UPSC मुख्य परीक्षा 2021 सामान्य अध्ययन पेपर I (GS Paper I) के प्रश्नों के उत्तर हिंदी में दिए गए हैं:
Q1. भक्ति साहित्य की प्रकृति का मूल्यांकन कीजिए और भारतीय संस्कृति में इसके योगदान का निर्धारण कीजिए।
उत्तर:
भक्ति साहित्य की प्रकृति:
- क्षेत्रीय भाषाएँ: कुलीन संस्कृत साहित्य के विपरीत, भक्ति साहित्य की रचना क्षेत्रीय भाषाओं (तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मराठी, हिंदी, बंगाली आदि) में की गई थी, जिससे यह आम जनता के लिए सुलभ हो गया।
- भक्तिपूर्ण और व्यक्तिगत: इसने कठोर कर्मकांडों और पुरोहिती मध्यस्थों को खारिज करते हुए, भक्त और ईश्वर (इष्ट-देवता) के बीच सीधे, व्यक्तिगत संबंध पर जोर दिया।
- समानतावाद: इसने अक्सर जाति व्यवस्था और सामाजिक पदानुक्रम को चुनौती दी और ईश्वर के समक्ष सभी आत्माओं की समानता का उपदेश दिया।
- विविध रूप: यह कविता, वचन, दोहा, अभंग और कीर्तन जैसे कई रूपों में फैला हुआ है।
भारतीय संस्कृति में योगदान:
- क्षेत्रीय भाषाओं का विकास: इसने आधुनिक भारतीय भाषाओं की नींव रखी (जैसे अवधी के लिए तुलसीदास, ब्रज के लिए सूरदास, मराठी के लिए ज्ञानेश्वर)।
- संगीत और नृत्य: इसने भारतीय शास्त्रीय और लोक संगीत परंपराओं को समृद्ध किया (जैसे पुरंदर दास द्वारा कर्नाटक संगीत की नींव, बंगाल में बाउल संगीत, असम में सत्रिया नृत्य)।
- सामाजिक सुधार: कबीर, गुरु नानक और बसवन्ना जैसे संतों ने साहित्य का उपयोग जातिगत भेदभाव और लैंगिक असमानता जैसी सामाजिक बुराइयों की आलोचना करने के लिए किया।
- सांस्कृतिक संश्लेषण: इसने उत्तर और दक्षिण के बीच की खाई को पाटा और हिंदू व इस्लामी तत्वों (सूफी प्रभाव) में सामंजस्य स्थापित किया, जिससे एक मिली-जुली (साझा) संस्कृति को बढ़ावा मिला।
Q2. यंग बंगाल और ब्रह्म समाज के विशेष संदर्भ में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के उत्थान और विकास को रेखांकित कीजिए।
उत्तर:
उत्थान और विकास:
19वीं सदी के सुधार आंदोलन आधुनिक पश्चिमी शिक्षा के प्रसार, मध्यम वर्ग के उदय और सामाजिक ठहराव व हिंदू धर्म की मिशनरी आलोचना का मुकाबला करने की आवश्यकता के कारण उत्पन्न हुए।
- यंग बंगाल आंदोलन (1820 के दशक के अंत में):
- उत्पत्ति: हिंदू कॉलेज, कलकत्ता में हेनरी लुइस विवियन डेरोजियो के नेतृत्व में।
- प्रकृति: फ्रांसीसी क्रांति से प्रेरित, यह कट्टरपंथी और बौद्धिक था। उन्होंने परंपरा पर सवाल उठाए और महिलाओं के लिए शिक्षा व विचार की स्वतंत्रता की मांग की।
- प्रभाव: हालांकि जनता के साथ जुड़ाव की कमी और अत्यधिक उग्रवाद के कारण यह लंबे समय तक नहीं टिक सका, लेकिन इसने बंगाल में तर्कवाद के बीज बो दिए।
- ब्रह्म समाज (1828):
- उत्पत्ति: राजा राम मोहन राय द्वारा स्थापित।
- प्रकृति: इसने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद और कर्मकांडों को हटाकर हिंदू धर्म को शुद्ध करने की मांग की और अपने दर्शन को उपनिषदों (एकेश्वरवाद) पर आधारित किया।
- विकास: देवेंद्रनाथ टैगोर और केशव चंद्र सेन के तहत इसका विस्तार हुआ। इसने सती प्रथा, बाल विवाह के खिलाफ और विधवा पुनर्विवाह के लिए अभियान चलाया।
- प्रभाव: यह भारतीय पुनर्जागरण का बौद्धिक चेहरा बन गया, जिसने सती विनियमन अधिनियम (1829) जैसे कानूनों को प्रभावित किया और राष्ट्रवाद के उदय में योगदान दिया।
Q3. भारतीय रियासतों के एकीकरण की प्रक्रिया में मुख्य प्रशासनिक मुद्दों और सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याओं का आकलन कीजिए।
उत्तर:
प्रशासनिक मुद्दे:
- संप्रभुता और व्यपगत (Lapse): “परमिसत्ता की समाप्ति” (Lapse of Paramountcy) ने रियासतों को तकनीकी रूप से भारत, पाकिस्तान में शामिल होने या स्वतंत्र रहने के लिए मुक्त छोड़ दिया, जिससे एक कानूनी और प्रशासनिक शून्य पैदा हो गया।
- संचार और रक्षा: 560 से अधिक रियासतों के विविध संचार नेटवर्क (रेलवे, डाक) और राज्य बलों को एक एकीकृत राष्ट्रीय प्रणाली में एकीकृत करना एक बड़ी चुनौती थी।
- प्रिवी पर्स: विलय के बदले शासकों को वित्तीय मुआवजे (प्रिवी पर्स) पर बातचीत करना सरकारी खजाने पर भारी बोझ था।
सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याएं:
- धार्मिक विभाजन: जूनागढ़ और हैदराबाद जैसी रियासतों में शासक और आबादी अलग-अलग धर्मों के थे, जिससे विलय के दौरान सांप्रदायिक तनाव पैदा हुआ।
- पहचान का संकट: इन राज्यों के लोग अक्सर “भारत” की अमूर्त अवधारणा के बजाय अपने शासकों के प्रति वफादार थे, जिससे भावनात्मक एकीकरण कठिन हो गया।
- भाषा और संस्कृति: रियासतें अक्सर सांस्कृतिक रूप से भिन्न इकाइयाँ थीं। उन्हें व्यापक भाषाई प्रांतों में मिलाना (जैसे केरल या कर्नाटक का गठन) क्षेत्रीय भावनाओं को संभालने के लिए सावधानी की मांग करता था।
- सामंती ढांचा: प्रजा को सामंती मानसिकता से लोकतांत्रिक नागरिकता की ओर ले जाने के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक इंजीनियरिंग की आवश्यकता थी।
Q4. हिमालय क्षेत्र और पश्चिमी घाट में भूस्खलन के कारणों में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
| विशेषता | हिमालय क्षेत्र | पश्चिमी घाट |
| :— | :— | :— |
| भूगर्भीय स्थिरता | युवा, वलित पर्वत; विवर्तनिक रूप से सक्रिय और अस्थिर (भूकंपीय क्षेत्र IV और V)। | स्थिर भूभाग (दक्कन शील्ड); विवर्तनिक रूप से कम सक्रिय। |
| चट्टान का प्रकार | अवसादी और कायांतरित चट्टानें जो अक्सर भुरभुरी और ढीली होती हैं। | कठोर ज्वालामुखी चट्टानें (बेसाल्ट) जो आमतौर पर अधिक स्थिर होती हैं लेकिन उन पर मिट्टी की मोटी परत होती है। |
| ढलान प्रवणता | अत्यंत खड़ी और ऊर्ध्वाधर ढलानें। | हवा की ओर (scarp faces) खड़ी ढलान, लेकिन ऊपर पठार जैसा। |
| ट्रिगर कारक | विवर्तनिक गतिविधि (भूकंप) वर्षा के साथ एक प्रमुख ट्रिगर है। सड़क काटने और बांध बनाने जैसे मानवीय कारक भी भारी योगदान देते हैं। | भारी वर्षा प्राथमिक ट्रिगर है। खनन, उत्खनन और वृक्षारोपण के लिए वनों की कटाई प्रमुख मानव-जनित कारण हैं। |
| पैमाना | गहरे और बड़े पैमाने पर भूस्खलन आम हैं। | उथले मलबे का प्रवाह (Debris flow) और कीचड़ का खिसकना (Mudslides) अधिक आम है। |
Q5. गोंडवानालैंड के देशों में से एक होने के बावजूद, भारत के खनन उद्योग का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में योगदान प्रतिशत में बहुत कम है। चर्चा कीजिए।
उत्तर:
गोंडवानालैंड की भूगर्भीय विरासत के कारण भारत खनिज संसाधनों (कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट) से समृद्ध है। हालांकि, जीडीपी में खनन क्षेत्र का योगदान केवल लगभग 2.2% – 2.5% है।
कम योगदान के कारण:
- विनियामक बाधाएं: पर्यावरण और वन मंजूरी में देरी, जटिल भूमि अधिग्रहण कानून और लालफीताशाही परियोजनाओं को रोकते हैं।
- पुरानी तकनीक: उन्नत अन्वेषण और निष्कर्षण तकनीकों (विशेष रूप से गहरे खनिजों के लिए) में निवेश की कमी से दक्षता कम होती है।
- बुनियादी ढांचे की कमी: खदानों से बंदरगाहों/संयंत्रों तक खराब कनेक्टिविटी (रेल/सड़क) रसद लागत बढ़ाती है, जिससे निर्यात अप्रतिस्पर्धी हो जाता है।
- अवैध खनन और मुकदमेबाजी: बड़े पैमाने पर अवैध खनन के कारण न्यायिक प्रतिबंध लगते हैं (जैसे गोवा और कर्नाटक में), जिससे वर्षों तक उत्पादन रुका रहता है।
- स्थिरता के मुद्दे: उच्च सामाजिक और पर्यावरणीय लागत के कारण स्थानीय प्रतिरोध होता है (जैसे नियमगिरि विरोध)।
- आयात निर्भरता: भंडार होने के बावजूद, खराब घरेलू गुणवत्ता या निष्कर्षण क्षमता के कारण भारत उच्च श्रेणी के कोयले और अन्य खनिजों का आयात करता है।
Q6. शहरी भूमि उपयोग के लिए जल निकायों के पुनरुद्धार (Reclamation) के पर्यावरणीय निहितार्थ क्या हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
पुनरुद्धार (Reclamation) का अर्थ है रियल एस्टेट और बुनियादी ढांचे के लिए भूमि बनाने हेतु आर्द्रभूमि (wetlands), झीलों या नदी के तल को भरना।
पर्यावरणीय निहितार्थ:
- शहरी बाढ़: जल निकाय प्राकृतिक स्पंज के रूप में कार्य करते हैं। उनका विनाश जल निकासी मार्गों को हटा देता है, जिससे गंभीर बाढ़ आती है (उदाहरण: पल्लीकरनई मार्श के अतिक्रमण के कारण चेन्नई बाढ़ 2015; झीलों के खोने के कारण बैंगलोर बाढ़)।
- भूजल की कमी: आर्द्रभूमि जलभृतों (aquifers) को रिचार्ज करती हैं। उन पर निर्माण करने से पानी का रिसाव रुक जाता है, जिससे जल स्तर गिर जाता है (उदाहरण: दिल्ली)।
- जैव विविधता का नुकसान: प्रवासी पक्षियों, मछलियों और जलीय वनस्पतियों के आवास का विनाश (उदाहरण: पूर्वी कोलकाता आर्द्रभूमि के लिए खतरा)।
- हीट आइलैंड प्रभाव: जल निकाय सूक्ष्म जलवायु को ठंडा करते हैं। उनका नुकसान बढ़ते शहरी तापमान को बढ़ाता है।
- जल गुणवत्ता में गिरावट: शेष जल निकाय अक्सर सीवेज के लिए डंपिंग ग्राउंड बन जाते हैं, जिससे यूट्रोफिकेशन होता है (उदाहरण: बैंगलोर में बेलंदूर झील)।
Q7. 2021 में घटित ज्वालामुखी विस्फोटों की वैश्विक घटनाओं का उल्लेख कीजिए तथा क्षेत्रीय पर्यावरण पर उनके प्रभाव को बताइए।
उत्तर:
2021 में “रिंग ऑफ फायर” और अन्य विवर्तनिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण ज्वालामुखी गतिविधि देखी गई।
2021 में प्रमुख विस्फोट:
- कम्ब्रे विजा (ला पाल्मा, स्पेन): कैनरी द्वीप समूह में लंबी अवधि का विस्फोट।
- माउंट न्यारागोंगो (कांगो): गोमा शहर के पास विस्फोट।
- माउंट सेमेरू (इंडोनेशिया): पूर्वी जावा में विस्फोटक उद्गार।
- ला सौफ्रेयर (सेंट विंसेंट): कैरिबियन विस्फोट जिसने द्वीप को राख से ढक दिया।
- फैग्राडल्सफजाल (आइसलैंड): रेकजाविक के पास इफ्यूजिव (शांत) विस्फोट।
क्षेत्रीय पर्यावरण पर प्रभाव:
- वायु गुणवत्ता: सल्फर डाइऑक्साइड ($SO_2$) और राख के गुबार से श्वसन स्वास्थ्य आपात स्थिति और अम्लीय वर्षा का जोखिम (जैसे ला पाल्मा)।
- जलवायु शीतलन: हालांकि 2021 के विस्फोट वैश्विक शीतलन के लिए पर्याप्त विशाल नहीं थे, लेकिन सूर्य के प्रकाश को अवरुद्ध करने वाली राख के कारण स्थानीय शीतलन देखा गया।
- विस्थापन और आवास का नुकसान: लावा के प्रवाह ने जंगलों, खेत और घरों को नष्ट कर दिया (जैसे ला पाल्मा में केले के बागान, गोमा में विस्थापन)।
- जल प्रदूषण: सेंट विंसेंट में राख गिरने से पेयजल स्रोत दूषित हो गए।
- नई भू-आकृतियाँ: लावा प्रवाह ने समुद्र में नए डेल्टा और भूमि विस्तार का निर्माण किया (ला पाल्मा)।
Q8. भारत को एक उप-महाद्वीप क्यों माना जाता है? विस्तार से उत्तर दीजिए।
उत्तर:
एक “उप-महाद्वीप” एक बड़ा, विशिष्ट भूभाग होता है जो एक महाद्वीप का हिस्सा होता है लेकिन भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से आत्मनिर्भर होता है।
भौगोलिक कारण:
- भौतिक बाधाएं: उत्तर में हिमालय, दक्षिण में हिंद महासागर, पश्चिम में थार रेगिस्तान और पूर्व में पूर्वांचल की पहाड़ियां इस क्षेत्र को शेष एशिया से अलग करती हैं।
- जलवायु: इसकी एक विशिष्ट “मानसून” जलवायु प्रणाली है जो इस भूभाग के लिए अद्वितीय है।
- आकार: यह विशाल है, लगभग 4.4 मिलियन वर्ग किमी (पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान सहित) को कवर करता है, जो रूस को छोड़कर यूरोप के बराबर है।
सांस्कृतिक/राजनीतिक कारण:
- सभ्यतागत एकता: विविधता के बावजूद, क्षेत्र एक साझा इतिहास (सिंधु घाटी, मौर्य, मुगल, ब्रिटिश) और सांस्कृतिक धागे (धर्म, भाषा, भोजन) साझा करता है।
- आर्थिक क्षेत्र: यह एकीकृत नदी प्रणालियों और व्यापार मार्गों के साथ एक विशिष्ट आर्थिक इकाई के रूप में कार्य करता है।
Q9. मुख्यधारा के ज्ञान और सांस्कृतिक प्रणालियों की तुलना में जनजातीय ज्ञान प्रणाली की विशिष्टता की जांच कीजिए।
उत्तर:
जनजातीय ज्ञान की विशिष्टता:
- प्रकृति-केंद्रित: जनजातीय ज्ञान पारिस्थितिकी में निहित है। वे प्रकृति को सम्मान देने के लिए एक जीवित इकाई (जीववाद) के रूप में देखते हैं, न कि शोषण के लिए संसाधन के रूप में (जो कि मुख्यधारा का दृष्टिकोण है)।
- मौखिक परंपरा: यह लिखित ग्रंथों के बिना लोकगीतों, गीतों और नृत्य के माध्यम से मौखिक रूप से प्रसारित होता है, जिससे इतिहास और ज्ञान संरक्षित रहता है।
- समग्र चिकित्सा: एथनोमेडिसिन सदियों के अवलोकन के आधार पर स्थानीय वनस्पतियों/जीवों का उपयोग करती है, जो अक्सर आधुनिक एलोपैथी के रिडक्शनिस्ट दृष्टिकोण के विपरीत “आत्मा” और शरीर का एक साथ इलाज करती है।
- व्यक्ति पर समुदाय: ज्ञान अक्सर सामुदायिक संपत्ति होती है, पेटेंट या पण्य (commodified) नहीं।
- सतत अभ्यास: कृषि पद्धतियां (जैसे मिश्रित फसल) और जल प्रबंधन स्थिरता और लचीलेपन के लिए डिज़ाइन किए गए हैं, न कि केवल उपज को अधिकतम करने के लिए।
Q10. भारत में महिलाओं के सशक्तिकरण की प्रक्रिया में ‘गिग इकॉनमी’ (Gig Economy) की भूमिका का परीक्षण कीजिए।
उत्तर:
सशक्तिकरण में भूमिका:
- लचीलापन: सबसे बड़ा लाभ “कहीं से भी, कभी भी काम” है। इससे महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता के साथ पारंपरिक देखभाल की भूमिकाओं को संतुलित करने में मदद मिलती है।
- बाधाओं को तोड़ना: यह महिलाओं के लिए कार्यबल में शामिल होने के लिए प्रवेश बाधाओं (शिक्षा, स्थान) को कम करता है (जैसे अर्बन क्लैप, फूड डिलीवरी, फ्रीलांस कोडिंग)।
- वित्तीय स्वतंत्रता: पूरक या प्राथमिक आय का स्रोत प्रदान करता है, जिससे घर के भीतर निर्णय लेने की शक्ति बढ़ती है।
- सुरक्षा: गिग इकॉनमी में रिमोट वर्क के विकल्प आने-जाने और असुरक्षित कार्यस्थलों से जुड़ी सुरक्षा चिंताओं को कम कर सकते हैं।
सशक्तिकरण के लिए चुनौतियां:
- वेतन असमानता: पुरुष (डिलीवरी, राइडशेयर) की तुलना में महिलाएं अक्सर कम वेतन वाली गिग भूमिकाओं (सौंदर्य सेवाएं, देखभाल) में होती हैं।
- सामाजिक सुरक्षा का अभाव: मातृत्व लाभ, पीएफ या स्वास्थ्य बीमा नहीं होने से महिलाएं असुरक्षित हो जाती हैं।
- दोहरा बोझ: लचीलेपन के कारण अक्सर “दोहरा बोझ” पड़ता है, जिसमें पूरे घर के कामकाज का प्रबंधन करते हुए पूरी गिग नौकरी करनी पड़ती है।
Q11. नरमपंथियों (Moderates) की भूमिका ने किस हद तक व्यापक स्वतंत्रता आंदोलन के लिए आधार तैयार किया? टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
दादाभाई नौरोजी, जी.के. गोखले आदि के नेतृत्व में नरमपंथियों (1885-1905) की अक्सर उनकी “याचिका की राजनीति” के लिए आलोचना की जाती है, लेकिन उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के लिए अपरिहार्य नींव रखी।
आधार तैयार करना:
- उपनिवेशवाद की आर्थिक आलोचना: “धन के निष्कासन के सिद्धांत” (नौरोजी) ने ब्रिटिश परोपकार के मिथक को तोड़ दिया, यह साबित करते हुए कि ब्रिटिश शासन आर्थिक रूप से भारत को लूट रहा था। यह भारतीय राष्ट्रवाद की मुख्य विचारधारा बन गई।
- संस्थागत निर्माण: उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना की और इसे एक राष्ट्रीय मंच के रूप में पोषित किया, जिससे एक अखिल भारतीय राजनीतिक पहचान बनी।
- लोकतांत्रिक शिक्षा: उन्होंने भारतीयों को विधायी कार्य, बजट चर्चा और संवैधानिक सीमाओं के भीतर आंदोलन में प्रशिक्षित किया, जिससे लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रसार हुआ।
- परिषद के आधार का विस्तार: उनके दबाव के कारण 1892 का भारतीय परिषद अधिनियम बना, जिससे शासन में भारतीयों की भागीदारी का विस्तार हुआ।
- मध्यम वर्ग को जगाना: उन्होंने शहरी मध्यम वर्ग का सफलतापूर्वक राजनीतिकरण किया, जो बाद में गांधी के नेतृत्व में जन आंदोलनों के नेता बने।
सीमा: वे जनता (किसानों/मजदूरों) के साथ जुड़ने में विफल रहे, जो बाद में चरमपंथियों और गांधी द्वारा भरा गया एक अंतर था।
Q12. असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गांधी का मानना था कि सामाजिक पुनर्निर्माण के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता (स्वराज) अर्थहीन है। उनका रचनात्मक कार्यक्रम स्वतंत्रता संग्राम का “स्टील फ्रेम” था।
प्रमुख कार्यक्रम:
- सांप्रदायिक एकता: हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सद्भाव को बढ़ावा देना (जैसे खिलाफत आंदोलन के दौरान)।
- अस्पृश्यता निवारण: गांधी ने अस्पृश्यता के खिलाफ अथक अभियान चलाया, दलितों को “हरिजन” कहा और उनके लिए मंदिर/कुएं खोले।
- खादी और चरखा: ब्रिटिश वस्त्रों पर निर्भरता को खत्म करने और ग्रामीण गरीबों को आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रदान करने के लिए हाथ से कताई को बढ़ावा देना।
- ग्राम उद्योग: गांवों को आत्मनिर्भर गणतंत्र बनाने के लिए ग्रामीण शिल्प (मिट्टी के बर्तन, बढ़ईगीरी) को पुनर्जीवित करना।
- निषेध: गरीबों की नैतिक और आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए शराब और नशीली दवाओं के खिलाफ अभियान चलाना।
- महिला मुक्ति: महिलाओं को शराब की दुकानों पर धरना देने और कताई में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करना, उन्हें “पर्दा” से बाहर लाना।
- बुनियादी शिक्षा (नई तालीम): स्थानीय भाषा में व्यावसायिक और मूल्य आधारित शिक्षा को बढ़ावा देना।
Q13. “दोनों विश्व युद्धों के बीच लोकतांत्रिक राज्य प्रणाली के लिए एक गंभीर चुनौती उत्पन्न हुई।” इस कथन का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
अंतर-युद्ध अवधि (1919-1939) में नवजात लोकतंत्रों का पतन और अधिनायकवादी शासनों का उदय देखा गया।
लोकतंत्र के लिए चुनौतियां:
- फासीवाद का उदय (इटली): मुसोलिनी ने लोकतांत्रिक संस्थानों को खत्म करने के लिए युद्ध के बाद के आर्थिक संकट और राष्ट्रवादी असंतोष का फायदा उठाया और तानाशाही स्थापित की।
- नाजीवाद का उदय (जर्मनी): वीमर गणराज्य अति मुद्रास्फीति और वर्साय की संधि के अपमान को संभालने में विफल रहा। हिटलर ने सत्ता हथियाने के लिए लोकतांत्रिक साधनों का इस्तेमाल किया और फिर लोकतंत्र को समाप्त कर दिया।
- सोवियत साम्यवाद: यूएसएसआर उदार लोकतंत्र के एक शक्तिशाली विकल्प के रूप में उभरा, जिसने एक-पक्षीय अधिनायकवादी राज्य को बढ़ावा दिया जो विश्व स्तर पर श्रमिक वर्ग को आकर्षित करता था।
- जापान में सैन्यवाद: सेना ने नागरिक सरकार का अपहरण कर लिया और आक्रामक विस्तारवाद का अनुसरण किया।
- राष्ट्र संघ की विफलता: आक्रामकता (मंचूरिया, इथियोपिया) की जांच करने में लोकतांत्रिक शक्तियों (यूके, फ्रांस) की असमर्थता ने लोकतांत्रिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में विश्वास को कमजोर कर दिया।
- महामंदी (1929): आर्थिक पतन ने लोगों को पूंजीवाद और उदार लोकतंत्र में विश्वास खो दिया, जिससे वे कट्टरपंथी विकल्पों की ओर धकेल दिए गए।
Q14. विश्व की प्रमुख पर्वत श्रृंखलाओं के संरेखण (alignment) का संक्षेप में उल्लेख कीजिए तथा स्थानीय मौसम की स्थितियों पर उनके प्रभाव को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
संरेखण और प्रभाव:
- रॉकीज़ और एंडीज़ (उत्तर-दक्षिण संरेखण):
- प्रभाव: वे पछुआ हवाओं (Westerlies) के लिए एक बाधा के रूप में कार्य करते हैं।
- उदाहरण: उत्तरी अमेरिका में, रॉकीज़ समुद्री प्रभाव को आंतरिक भाग तक पहुँचने से रोकते हैं, जिससे शुष्क परिस्थितियाँ (ग्रेट बेसिन रेगिस्तान) पैदा होती हैं। दक्षिण अमेरिका में, एंडीज़ पश्चिम में अटाकामा रेगिस्तान (वृष्टि छाया) और पूर्व में अमेज़ॅन बेसिन में भारी वर्षा का कारण बनते हैं।
- हिमालय (पश्चिम-पूर्व संरेखण):
- प्रभाव: वे एक जलवायु विभाजक के रूप में कार्य करते हैं।
- उदाहरण: वे ठंडी साइबेरियाई हवाओं को भारत में प्रवेश करने से रोकते हैं, जिससे सर्दियों में यह गर्म रहता है। महत्वपूर्ण रूप से, वे दक्षिण-पश्चिम मानसून हवाओं को रोकते हैं, जिससे उन्हें भारतीय उपमहाद्वीप पर नमी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जिससे कृषि संभव हो पाती है।
- आल्प्स (पश्चिम-पूर्व संरेखण):
- प्रभाव: वे भूमध्यसागरीय प्रभाव को प्रवेश करने की अनुमति देते हैं लेकिन ठंडी उत्तरी हवाओं को आंशिक रूप से रोकते हैं।
- उदाहरण: फॉन (Foehn) हवा (गर्म, शुष्क हवा) लीवर्ड साइड (हवा के विपरीत) पर उतरती है, बर्फ पिघलाती है और स्विट्जरलैंड में कृषि में सहायता करती है।
- ग्रेट डिवाइडिंग रेंज (ऑस्ट्रेलिया):
- प्रभाव: व्यापारिक हवाओं को रोकता है।
- उदाहरण: पूर्व में एक हरी-भरी तटीय पट्टी बनाता है लेकिन पश्चिम में एक विशाल शुष्क आउटबैक (रेगिस्तान) बनाता है।
Q15. आर्कटिक की बर्फ और अंटार्कटिक के ग्लेशियरों का पिघलना किस प्रकार अलग-अलग ढंग से पृथ्वी पर मौसम के स्वरूप और मानवीय गतिविधियों को प्रभावित करता है? समझाइए।
उत्तर:
आर्कटिक बर्फ का पिघलना (समुद्री बर्फ):
- मौसम के स्वरूप:
- जेट स्ट्रीम व्यवधान: आर्कटिक के गर्म होने से ध्रुव और भूमध्य रेखा के बीच तापमान का अंतर कम हो जाता है, जिससे पोलर जेट स्ट्रीम कमजोर हो जाती है। इससे मौसम के पैटर्न “अटक” जाते हैं, जिससे उत्तरी अमेरिका/यूरोप में अत्यधिक शीत लहरें (पोलर वोर्टेक्स) और अन्य जगहों पर लंबे समय तक गर्मी की लहरें चलती हैं।
- महासागरीय धाराएं: ताजे पानी का प्रवाह AMOC (अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन) को कमजोर कर सकता है, जिससे यूरोप ठंडा हो सकता है।
- मानवीय गतिविधियाँ:
- नए व्यापार मार्ग: उत्तरी सागर मार्ग खुलता है, जिससे यूरोप और एशिया के बीच शिपिंग का समय कम हो जाता है।
- भू-राजनीति: आर्कटिक समुद्र तल में संसाधनों (तेल, गैस) के लिए होड़।
अंटार्कटिक ग्लेशियर का पिघलना (भूमि बर्फ):
- मौसम के स्वरूप:
- दक्षिणी महासागर परिसंचरण: पिघलती बर्फ की अलमारियां (Ice shelves) ठंडे, सघन तल के पानी के निर्माण को बदल देती हैं, जो वैश्विक महासागर परिसंचरण और गर्मी वितरण को संचालित करता है।
- अल्बेडो प्रभाव: सफेद बर्फ के आवरण का नुकसान ग्लोबल वार्मिंग (सकारात्मक प्रतिक्रिया लूप) को तेज करता है।
- मानवीय गतिविधियाँ:
- समुद्र के स्तर में वृद्धि: आर्कटिक समुद्री बर्फ के विपरीत, पिघलती अंटार्कटिक भूमि बर्फ वैश्विक समुद्र के स्तर में वृद्धि में सीधे और बड़े पैमाने पर योगदान देती है, जिससे तटीय शहरों और द्वीपीय देशों को खतरा होता है।
- मत्स्य पालन: पानी के तापमान और लवणता में परिवर्तन क्रिल (krill) की आबादी को प्रभावित करता है, जो दक्षिणी महासागर खाद्य जाल का आधार है।
Q16. विश्व में खनिज तेल के असमान वितरण के बहुआयामी निहितार्थों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
आर्थिक निहितार्थ:
- धन असमानता: तेल समृद्ध राष्ट्रों (खाड़ी देशों) ने अपार धन इकट्ठा किया है, जबकि तेल आयात करने वाले राष्ट्रों (जैसे भारत) को उच्च चालू खाता घाटे और मुद्रास्फीति का सामना करना पड़ता है।
- कार्टेलाइज़ेशन: ओपेक (OPEC) का गठन कुछ देशों को वैश्विक ऊर्जा कीमतों को नियंत्रित करने की अनुमति देता है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था बंधक बन जाती है।
भू-राजनीतिक निहितार्थ:
- संघर्ष और युद्ध: प्रमुख संघर्ष (खाड़ी युद्ध, इराक युद्ध, दक्षिण चीन सागर में तनाव) अक्सर तेल भंडार या आपूर्ति मार्गों को नियंत्रित करने की इच्छा से प्रेरित होते हैं।
- रणनीतिक गठबंधन: विदेश नीतियां ऊर्जा सुरक्षा द्वारा निर्धारित की जाती हैं (जैसे अमेरिका-सऊदी संबंध, ईरान/रूस के साथ भारत का जुड़ाव)।
सामाजिक निहितार्थ:
- संसाधन अभिशाप (Resource Curse): कई तेल-समृद्ध राष्ट्र “डच रोग” से पीड़ित हैं—अधिनायकवाद, भ्रष्टाचार और आर्थिक विविधीकरण की कमी (जैसे वेनेजुएला, नाइजीरिया)।
- प्रवास: तेल क्षेत्रों में बूम टाउन श्रम प्रवास को आकर्षित करते हैं, जिससे जनसांख्यिकी बदल जाती है (जैसे मध्य पूर्व में भारतीय प्रवासी)।
Q17. भारत के प्रमुख शहरों में आईटी उद्योगों के विकास से उत्पन्न होने वाले मुख्य सामाजिक-आर्थिक निहितार्थ क्या हैं?
उत्तर:
सकारात्मक निहितार्थ:
- रोजगार: लाखों प्रत्यक्ष व्हाइट-कॉलर नौकरियां और अप्रत्यक्ष नौकरियां (परिवहन, खानपान, सुरक्षा) सृजित हुईं।
- मध्यम वर्ग का विकास: डिस्पोजेबल आय में वृद्धि ने खपत (रियल एस्टेट, खुदरा, ऑटोमोबाइल) को बढ़ावा दिया है।
- महिला रोजगार: यह क्षेत्र महिलाओं का एक बड़ा नियोक्ता है, जो सामाजिक गतिशीलता और लिंग भूमिकाओं को बदलने में सहायता करता है।
- ग्लोबल ब्रांड: बैंगलोर, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों को वैश्विक मानचित्र पर (“पूर्व की सिलिकॉन वैली”) रखा।
नकारात्मक निहितार्थ:
- क्षेत्रीय असमानता: विकास कुछ महानगरों में केंद्रित है, जिससे बड़े पैमाने पर प्रवास होता है और टियर-2/3 शहरों की उपेक्षा होती है।
- शहरी अराजकता: भीड़भाड़, ट्रैफिक जाम और आसमान छूती रियल एस्टेट की कीमतों ने इन केंद्रों में जीवन की गुणवत्ता कम कर दी है।
- डिजिटल डिवाइड: अंग्रेजी बोलने वाले डिजिटल अभिजात वर्ग और बाकी आबादी के बीच एक खाई पैदा की।
- सांस्कृतिक बदलाव: पश्चिमी जीवन शैली, देर से शादी और एकल परिवारों का उदय, पारंपरिक सामाजिक ताने-बाने को बदल रहा है।
Q18. जनसंख्या शिक्षा (Population Education) के मुख्य उद्देश्यों की चर्चा कीजिए और भारत में उन्हें प्राप्त करने के उपायों को विस्तार से बताइए।
उत्तर:
उद्देश्य:
- जागरूकता: युवाओं को जनसंख्या वृद्धि की गतिशीलता और विकास व पर्यावरण पर इसके प्रभाव के बारे में सूचित करना।
- तर्कसंगत निर्णय लेना: जोड़ों को परिवार के आकार और जन्म के अंतर के बारे में सूचित विकल्प बनाने में सक्षम बनाना।
- जिम्मेदार पितृत्व: लैंगिक समानता, बालिका की देखभाल और जिम्मेदार यौन व्यवहार के मूल्यों को स्थापित करना।
- स्वास्थ्य: प्रजनन स्वास्थ्य, स्वच्छता और एसटीडी/एड्स के बारे में शिक्षित करना।
भारत में प्राप्त करने के उपाय:
- पाठ्यक्रम एकीकरण: स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम (NCERT) में जनसंख्या शिक्षा को शामिल करना।
- आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता: गर्भनिरोधक और परिवार नियोजन पर ग्रामीण महिलाओं को परामर्श देने के लिए जमीनी स्तर के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का उपयोग करना।
- मीडिया अभियान: जागरूकता फैलाने के लिए सरकारी विज्ञापन (“हम दो हमारे दो”) और सोशल मीडिया का उपयोग।
- प्रोत्साहन: विलंबित विवाह और अंतर को बढ़ावा देने वाली योजनाएं (जैसे मिशन परिवार विकास)।
- प्रौढ़ शिक्षा: गैर-छात्र आबादी तक पहुंचने के लिए वयस्क साक्षरता कार्यक्रमों में जनसंख्या विषयों को एकीकृत करना।
Q19. क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrency) क्या है? यह वैश्विक समाज को कैसे प्रभावित करती है? क्या यह भारतीय समाज को भी प्रभावित कर रही है?
उत्तर:
क्रिप्टोकरेंसी: यह एक डिजिटल या आभासी मुद्रा है जो सुरक्षा के लिए क्रिप्टोग्राफी का उपयोग करती है। यह ब्लॉकचेन तकनीक (जैसे बिटकॉइन, एथेरियम) पर आधारित विकेन्द्रीकृत नेटवर्क पर संचालित होती है।
वैश्विक समाज पर प्रभाव:
- वित्तीय समावेशन: बिचौलियों के बिना बिना बैंक वाले लोगों को बैंकिंग जैसी सेवाएं प्रदान करता है।
- सट्टेबाजी और अस्थिरता: एक नया परिसंपत्ति वर्ग बनाया लेकिन कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के कारण खुदरा निवेशकों के लिए वित्तीय अस्थिरता पैदा हुई।
- अवैध गतिविधियां: गुमनामी इसे मनी लॉन्ड्रिंग, आतंक वित्तपोषण और डार्क वेब लेनदेन (जैसे रैनसमवेयर भुगतान) के लिए एक उपकरण बनाती है।
- संप्रभुता को चुनौती: मौद्रिक नीति और मुद्रा जारी करने पर केंद्रीय बैंकों के एकाधिकार को खतरा है।
भारतीय समाज पर प्रभाव:
- निवेश का क्रेज: एक महत्वपूर्ण युवा जनसांख्यिकी ने त्वरित रिटर्न की तलाश में क्रिप्टो में निवेश किया, अक्सर वित्तीय साक्षरता की कमी के साथ।
- विनियामक अस्थिरता: अनिश्चितता (प्रतिबंध बनाम विनियमन) ने चिंता पैदा की। 2022 की कर व्यवस्था (30% कर) ने उत्साह कम किया लेकिन इसके अस्तित्व को स्वीकार किया।
- घोटाले: भोले-भाले निवेशकों को निशाना बनाने वाले क्रिप्टो-संबंधित धोखाधड़ी और पोंजी योजनाओं में वृद्धि।
- नवाचार: भारतीय ब्लॉकचेन स्टार्टअप और तकनीक-प्रेमी डेवलपर समुदाय का विकास।
Q20. भारतीय समाज पारंपरिक सामाजिक मूल्यों में निरंतरता कैसे बनाए रखता है? इसमें हो रहे परिवर्तनों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
निरंतरता:
- परिवार प्रणाली: एकल परिवारों के उदय के बावजूद, संयुक्त परिवार की भावना मजबूत बनी हुई है (संकट, त्योहारों के दौरान समर्थन)।
- धर्म और अनुष्ठान: धार्मिक प्रथाएं, तीर्थयात्राएं और जीवन-चक्र अनुष्ठान (जन्म, विवाह, मृत्यु) जीवन के केंद्र में बने हुए हैं।
- जातीय अंतर्विवाह: अपनी जाति के भीतर अरेंज मैरिज अभी भी एक विशाल बहुमत के लिए आदर्श है, जो जाति की रेखाओं को संरक्षित करता है।
- बड़ों का सम्मान: पदानुक्रम का मूल्य और बड़ों का सम्मान करना अभी भी पालन-पोषण में गहराई से निहित है।
परिवर्तन:
- जाति तरलता: जबकि विवाह कठोर बना हुआ है, भोजन और व्यवसाय पर जातिगत प्रतिबंध शहरी क्षेत्रों में काफी हद तक गायब हो गए हैं।
- लिंग भूमिकाएं: महिलाएं तेजी से कार्यबल और सार्वजनिक जीवन में प्रवेश कर रही हैं, पितृसत्तात्मक मानदंडों को चुनौती दे रही हैं।
- व्यक्तिवाद: शहरीकरण व्यक्तिवाद को बढ़ावा दे रहा है, जिसमें व्यक्तिगत आकांक्षाएं अक्सर समुदाय या पारिवारिक कर्तव्य पर वरीयता लेती हैं।
- जीवन शैली का धर्मनिरपेक्षीकरण: जबकि धार्मिक पहचान बनी हुई है, दैनिक जीवन तेजी से धार्मिक फरमानों के बजाय धर्मनिरपेक्ष, तर्कसंगत और कानूनी मानदंडों द्वारा शासित होता है।
- अंतर-जातीय/अंतर-धार्मिक विवाह: धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं, खासकर शहरी, शिक्षित वर्गों में, जो पारंपरिक सीमाओं को चुनौती दे रहे हैं।