॉल में बड़ी स्क्रीन पर साहसिक शिलालेखों का चित्रित होना था।अटाला मस्जिद और जामी मस्जिद
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