मुगल साम्राज्य का चरमोत्कर्ष और संकट: मराठे और दक्कन
मुगल साम्राज्य का चरमोत्कर्ष और उसका विघटन (Disintegration) मध्यकालीन भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण चरण को चिह्नित करता है, जिसमें मराठा शक्ति का उदय और औरंगजेब की विनाशकारी दक्कन नीति प्रमुख कारक थे।
I. मुगल साम्राज्य का चरमोत्कर्ष
- मुगल साम्राज्य की स्थापना 1526 ईस्वी में बाबर के सिंहासन पर बैठने के साथ हुई थी।
- सम्राट औरंगजेब (1658 से 1707 ई.) का 49 वर्ष का शासनकाल मुगल साम्राज्य का चरमोत्कर्ष माना जाता है।
- इस समय, मुगल साम्राज्य क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा साम्राज्य था।
- औरंगजेब ने दुश्मन को पराजित करके और फिर उन्हें सुलह के लिए बुलाकर शाही सेवा में शामिल करने की नीति अपनाई थी।
II. संकट की शुरुआत और प्रमुख कारण
मुगल साम्राज्य का विघटन औरंगजेब के शासनकाल के दौरान शुरू हुआ, लेकिन 1707 ई. में उसकी मृत्यु के बाद यह स्थिति और बिगड़ गई।
1. औरंगजेब की नीतियाँ:
- धार्मिक असहिष्णुता: 1679 में गैर-मुस्लिमों पर जज़िया (poll tax) फिर से लगाना उसकी नीतियों में बदलाव का पहला संकेत था। उनकी धार्मिक रूढ़िवादिता और हिंदू विरोधी नीतियों ने प्रमुख समुदायों को दूर कर दिया, जिससे गठबंधन कमजोर हो गए।
- व्यक्तिगत दोष: औरंगजेब का संदेह करने वाला स्वभाव ऐसा था कि उसने अपने किसी भी बेटे या रईस को सक्षम शासक के रूप में विकसित होने की अनुमति नहीं दी।
- दक्कन की नीति: औरंगजेब की दक्कन नीति ने उसकी वंश के पतन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उसने दक्कन के शिया राज्यों बीजापुर और गोलकोंडा को नष्ट कर दिया।
- वित्तीय संकट: लंबे और महंगे युद्धों (विशेषकर दक्कन में) के कारण शाही खजाना खाली हो गया और साम्राज्य के संसाधन समाप्त हो गए। राजस्व जुटाने के लिए औरंगजेब ने कृषि कर बढ़ाए, जिससे किसानों में असंतोष फैला।
2. आंतरिक कमजोरियाँ:
- कमजोर उत्तराधिकारी: औरंगजेब के बाद कोई भी योग्य शासक नहीं हुआ, जिससे उत्तराधिकार के युद्धों की पुनरावृत्ति हुई और साम्राज्य कमजोर होता गया।
- जागीरदारी संकट: जागीरदारों की संख्या में वृद्धि और उपजाऊ भूमि (जागीर) की कमी के कारण जागीरदारी संकट पैदा हुआ, जिसने प्रशासनिक अक्षमता को जन्म दिया।
- सैन्य कमजोरी: मुगल सैन्य संगठन सामंती आधार पर था, और अनुशासन और आधुनिक हथियारों की कमी के कारण सेना का मनोबल गिरा।
3. विदेशी आक्रमण:
- नादिर शाह (1739) और बाद में अहमद शाह अब्दाली के आक्रमणों ने साम्राज्य के वित्तीय संसाधनों को लूटा और सैन्य कमजोरी को उजागर किया। नादिर शाह ने विशाल धन-संपदा लूट ली और कोहिनूर हीरा और तख्त-ए-ताऊस (मयूर सिंहासन) ले गया।
III. मराठे और दक्कन: एक बड़ा संकट
मराठा शक्ति का उदय मुगल साम्राज्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण और अंततः घातक चुनौती थी।
1. मराठा राज्य का उदय:
- मराठा प्रमुख छत्रपति शिवाजी महाराज ने बीजापुर के सुल्तान के विरुद्ध संघर्ष करके हिंदवी-स्वराज्य की स्थापना की। उन्हें 1674 में छत्रपति का ताज पहनाया गया।
- मराठा, क्षेत्रीय शक्ति से आगे बढ़कर, पेशवा बाजीराव के नेतृत्व में उत्तरी क्षेत्रों को जीतने की नीति अपनाते हुए भारत की सबसे शक्तिशाली ताकत बन गए।
- शिवाजी के राजस्व प्रणाली में चौथ (राजस्व का 25% वार्षिक कर) और सरदेशमुखी (10% अतिरिक्त कर) शामिल थे। ये कर उन क्षेत्रों पर लगाए जाते थे जो मुगलों या दक्कन सल्तनत के अधीन थे, ताकि मराठा आक्रमणों को रोका जा सके।
2. दक्कन युद्ध और औरंगजेब की नीति का विनाशकारी प्रभाव:
- औरंगजेब ने छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ विवाद बनाए रखा।
- शिवाजी की मृत्यु (1680) के बाद, मुगलों और मराठों के बीच दक्कन युद्ध (Mughal–Maratha wars) छिड़ गया जो 1707 में औरंगजेब की मृत्यु तक चला।
- 1681 में, औरंगजेब अपने विद्रोही पुत्र मुहम्मद अकबर को संभाजी द्वारा आश्रय दिए जाने के कारण अपनी सेना और दरबार को दक्कन ले गया।
- 1689 में मुगल सेना ने संभाजी को पकड़ लिया और फाँसी दे दी, जिससे मराठों में मुगलों के विरुद्ध एकता और प्रतिशोध की भावना जागृत हुई।
- मुगलों से बचने के लिए, मराठा राजधानी जिंजी (तमिल देश) स्थानांतरित कर दी गई। जिंजी के किले ने सात साल तक मुगल सेना को उलझाए रखा, जिससे मुगल संसाधन भारी मात्रा में खर्च हुए।
- औरंगजेब की दक्कन नीति, जिसने बीजापुर और गोलकोंडा के शिया साम्राज्यों को नष्ट कर दिया और मराठों के विरुद्ध एक लंबा, अंतहीन युद्ध छेड़ा, मुगल राजवंश के पतन का एक प्रमुख कारण बनी।
- लगभग दो दशकों तक दक्कन में लगातार युद्ध लड़ने के कारण, औरंगजेब ने अपनी सेना का लगभग पाँचवाँ हिस्सा खो दिया।
- दक्कन युद्ध के कारण मुगल प्रतिष्ठा को भारी क्षति पहुँची, और मराठा नर्मदा पार करके उत्तरी भारत के मुगल प्रांतों पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित हुए।
- 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद, मराठा प्रमुख शाहू को मुक्त कर दिया गया। शाहू ने बालाजी विश्वनाथ को पेशवा (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया, जिसने केंद्रीय मराठा शक्ति (मराठा परिसंघ) के उदय को चिह्नित किया।
- मराठों ने मुगलों को चुनौती देते हुए अपनी स्वतंत्रता पर जोर दिया और साम्राज्य के विघटन को तेज किया। 1759 तक, मराठा प्रभाव दक्षिण में तमिलनाडु और उत्तर में पेशावर तक फैल गया था।