मध्यकालीन भारतीय समाज-संरचना और विकास को समझने के लिए, मुग़ल काल और क्षेत्रीय राज्यों (जैसे मराठा और विजयनगर) के तहत विकसित विभिन्न सामाजिक वर्गों, आर्थिक ढांचे और परिवर्तनों पर ध्यान देना आवश्यक है।
I. मध्यकालीन समाज की संरचना (Mughal Era)
मध्यकालीन भारतीय समाज में उच्च स्तरीकरण (highly stratified nature) था, जो निवास की स्थिति, जाति और पद पर आधारित था।
1. शासक वर्ग और अभिजात वर्ग (Ruling Class and Nobility)
- स्वरूप: शासक वर्ग में सम्राट, शाही परिवार के सदस्य और उच्च पदस्थ अधिकारी शामिल थे। मुग़ल अभिजात वर्ग में तुर्की, ईरानी, राजपूत, भारतीय मुस्लिम (शेखज़ादा) और बाद में मराठा जैसे विभिन्न समूह शामिल थे।
- जीवनशैली: अभिजात वर्ग अत्यधिक विलासितापूर्ण और वैभवशाली जीवन जीते थे। उनकी जीवनशैली की विशेषता “खर्च करना, न कि जमा करना” थी (spending not hoarding)।
- संरचना: इस वर्ग को मनसबदारी प्रणाली के माध्यम से प्रशासनिक और सैन्य पद दिए जाते थे। मुग़ल अभिजात वर्ग के पास बड़े महल, बगीचे और बड़ी संख्या में दास तथा सेवक होते थे।
- पतन और दोष: उच्च पदों पर विलासिता और भोग-विलास के कारण उनका चारित्रिक पतन हुआ। सम्राटों की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के युद्धों में ये अमीर विभिन्न गुटों में संगठित होकर “राजा-निर्माता” (king-maker) की भूमिका निभाते थे, जिससे आंतरिक संघर्ष और बढ़ जाता था।
2. ग्रामीण समाज (Rural Society)
- जनसंख्या का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा गाँवों में निवास करता था।
- रियायती वर्ग (Privileged/Khud-kasht): ये गाँवों के निवासी काश्तकार (owner-cultivators) होते थे, जिन्हें कर में रियायतें मिलती थीं और सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त थी। इस वर्ग में ब्राह्मण, राजपूत, और चौधरी जैसे स्थानीय अधिकारी शामिल थे।
- रैयती वर्ग (Ordinary/Muzarian): ये सामान्य किसान होते थे, जो उपज का एक-तिहाई से आधा हिस्सा (50%) तक राजस्व के रूप में चुकाते थे।
- पाहिस/पाई-काश्ट: ये पड़ोसी गाँवों या परगनों से आकर खेती करते थे, जिन्हें नए या उजाड़ गाँवों को बसाने पर शुरू में रियायती दरें दी जाती थीं।
- सेवा वर्ग (Service Class): इनमें लोहार, बढ़ई, कुम्हार, नाई, पुजारी आदि शामिल थे, जिन्हें महाराष्ट्र में बलूतेदार कहा जाता था और वे अपनी सेवाओं के बदले गाँव की उपज में एक निर्धारित हिस्सा (बलूता) पाते थे।
- असमानता: गाँवों में सम्पत्ति और भूमि वितरण में भारी असमानता थी; 5 से 10 प्रतिशत किसान धनी थे, जबकि 15 से 30 प्रतिशत गरीब या भूमिहीन होते थे।
3. महिलाएँ (Women) और दास प्रथा
- महिलाओं की स्थिति: समाज मुख्य रूप से पितृसत्तात्मक था (केरल को छोड़कर)। उच्च वर्ग की महिलाओं में पर्दा प्रथा और बाल विवाह आम थे। उच्च जातियों में सती प्रथा का प्रचलन था, जिसे पेशवाओं ने अपने प्रभुत्व वाले क्षेत्र में हतोत्साहित करने का प्रयास किया था।
- कार्य: अभिजात वर्ग की महिलाएँ विलासिता का जीवन जीती थीं, लेकिन निम्न वर्ग की महिलाओं को आजीविका कमाने के लिए पुरुषों के साथ बाहर काम करना पड़ता था। कुछ शाही महिलाओं ने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई, जैसे नूर जहाँ।
- गुलामी: दास प्रथा एक प्रमुख सामाजिक विशेषता थी, और दासों को मुख्य रूप से घरेलू कार्यों के लिए रखा जाता था। दासों को आमतौर पर परिवार की वंशानुगत संपत्ति माना जाता था।
II. सामाजिक संरचना का विकास और परिवर्तन
मध्यकालीन समाज का विकास और परिवर्तन विशेष रूप से शहरीकरण और आर्थिक गतिविधियों में देखा गया।
1. शहरी विकास और जनसंख्या (Urban Growth and Population)
- जनसंख्या: 16वीं शताब्दी के अंत में भारत की जनसंख्या 140 से 150 मिलियन के बीच थी, जो 18वीं शताब्दी के अंत तक 200 मिलियन तक बढ़ गई।
- शहरीकरण: 16वीं शताब्दी के अंत में शहरी जनसंख्या लगभग 15 प्रतिशत थी। यह काल “शहरीकरण का वास्तविक स्वर्ण युग” (veritable golden age of urbanization) माना जाता है।
- नगरों का वर्गीकरण: नगर प्रशासन (जैसे कोतवाल) द्वारा शासित थे। नगरों को प्रशासनिक (दिल्ली, आगरा), वाणिज्यिक (अहमदाबाद, पटना), तीर्थयात्रा (बनारस) और विशिष्ट शिल्प केंद्रों के रूप में वर्गीकृत किया गया था।
2. आर्थिक और तकनीकी विकास
- कृषि: अकबर द्वारा भू-राजस्व प्रणाली (ज़ब्त/दहसाला) स्थापित की गई, जो कृषि करों पर आधारित थी। सिंचाई प्रणालियों के निर्माण में राज्य द्वारा वित्त पोषण किया गया।
- उद्योग: सबसे बड़ा उद्योग वस्त्र निर्माण था (कपास और रेशम), विशेष रूप से बंगाल में। धातु विज्ञान, कागज बनाना और जहाज निर्माण (बंगाल) अन्य प्रमुख उद्योग थे।
- उत्पादन तकनीक: मध्यकाल में चरखे (spinning wheel) का उपयोग बढ़ा, जिससे उत्पादन में वृद्धि हुई। हालाँकि, 18वीं शताब्दी तक भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी में पश्चिमी देशों से बहुत पीछे रह गया था।
- व्यापार और मुद्रा: व्यापार आंतरिक और विदेशी दोनों था। मुगल काल में मुद्रा प्रणाली को रुपया (चाँदी), मोहर (सोना), और दाम (तांबा) के साथ मानकीकृत किया गया था। विदेशी व्यापार के कारण बड़ी मात्रा में बुलियन (सोना और चांदी) भारत में आयात होता था।
- बैंकिंग/वित्त: हुंडी (विनिमय पत्र) का उपयोग प्रचलित था, जो धन हस्तांतरण का एक सुरक्षित तरीका था। साहूकार और सर्राफ बैंकिंग और ऋण देने का कार्य करते थे।
3. क्षेत्रीय राज्य संरचनाओं का योगदान
- मराठा समाज: मराठा प्रशासन पेशवाओं के अधीन ब्राह्मण कुलीनों द्वारा संचालित था। राजस्व प्रणाली में चौथ (राजस्व का 25%) और सरदेशमुखी (10% अतिरिक्त कर) जैसे लेवी शामिल थे।
- विजयनगर समाज: यहां नायका प्रणाली थी, जहां अमरनायकों को सैन्य सेवा के बदले भूमि राजस्व अधिकार (अमरम) दिए जाते थे, जो सामंतवाद का एक रूप था। मंदिर महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्र थे जो बैंकिंग और सिंचाई कार्यों में निवेश करते थे। समाज में वलांगई (दायाँ हाथ) और इडंगई (बायाँ हाथ) समूहों का विभाजन था जो कृषि और शिल्प के आधार पर बंटा था।