यहाँ ‘राष्ट्रीय आय और कल्याण’ तथा ‘हरित लेखांकन (Green accounting)’ की अवधारणा पर आधारित विस्तृत नोट्स दिए गए हैं:
विस्तृत नोट्स: राष्ट्रीय आय, आर्थिक कल्याण और हरित लेखांकन
1. राष्ट्रीय आय और आर्थिक कल्याण का संबंध (National Income and Economic Welfare)
पारंपरिक रूप से राष्ट्रीय आय को आर्थिक विकास का सूचक माना जाता है, लेकिन यह आर्थिक कल्याण का पूर्णतः सही माप नहीं है। आधुनिक अर्थशास्त्रियों के अनुसार, राष्ट्रीय आय और कल्याण के बीच गहरा संबंध तो है, लेकिन इसमें कुछ सीमाएँ हैं:
- कल्याण का अधूरा मापन: राष्ट्रीय आय की गणना में उन वस्तुओं और सेवाओं को शामिल किया जाता है जिनका बाजार मूल्य होता है, लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि उत्पादन से लोगों के जीवन स्तर या कल्याण में कितनी वृद्धि हुई है। कई बार राष्ट्रीय आय बढ़ने पर भी पर्यावरण प्रदूषण जैसी समस्याओं के कारण लोगों का कल्याण घट जाता है।
- शोचनीय लागतें (Regrettable Costs): राष्ट्रीय आय में कुछ ऐसे अनुत्पादक व्यय शामिल होते हैं जो कल्याण में सीधे वृद्धि नहीं करते, जैसे युद्ध या सुरक्षा पर किया गया व्यय (प्रतिरक्षा व्यय)। इन्हें ‘शोचनीय लागतें’ कहा जाता है, जिन्हें कल्याण के सही मापन के लिए राष्ट्रीय आय से घटाया जाना चाहिए।
- नकारात्मक बाह्यताएँ (Negative Externalities): उत्पादन प्रक्रियाओं से उत्पन्न प्रदूषण (वायु, जल, ध्वनि) लोगों के स्वास्थ्य और कल्याण को कम करता है, लेकिन पारंपरिक जीडीपी (GDP) गणना में इस पर्यावरणीय क्षति की लागत को नहीं घटाया जाता,।
निवल आर्थिक कल्याण (Net Economic Welfare – NEW) का सूत्र: कल्याण का सही माप प्राप्त करने के लिए राष्ट्रीय आय को समायोजित किया जाना चाहिए। इसका एक सामान्य सूत्र स्रोतों में इस प्रकार दिया गया है:
निवल आर्थिक कल्याण = वास्तविक कुल राष्ट्रीय आय – मूल्यह्रास – अवकाश का मूल्य – क्रय-विक्रय न की जाने वाली गतिविधियाँ – पर्यावरण प्रदूषण – शोचनीय लागतें,।
2. हरित लेखांकन (Green Accounting) की अवधारणा
हरित लेखांकन एक ऐसी प्रणाली है जो राष्ट्रीय आय के खातों में पर्यावरणीय लागतों और प्राकृतिक संसाधनों की स्थिति को एकीकृत करती है।
- परिभाषा: हरित लेखांकन के अंतर्गत प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग और पर्यावरण क्षरण (Environmental degradation) को राष्ट्रीय आय लेखांकन में शामिल किया जाता है। इसका उद्देश्य यह मापना है कि आर्थिक विकास किस हद तक टिकाऊ (Sustainable) है।
- आवश्यकता: पारंपरिक ‘राष्ट्रीय लेखा प्रणाली’ (SNA) में प्राकृतिक संसाधनों (जैसे हवा, पानी, मृदा) के योगदान और उनके ह्रास को शामिल नहीं किया जाता है। इसमें प्राकृतिक संसाधनों को अक्सर ‘मुफ्त’ माना जाता है, जिससे आर्थिक प्रगति का सही चित्र नहीं मिल पाता,।
- उद्देश्य: हरित लेखांकन का मुख्य ध्येय यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक गणनाओं में पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति और प्राकृतिक पूँजी के क्षरण का हिसाब रखा जाए, ताकि नीति निर्माता भ्रमित न हों और सतत विकास को बढ़ावा मिले,।
3. हरित जीडीपी (Green GDP)
हरित जीडीपी, हरित लेखांकन का एक प्रमुख संकेतक है।
- अर्थ: यह पारंपरिक जीडीपी का वह रूप है जिसे पर्यावरणीय क्षति और प्राकृतिक संसाधनों की कमी के लिए समायोजित किया गया है। इसे ‘पर्यावरण समायोजित घरेलू उत्पाद’ (Environmentally Adjusted Domestic Product – EDP) भी कहा जाता है।
- गणना विधि: हरित जीडीपी = पारंपरिक जीडीपी – (प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण + पर्यावरणीय क्षति की लागत)।एक अन्य दृष्टिकोण के अनुसार: EDP (पर्यावरण समायोजित उत्पाद) = GDP – अचल पूँजी की घिसावट – प्राकृतिक पूँजी का क्षरण – प्रदूषण/पर्यावरणीय ह्रास की लागत।
- विशेषताएँ:
- यह केवल जंगलों या वन्यजीवों की कीमत लगाना नहीं है, बल्कि यह मापना है कि जैव विविधता की कमी और जलवायु परिवर्तन का अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।
- यह प्रति व्यक्ति कचरा और कार्बन उत्सर्जन का भी लेखा-जोखा रखता है।
4. राष्ट्रीय आय लेखांकन में हरित लेखांकन का समावेश (Methods of Inclusion)
स्रोतों के अनुसार, पारंपरिक राष्ट्रीय लेखांकन (SNA) में सुधार कर हरित लेखांकन को निम्नलिखित विधियों से जोड़ा जा सकता है:
- भौतिक लेखांकन (Physical Accounting): इसमें प्राकृतिक संसाधनों (जैसे वन क्षेत्र, खनिज भंडार) के भौतिक स्टॉक और प्रवाह का हिसाब रखा जाता है। उदाहरण के लिए, वनों के संदर्भ में लकड़ी के भंडार और खुले वन क्षेत्रफल का लेखा-जोखा रखना।
- प्रदूषण निवारण व्यय लेखांकन: इसमें प्रदूषण को रोकने या पर्यावरण को साफ करने के लिए किए गए वास्तविक खर्चों को अलग से वर्गीकृत किया जाता है।
- प्राकृतिक पूँजी लेखांकन (Natural Capital Accounting): इसमें प्राकृतिक संसाधनों (वन, जल, खनिज) को राष्ट्रीय संपत्ति मानकर उनके मूल्य को मापा जाता है।
- SEEA पद्धति: ‘पर्यावरण-आर्थिक लेखांकन प्रणाली’ (SEEA) एक स्वीकृत ढांचा है जो पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के बीच भौतिक और मौद्रिक प्रवाहों का मिलान करता है। यह हाइब्रिड खाते तैयार करता है जो आर्थिक और पर्यावरणीय आंकड़ों को जोड़ते हैं।
- ENRAP दृष्टिकोण: यह विधि बाजार में न बिकने वाली पर्यावरणीय सेवाओं (जैसे मनोरंजन के लिए वन, अपशिष्ट निपटान सेवाएँ) के लिए ‘छाया कीमतों’ (Shadow Prices) का उपयोग कर उनका मूल्यांकन करती है।
5. हरित लेखांकन का महत्त्व और चुनौतियाँ
महत्त्व:
- सतत विकास (Sustainability): यह बताता है कि देश का आर्थिक विकास भविष्य की पीढ़ियों के लिए कितना टिकाऊ है,।
- नीति निर्माण: यह सरकारों को प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन और प्रदूषण नियंत्रण के लिए बेहतर नीतियाँ बनाने में मदद करता है।
- असली तस्वीर: यह पारंपरिक जीडीपी के भ्रम को दूर करता है। उदाहरण के लिए, यदि वनों की कटाई से लकड़ी बिकती है तो पारंपरिक जीडीपी बढ़ती है, लेकिन हरित जीडीपी यह दिखाएगी कि प्राकृतिक संपत्ति कम हुई है।
चुनौतियाँ:
- डेटा की कमी: पर्यावरणीय क्षति और संसाधनों के मूल्यांकन के लिए विश्वसनीय आँकड़े प्राप्त करना कठिन है,।
- मूल्यांकन की समस्या: हवा, पानी या जैव विविधता जैसी चीजों का मौद्रिक मूल्य (Monetary Value) तय करना विवादास्पद और जटिल होता है।
- राजनैतिक प्रतिरोध: कई बार हरित जीडीपी के आँकड़े पारंपरिक विकास दर को कम करके दिखाते हैं, जिससे सरकारें इसे अपनाने में हिचकिचाती हैं। चीन का उदाहरण इसका प्रमाण है जहाँ उसने हरित जीडीपी की गणना शुरू की लेकिन कम विकास दर दिखने पर इसे रोक दिया।
भारत के संदर्भ में: भारत में आधिकारिक तौर पर हरित जीडीपी नहीं मापी जाती, लेकिन प्रयास जारी हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के एक पत्र (अक्टूबर 2022) के अनुसार, शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि 2019 में भारत की हरित जीडीपी पारंपरिक जीडीपी से लगभग 10% कम थी।