पर्वत प्रदेश में पावस
कविता का सार (Summary)
इस कविता में पंत जी ने पर्वतीय अंचल में वर्षा ऋतु के पल-पल बदलते रूप का जादुई वर्णन किया है। प्रकृति यहाँ किसी सजीव मानवी रूप में दिखाई देती है, जहाँ पहाड़, झरने और पेड़ सब सजीव हो उठते हैं।
प्रमुख बिंब और भाव (Imagery)
मेखलाकार पर्वत का मानवीकरण
विशाल पर्वत अपनी सहस्र दृग-सुमन (हज़ारों पुष्प रूपी आँखें) फाड़कर नीचे तालाब के दर्पण में अपना विशाल रूप निहार रहा है।
सजीव झरने (The Waterfalls)
पहाड़ों से बहते झागभरे झरने मोतियों की लड़ियों के समान सुंदर लग रहे हैं। उनकी आवाज़ ऐसी लगती है मानो वे पर्वत का यशगान कर रहे हों।
आकाश की ओर झांकते वृक्ष
पहाड़ के सीने से उगे शाल के पेड़ मौन आकाश की ओर एकटक देख रहे हैं। वे मनुष्य की उच्चाकांक्षाओं (High Aspirations) के प्रतीक हैं।
इंद्र का इंद्रजाल (Magic of Rain)
अचानक बादल छाने से ऐसा लगता है मानो पर्वत पारे के पंख (पारद के पर) फड़फड़ाकर उड़ गया हो। चारों ओर धुआँ उठने से लगता है मानो तालाब में आग लग गई हो। यह इंद्र का जादू जैसा लगता है।
काव्य सौंदर्य
- शैली: चित्रात्मक (Pictorial) – पढ़ते ही दृश्य सामने आ जाता है।
- अलंकार: मानवीकरण, उपमा (दर्पण-सा ताल), और रूपक।
- भाषा: तत्सम प्रधान खड़ी बोली।
शब्द-अर्थ
- पावस: वर्षा ऋतु
- मेखलाकार: करघनी के आकार का
- सहस्र: हज़ार
- दृग-सुमन: पुष्प रूपी आँखें
- निर्झर: झरना
- इंद्रजाल: जादूगरी
प्रकृति के रूप
Topper’s Tip:
‘दर्पण-सा फैला है विशाल’ पंक्ति में उपमा अलंकार है। यहाँ तालाब की तुलना दर्पण से की गई है क्योंकि वह पारदर्शी और स्वच्छ है।