(पल्लवन) महत्त्वपूर्ण सूक्तियों का भाव-विस्तार
यहाँ अभ्यास के लिए दी गई महत्त्वपूर्ण सूक्तियों और लोकोक्तियों का अर्थ एवं भाव-विस्तार प्रस्तुत है।
1. अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम।
(पूरा दोहा: अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।।)
- अर्थ: ईश्वर ही सबका पालनहार है।
- भाव-विस्तार: इस पंक्ति में संत मलूकदास जी ने ईश्वर की पालन-पोषण करने की क्षमता पर अटूट विश्वास प्रकट किया है। वे कहते हैं कि अजगर किसी की नौकरी नहीं करता और पक्षी भी कोई काम-धंधा नहीं करते, फिर भी उनका पेट भरता है। ईश्वर सभी प्राणियों की चिंता करते हैं और उन्हें भोजन उपलब्ध कराते हैं। इसका भाव यह है कि मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं के लिए बहुत अधिक चिंताग्रस्त होने के बजाय ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए। हालाँकि, इसे कर्महीनता का उपदेश नहीं मानना चाहिए, बल्कि यह ईश्वर पर भरोसे (तवक्कल) का प्रतीक है।
2. अतिशय रगड़ करे जो कोई, अनल प्रकट चंदन तें होई।
- अर्थ: निरंतर प्रयास से असंभव भी संभव हो जाता है।
- भाव-विस्तार: चंदन को स्वभाव से अत्यंत शीतल माना जाता है, लेकिन यदि उसे भी बहुत अधिक और लगातार रगड़ा जाए, तो उससे भी अग्नि (चिंगारी) उत्पन्न हो सकती है। इसी प्रकार, यदि मनुष्य दृढ़ निश्चय के साथ निरंतर कठिन परिश्रम करे, तो वह उन कार्यों को भी सिद्ध कर सकता है जो देखने में असंभव लगते हैं। यह सूक्ति हमें सतत परिश्रम और संघर्ष की प्रेरणा देती है।
3. अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।
- अर्थ: अवसर निकल जाने पर पश्चाताप करना व्यर्थ है।
- भाव-विस्तार: किसान यदि समय पर खेत की रखवाली न करे और चिड़ियाँ सारी फसल चुग लें, तो बाद में रोने या पछताने से फसल वापस नहीं आती। ठीक इसी तरह, जीवन में हर काम का एक उचित समय होता है। यदि विद्यार्थी परीक्षा से पहले न पढ़े और फेल हो जाए, तो बाद में पछताने का कोई लाभ नहीं। समय के सदुपयोग और सतर्कता की महत्ता ही इस कहावत का मूल भाव है।
4. आवश्यकता आविष्कार की जननी है।
- अर्थ: जरूरत ही नई खोजों को जन्म देती है।
- भाव-विस्तार: मनुष्य स्वभाव से सुविधाभोगी है, लेकिन जब उसे किसी चीज की कमी या कठिनाई महसूस होती है, तो वह उसे दूर करने के उपाय सोचता है। आदिमानव ने जब ठंड महसूस की, तो उसने आग और कपड़ों की खोज की। दूरी मिटाने के लिए पहिये और वाहनों का आविष्कार हुआ। अतः यह सत्य है कि जब-जब मनुष्य को आवश्यकता पड़ी है, उसने अपनी बुद्धि का प्रयोग करके नए आविष्कार किए हैं। अभाव ही नई रचना का कारण बनता है।
5. मान सहित विष खाय के शंभु भयो जगदीश।
(बिना मान अमृत पिये, राहु कटायो सीस)
- अर्थ: स्वाभिमान के साथ कष्ट सहना भी श्रेयस्कर है।
- भाव-विस्तार: भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले विष को लोक-कल्याण के लिए मान-सम्मान के साथ ग्रहण किया, इसलिए वे ‘नीलकंठ’ और ‘जगदीश’ (जगत के ईश्वर) कहलाए और पूजनीय हुए। दूसरी ओर, राहु ने छिपकर अमृत पिया, लेकिन उसे अपमानित होकर सिर कटवाना पड़ा। भाव यह है कि मान-सम्मान के साथ जीवन में कष्ट या मृत्यु भी स्वीकार्य है, लेकिन अपमान के साथ मिला सुख या जीवन भी व्यर्थ है।
6. का वर्षा जब कृषि सुखाने।
(समय चूकि पुनि का पछताने)
- अर्थ: काम बिगड़ने के बाद सहायता मिलने का कोई लाभ नहीं।
- भाव-विस्तार: यदि फसल पानी की कमी से सूख जाए और उसके बाद मूसलाधार बारिश हो, तो वह बारिश उस फसल के किसी काम की नहीं होती। उसी प्रकार, यदि किसी जरूरतमंद को समय पर सहायता न मिले और उसका काम बिगड़ जाए, तो बाद में मिली मदद का कोई अर्थ नहीं रह जाता। हर कार्य की सार्थकता उचित समय पर होने में ही है।
7. आलस्य ही मनुष्य का परम शत्रु है।
(आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः)
- अर्थ: आलस्य मनुष्य के शरीर में स्थित उसका सबसे बड़ा दुश्मन है।
- भाव-विस्तार: आलस्य मनुष्य की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा है। आलसी व्यक्ति ‘आज का काम कल पर’ टालता रहता है और अंततः असफलता प्राप्त करता है। आलस्य मनुष्य की प्रतिभा, शक्ति और समय को नष्ट कर देता है। जिस प्रकार दीमक लकड़ी को खोखला कर देती है, उसी प्रकार आलस्य मनुष्य के जीवन को व्यर्थ बना देता है। परिश्रम ही सफलता की कुंजी है और आलस्य उसका विनाशक।
8. वृच्छ कबहु नहिं फल भखै, नदी न संचै नौर।
(परमारथ के कारनै, साधुन धरा शरीर)
- अर्थ: परोपकार ही सज्जनों का स्वभाव होता है।
- भाव-विस्तार: वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते और नदियाँ अपना पानी स्वयं नहीं पीतीं। वे दूसरों के लिए ही फलते और बहते हैं। इसी प्रकार, सज्जन और संत महात्माओं का जीवन भी स्वयं के भोग-विलास के लिए नहीं, बल्कि परोपकार (दूसरों की भलाई) के लिए होता है। प्रकृति हमें निस्वार्थ भाव से सेवा करने की शिक्षा देती है।
9. आचरण ही सज्जनता की कसौटी है।
- अर्थ: व्यक्ति की पहचान उसके व्यवहार से होती है।
- भाव-विस्तार: कोई व्यक्ति कितना विद्वान या धनवान है, इससे उसकी सज्जनता सिद्ध नहीं होती। असली सज्जन वही है जिसका आचरण (चरित्र) शुद्ध और पवित्र हो। यदि कोई व्यक्ति मीठा बोलता है लेकिन उसके कर्म बुरे हैं, तो वह सज्जन नहीं कहला सकता। मनुष्य का व्यवहार, विनम्रता और नैतिकता ही यह तय करती है कि वह वास्तव में सज्जन है या नहीं। आचरण मनुष्य का दर्पण है।
10. कर्म प्रधान विश्व करि राखा।
(जो जस करइ सो तस फल चाखा)
- अर्थ: संसार में कर्म ही मुख्य है, जैसा कर्म वैसा फल।
- भाव-विस्तार: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि ईश्वर ने इस संसार को कर्म-क्षेत्र बनाया है। यहाँ भाग्य के भरोसे बैठने वालों को कुछ नहीं मिलता। जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है। अच्छे कर्मों का फल अच्छा और बुरे कर्मों का फल बुरा होता है। यह उक्ति भाग्यवाद का खंडन करती है और कर्मवाद (पुरुषार्थ) की महत्ता स्थापित करती है।
11. ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
(पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय)
- अर्थ: प्रेम का मर्म जानने वाला ही असली ज्ञानी है।
- भाव-विस्तार: कबीरदास जी कहते हैं कि केवल बड़ी-बड़ी किताबें और शास्त्र पढ़ने से कोई विद्वान नहीं बन जाता। संसार में अनेकों लोग पोथियाँ पढ़कर चले गए, पर सच्चा ज्ञान न पा सके। जो व्यक्ति प्रेम (मानवता, करुणा, ईश्वर प्रेम) के ढाई अक्षरों को अर्थात् प्रेम के वास्तविक स्वरूप को समझ लेता है और उसे व्यवहार में उतारता है, वही सच्चा पंडित या ज्ञानी है। शुष्क ज्ञान से श्रेष्ठ है प्रेम भरा हृदय।
12. प्रेम मुक्त भी है और स्वाधीन भी।
- अर्थ: सच्चा प्रेम बंधन नहीं, बल्कि आजादी देता है।
- भाव-विस्तार: प्रेम का स्वरूप त्याग और समर्पण पर आधारित है, न कि अधिकार और बंधन पर। सच्चा प्रेम व्यक्ति को संकीर्णताओं से मुक्त करता है और उसे व्यापक बनाता है। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ जबरदस्ती या गुलामी नहीं होती। प्रेम करने वाला स्वयं भी स्वतंत्र महसूस करता है और अपने प्रिय को भी स्वतंत्रता देता है। प्रेम आत्मा की मुक्ति का साधन है।
13. पराधीन सपनेहूं सुख नाहीं।
- अर्थ: गुलामी में स्वप्न में भी सुख नहीं मिलता।
- भाव-विस्तार: स्वतंत्रता मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार और स्वाभाविक गुण है। सोने के पिंजरे में बंद पक्षी को चाहे कितने ही अच्छे पकवान दिए जाएं, उसे आकाश में उड़ने जैसा सुख नहीं मिल सकता। उसी प्रकार, पराधीन व्यक्ति हमेशा दूसरों की इच्छा पर निर्भर रहता है, उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं होता। सच्चा सुख और स्वाभिमान केवल स्वाधीनता में ही निहित है।
14. जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
(वह नर नहीं है पशु निरा है और मृतक समान है)
- अर्थ: देशप्रेम से शून्य व्यक्ति मरे हुए के समान है।
- भाव-विस्तार: मैथिलीशरण गुप्त जी की ये पंक्तियाँ देशप्रेम की भावना को जगाती हैं। जिस व्यक्ति को अपनी संस्कृति, अपने पूर्वजों के गौरव और अपनी मातृभूमि पर गर्व नहीं है, उसका जीवन व्यर्थ है। वह केवल साँस लेने वाला प्राणी (पशु) है, उसमें मनुष्योचित संवेदनाएँ नहीं हैं। मनुष्य होने की सार्थकता इसी में है कि वह अपने देश के उत्थान के लिए जिए और मरे।
15. जो तोको कांटा बुवै, ताहि बोय तू फूल।
- अर्थ: बुराई का बदला भलाई से देना चाहिए।
- भाव-विस्तार: कबीरदास जी कहते हैं कि यदि कोई तुम्हारे रास्ते में काँटे बिछाए (बुरा करे), तो तुम उसके लिए फूल बिछाओ (भला करो)। इसका परिणाम यह होगा कि तुम्हारी भलाई (फूल) तो तुम्हें मिलेगी ही, और उस व्यक्ति के काँटे (बुराई) अंततः उसी को चुभेंगे। साथ ही, तुम्हारे अच्छे व्यवहार से उसका हृदय परिवर्तन भी हो सकता है। यह उक्ति ‘अहिंसा’ और ‘क्षमा’ का पाठ पढ़ाती है।
16. पर उपदेश कुशल बहुतेरे।
(जे आचरहिं ते नर न घनेरे)
- अर्थ: दूसरों को उपदेश देना बहुत आसान है।
- भाव-विस्तार: तुलसीदास जी कहते हैं कि संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो दूसरों को ज्ञान और उपदेश देने में बहुत कुशल होते हैं। लेकिन ऐसे लोग बहुत कम (विरले) होते हैं जो उन उपदेशों को स्वयं अपने आचरण में उतारते हैं। ‘कथनी’ और ‘करनी’ में अंतर होना साधारण बात है। सच्चा प्रभाव उपदेश से नहीं, बल्कि आचरण से पड़ता है।
17. लघुता से प्रभुता मिलै, प्रभुता से प्रभु दूर।
- अर्थ: विनम्रता ही बड़प्पन (प्रभुता) दिलाती है।
- भाव-विस्तार: जो व्यक्ति विनम्र बनकर रहता है, अहंकार को त्याग देता है (लघुता), वही संसार में सम्मान और बड़प्पन (प्रभुता) प्राप्त करता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति पद या धन पाकर अहंकारी हो जाता है और खुद को प्रभु (स्वामी) समझने लगता है, उससे ईश्वर (प्रभु) दूर हो जाते हैं। चींटी शक्कर खाती है जबकि अहंकारी हाथी धूल फांकता है। विनम्रता ही उन्नति का मूल मंत्र है।
18. क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो।
(उसको क्या जो दंतहीन विषरहित विनीत सरल हो)
- अर्थ: शक्तिसंपन्न व्यक्ति की ही क्षमा का महत्त्व होता है।
- भाव-विस्तार: रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी कहते हैं कि क्षमा उसी साँप को शोभा देती है जिसके पास जहर है। अर्थात, जो व्यक्ति शक्तिशाली और समर्थ है, यदि वह किसी को माफ करे तो यह उसका बड़प्पन माना जाता है। लेकिन जो व्यक्ति कमजोर, कायर और असमर्थ है, उसकी क्षमा को दुनिया उसकी मजबूरी या विवशता मानती है। अतः क्षमाशील होने के लिए पहले शक्ति अर्जित करना आवश्यक है।
19. श्रद्धा और प्रेम का योग ही भक्ति है।
- अर्थ: भक्ति में आदर और स्नेह दोनों का होना अनिवार्य है।
- भाव-विस्तार: आचार्य रामचंद्र शुक्ल का यह कथन भक्ति के स्वरूप को स्पष्ट करता है। केवल श्रद्धा (आदर) होने से दूरी बनी रहती है, और केवल प्रेम होने से चंचलता आ सकती है। जब हम किसी के महान गुणों के प्रति श्रद्धा रखते हैं और साथ ही उससे आत्मीयता (प्रेम) भी रखते हैं, तभी सच्ची भक्ति का जन्म होता है। जैसे पुत्र का पिता के प्रति या भक्त का ईश्वर के प्रति भाव।
20. भाषा विचार की पोशाक है।
- अर्थ: भाषा विचारों को मूर्त रूप देती है।
- भाव-विस्तार: जिस प्रकार पोशाक (कपड़े) शरीर को ढकती है और उसे आकर्षक रूप देती है, उसी प्रकार भाषा हमारे अमूर्त विचारों को आकार प्रदान करती है। बिना भाषा के विचार अस्पष्ट और निराकार रहते हैं। जब हम उचित और सुंदर शब्दों का प्रयोग करते हैं, तो हमारे विचार प्रभावशाली बनकर दूसरों तक पहुँचते हैं। भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि विचारों का परिधान भी है।
21. निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
(बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल)
- अर्थ: अपनी मातृभाषा की उन्नति ही सभी प्रकार के विकास की जड़ है।
- भाव-विस्तार: भारतेंदु हरिश्चंद्र जी कहते हैं कि अपनी भाषा (मातृभाषा/राष्ट्रभाषा) की उन्नति के बिना समाज या राष्ट्र की वास्तविक उन्नति असंभव है। हम चाहे विदेशी भाषाओं में कितना भी ज्ञान प्राप्त कर लें, लेकिन मन की पीड़ा (हिय को सूल) और मौलिक विचार केवल अपनी भाषा में ही व्यक्त हो सकते हैं। स्वाभिमान और राष्ट्रीय एकता के लिए निज भाषा का विकास सर्वोपरि है।