राजा राम मोहन राय और ब्रह्म समाज

राजा राम मोहन राय: महत्वपूर्ण तथ्य

  • प्रमुख उपाधियाँ: इन्हें ‘आधुनिक भारत का जनक’, ‘भारतीय पुनर्जागरण का पिता’, और ‘भारतीय राष्ट्रवाद का पैगंबर/अग्रदूत’ कहा जाता है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने इन्हें ‘युगदूत’ की संज्ञा दी थी।
  • ‘राजा’ की उपाधि: 1830 में मुगल सम्राट अकबर द्वितीय ने इन्हें ‘राजा’ की उपाधि दी थी और अपनी पेंशन से जुड़ी मांगों के लिए अपना राजदूत बनाकर इंग्लैंड भेजा था।
  • जन्म और मृत्यु: इनका जन्म 22 मई 1772 को बंगाल के हुगली जिले के राधानगर में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनकी मृत्यु 27 सितंबर 1833 को इंग्लैंड के ब्रिस्टल (Stapleton) में हुई, जहाँ इनकी समाधि स्थित है।
  • सती प्रथा का अंत: इनके सबसे महान सामाजिक कार्यों में सती प्रथा का विरोध शामिल है। इन्हीं के अथक प्रयासों से 1829 में तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने एक कानून (नियम XVII) बनाकर सती प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया।
  • प्रमुख संस्थाओं की स्थापना:
    • आत्मीय सभा (1814/1815): कलकत्ता में स्थापित, जिसका उद्देश्य एकेश्वरवाद का प्रचार करना और हिंदू धर्म की कुरीतियों का विरोध करना था।
    • हिंदू कॉलेज (1817): पश्चिमी और आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए डेविड हेयर के सहयोग से कलकत्ता में स्थापना की।
    • वेदांत कॉलेज (1825): इसमें भारतीय विद्या और पाश्चात्य सामाजिक व भौतिक विज्ञान दोनों की शिक्षा दी जाती थी।
  • प्रमुख पत्र-पत्रिकाएँ और पुस्तकें:
    • तुहफत-उल-मुवाहिदीन (Gift to Monotheists): 1803/1804 में फारसी भाषा में प्रकाशित उनकी पहली दार्शनिक पुस्तक, जिसमें मूर्तिपूजा का विरोध और एकेश्वरवाद का समर्थन किया गया।
    • संवाद कौमुदी (Sambad Kaumudi): 1821 में बंगाली भाषा में शुरू किया गया साप्ताहिक समाचार पत्र।
    • मिरात-उल-अकबर (Mirat-ul-Akbar): 1822 में फारसी भाषा में प्रकाशित प्रथम पत्रिका।
    • प्रिसेप्ट्स ऑफ जीसस (Precepts of Jesus): 1820 में प्रकाशित, जिसमें ईसाई धर्म के नैतिक और दार्शनिक संदेशों पर जोर दिया गया।
    • बंगदूत: 1829 में बांग्ला, हिंदी और फारसी में प्रकाशित एक अनोखा पत्र।

ब्रह्म समाज: महत्वपूर्ण तथ्य

  • स्थापना: 20 अगस्त 1828 को कलकत्ता में राजा राम मोहन राय और द्वारकानाथ टैगोर द्वारा की गई। प्रारंभ में इसे ‘ब्रह्म सभा’ कहा गया, जो बाद में ‘ब्रह्म समाज’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
  • प्रमुख सिद्धांत और उद्देश्य:
    • यह पूरी तरह से एकेश्वरवाद (एक ईश्वर में विश्वास) के सिद्धांत पर आधारित था।
    • ब्रह्म समाज ने मूर्तिपूजा, बहुदेववाद और अवतारवाद का कड़ा विरोध किया तथा वेदों व उपनिषदों को अपने ज्ञान का आधार बनाया।
    • इसका प्रमुख लक्ष्य हिंदू धर्म को अंधविश्वासों और कर्मकांडों से मुक्त करना तथा सती प्रथा, बाल विवाह, छुआछूत और जाति प्रथा का विरोध करना था।
    • महिलाओं की शिक्षा, संपत्ति में उनके अधिकार और विधवा पुनर्विवाह का पुरजोर समर्थन किया गया।
  • ब्रह्म समाज का संचालन: राजा राम मोहन राय की मृत्यु के बाद, इसका प्रारंभिक संचालन द्वारकानाथ टैगोर और पंडित रामचंद्र विद्यावागीश ने किया। 1842-43 में देवेन्द्रनाथ टैगोर (जिन्होंने 1839 में तत्त्वबोधिनी सभा बनाई थी) ने ब्रह्म समाज का नेतृत्व संभाला।
  • ब्रह्म समाज का विभाजन:
    • प्रथम विभाजन (1866): 1857-58 में केशव चंद्र सेन ब्रह्म समाज में शामिल हुए, लेकिन ईसाई धर्म से अत्यधिक प्रभावित होने और उनके अति-उदारवादी विचारों के कारण देवेन्द्रनाथ टैगोर से उनका वैचारिक मतभेद हो गया। फलस्वरूप 1866 में समाज बँट गया। देवेन्द्रनाथ का मूल गुट ‘आदि ब्रह्म समाज’ कहलाया और केशव चंद्र सेन का गुट ‘भारतवर्षीय ब्रह्म समाज’ (Brahmo Samaj of India) कहलाया।
    • द्वितीय विभाजन (1878): केशव चंद्र सेन महिला शिक्षा और बाल-विवाह के विरोध की बात करते थे, लेकिन 1878 में जब उन्होंने अपनी अल्पवयस्क (नाबालिग) पुत्री का विवाह कूचबिहार के राजकुमार से वैदिक रीति-रिवाजों के साथ कर दिया, तो उनके युवा अनुयायियों ने विद्रोह कर दिया। आनंद मोहन बोस, शिवनाथ शास्त्री और उमेश चंद्र दत्ता आदि ने मिलकर एक नया संगठन ‘साधारण ब्रह्म समाज’ स्थापित किया।

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