Working of Gram Panchayat in Hindi

यहाँ महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय (MDSU), अजमेर के बी.ए. (द्वितीय वर्ष, तृतीय सेमेस्टर) के राजनीति विज्ञान के छात्रों के लिए “73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम और ग्राम पंचायत का संस्थागत ढाँचा” पर विस्तृत नोट्स दिए गए हैं। यह सामग्री विशेष रूप से आपके स्किल एनहांसमेंट कोर्स (SEC – PSC 7001) “Working of Gram Panchayat” के पाठ्यक्रम को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।


73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम और ग्राम पंचायत का संस्थागत ढाँचा: विस्तृत नोट्स

परिचय

भारत में स्थानीय स्वशासन की नींव बहुत पुरानी है, लेकिन इसे संवैधानिक मज़बूती 1992 के 73वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से मिली। यह अधिनियम जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए एक क्रांतिकारी कदम था, जिसने पंचायतों को “स्वशासन की इकाइयों” के रूप में कार्य करने का अधिकार दिया।

महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय (MDSU), अजमेर के पाठ्यक्रम के अनुसार, यह अधिनियम ग्राम पंचायतों की कार्यप्रणाली को समझने का मुख्य आधार है।

73वें संविधान संशोधन अधिनियम की पृष्ठभूमि और महत्व

  1. संवैधानिक दर्जा: इस अधिनियम ने पंचायती राज संस्थाओं (PRI) को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया, जिससे अब राज्य सरकारें अपनी इच्छा से इनके चुनाव नहीं टाल सकतीं।
  2. नया भाग और अनुसूची: इस संशोधन द्वारा संविधान में एक नया भाग-IX (अनुच्छेद 243 से 243-O) और 11वीं अनुसूची जोड़ी गई।
  3. 11वीं अनुसूची: इसमें पंचायतों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले 29 कार्यात्मक विषय शामिल हैं, जैसे कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण आवास।

ग्राम पंचायत का संस्थागत ढाँचा (Institutional Framework)

73वें संशोधन ने पूरे देश में पंचायतों के लिए एक समान त्रि-स्तरीय संरचना (Three-Tier System) का प्रावधान किया है:

  1. ग्राम सभा (आधार स्तंभ):
    • यह पंचायत क्षेत्र के सभी पंजीकृत मतदाताओं की एक सभा है।
    • इसे प्रत्यक्ष लोकतंत्र का प्रतीक माना जाता है, जहाँ ग्रामीण सीधे निर्णय लेने की प्रक्रिया में भाग लेते हैं।
  2. त्रि-स्तरीय प्रणाली (Three-Tier Structure):
    • ग्राम स्तर: ग्राम पंचायत
    • खंड (ब्लॉक) स्तर: पंचायत समिति
    • जिला स्तर: जिला परिषद
    • नोट: जिन राज्यों की जनसंख्या 20 लाख से कम है, वहाँ मध्यवर्ती (ब्लॉक) स्तर की पंचायत बनाना अनिवार्य नहीं है।

अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ

  • चुनाव प्रक्रिया: पंचायतों के सभी स्तरों पर सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा किया जाता है। ग्राम पंचायत के अध्यक्ष (सरपंच) का चुनाव राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित तरीके से होता है।
  • सीटों का आरक्षण (अनुच्छेद 243-D):
    • SC/ST आरक्षण: उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित हैं।
    • महिला आरक्षण: कुल सीटों का कम से कम एक-तिहाई (1/3) महिलाओं के लिए आरक्षित है। राजस्थान जैसे राज्यों में यह आरक्षण बढ़ाकर 50% कर दिया गया है।
  • कार्यकाल: पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित है। यदि पंचायत समय से पहले भंग होती है, तो 6 महीने के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है।
  • राज्य चुनाव आयोग: चुनावों के संचालन और मतदाता सूची तैयार करने की जिम्मेदारी राज्य चुनाव आयोग की होती है।
  • राज्य वित्त आयोग: पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने और संसाधनों के वितरण की सिफारिश करने के लिए राज्यपाल हर 5 साल में एक वित्त आयोग का गठन करते हैं।

राजस्थान के विशेष संदर्भ में (MDSU छात्रों के लिए महत्वपूर्ण)

राजस्थान पंचायती राज की जन्मभूमि है (2 अक्टूबर 1959, नागौर)। 73वें संशोधन के बाद, राजस्थान ने ‘राजस्थान पंचायती राज अधिनियम 1994’ लागू किया ताकि नई संवैधानिक व्यवस्था को अपनाया जा सके।

चुनौतियाँ: राजस्थान में ग्राम पंचायतों के सामने वित्तीय आत्मनिर्भरता की कमी, राजनीतिक हस्तक्षेप और तकनीकी प्रशिक्षण का अभाव प्रमुख चुनौतियाँ हैं।


निष्कर्ष

73वाँ संविधान संशोधन भारत में ‘प्रतिनिधि लोकतंत्र’ को ‘भागीदारी लोकतंत्र’ में बदलने वाला एक ऐतिहासिक कदम है। यह न केवल ग्रामीण विकास सुनिश्चित करता है, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों और महिलाओं को मुख्यधारा की राजनीति में सशक्त भी बनाता है।


छात्रों के लिए टिप: परीक्षा में उत्तर लिखते समय अनुच्छेदों (जैसे 243-A से 243-O) और 11वीं अनुसूची के 29 विषयों का उल्लेख अवश्य करें। यह आपके उत्तर को अधिक प्रभावी बनाएगा।


यह लेख बी.ए. राजनीति विज्ञान के छात्रों के लिए अध्ययन सामग्री के रूप में तैयार किया गया है।

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