राजस्थान में पुरापाषाण और मध्यपाषाण संस्कृति के साक्ष्य Evidence of Palaeolithic and Mesolithic Culture in Rajasthan
क्या आप जानते हैं कि जिस राजस्थान को आज हम महलों, दुर्गों और राजपूत राजाओं के गौरवशाली इतिहास के लिए जानते हैं, उसकी जड़ें लाखों वर्ष पुरानी पाषाणकालीन मानव सभ्यताओं से जुड़ी हुई हैं? RPSC, RAS, REET, और Patwari जैसी परीक्षाओं में पाषाणकालीन बस्तियों और औजारों से जुड़े सवाल हर बार पूछे जाते हैं। तो चलिए, आज इस विषय के सबसे प्रामाणिक और परीक्षा-उपयोगी नोट्स को पढ़ते हैं और सीधे परीक्षा के अंक पक्के करते हैं! 📚👇
1️⃣ पुरापाषाण काल (Palaeolithic Age: 5,00,000 ई.पू. से 10,000 ई.पू.)
इस आदिम युग में मानव पूरी तरह शिकारी और खाद्य-संग्रहकर्ता था। उसे न तो घर बनाने का ज्ञान था और न ही कृषि या धातु गलाने का; वह पूरी तरह पत्थर के औजारों पर निर्भर था।
- ऐतिहासिक शुरुआत और खोज:
- राजस्थान में पाषाण काल का सबसे पहला साक्ष्य 1870 ई. में मिला, जब सी. ए. हैकेट ने जयपुर और इंद्रगढ़ (बूंदी) से पत्थर के हस्तकुठार (Handaxe) और क्लीवर (Cleaver) की खोज की। ये उपकरण आज भी कलकत्ता संग्रहालय में सुरक्षित हैं।
- इसके ठीक बाद, 1871 ई. में ए. सी. एल. कार्लाइल ने राजस्थान में पुरातात्त्विक सर्वेक्षण कार्य की कमान संभाली और दौसा क्षेत्र से पाषाण उपकरण खोज निकाले।
- 1908 ई. में सेटन कार ने झालावाड़ क्षेत्र से पाषाण युगीन औजार खोजे।
- भीलवाड़ा में बनास नदी के किनारे स्थित मंडपिया पुरास्थल की खोज का श्रेय डॉ. वी. एन. मिश्र को जाता है।
अध्ययन की सुविधा के लिए इस काल को तीन उप-भागों में विभाजित किया जाता है:
क) निम्न पुरापाषाण युग (5,00,000 ई.पू. – 50,000 ई.पू.):
- भौगोलिक विस्तार: इसके अधिकांश स्थल अरावली पर्वतमाला के पूर्वी भाग में पाए गए हैं।
- विशेषताएँ और औजार: इस काल के मानव को ‘एच्युलियन शिकारी संस्कृति’ का हिस्सा माना जाता है। यहाँ के मुख्य औजारों में हैंडएक्स, क्लीवर, चॉपर और शल्क (Flakes) प्रमुख थे।
- कच्चा माल: औजार बनाने के लिए क्वार्टजाइट, क्वार्ट्ज और बेसाल्ट पत्थरों का उपयोग होता था।
- प्रमुख स्थल: मंडपिया (भीलवाड़ा), बीगोद, देवली, नाथद्वारा, भैंसरोड़गढ़, नवाघाट, इंद्रगढ़ (बूंदी), विराटनगर (जयपुर), और गोगा खेड़ा (राजसमंद)।
ख) मध्य पुरापाषाण युग (50,000 ई.पू. – 20,000 ई.पू.):
- औजारों में बदलाव: इस युग में औजार पहले की तुलना में अधिक छोटे, पतले और हल्के हो गए थे, जिनमें ‘शल्क’ (Flakes) की प्रधानता थी।
- मुख्य औजार: साइड स्क्रैपर (पाश्र्व खुरचनी), एंड स्क्रैपर, प्वाइंट्स (बेधनी) और बोरर्स (बेधक)।
- कच्चा माल: इस काल में चर्ट, जैस्पर, एगेट और सिलिकामय चट्टानों का प्रयोग औजार बनाने में होने लगा था।
- प्रमुख स्थल: यह मुख्य रूप से अरावली के पश्चिमी भाग में विस्तृत था। इसमें लूनी नदी घाटी, पाली, जोधपुर, मोगरा, नागरी, बाररधानी, समदड़ी, धूंधाड़ा, श्रीकृष्णपुरा, गोतलयो, हंुडगाँव, भावी और पिचाक प्रमुख हैं।
ग) उच्च पुरापाषाण युग (20,000 ई.पू. – 10,000 ई.पू.):
- विशेषताएँ: इस काल के औजार अधिक परिष्कृत और मानकीकृत थे, जो मुख्यतः शल्क और ब्लेड से बने थे।
- अद्भुत खोज: राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के 40 से अधिक स्थलों पर शुतुरमुर्ग (Ostrich) के अंडों के छिलके मिले हैं। यह साबित करता है कि उस समय यहाँ की जलवायु बेहद शुष्क थी और यहाँ शुतुरमुर्ग बहुतायत में पाए जाते थे।
- शैल चित्रकला (Rock Art): मानव द्वारा कला का सबसे पहला रूप इसी काल में चट्टानों पर चित्रकारी (जैसे भीमबेटका) के रूप में सामने आया।
- प्रमुख स्थल: चित्तौड़गढ़, कोटा, चंबल नदी बेसिन, बनास तट पर हमीरगढ़ और जहाजपुर, देवली, गिलांड, लूनी नदी के तट पर पाली, समदड़ी, शिकारपुर, सोजत, पीपाड़, खींवसर और टोंक का भरनी क्षेत्र।
2️⃣ मध्यपाषाण काल (Mesolithic Age: 10,000 ई.पू. से 5,000 ई.पू.)
इस काल में जलवायु गर्म और आर्द्र हो जाने से वनस्पतियों और जीवों का तेजी से विस्तार हुआ। मानव केवल शिकारी न रहकर पशुपालक भी बनने लगा।
- लघुपाषाण उपकरण (Microliths): इस युग की सबसे बड़ी पहचान माइक्रोलिथ्स हैं। ये 1 से 5 सेमी आकार के बहुत छोटे और परिष्कृत (ज्यामितीय) पत्थर के उपकरण थे। इनमें बैक्ड ब्लेड, पॉइंट, क्रेसेंट (अर्धचंद्र), त्रिकोण और ट्रेपेज़ शामिल थे, जिनका उपयोग तीर, भाले या चाकू की नोक पर किया जाता था।
- पशुपालन और कृषि की शुरुआत: भारत में पशुपालन के सबसे पहले साक्ष्य इसी काल से मिलते हैं, जहाँ कुत्ता, मवेशी, भेड़ और बकरियों को पालतू बनाया गया था।
📍 राजस्थान के दो सबसे प्रमुख मध्यपाषाण कालीन स्थल:
1. बागोर (भीलवाड़ा) — “आदिम संस्कृति का संग्रहालय” 🏛️
- स्थिति: भीलवाड़ा जिले में कोठारी नदी के किनारे स्थित है। यह एक बड़े रेत के टीले के रूप में फैला है, जिसे स्थानीय रूप से ‘महासतियों का टीला’ कहा जाता है।
- उत्खनन: इस स्थल पर 1967 से 1970 ई. के बीच डॉ. वी. एन. मिश्र और डॉ. एल. एस. लेशनिक की देखरेख में व्यापक खुदाई की गई थी।
- ऐतिहासिक प्रमाण और महत्व:
- यह भारत का सबसे बड़ा और सबसे समृद्ध मध्यपाषाण कालीन स्थल माना जाता है।
- यहाँ से संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि और पशुपालन के सबसे प्राचीनतम साक्ष्य (लगभग 5000–4500 ई.पू. के मवेशी, भेड़-बकरी पालन) प्राप्त हुए हैं।
- इस स्थल से बहुतायत में लघु पाषाण उपकरण मिले हैं, जिसके कारण इसे “आदिम संस्कृति का संग्रहालय” कहा जाता है।
- मृतक संस्कार: यहाँ मृतकों को पूर्व-पश्चिम दिशा में दफनाने के प्रमाण मिले हैं, जिनके साथ भोजन सामग्री और मिट्टी के बर्तन भी रखे जाते थे। यह इस बात का संकेत है कि ये लोग मृत्यु के बाद जीवन की अवधारणा में विश्वास करते थे।
- यहाँ से तांबे के उपकरण (जैसे छेद वाली सुई) और बोतल के आकार के अनोखे बर्तन भी मिले हैं।
2. तिलवाड़ा (बालोतरा/बाड़मेर) 🏜️
- स्थिति: यह बालोतरा क्षेत्र में लूनी नदी के किनारे स्थित एक समृद्ध मध्यपाषाण स्थल है।
- उत्खनन: इसका उत्खनन 1967-68 ई. में वी. एन. मिश्र, विजय कुमार और एल. सी. लेशनिक के नेतृत्व में हुआ।
- प्राप्त साक्ष्य: यहाँ से प्राचीनतम पशुपालन के अवशेष, गोलाकार अग्निकुंड, मानव अस्थि भस्म और पाँच आवासीय बस्तियों के साक्ष्य मिले हैं।
3️⃣ नवपाषाण काल (Neolithic Age) का सच 🌾
- राजस्थान के संदर्भ में एक बेहद रोचक ऐतिहासिक तथ्य यह है कि यहाँ का आदिम मानव मध्यपाषाण काल से सीधे उत्तर पाषाणकाल (ताम्रपाषाण/लौह युग) में प्रवेश कर गया था।
- इस कारण राजस्थान में एक पृथक या विशिष्ट नवपाषाण कालीन बस्तियों के पूर्ण प्रमाण नहीं मिलते हैं। हालांकि, इसके कुछ आंशिक अवशेष हमीरगढ़ (भीलवाड़ा), विराटनगर (जयपुर), समदड़ी (बाड़मेर), आलनिया (कोटा) और भरनी (टोंक) जैसे स्थलों से प्राप्त हुए हैं।
🎯 परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण वन-लाइनर्स (Quick Exam Points):
- राजस्थान में सर्वप्रथम पाषाणकालीन हस्तकुठार किसने खोजा? सी. ए. हैकेट ने, 1870 में (जयपुर व इंद्रगढ़ से)।
- भारतीय उपमहाद्वीप में पशुपालन के सबसे प्राचीन साक्ष्य कहाँ मिले? बागोर (भीलवाड़ा)।
- ‘महासतियों का टीला’ और ‘आदिम संस्कृति का संग्रहालय’ किसे कहा जाता है? बागोर (भीलवाड़ा) को।
- शुतुरमुर्ग के अंडों के छिलके किस काल के मिले हैं? उच्च पुरापाषाण काल के।
- माइक्रोलिथ्स (Microliths) क्या हैं? मध्यपाषाण युग के छोटे और सूक्ष्म पत्थर के औजार।
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