Class 10 History Chapter 2 Nationalism in India
- Topic 1: Introduction & Impact of the First World War (प्रस्तावना और प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव) – नीचे सैंपल नोट्स में दिया गया है।
- Topic 2: Satyagraha & Rowlatt Act (सत्याग्रह और रौलट एक्ट – जलियांवाला बाग के साथ)
- Topic 3: Non-Cooperation Movement (असहयोग आंदोलन: कारण, चरण और समाज के अलग-अलग हिस्सों की भागीदारी)
- Topic 4: Towards Civil Disobedience & Salt March (सविनय अवज्ञा आंदोलन की ओर और दांडी यात्रा)
- Topic 5: Limits & Participant Perspectives of Civil Disobedience (सविनय अवज्ञा आंदोलन की सीमाएं और विभिन्न वर्गों का दृष्टिकोण)
- Topic 6: The Sense of Collective Belonging (सामूहिक अपनेपन का भाव – चित्र, लोककथाएं और इतिहास का पुनर्मूल्यांकन)
📝 Topic 1: Introduction & Impact of the First World War
(प्रस्तावना और प्रथम विश्व युद्ध का भारत पर आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव)
Format 1: Simple English Notes (For Exam Copies)
- Growth of Nationalism: Modern nationalism in India grew along with the anti-colonial movement. People found unity because they were all oppressed by the British rule.
- Role of Congress: Under the leadership of Mahatma Gandhi, the Congress tried to bring different social groups together under one big movement.
- New Economic and Political Situation (Due to First World War):
- Increase in Defence Expenditure: The war led to a huge increase in military spending. To pay for this, the British government took war loans and increased taxes.
- New Taxes: Customs duties (taxes on imports) were raised, and Income Tax was introduced in India for the first time.
- Rise in Prices: Between 1913 and 1918, prices of essential items doubled, causing extreme hardship for common people.
- Forced Recruitment: Villages were forced to supply soldiers for the British army, which caused widespread anger in rural areas.
- Crop Failure and Disease: In 1918-19 and 1920-21, crops failed in many parts of India, causing acute food shortages. This was followed by an influenza epidemic.
- Loss of Lives: According to the 1921 Census, about 12 to 13 million people died due to famines and the epidemic.
Format 2: देवनागरी मिक्स / Hinglish Notes (Class में समझाने के लिए)
- Nationalism (राष्ट्रवाद) का जन्म: इंडिया में मॉडर्न नेशनलिज्म (आधुनिक राष्ट्रवाद) का जन्म Anti-colonial movement (ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ाई) के दौरान हुआ था। अलग-अलग ग्रुप्स ब्रिटिश सरकार के अत्याचारों को सहते-सहते आपस में एकता महसूस करने लगे थे।
- Congress का रोल: Mahatma Gandhi के लीडरशिप में कांग्रेस ने इन सभी अलग-अलग ग्रुप्स को मिलाकर एक बड़ा नेशनल मूवमेंट बनाने की कोशिश की।
- First World War (प्रथम विश्व युद्ध: 1914-1918) का प्रभाव:
- Defence Expenditure (सैन्य खर्च) बढ़ा: युद्ध की वजह से ब्रिटिश सरकार का मिलिट्री खर्च बहुत बढ़ गया। इसे पूरा करने के लिए उन्होंने War Loans (युद्ध कर्ज) लिए और लोगों पर Taxes (कर) बढ़ा दिए।
- New Taxes (नए टैक्स) लागू हुए: Customs duties (सीमा शुल्क) बढ़ा दी गई और इंडिया में पहली बार Income Tax (आयकर) शुरू किया गया।
- Prices (कीमतें) डबल हो गईं: 1913 से 1918 के बीच जरूरी चीजों के दाम दोगुने हो गए, जिससे आम जनता की लाइफ बहुत मुश्किल हो गई।
- Forced Recruitment (जबरन भर्ती): गाँवों के नौजवानों को जबरदस्ती ब्रिटिश आर्मी में भर्ती किया गया, जिससे रूरल एरियाज (ग्रामीण इलाकों) में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बहुत गुस्सा फैल गया।
- Crops Fail (फसलें खराब) और महामारी: 1918-19 और 1920-21 में देश के कई हिस्सों में फसलें बर्बाद हो गईं, जिससे खाने की भारी कमी हो गई। साथ ही, Influenza Epidemic (एक बड़ी बीमारी) भी फैल गई।
- लाखों मौतें: 1921 की जनगणना (Census) के अनुसार, सूखे (famine) और महामारी के कारण लगभग 1.2 से 1.3 करोड़ लोग मारे गए।
Format 3: हिन्दी नोट्स (गहरी समझ के लिए)
- राष्ट्रवाद का उदय: भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद का उदय उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन (ब्रिटिश शासन के विरोध) के साथ जुड़ा हुआ है। विभिन्न समूहों ने औपनिवेशिक शासकों के दमन के खिलाफ लड़ाई के दौरान आपसी एकता को पहचाना।
- कांग्रेस का योगदान: महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने इन सभी अलग-अलग वर्गों और समूहों को एक साझा आंदोलन में पिरोने का प्रयास किया।
- प्रथम विश्व युद्ध का भारत पर प्रभाव (आर्थिक और राजनीतिक):
- रक्षा खर्च में भारी वृद्धि: युद्ध के कारण ब्रिटिश सरकार के सैन्य खर्च में भारी बढ़ोतरी हुई। इस खर्च को पूरा करने के लिए युद्ध ऋण लिए गए और करों में वृद्धि की गई।
- नए करों की शुरुआत: सीमा शुल्क (कस्टम ड्यूटी) बढ़ा दिया गया और देश में पहली बार आयकर (इन्कम टैक्स) लागू किया गया।
- महंगाई की मार: 1913 से 1918 के बीच आवश्यक वस्तुओं की कीमतें दोगुनी हो गईं, जिससे आम जनता का जीवन अत्यंत कष्टकारी हो गया।
- जबरन सैन्य भर्ती: ग्रामीण क्षेत्रों से जबरन लोगों को सेना में भर्ती किया गया, जिसके कारण ग्रामीणों में ब्रिटिश सरकार के प्रति गहरा आक्रोश व्याप्त था।
- फसल खराबी और महामारी: वर्ष 1918-19 और 1920-21 में देश के कई हिस्सों में फसलें नष्ट हो गईं, जिससे खाद्यान्न का गंभीर संकट पैदा हो गया। इसी दौरान इन्फ्लूएंजा नामक महामारी फैल गई।
- जनहानि: 1921 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, इस अकाल और महामारी के कारण लगभग 120 से 130 लाख (1.2 से 1.3 करोड़) लोग काल के गाल में समा गए।
📝 Topic 2: Satyagraha & Rowlatt Act (including Jallianwala Bagh)
(सत्याग्रह का विचार, रोलेट एक्ट, और जलियांवाला बाग हत्याकांड)
Format 1: Simple English Notes (For Exam Copies)
- The Idea of Satyagraha:
- Meaning: Mahatma Gandhi returned to India from South Africa in January 1915. He introduced a new method of mass agitation called Satyagraha.
- Core Principle: It was based on truth and non-violence. It suggested that if the cause is true and the struggle is against injustice, physical force is not needed to fight the oppressor. A satyagrahi can win the battle by appealing to the conscience of the oppressor.
- Early Satyagraha Movements by Gandhiji:
- 1917 (Champaran, Bihar): To help peasants struggle against the oppressive indigo plantation system.
- 1918 (Kheda, Gujarat): To support peasants who could not pay land revenue due to crop failure and a plague epidemic.
- 1918 (Ahmedabad, Gujarat): To support cotton mill workers.
- The Rowlatt Act (1919):
- What was it? This Act was hurriedly passed by the Imperial Legislative Council despite united opposition from Indian members.
- Repressive Powers: It gave the British government enormous powers to repress political activities and allowed them to detain political prisoners without trial for two years.
- The Protest: Gandhiji started a non-violent Civil Disobedience movement against this unjust law with a hartal on 6 April 1919. Rallies were organised, shops were closed, and railway workers went on strike.
- British Reaction: The British government clamped down on nationalists. Local leaders were arrested in Amritsar, and Gandhiji was barred from entering Delhi. On 10 April, police in Amritsar fired upon a peaceful procession, which led to attacks on banks, post offices, and railway stations. Martial Law was imposed, and General Dyer took command.
- The Jallianwalla Bagh Massacre (13 April 1919):
- The Gathering: A large crowd gathered in the enclosed ground of Jallianwalla Bagh in Amritsar. Some people came to protest against the government’s repressive policies, while many villagers came to attend the annual Baisakhi fair. They were unaware that Martial Law had been imposed in the city.
- The Incident: General Dyer entered the park, blocked all the narrow exit points, and ordered his troops to open fire on the peaceful crowd. Hundreds of innocent people were killed.
- Dyer’s Objective: Dyer later declared that his aim was to “produce a moral effect” and to create a feeling of terror and awe in the minds of satyagrahis.
- The Aftermath: This incident led to strikes, clashes with police, and attacks on government buildings in North Indian towns. The British responded with brutal repression: they forced satyagrahis to rub their noses on the ground, crawl on the streets, and do salaam to British officers. Villages were bombed and people were flogged.
- Calling off the Movement: Seeing widespread violence, Mahatma Gandhi called off the Rowlatt Satyagraha movement.
Format 2: देवनागरी मिक्स / Hinglish Notes (Class में समझाने के लिए)
- Satyagraha (सत्याग्रह) का Concept:
- Gandhiji की वापसी: महात्मा गांधी January 1915 में साउथ अफ्रीका से इंडिया वापस आए थे. वहाँ उन्होंने काले-गोरे के भेद (racist regime) के खिलाफ सफलतापूर्वक Satyagraha नाम का एक अनोखा आंदोलन चलाया था.
- सत्याग्रह का मतलब: इसका मुख्य फोकस सच्चाई की ताकत (power of truth) और सत्य की खोज पर था. गांधीजी का मानना था कि अगर आपका रास्ता सच्चा है और आप नाइंसाफी (injustice) के खिलाफ लड़ रहे हैं, तो दुश्मन से लड़ने के लिए शारीरिक ताकत (physical force) की कोई जरूरत नहीं है. बिना किसी हिंसा या गुस्से के, एक सत्याग्रही केवल अहिंसा (non-violence) के रास्ते पर चलकर oppressor (अत्याचारी) की अंतरात्मा (conscience) को जगाकर जीत हासिल कर सकता है.
- शुरुआती Satyagrahas (1917-1918):
- 1917 (Champaran, Bihar): यहाँ किसानों को नील के बागान मालिकों (oppressive plantation system) के खिलाफ लड़ने की हिम्मत दी.
- 1918 (Kheda, Gujarat): फसल खराब होने और प्लेग महामारी (plague epidemic) के कारण किसान टैक्स नहीं दे पा रहे थे, उनके टैक्स माफी के लिए सत्याग्रह किया.
- 1918 (Ahmedabad, Gujarat): यहाँ सूती कपड़ा मिल के मजदूरों (cotton mill workers) के हक के लिए आंदोलन किया.
- Rowlatt Act (रोलेट एक्ट – 1919):
- यह क्या था? इस कानून को इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ने भारतीय सदस्यों के भारी विरोध के बावजूद बहुत जल्दबाजी में पास किया था.
- सरकार को मिली असीमित ताकत: इस काले कानून के तहत ब्रिटिश सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को कुचलने की पूरी छूट मिल गई. सबसे खतरनाक बात यह थी कि सरकार बिना कोई मुकदमा (trial) चलाए किसी भी राजनीतिक कैदी को 2 साल तक जेल में बंद रख सकती थी.
- देशव्यापी विरोध: गांधीजी ने इस अन्यायपूर्ण कानून के खिलाफ अहिंसक विरोध शुरू किया, जिसकी शुरुआत 6 April 1919 को एक देशव्यापी हड़ताल (Hartal) से हुई. रैलियां निकाली गईं, दुकानें बंद हो गईं और रेलवे वर्कशॉप्स के कर्मचारी हड़ताल पर चले गए.
- ब्रिटिश सरकार का एक्शन: सरकार ने आंदोलनकारियों का दमन शुरू कर दिया. अमृतसर के स्थानीय नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और गांधीजी के दिल्ली आने पर रोक लगा दी गई. 10 April को अमृतसर में पुलिस ने एक शांत जुलूस पर गोलियां चला दीं, जिससे गुस्साए लोगों ने बैंकों, डाकघरों और रेलवे स्टेशनों पर हमले शुरू कर दिए. इसके बाद शहर में Martial Law (सैन्य कानून) लागू कर दिया गया और कमांड General Dyer को सौंप दी गई.
- Jallianwalla Bagh Massacre (जलियांवाला बाग हत्याकांड – 13 April 1919):
- भीड़ क्यों जुटी थी? 13 अप्रैल को अमृतसर के जलियांवाला बाग के बंद मैदान में एक बहुत बड़ी भीड़ जमा हुई थी. कुछ लोग सरकारी दमन का विरोध करने आए थे, तो कुछ ग्रामीण पास के वैसाखी मेले (Baisakhi fair) में शामिल होने आए थे. शहर के बाहर से आए इन ग्रामीणों को यह पता नहीं था कि शहर में मार्शल लॉ लागू है.
- वह भयानक घटना: जनरल डायर अपनी सेना के साथ वहाँ पहुँचा. उसने मैदान के बाहर जाने वाले सभी संकरे रास्तों (exit points) को बंद कर दिया और निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां चलाने का आदेश दे दिया. इस गोलीबारी में सैकड़ों मासूम लोग मारे गए.
- डायर का मकसद: डायर ने बाद में बयान दिया कि उसका मकसद सत्याग्रहियों के दिलों में डर और खौफ पैदा करके एक “moral effect” (नैतिक प्रभाव) पैदा करना था.
- हिंसा और दमन: जलियांवाला बाग की खबर फैलते ही उत्तर भारत के शहरों में लोग सड़कों पर उतर आए, पुलिस से झड़पें हुईं और सरकारी इमारतों पर हमले किए गए. ब्रिटिश सरकार ने बेहद क्रूरता से आंदोलन को दबाया: सत्याग्रहियों को जमीन पर नाक रगड़ने, सड़कों पर रेंगने (crawling) और ब्रिटिश अधिकारियों को सलाम करने के लिए मजबूर किया गया. लोगों पर कोड़े बरसाए गए और पंजाब के गाँवों पर बम गिराए गए.
- आंदोलन वापस लेना: हिंसा को चारों तरफ बढ़ता देख महात्मा गांधी ने इस आंदोलन (Rowlatt Satyagraha) को वापस ले लिया.
Format 3: हिन्दी नोट्स (गहरी समझ के लिए)
- सत्याग्रह का विचार:
- पृष्ठभूमि: महात्मा गांधी जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने नस्लभेदी शासन के खिलाफ एक नए तरह के जन-आंदोलन का सफल नेतृत्व किया था, जिसे उन्होंने ‘सत्याग्रह’ नाम दिया।
- मूल सिद्धांत: सत्याग्रह के विचार में सत्य की शक्ति पर आग्रह और सत्य की खोज पर जोर दिया जाता था। इसका अर्थ यह था कि यदि आपका उद्देश्य सच्चा है और आपका संघर्ष अन्याय के खिलाफ है, तो दमनकारी से लड़ने के लिए आपको किसी शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है। एक सत्याग्रही बिना प्रतिशोध की भावना या आक्रामकता के, केवल अहिंसा के माध्यम से युद्ध जीत सकता है। इसके लिए अत्याचारी की अंतरात्मा को झकझोरना आवश्यक था। गांधीजी का विश्वास था कि अहिंसा का यह धर्म सभी भारतीयों को एकता के सूत्र में बांध सकता है।
- आरंभिक सत्याग्रह आंदोलन:
- 1917 (चंपारण, बिहार): दमनकारी नील बगान व्यवस्था (plantation system) के खिलाफ किसानों को संघर्ष के लिए प्रेरित किया।
- 1918 (खेड़ा, गुजरात): फसल खराब होने और प्लेग की महामारी के कारण किसान लगान चुकाने की स्थिति में नहीं थे। उन्होंने लगान वसूली में ढील देने की मांग को लेकर सत्याग्रह किया।
- 1918 (अहमदाबाद, गुजरात): सूती कपड़ा मिल के मजदूरों के समर्थन में सत्याग्रह आंदोलन का आयोजन किया।
- रोलेट एक्ट (1919):
- अधिनियम का स्वरूप: इस कानून को भारतीय सदस्यों के भारी विरोध के बावजूद ‘इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल’ द्वारा बहुत जल्दबाजी में पारित किया गया था।
- दमनकारी प्रावधान: इस कानून के माध्यम से सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को कुचलने के लिए असीमित अधिकार मिल गए। इसके तहत बिना किसी मुकदमे के राजनीतिक कैदियों को दो साल तक जेल में बंद रखने का प्रावधान था।
- सत्याग्रह आंदोलन: गांधीजी ने इस अन्यायपूर्ण कानून के खिलाफ अहिंसक सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का फैसला किया, जिसका प्रारंभ 6 अप्रैल 1919 को एक देशव्यापी हड़ताल से हुआ। विभिन्न शहरों में रैलियां निकाली गईं, रेलवे कार्यशालाओं में हड़ताल हुई और दुकानें पूरी तरह बंद हो गईं।
- ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया: इस जन-उभार से घबराकर ब्रिटिश प्रशासन ने राष्ट्रवादियों का दमन शुरू कर दिया। अमृतसर से स्थानीय नेताओं को हिरासत में ले लिया गया और गांधीजी के दिल्ली प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया। 10 अप्रैल को अमृतसर में पुलिस ने एक शांतिपूर्ण जुलूस पर गोली चलाई, जिसके बाद बैंकों, डाकघरों और रेलवे स्टेशनों पर हिंसक हमले शुरू हो गए। स्थिति बिगड़ने पर अमृतसर में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया और कमान जनरल डायर के हाथों में सौंप दी गई।
- जलियांवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919):
- घटना की पृष्ठभूमि: 13 अप्रैल को अमृतसर के जलियांवाला बाग मैदान में एक विशाल भीड़ एकत्रित हुई थी। इनमें से कुछ लोग सरकार के नए दमनकारी उपायों का विरोध करने आए थे, जबकि बहुत से ग्रामीण वार्षिक बैसाखी मेले में भाग लेने आए थे। शहर से बाहर के होने के कारण इन ग्रामीणों को यह ज्ञात नहीं था कि क्षेत्र में मार्शल लॉ लागू है।
- हत्याकांड: जनरल डायर अपनी सशस्त्र सेना के साथ मैदान में घुसा। उसने बाहर निकलने के सभी संकरे रास्तों को बंद कर दिया और शांत भीड़ पर अंधाधुंध गोलीबारी का आदेश दे दिया। इस भीषण नरसंहार में सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गए।
- डायर का उद्देश्य: डायर ने बाद में घोषित किया कि उसका उद्देश्य सत्याग्रहियों के मन में आतंक और विस्मय की भावना पैदा करके एक ‘नैतिक प्रभाव’ (moral effect) उत्पन्न करना था।
- देशव्यापी प्रतिक्रिया: जलियांवाला बाग की खबर फैलते ही उत्तर भारत के कई शहरों में लोग सड़कों पर उतर आए। हड़तालें हुईं, पुलिस के साथ हिंसक झड़पें हुईं और सरकारी इमारतों पर हमले किए गए।
- बर्बर दमन: ब्रिटिश सरकार ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए अत्यंत क्रूर रुख अपनाया। सत्याग्रहियों को जमीन पर नाक रगड़ने, सड़कों पर रेंगकर चलने और सभी अंग्रेज अधिकारियों (साहबों) को सलाम करने के लिए मजबूर किया गया। लोगों को कोड़े मारे गए और पंजाब के गाँवों पर बमबारी की गई।
- आंदोलन की समाप्ति: चारों तरफ फैली हिंसा को देखकर महात्मा गांधी ने तुरंत रोलेट सत्याग्रह आंदोलन को वापस ले लिया।
📝 Topic 3: Non-Cooperation Movement (असहयोग आंदोलन)
(असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि, चरण, देश के अलग-अलग हिस्सों में इसकी भागीदारी और आंदोलन की समाप्ति)
Format 1: Simple English Notes (For Exam Copies)
- Why Non-Cooperation?
- Gandhiji’s Philosophy: In his famous book Hind Swaraj (1909), Mahatma Gandhi declared that British rule was established in India with the cooperation of Indians. If Indians refused to cooperate, British rule would collapse within a year, and Swaraj would come.
- Proposed Stages of the Movement: Gandhiji proposed that the movement should unfold in stages:
- Surrender of titles awarded by the government.
- Boycott of civil services, army, police, courts, legislative councils, schools, and foreign goods.
- In case of government repression, a full Civil Disobedience campaign would be launched.
- Adoption of the Programme: Although there was a struggle within the Congress regarding council elections, the Non-Cooperation programme was finally adopted at the Nagpur Congress session in December 1920. The Non-Cooperation-Khilafat Movement began in January 1921.
- Differing Strands (Participation in different areas):
- 1. The Movement in the Towns (Cities):
- Middle-Class Participation: Thousands of students left government schools, headmasters and teachers resigned, and lawyers gave up their practice.
- Council Boycott: Elections were boycotted in most provinces except Madras, where the Justice Party (non-Brahmans) participated to gain some political power.
- Economic Impact: Foreign goods were boycotted, liquor shops were picketed, and foreign cloth was burnt in bonfires. The import of foreign cloth halved between 1921 and 1922 (value dropped from Rs 102 crore to Rs 57 crore). Production of Indian textile mills and handlooms went up.
- Why it Slowed Down: Khadi cloth was too expensive for the poor compared to cheap mill cloth. Also, alternative Indian institutions were slow to come up, so students, teachers, and lawyers gradually went back to government institutions.
- 2. Rebellion in the Countryside (Rural Areas):
- Awadh Peasants (Led by Baba Ramchandra – a sanyasi):
- Grievances: The movement was against talukdars and landlords who demanded high rents and forced peasants to do begar (unpaid forced labour). Peasants had no security of tenure.
- Demands: Reduction of revenue, abolition of begar, and social boycott of oppressive landlords (like nai-dhobi bandhs).
- Oudh Kisan Sabha: Set up in October 1920, headed by Jawaharlal Nehru and Baba Ramchandra. It had over 300 branches.
- Violence: In 1921, the peasant movement turned violent. Houses of talukdars were attacked, bazaars were looted, and Gandhiji’s name was used to justify not paying taxes.
- Tribal Peasants in Gudem Hills (Andhra Pradesh):
- Grievances: The British government closed forest areas, preventing tribals from grazing cattle or collecting fuelwood and fruits. This ruined their livelihoods.
- Leadership of Alluri Sitaram Raju: Raju claimed to have special powers (astrological predictions, healing, and surviving bullet shots). He was inspired by Gandhiji, wore khadi, and gave up drinking.
- Method: Unlike Gandhiji, Raju believed India could be liberated only by using force (violence), not non-violence. Gudem rebels attacked police stations and carried on guerrilla warfare. Raju was captured and executed in 1924.
- Awadh Peasants (Led by Baba Ramchandra – a sanyasi):
- 3. Swaraj in the Plantations (Assam):
- For Assam tea garden workers, freedom meant the right to move freely and maintain contact with their home villages.
- Under the Inland Emigration Act of 1859, they were not allowed to leave the tea gardens without permission, which was rarely given.
- Hearing of Non-Cooperation, thousands of workers defied the rules, left the plantations, and headed home.
- The Result: They were stranded due to railway and steamer strikes, caught by the police, and brutally beaten up.
- 1. The Movement in the Towns (Cities):
- Calling off the Movement (February 1922):
- In February 1922, Mahatma Gandhi decided to withdraw the Non-Cooperation Movement.
- Reason: The movement was turning violent in many places. The immediate cause was the Chauri Chaura incident (Gorakhpur), where a peaceful demonstration turned into a violent clash with the police. Gandhiji felt satyagrahis needed proper training before mass struggles.
Format 2: देवनागरी मिक्स / Hinglish Notes (Class में समझाने के लिए)
- Non-Cooperation (असहयोग) क्यों?
- गांधीजी की बुक ‘Hind Swaraj’ (1909): गांधीजी का मानना था कि भारत में ब्रिटिश राज केवल इसलिए स्थापित हो सका क्योंकि इंडियंस ने उनके साथ सहयोग (cooperate) किया. अगर भारतीय सहयोग करना बंद कर दें, तो अंग्रेजी सरकार 1 साल के अंदर गिर जाएगी और हमें स्वराज मिल जाएगा.
- मूवमेंट के Stages (चरण): गांधीजी ने सुझाव दिया कि आंदोलन को स्टेज-बाय-स्टेज आगे बढ़ना चाहिए:
- सरकार द्वारा दी गई Titles (पदवियों) को वापस करना.
- सिविल सर्विसेज, आर्मी, पुलिस, अदालतों, विधायी परिषदों (legislative councils), स्कूलों और विदेशी सामानों का Boycott (बहिष्कार) करना.
- अगर सरकार दमन करती है, तो एक फुल Civil Disobedience (सविनय अवज्ञा) आंदोलन शुरू किया जाएगा.
- आंदोलन की शुरुआत: कांग्रेस के भीतर थोड़ा विरोध था, लेकिन आखिरकार December 1920 के नागपुर अधिवेशन (Nagpur Congress session) में असहयोग कार्यक्रम को मंजूरी मिल गई. January 1921 में ‘असहयोग-खिलाफत आंदोलन’ की शुरुआत हुई.
- Differing Strands (समाज के अलग-अलग हिस्सों की भागीदारी):
- 1. शहरों में आंदोलन (Movement in Towns):
- मिडिल क्लास का योगदान: हजारों स्टूडेंट्स ने सरकारी स्कूल-कॉलेज छोड़ दिए, प्रिंसिपल्स और टीचर्स ने इस्तीफे दे दिए और वकीलों ने कोर्ट जाना बंद कर दिया.
- इलेक्शन का बॉयकॉट: काउंसिल इलेक्शन्स का बहिष्कार किया गया, केवल मद्रास की Justice Party (जो गैर-ब्राह्मणों की पार्टी थी) ने चुनाव लड़ा क्योंकि वे इसके जरिए कुछ पावर हासिल करना चाहते थे.
- आर्थिक मोर्चे पर असर: विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई और शराब की दुकानों की Picketing (नाकेबंदी) की गई. 1921 से 1922 के बीच विदेशी कपड़ों का इम्पोर्ट आधा हो गया (वैल्यू 102 करोड़ रुपये से घटकर 57 करोड़ रुपये रह गई). इससे भारतीय कपड़ा मिलों और हथकरघा (handlooms) का प्रोडक्शन बहुत बढ़ गया.
- शहरों में आंदोलन धीमा क्यों पड़ा? Khadi (खादी का कपड़ा) मिलों में बनने वाले साधारण कपड़ों की तुलना में बहुत महंगा था, जिसे गरीब लोग लंबे समय तक नहीं खरीद सकते थे. साथ ही, ब्रिटिश संस्थानों के बदले कोई वैकल्पिक भारतीय संस्थान (Indian institutions) जल्दी तैयार नहीं हो पाए, इसलिए स्टूडेंट्स, टीचर्स और वकील धीरे-धीरे वापस सरकारी काम पर लौटने लगे.
- 2. देहात/गाँवों में विद्रोह (Rebellion in the Countryside):
- अवध के किसान (Leader: बाबा रामचंद्र – एक संन्यासी):
- दिक्कतें: यहाँ आंदोलन तालुकदारों और जमींदारों के खिलाफ था, जो बहुत ज्यादा लगान (high rents) मांगते थे और किसानों से बिना पैसे दिए Begar (बेगार/जबरन मजदूरी) कराते थे. किसानों को जमीन से कभी भी बेदखल (evict) कर दिया जाता था ताकि वे जमीन पर अपना अधिकार न जता सकें.
- मांग: लगान कम हो, बेगार खत्म हो और दमनकारी जमींदारों का सामाजिक बहिष्कार किया जाए (जैसे पंचायतों द्वारा नाई-धोबी बंद का फैसला).
- अवध किसान सभा: October 1920 में जवाहरलाल नेहरू और बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में इसका गठन हुआ, जिसकी जल्द ही 300 से ज्यादा शाखाएं खुल गईं.
- हिंसा का रूप: 1921 में आंदोलन हिंसक हो गया। तालुकदारों के घरों पर हमले हुए, बाजारों को लूटा गया और स्थानीय नेताओं ने गांधीजी के नाम का इस्तेमाल करके कहा कि अब कोई टैक्स नहीं देना है और जमीन गरीबों में बांटी जाएगी.
- आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियों के आदिवासी:
- दिक्कतें: ब्रिटिश सरकार ने आदिवासियों को जंगलों में जाने, मवेशी चराने, और सूखी लकड़ियाँ या फल इकट्ठा करने पर बैन लगा दिया था. इससे उनकी आजीविका छिन गई. जब सरकार ने उनसे सड़क बनाने के लिए ‘बेगार’ करने को कहा, तो उन्होंने बगावत कर दी.
- Alluri Sitaram Raju का रोल: अल्लूरी सीताराम राजू एक दिलचस्प नेता थे। उनका दावा था कि उनके पास चमत्कारी शक्तियां हैं (जैसे सटीक भविष्यवाणी करना, बीमारों को ठीक करना और गोली लगने पर भी बच जाना). लोग उन्हें भगवान का अवतार मानते थे. राजू गांधीजी से बहुत प्रभावित थे, उन्होंने लोगों को खादी पहनने और शराब छोड़ने की सलाह दी.
- अलग विचार: लेकिन राजू का मानना था कि भारत केवल बल प्रयोग (force/violence) से ही आजाद हो सकता है, अहिंसा से नहीं. गुडेम के विद्रोहियों ने पुलिस स्टेशनों पर हमले किए और गुरिल्ला युद्ध (guerrilla warfare) चलाया. राजू को 1924 में पकड़कर फांसी दे दी गई.
- अवध के किसान (Leader: बाबा रामचंद्र – एक संन्यासी):
- 3. बागानों में स्वराज (Swaraj in Assam Plantations):
- असम के चाय बागानों के मजदूरों के लिए स्वराज का मतलब था कि वे बिना रोक-टोक के बागानों से बाहर आ-जा सकें और अपने गाँव से जुड़े रह सकें.
- Inland Emigration Act of 1859 (इन्लैंड इमिग्रेशन एक्ट): इस कानून के तहत बागान मजदूरों को बिना अनुमति के बागान छोड़ने की इजाजत नहीं थी, और ऐसी इजाजत उन्हें शायद ही कभी मिलती थी.
- असहयोग आंदोलन की खबर सुनकर हजारों मजदूरों ने अधिकारियों की बात मानने से इनकार कर दिया, बागान छोड़ दिए और अपने घर की तरफ चल दिए.
- नतीजा: रेलवे और स्टीमर की हड़ताल के कारण वे रास्ते में ही फंस गए। पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और बुरी तरह पीटा.
- 1. शहरों में आंदोलन (Movement in Towns):
- आंदोलन वापस लेना (Calling off the Movement):
- February 1922 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया.
- कारण: आंदोलन कई जगहों पर हिंसक होने लगा था. गोरखपुर के Chauri Chaura (चौरी-चौरा) में एक शांतिपूर्ण जुलूस का पुलिस के साथ हिंसक टकराव हो गया, जिसमें प्रदर्शनकारियों ने पुलिस स्टेशन में आग लगा दी. गांधीजी ने महसूस किया कि सत्याग्रहियों को अभी और ट्रेनिंग की जरूरत है.
Format 3: हिन्दी नोट्स (गहरी समझ के लिए)
- असहयोग ही क्यों?
- वैचारिक पृष्ठभूमि: महात्मा गांधी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ (1909) में घोषणा की थी कि भारत में ब्रिटिश शासन केवल इसलिए स्थापित हो सका क्योंकि भारतीयों ने उनके साथ सहयोग किया था। यदि भारतीय अपना सहयोग वापस ले लें, तो भारत में ब्रिटिश शासन एक वर्ष के भीतर ढह जाएगा और ‘स्वराज’ की स्थापना हो जाएगी।
- आंदोलन के प्रस्तावित चरण: गांधीजी का प्रस्ताव था कि यह आंदोलन चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ना चाहिए:
- प्रथम चरण में सरकार द्वारा दी गई मानद उपाधियों (titles) को लौटाया जाए।
- द्वितीय चरण में सरकारी नौकरियों, सेना, पुलिस, अदालतों, विधायी परिषदों, स्कूलों तथा विदेशी वस्तुओं का पूर्ण बहिष्कार (boycott) किया जाए।
- यदि सरकार द्वारा इस आंदोलन को दबाने के लिए दमनकारी नीति अपनाई जाती है, तो देशव्यापी सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया जाए।
- स्वीकृति: कांग्रेस के भीतर परिषदीय चुनावों में भाग लेने को लेकर मतभेद थे, लेकिन अंततः दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन में इस असहयोग कार्यक्रम को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया। जनवरी 1921 में ‘असहयोग-खिलाफत आंदोलन’ की औपचारिक शुरुआत हुई।
- आंदोलन के भीतर अलग-अलग धाराएं (विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी):
- 1. शहरों में आंदोलन:
- मध्यम वर्ग की भागीदारी: शहरों में आंदोलन की शुरुआत मध्यम वर्ग की सक्रिय भागीदारी से हुई। हजारों छात्रों ने सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को छोड़ दिया, प्रधानाध्यापकों और शिक्षकों ने इस्तीफे दे दिए, और प्रख्यात वकीलों ने अपनी वकालत छोड़ दी।
- चुनावों का बहिष्कार: अधिकांश प्रांतों में परिषद चुनावों का बहिष्कार किया गया, सिवाय मद्रास के, जहाँ गैर-ब्राह्मणों की पार्टी ‘जस्टिस पार्टी’ ने चुनावों में भाग लिया। उनका मानना था कि काउंसिल में प्रवेश करके वे कुछ अधिकार प्राप्त कर सकते हैं, जो सामान्यतः केवल ब्राह्मणों के पास थे।
- आर्थिक प्रभाव: विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया, शराब की दुकानों की नाकेबंदी (picket) की गई, और विदेशी कपड़ों की सार्वजनिक रूप से होली जलाई गई। 1921 से 1922 के बीच विदेशी कपड़ों का आयात घटकर आधा रह गया और इसका मूल्य 102 करोड़ रुपये से घटकर केवल 57 करोड़ रुपये रह गया। व्यापारियों ने विदेशी व्यापार में पूंजी लगाने से इनकार कर दिया, जिससे भारतीय कपड़ा मिलों और हथकरघा उद्योग के उत्पादन को भारी बढ़ावा मिला।
- धीमे पड़ने के कारण: मिलों में मशीनों से बने सस्ते कपड़ों की तुलना में खादी का कपड़ा अत्यधिक महंगा था, जिसे गरीब जनता लंबे समय तक नहीं खरीद सकती थी। इसके अतिरिक्त, ब्रिटिश संस्थानों के स्थान पर वैकल्पिक भारतीय शिक्षण संस्थानों की स्थापना की गति अत्यंत धीमी थी, जिसके कारण अंततः छात्र, शिक्षक और वकील पुनः अपने पुराने सरकारी कामों पर लौटने लगे।
- 2. ग्रामीण इलाकों में विद्रोह:
- अवध के किसान (नेतृत्व: बाबा रामचंद्र – एक गिरमिटिया मजदूर रह चुके संन्यासी):
- मुख्य कारण: यह आंदोलन उन तालुकदारों और जमींदारों के खिलाफ था जो किसानों से अत्यधिक लगान वसूलते थे और बिना भुगतान के बेगार (जबरन श्रम) करवाते थे। पट्टेदारों (tenants) के रूप में किसानों का कोई निश्चित कार्यकाल नहीं था और उन्हें भूमि से बार-बार बेदखल किया जाता था।
- मांगें: राजस्व (लगान) में कमी की जाए, बेगार प्रथा का उन्मूलन हो, और दमनकारी जमींदारों का सामाजिक बहिष्कार किया जाए (जैसे पंचायतों द्वारा आयोजित नाई-धोबी बंद)।
- अवध किसान सभा का गठन: जून 1920 में जवाहरलाल नेहरू ने अवध के गाँवों का दौरा किया। अक्टूबर 1920 तक नेहरू जी और बाबा रामचंद्र के नेतृत्व में ‘अवध किसान सभा’ का गठन किया गया, जिसकी अल्प समय में ही 300 से अधिक शाखाएं स्थापित हो गईं।
- हिंसक मोड़: 1921 में आंदोलन हिंसक हो गया; तालुकदारों के मकानों पर हमले हुए, बाजारों में लूटपाट की गई, और खाद्यान्न के भंडारों पर कब्जा कर लिया गया। स्थानीय नेताओं ने गांधीजी के नाम का सहारा लेकर करों का भुगतान न करने और भूमि के पुनर्वितरण की घोषणाएं कीं।
- आंध्र प्रदेश की गुडेम पहाड़ियों के आदिवासी (गुरिल्ला आंदोलन):
- विद्रोह का कारण: औपनिवेशिक सरकार ने बड़े वन क्षेत्रों को आरक्षित घोषित कर बंद कर दिया था, जिससे आदिवासी न तो पशु चरा सकते थे और न ही ईंधन के लिए लकड़ी या फल ला सकते थे। जब सरकार ने उन्हें सड़क निर्माण के लिए बेगार करने को मजबूर किया, तो आदिवासियों ने विद्रोह कर दिया।
- अल्लूरी सीताराम राजू का करिश्माई नेतृत्व: राजू का दावा था कि उनके पास विशेष शक्तियां हैं, वे सटीक ज्योतिषीय भविष्यवाणी कर सकते हैं, लोगों को ठीक कर सकते हैं और गोलियों से भी बच सकते हैं। लोगों उन्हें ईश्वर का अवतार मानते थे। राजू गांधीजी के विचारों से प्रेरित थे, उन्होंने लोगों को खादी पहनने और मदिरा त्यागने के लिए प्रेरित किया।
- हिंसा का समर्थन: परंतु गांधीजी के विपरीत, राजू का मानना था कि भारत केवल बल प्रयोग (हिंसा) द्वारा ही स्वतंत्र हो सकता है, अहिंसा से नहीं। विद्रोहियों ने थानों पर हमले किए और अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध जारी रखा। राजू को 1924 में बंदी बनाकर मृत्युदंड दे दिया गया।
- अवध के किसान (नेतृत्व: बाबा रामचंद्र – एक गिरमिटिया मजदूर रह चुके संन्यासी):
- 3. बागान श्रमिकों के लिए ‘स्वराज’ (असम):
- असम के चाय बागानों के श्रमिकों के लिए स्वतंत्रता का अर्थ था कि वे अपनी मर्जी से उन चारदीवारियों से बाहर आ-जा सकें जिनमें उन्हें बंद रखा गया था, और अपने गाँवों से संपर्क बनाए रख सकें।
- 1859 का इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट (Inland Emigration Act): इस दमनकारी कानून के तहत बागान श्रमिकों को बिना अनुमति के बागान छोड़ने की मनाही थी, और ऐसी अनुमति शायद ही कभी मिलती थी।
- जब इन श्रमिकों ने असहयोग आंदोलन के बारे में सुना, तो हजारों की संख्या में उन्होंने नियमों की अवहेलना की, बागान छोड़ दिए और अपने घरों की ओर चल पड़े।
- त्रासद अंत: रेलवे और स्टीमरों की हड़ताल के कारण वे मार्ग में ही फंस गए। पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और क्रूरतापूर्वक उनकी पिटाई की।
- 1. शहरों में आंदोलन:
- आंदोलन की वापसी (फरवरी 1922):
- फरवरी 1922 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन को वापस लेने का निर्णय लिया।
- कारण: गांधीजी ने देखा कि कई स्थानों पर आंदोलन हिंसक होता जा रहा था और सत्याग्रहियों को जन-संघर्षों के लिए उचित प्रशिक्षण की आवश्यकता थी। इसका प्रमुख तात्कालिक कारण चौरी-चौरा (गोरखपुर) की घटना थी, जहाँ बाजार में एक शांतिपूर्ण जुलूस पुलिस के साथ हिंसक झड़प में बदल गया और उत्तेजित भीड़ ने पुलिस थाने में आग लगा दी, जिससे कई पुलिसकर्मी मारे गए।
📝 Topic 4: Towards Civil Disobedience & Salt March
(सविनय अवज्ञा आंदोलन की ओर और दांडी यात्रा)
Format 1: Simple English Notes (For Exam Copies)
- Background (After February 1922):
- Swaraj Party: Some Congress leaders like C. R. Das and Motilal Nehru wanted to enter provincial councils (elections) to oppose British policies from within the government. They formed the Swaraj Party in 1922 to argue for council politics.
- Radical Leaders: Younger leaders like Jawaharlal Nehru and Subhas Chandra Bose pressed for more intense mass struggles and full independence.
- Two Factors that Shaped Indian Politics (Late 1920s):
- 1. Economic Depression (1926-1930): Agricultural prices began falling from 1926 and collapsed after 1930. Peasants found it impossible to sell their crops or pay taxes, causing extreme trouble in the countryside.
- 2. Simon Commission (1928):
- The new British government set up a commission under Sir John Simon to look into India’s constitutional system and suggest changes.
- The Problem: There was no Indian member in this commission; they were all British.
- Protest: When it arrived in India in 1928, it was boycotted with the slogan “Go back Simon” by all political parties.
- Tragedy: Nationalist leader Lala Lajpat Rai was assaulted by British police during a peaceful protest and died from his injuries.
- The Demand for Purna Swaraj (1929):
- In December 1929, under the presidency of Jawaharlal Nehru, the Lahore Congress session formalised the demand for ‘Purna Swaraj’ (Full Independence).
- They declared 26 January 1930 as Independence Day, where people would take a pledge to fight for complete freedom.
- The Salt March (Dandi March):
- Why Salt? Mahatma Gandhi chose salt as a powerful symbol of unity because it was consumed by both the rich and the poor. Salt tax and government monopoly over its production was the most oppressive face of British rule.
- The Ultimatum: On 31 January 1930, Gandhiji wrote a letter to Viceroy Irwin with 11 demands. He warned that if these demands were not met by 11 March, the Congress would start a Civil Disobedience movement. Irwin refused to negotiate.
- The Journey: Gandhiji started his famous salt march with 78 trusted volunteers.
- Distance and Duration: The march was 240 miles long, from Gandhiji’s Sabarmati Ashram to the coastal town of Dandi. They walked for 24 days (about 10 miles a day).
- Breaking the Law: On 6 April 1930, Gandhiji reached Dandi and broke the salt law by boiling sea water to manufacture salt. This marked the beginning of the Civil Disobedience Movement.
- Difference between Non-Cooperation and Civil Disobedience:
- During Non-Cooperation (1921-22), people only refused to cooperate with the British.
- During Civil Disobedience (1930), people were asked not only to refuse cooperation but also to break colonial laws.
Format 2: देवनागरी मिक्स / Hinglish Notes (Class में समझाने के लिए)
- असहयोग के बाद का बैकग्राउंड (1922 के बाद का समय):
- Swaraj Party की स्थापना: जब असहयोग आंदोलन वापस हुआ, तो C.R. Das और Motilal Nehru जैसे कांग्रेस लीडर्स जन-आंदोलनों से थक चुके थे. वे 1919 के एक्ट के तहत परिषदों (provincial councils) के इलेक्शन में हिस्सा लेकर अंदर रहकर ब्रिटिश नीतियों का विरोध करना चाहते थे. इसलिए उन्होंने कांग्रेस के भीतर ही Swaraj Party बनाई.
- यंग लीडर्स: Jawaharlal Nehru और Subhas Chandra Bose जैसे युवा लीडर्स देश के लिए Full Independence (पूर्ण स्वराज) और बड़े आंदोलनों के पक्ष में थे.
- दो बडे़ फैक्टर्स जिन्होंने इंडियन पॉलिटिक्स को बदला (1920s के अंत में):
- 1. Worldwide Economic Depression (आर्थिक मंदी): 1926 से फसलों की कीमतें गिरने लगीं और 1930 के बाद पूरी तरह क्रैश हो गईं. किसानों की फसल बिक नहीं रही थी और वे टैक्स (revenue) नहीं दे पा रहे थे, जिससे गाँवों में उथल-पुथल मच गई.
- 2. Simon Commission (साइमन कमीशन):
- ब्रिटेन की ब्रिटिश सरकार ने भारत के संवैधानिक सिस्टम में बदलाव सुझाने के लिए Sir John Simon के अंडर एक कमीशन भारत भेजा.
- सबसे बड़ी प्रॉब्लम (The Problem): इस पूरे कमीशन में एक भी इंडियन मेंबर नहीं था; सभी ब्रिटिश थे.
- विरोध और नारा: जब यह कमीशन 1928 में इंडिया आया, तो सभी पार्टियों ने काले झंडे दिखाकर नारा लगाया: “Go back Simon” (साइमन वापस जाओ).
- Lala Lajpat Rai का निधन: इस शांतिपूर्ण विरोध के दौरान ब्रिटिश पुलिस के लाठीचार्ज में घायल होने की वजह से Lala Lajpat Rai जी का निधन हो गया.
- Purna Swaraj (पूर्ण स्वराज) की मांग (1929):
- Lahore Congress Session: December 1929 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन हुआ, जहाँ ‘Purna Swaraj’ (यानी पूरी आजादी) की मांग को पास किया गया.
- तय किया गया कि 26 January 1930 को पहला Independence Day मनाया जाएगा, जहाँ लोग देश की पूरी आजादी के लिए संघर्ष करने की शपथ (pledge) लेंगे.
- The Salt March (दांडी यात्रा):
- नमक (Salt) ही क्यों? गांधीजी ने देखा कि नमक एक ऐसी चीज है जिसे अमीर-गरीब सब इस्तेमाल करते हैं. ब्रिटिश सरकार ने नमक पर भारी टैक्स लगा रखा था और इसे खुद बनाने का एकाधिकार (monopoly) ले रखा था, जो ब्रिटिश शासन का सबसे क्रूर चेहरा था.
- Viceroy Irwin को अल्टीमेटम: 31 January 1930 को गांधीजी ने वाइसराय इरविन को एक पत्र लिखकर 11 मांगें रखीं. उन्होंने अल्टीमेटम दिया कि अगर 11 March तक ये मांगें नहीं मानी गईं, तो कांग्रेस Civil Disobedience Movement (सविनय अवज्ञा आंदोलन) शुरू कर देगी. इरविन ने बात मानने से इनकार कर दिया.
- Dandi March की शुरुआत: गांधीजी ने अपने 78 भरोसेमंद वालंटियर्स के साथ ऐतिहासिक नमक यात्रा शुरू की.
- दूरी और समय: यह यात्रा साबरमती आश्रम से गुजरात के तटीय गाँव Dandi तक 240 मील लंबी थी. उन्होंने 24 दिनों तक रोज़ लगभग 10 मील की यात्रा की.
- कानून तोड़ा: 6 April 1930 को दांडी पहुँचकर गांधीजी ने समंदर का पानी उबालकर नमक बनाया और कानून तोड़ दिया. यहीं से Civil Disobedience Movement की शुरुआत हुई.
- Non-Cooperation और Civil Disobedience में अंतर:
- Non-Cooperation (असहयोग): इसमें लोगों को सिर्फ अंग्रेजों का सहयोग न करने (cooperate न करने) के लिए कहा गया था.
- Civil Disobedience (सविनय अवज्ञा): इसमें सहयोग न करने के साथ-साथ अंग्रेजों के कानूनों को तोड़ने (to break colonial laws) के लिए भी कहा गया.
Format 3: हिन्दी नोट्स (गहरी समझ के लिए)
- सविनय अवज्ञा आंदोलन की पृष्ठभूमि (1922-1929):
- स्वराज पार्टी का गठन: असहयोग आंदोलन के वापस लिए जाने के बाद, कांग्रेस के भीतर कुछ नेता (जैसे सी. आर. दास और मोतीलाल नेहरू) प्रांतीय परिषदों के चुनावों में भाग लेना चाहते थे ताकि वे परिषदों के भीतर रहकर ब्रिटिश नीतियों का विरोध कर सकें और सुधारों की वकालत कर सकें। इस उद्देश्य से उन्होंने कांग्रेस के भीतर ‘स्वराज पार्टी’ का गठन किया।
- युवा नेताओं का रुख: इसके विपरीत, जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा नेता अधिक उग्र जन-आंदोलन और पूर्ण स्वतंत्रता के लिए दबाव बना रहे थे।
- 1920 के दशक की भारतीय राजनीति को प्रभावित करने वाले दो कारक:
- वैश्विक आर्थिक मंदी: 1926 से कृषि उत्पादों की कीमतें गिरने लगीं और 1930 के बाद पूरी तरह धराशायी हो गईं। कृषि उत्पादों की मांग गिरने और निर्यात में कमी आने के कारण किसान अपनी फसल बेच पाने और लगान चुका पाने में असमर्थ हो गए, जिससे ग्रामीण इलाकों में भारी उथल-पुथल मच गई।
- साइमन कमीशन (1928): ब्रिटेन की नई टोरी सरकार ने भारत की संवैधानिक व्यवस्था के कामकाज की समीक्षा करने और बदलावों का सुझाव देने के लिए सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में एक वैधानिक आयोग (कमीशन) का गठन किया। भारतीय इस बात से अत्यंत आक्रोशित थे क्योंकि इस आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था; इसके सभी सदस्य अंग्रेज थे।
- जब 1928 में साइमन कमीशन भारत पहुँचा, तो उसका स्वागत “साइमन वापस जाओ” (Go back Simon) के नारों के साथ किया गया। कांग्रेस और मुस्लिम लीग सहित सभी दलों ने इसके खिलाफ प्रदर्शनों में भाग लिया।
- इस शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान ब्रिटिश पुलिस के लाठीचार्ज में घायल होने के कारण महान राष्ट्रवादी नेता लाला लाजपत राय जी की मृत्यु हो गई।
- पूर्ण स्वराज की ऐतिहासिक मांग (दिसंबर 1929):
- दिसंबर 1929 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन हुआ, जिसमें भारत के लिए ‘पूर्ण स्वराज’ (पूर्ण स्वतंत्रता) की मांग को औपचारिक रूप से स्वीकार किया गया।
- यह घोषणा की गई कि 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा, जहाँ लोग पूर्ण स्वतंत्रता के संघर्ष की प्रतिज्ञा लेंगे।
- नमक यात्रा और सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रारंभ:
- नमक – एकता का शक्तिशाली प्रतीक: महात्मा गांधी ने देश को एकजुट करने के लिए ‘नमक’ को एक अत्यंत शक्तिशाली प्रतीक के रूप में चुना क्योंकि नमक का उपभोग अमीर और गरीब दोनों समान रूप से करते थे और यह भोजन का सबसे अनिवार्य हिस्सा था। नमक पर कर और उसके उत्पादन पर सरकारी एकाधिकार को गांधीजी ने ब्रिटिश शासन का सबसे दमनकारी पहलू बताया।
- इरविन को अल्टीमेटम: 31 जनवरी 1930 को गांधीजी ने वाइसराय लॉर्ड इरविन को एक पत्र भेजा, जिसमें 11 मांगें शामिल थीं। पत्र में स्पष्ट चेतावनी दी गई थी कि यदि 11 मार्च तक ये मांगें पूरी नहीं की गईं, तो कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू कर देगी। इरविन समझौते के लिए तैयार नहीं हुए।
- ऐतिहासिक नमक यात्रा (दांडी मार्च):
- गांधीजी ने अपने 78 विश्वस्त स्वयंसेवकों के साथ साबरमती आश्रम से गुजरात के तटीय शहर दांडी तक 240 मील लंबी ऐतिहासिक यात्रा शुरू की।
- यह यात्रा कुल 24 दिनों की थी, जिसमें वे प्रतिदिन लगभग 10 मील पैदल चलते थे। रास्ते में हजारों लोग गांधीजी को सुनने आते थे।
- कानून का उल्लंघन: 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुँचकर उन्होंने समुद्र का पानी उबालकर नमक बनाकर नमक कानून का औपचारिक रूप से उल्लंघन किया। यहीं से सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत हुई।
- असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन में अंतर:
- असहयोग आंदोलन (1921-22): इसमें लोगों से केवल ब्रिटिश सरकार का सहयोग न करने की अपील की गई थी।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930): इसमें असहयोग के साथ-साथ लोगों से औपनिवेशिक कानूनों को तोड़ने की भी अपील की गई।
आइए, अब हम Topic 5: Limits & Participant Perspectives of Civil Disobedience (सविनय अवज्ञा आंदोलन की सीमाएं और विभिन्न वर्गों का दृष्टिकोण) के अत्यंत महत्वपूर्ण, सरल और एग्जाम-ओरिएंटेड नोट्स तैयार करते हैं।
इस टॉपिक में हम यह समझेंगे कि समाज के अलग-अलग लोगों (जैसे अमीर किसान, गरीब किसान, उद्योगपति, मजदूर और महिलाएं) ने इस आंदोलन को कैसे देखा, और इस आंदोलन की मुख्य राजनीतिक सीमाएं क्या थीं (जैसे दलित आंदोलन, पूना पैक्ट और मुस्लिम राजनीतिक संगठनों का रुख)।
📝 Topic 5: Limits & Participant Perspectives of Civil Disobedience
(सविनय अवज्ञा आंदोलन के विभिन्न सामाजिक वर्ग और इसकी सीमाएं)
Format 1: Simple English Notes (For Exam Copies)
1. How Different Social Groups Saw the Movement:
- A. Rich Peasants (Patidars of Gujarat and Jats of Uttar Pradesh):
- Why they joined: They produced commercial crops and were hard hit by the trade depression and falling prices. As cash income disappeared, they could not pay the government’s high land revenue demands.
- Their expectation: For them, the fight for Swaraj was a struggle against high revenues.
- Disappointment: They were deeply disappointed when Gandhiji called off the movement in 1931 without any reduction in revenue rates. As a result, when the movement was restarted in 1932, many of them refused to participate.
- B. Poor Peasants:
- Why they joined: They were small tenants cultivating rented land. Due to the depression, they could not pay their rent to landlords and wanted the unpaid rent to be remitted.
- Conflict with Congress: They joined radical movements led by Socialists and Communists. The Congress was reluctant to support their ‘no rent’ campaigns because it did not want to upset rich peasants and landlords. Thus, the relationship between poor peasants and Congress remained uncertain.
- C. Business Class (Industrialists):
- Why they joined: They made huge profits during the First World War and wanted to expand their businesses. They opposed colonial policies that restricted business activities.
- Their demands: They wanted protection against imports of foreign goods and a rupee-sterling foreign exchange ratio that would discourage imports.
- Organisations formed: They formed the Indian Industrial and Commercial Congress (1920) and the Federation of the Indian Chamber of Commerce and Industries (FICCI) in 1927. Prominent leaders were Purshottamdas Thakurdas and G. D. Birla.
- Decline in enthusiasm: After the failure of the Round Table Conference, they lost interest. They were worried about militant activities, business disruptions, and the growing influence of Socialism among younger Congress members.
- D. Industrial Working Classes:
- Participation: They did not participate in large numbers, except in the Nagpur region. As industrialists came close to Congress, workers stayed away.
- Selective support: Some workers selectively adopted Gandhian ideas like boycotting foreign goods to protest against low wages and poor working conditions. There were strikes by railway workers (1930) and dockworkers (1932).
- Congress’s stance: The Congress was reluctant to include workers’ demands because it feared this would alienate industrialists and divide the anti-imperial forces.
- E. Women:
- Participation: Women participated on a large scale. Thousands of women came out of their homes to listen to Gandhiji during the salt march, participated in protest marches, manufactured salt, and picketed foreign cloth and liquor shops.
- Limit: This public role did not change their position dramatically. Gandhiji believed that it was the duty of women to look after home and hearth, and be good mothers and wives. For a long time, Congress was reluctant to give women any positions of authority.
2. The Limits of Civil Disobedience:
- A. The Issue of Dalits (Untouchables):
- Congress’s initial stance: For a long time, the Congress ignored the dalits for fear of offending the Sanatanis (conservative high-caste Hindus).
- Gandhiji’s efforts: Gandhiji declared that Swaraj would not come for a hundred years if untouchability was not eliminated. He called them Harijans (children of God), organised satyagrahas for their entry into temples and access to public wells, and even cleaned toilets himself to dignify their work.
- Political demands of Dalit leaders: Leaders like Dr. B. R. Ambedkar wanted a political solution: reserved seats in educational institutions and a separate electorate.
- B. Dr. B.R. Ambedkar & The Poona Pact (September 1932):
- Ambedkar organised Dalits into the Depressed Classes Association in 1930.
- He clashed with Gandhiji at the Second Round Table Conference by demanding separate electorates for Dalits.
- When the British government accepted Ambedkar’s demand, Gandhiji went on a fast unto death, believing that separate electorates would slow down their integration into society.
- The Poona Pact (September 1932): Ambedkar accepted Gandhiji’s position and signed the pact. It gave the Depressed Classes (Scheduled Castes) reserved seats in provincial and central legislative councils, but they were to be voted in by the general electorate.
- C. Lukewarm Muslim Response:
- Alienation: After the decline of the Non-Cooperation-Khilafat movement, a large section of Muslims felt alienated from the Congress. They felt Congress was visibly associated with Hindu religious nationalist groups like the Hindu Mahasabha.
- Communal Clashes: Relations worsened, leading to communal riots in many cities, which deepened the distance between both communities.
- Representation Dispute: Muhammad Ali Jinnah (Muslim League leader) was willing to give up the demand for separate electorates if Muslims were guaranteed reserved seats in the Central Assembly and representation proportional to population in Muslim-dominated provinces (Bengal and Punjab). However, compromise negotiations failed in 1928 due to strong opposition from M. R. Jayakar of the Hindu Mahasabha.
- Atmosphere of Distrust: When the Civil Disobedience Movement started, there was an atmosphere of suspicion. Muslim leaders feared that their culture and identity as a minority would be submerged under a Hindu majority.
Format 2: देवनागरी मिक्स / Hinglish Notes (Class में समझाने के लिए)
1. अलग-अलग वर्गों का दृष्टिकोण (How they saw the movement):
- A. अमीर किसान (Rich Peasants – गुजरात के पाटीदार और UP के जाट):
- क्यों शामिल हुए? ये लोग व्यावसायिक फसलें (commercial crops) उगाते थे। आर्थिक मंदी (depression) के कारण इनकी फसलों के दाम बहुत गिर गए। इनके पास नगद कमाई (cash income) खत्म हो गई और वे सरकार का भारी लगान (revenue) देने की स्थिति में नहीं थे।
- क्या चाहते थे? इनके लिए स्वराज का मतलब था—लगान में कमी।
- निराशा क्यों हुई? जब 1931 में बिना लगान कम किए गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया, तो ये बहुत निराश हुए। इसलिए जब 1932 में आंदोलन दोबारा शुरू हुआ, तो बहुत से अमीर किसानों ने इसमें हिस्सा लेने से मना कर दिया।
- B. गरीब किसान (Poor Peasants):
- क्या चाहते थे? ये केवल लगान कम नहीं कराना चाहते थे। ये छोटे पट्टेदार (tenants) थे जो जमींदारों की जमीन पर खेती करते थे। मंदी के कारण किराया देना मुश्किल था, इसलिए ये चाहते थे कि इनका बकाया किराया (unpaid rent) माफ कर दिया जाए।
- कांग्रेस से अनबन: ये सोशलिस्टों और कम्युनिस्टों द्वारा चलाए गए उग्र आंदोलनों में शामिल होने लगे। कांग्रेस अमीर जमींदारों को नाराज नहीं करना चाहती थी, इसलिए उसने ‘no rent’ (भाड़ा न चुकाने) कैंपेन का खुलकर सपोर्ट नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि गरीब किसानों और कांग्रेस के बीच संबंध हमेशा तनावपूर्ण रहे।
- C. बिजनेस क्लास (Industrialists/व्यवसायी वर्ग):
- क्यों शामिल हुए? पहले विश्व युद्ध में इन्होंने भारी मुनाफा कमाया था और वे अपने बिजनेस को बढ़ाना चाहते थे। वे ब्रिटिश सरकार की उन नीतियों के खिलाफ थे जो उनके बिजनेस में रुकावट डालती थीं।
- इनकी मांगें: विदेशी सामानों के इम्पोर्ट पर रोक लगाई जाए और रुपया-स्टर्लिंग एक्सचेंज रेशियो को सुधारा जाए ताकि इम्पोर्ट हतोत्साहित हो।
- बनाए गए संगठन: इन्होंने 1920 में Indian Industrial and Commercial Congress और 1927 में FICCI (Federation of the Indian Chamber of Commerce and Industries) का गठन किया। मुख्य लीडर्स पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास और जी.डी. बिड़ला थे।
- जोश ठंडा क्यों हुआ? गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conference) के फेल होने के बाद इनका जोश ठंडा पड़ गया। उन्हें उग्र गतिविधियों (militant activities) और कांग्रेस के युवा सदस्यों में बढ़ते समाजवाद (Socialism) के प्रभाव का डर सताने लगा था।
- D. औद्योगिक मजदूर (Industrial Workers):
- कम भागीदारी: नागपुर रीजन को छोड़कर बाकी देश में मजदूरों ने इस आंदोलन में ज्यादा हिस्सा नहीं लिया। जैसे-जैसे उद्योगपति कांग्रेस के करीब आए, मजदूर कांग्रेस से दूर होते गए।
- छिटपुट आंदोलन: फिर भी, कुछ मजदूरों ने गांधीवादी टोपी पहनकर और विदेशी सामानों का बहिष्कार करके अपनी कम मजदूरी और खराब स्थितियों के खिलाफ प्रदर्शन किया। 1930 में रेलवे वर्कर्स और 1932 में डॉकवर्कर्स (गोदी कामगारों) की हड़तालें हुईं।
- कांग्रेस का रवैया: कांग्रेस मजदूरों की मांगों को आंदोलन में शामिल करने से कतराती थी क्योंकि उसे लगता था कि इससे उद्योगपति (industrialists) नाराज हो जाएंगे और आंदोलन कमजोर हो जाएगा।
- E. महिलाएं (Women):
- भारी संख्या में भागीदारी: महिलाओं ने इस आंदोलन में बहुत बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया। गांधीजी की नमक यात्रा के दौरान वे घरों से बाहर आईं, नमक बनाया, शराब और विदेशी कपड़ों की दुकानों की Picketing (नाकेबंदी) की और जेल भी गईं।
- सीमाएं: लेकिन इस भागीदारी के बावजूद कांग्रेस में उनकी स्थिति नहीं बदली। गांधीजी का मानना था कि महिलाओं का असली काम घर संभालना और अच्छी मां व अच्छी पत्नी बनना है। कांग्रेस लंबे समय तक उन्हें संगठन में कोई बड़ा पद देने से कतराती रही।
2. सविनय अवज्ञा आंदोलन की सीमाएं (The Limits):
- A. दलितों (Dalits) की भागीदारी और समस्या:
- शुरुआती उदासीनता: कांग्रेस ने लंबे समय तक सनातनियों (रूढ़िवादी सवर्ण हिंदुओं) को नाराज न करने के डर से दलितों पर ध्यान नहीं दिया।
- गांधीजी का प्रयास: गांधीजी ने कहा कि अगर छुआछूत (untouchability) खत्म नहीं हुई, तो स्वराज 100 साल तक भी नहीं आएगा। उन्होंने दलितों को Harijan (हरिजन – ईश्वर की संतान) नाम दिया। उनके लिए मंदिर, कुओं और स्कूलों में प्रवेश दिलाने के लिए सत्याग्रह किए और खुद शौचालय साफ करके इस काम को सम्मान दिलाया।
- दलित नेताओं की मांग: लेकिन दलित नेता राजनीतिक सशक्तिकरण (political empowerment) चाहते थे। उन्होंने रिजर्व सीटों और Separate Electorate (पृथक निर्वाचन क्षेत्र) की मांग की।
- B. डॉ. बी.आर. अंबेडकर और पूना पैक्ट (Poona Pact – September 1932):
- अंबेडकर जी ने 1930 में दलितों को Depressed Classes Association (दमित वर्ग एसोसिएशन) में संगठित किया।
- दूसरे गोलमेज सम्मेलन में उन्होंने दलितों के लिए ‘Separate Electorate’ की मांग की, जिस पर गांधीजी से उनका विवाद हो गया।
- जब ब्रिटिश सरकार ने अंबेडकर की यह मांग मान ली, तो गांधीजी आमरण अनशन (fast unto death) पर बैठ गए। उनका मानना था कि अलग चुनाव क्षेत्र मिलने से दलितों का समाज में एकीकरण (integration) धीमा हो जाएगा।
- Poona Pact (सितंबर 1932): आखिरकार अंबेडकर जी ने गांधीजी की बात मान ली और पूना पैक्ट साइन हुआ। इसके तहत दमित वर्गों (अनुसूचित जातियों) को प्रांतीय और केंद्रीय परिषदों में आरक्षित सीटें (Reserved Seats) दी गईं, लेकिन उनका चुनाव सामान्य मतदाता वर्ग (general electorate) द्वारा ही होना तय हुआ।
- C. मुस्लिम संगठनों का रुख (The Muslim Response):
- दूरी: असहयोग-खिलाफत आंदोलन के खत्म होने के बाद मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस से कटा हुआ महसूस करने लगा। उन्हें लगा कि कांग्रेस हिंदूवादी संगठनों जैसे Hindu Mahasabha के करीब जा रही है।
- सांप्रदायिक दंगे: दोनों समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ा और कई शहरों में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए।
- सीटों का विवाद: मुस्लिम लीग के नेता Muhammad Ali Jinnah अलग निर्वाचन क्षेत्र (separate electorate) की मांग छोड़ने को तैयार थे, बशर्ते उन्हें केंद्रीय असेंबली में आरक्षित सीटें दी जाएं और पंजाब व बंगाल जैसे मुस्लिम-बहुल प्रांतों में आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिले। लेकिन 1928 में हिंदू महासभा के एम.आर. जयकर के कड़े विरोध के कारण यह समझौता नहीं हो पाया।
- अविश्वास का माहौल: जब सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ, तब दोनों समुदायों के बीच गहरा अविश्वास था। मुस्लिम नेताओं को डर था कि हिंदू बहुसंख्या के वर्चस्व में अल्पसंख्यकों की संस्कृति और पहचान कहीं खो न जाए।
Format 3: हिन्दी नोट्स (गहरी समझ के लिए)
1. आंदोलन के प्रति विभिन्न सामाजिक समूहों का दृष्टिकोण:
- क. संपन्न किसान वर्ग (गुजरात के पाटीदार और उत्तर प्रदेश के जाट):
- आंदोलन में भागीदारी के कारण: व्यावसायिक फसलों के उत्पादक होने के कारण वे आर्थिक मंदी और गिरती कीमतों से अत्यंत प्रभावित थे। नगद आय समाप्त होने के कारण उनके लिए ब्रिटिश सरकार का लगान चुकाना असंभव हो गया था। सरकार ने लगान कम करने से साफ मना कर दिया, जिससे उनमें भारी आक्रोश था।
- स्वराज का अर्थ: इनके लिए स्वराज की लड़ाई का अर्थ अत्यधिक लगान के विरुद्ध संघर्ष था।
- असंतोष: जब 1931 में लगान दरों में बिना किसी संशोधन के आंदोलन वापस ले लिया गया, तो इन्हें घोर निराशा हुई। अतः जब 1932 में आंदोलन दोबारा शुरू हुआ, तो इनमें से बहुतों ने भाग लेने से इनकार कर दिया।
- ख. गरीब किसान वर्ग:
- मांगें: ये केवल लगान में कमी नहीं चाहते थे। इनमें से बहुत से किसान छोटे पट्टेदार (tenants) थे जो जमींदारों की जमीन पर खेती करते थे। मंदी के कारण उनके लिए जमीन का किराया चुकाना कठिन था, इसलिए वे चाहते थे कि जमींदारों को दिया जाने वाला बकाया किराया माफ कर दिया जाए।
- कांग्रेस से दूरी: वे समाजवादियों और कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाले उग्र आंदोलनों में शामिल होने लगे। अमीर किसानों और जमींदारों के नाराज होने के भय से कांग्रेस ‘भाड़ा-विरोधी’ (no-rent) आंदोलनों का समर्थन करने में हिचकिचाती रही, जिससे गरीब किसानों और कांग्रेस के बीच संबंध अनिश्चित बने रहे।
- ग. व्यवसायी वर्ग (उद्योगपति):
- रणनीति: प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारी मुनाफा कमाकर शक्तिशाली हो चुके भारतीय व्यापारी औपनिवेशिक नीतियों के खिलाफ थे क्योंकि ये नीतियां उनकी व्यावसायिक गतिविधियों को बाधित करती थीं।
- प्रमुख मांगें: वे विदेशी वस्तुओं के आयात से सुरक्षा चाहते थे और एक ऐसा रुपया-स्टर्लिंग विदेशी मुद्रा विनिमय अनुपात चाहते थे जिससे आयात हतोत्साहित हो।
- संगठनों की स्थापना: उन्होंने अपने व्यावसायिक हितों को संगठित करने के लिए 1920 में ‘इंडियन इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल कांग्रेस’ और 1927 में ‘भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ’ (FICCI) का गठन किया। इसका नेतृत्व पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास और जी.डी. बिड़ला जैसे प्रमुख उद्योगपतियों ने किया।
- उत्साह में कमी: गोलमेज सम्मेलन की विफलता के बाद इस वर्ग का उत्साह मंद पड़ गया। वे उग्र गतिविधियों के बढ़ने, व्यापार में लंबे गतिरोध और कांग्रेस के युवा सदस्यों में समाजवाद के बढ़ते प्रभाव से आशंकित थे।
- घ. औद्योगिक श्रमिक वर्ग:
- सीमित भागीदारी: नागपुर क्षेत्र को छोड़कर औद्योगिक मजदूरों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में बड़े पैमाने पर भाग नहीं लिया। जैसे-जैसे उद्योगपति कांग्रेस के करीब आ रहे थे, मजदूर कांग्रेस से दूर होते गए।
- प्रतिरोध: इसके बावजूद, कुछ श्रमिकों ने कम वेतन और काम की खराब परिस्थितियों के खिलाफ अपने स्वयं के आंदोलन के हिस्से के रूप में गांधीवादी टोपी पहनकर और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करके इसमें भाग लिया। 1930 में रेलवे कर्मचारियों और 1932 में गोदी कामगारों (dockworkers) की हड़तालें हुईं।
- कांग्रेस का दृष्टिकोण: कांग्रेस मजदूरों की मांगों को अपने संघर्ष के कार्यक्रम में शामिल करने से कतराती थी क्योंकि उसे लगता था कि इससे उद्योगपति आंदोलन से अलग हो जाएंगे और साम्राज्यवादी विरोधी ताकतों में फूट पड़ जाएगी।
- ङ. महिलाओं की भागीदारी:
- योगदान: सविनय अवज्ञा आंदोलन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण विशेषता महिलाओं की बड़े पैमाने पर भागीदारी थी। नमक सत्याग्रह के दौरान हजारों महिलाएं गांधीजी को सुनने घरों से बाहर आईं। उन्होंने जुलूसों में भाग लिया, नमक बनाया, और विदेशी कपड़ों व शराब की दुकानों की नाकेबंदी (picketing) की; कई महिलाएं जेल भी गईं।
- सामाजिक सीमा: इस सार्वजनिक भूमिका के बावजूद उनके सामाजिक स्थान में कोई बुनियादी बदलाव नहीं आया। गांधीजी का मानना था कि घर संभालना, अच्छी मां और अच्छी पत्नी बनना ही महिलाओं का असली कर्तव्य है। कांग्रेस भी लंबे समय तक उन्हें संगठन में किसी भी महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त करने से हिचकिचाती रही; वह केवल उनकी प्रतीकात्मक उपस्थिति की ही इच्छुक थी।
2. सविनय अवज्ञा आंदोलन की सीमाएं:
- क. अछूतों या दलितों की समस्या:
- पृष्ठभूमि: लंबे समय तक कांग्रेस ने सनातनियों (रूढ़िवादी उच्च जाति के हिंदुओं) को नाराज करने के डर से दलितों की समस्याओं की उपेक्षा की थी।
- गांधीजी के सुधारवादी कार्य: महात्मा गांधी ने घोषणा की कि यदि अस्पृश्यता (छुआछूत) को समाप्त नहीं किया गया, तो स्वराज सौ साल तक भी नहीं आएगा। उन्होंने अछूतों को ‘हरिजन’ (ईश्वर की संतान) नाम दिया। उन्होंने दलितों को मंदिरों, कुओं, तालाबों और स्कूलों में समान अधिकार दिलाने के लिए सत्याग्रह आयोजित किए और मैला ढोने वालों के काम को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए स्वयं शौचालय साफ किए।
- दलित नेताओं की राजनीतिक मांगें: इसके विपरीत, दलित नेता सामाजिक विकलांगताओं के निवारण के लिए राजनीतिक समाधान चाहते थे। उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षित सीटों और विधायी परिषदों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र (separate electorate) की मांग शुरू कर दी।
- ख. डॉ. बी.आर. अंबेडकर और पूना पैक्ट (सितंबर 1932):
- डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने 1930 में दलितों को ‘दमित वर्ग एसोसिएशन’ (Depressed Classes Association) में संगठित किया।
- द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में दलितों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की मांग को लेकर उनका महात्मा गांधी से तीखा टकराव हुआ।
- जब ब्रिटिश सरकार ने अंबेडकर की मांग मान ली, तो गांधीजी आमरण अनशन पर बैठ गए। उनका मानना था कि दलितों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था से समाज में उनके एकीकरण की प्रक्रिया अत्यंत धीमी हो जाएगी।
- पूना पैक्ट (Poona Pact): अंततः अंबेडकर ने गांधीजी के रुख को स्वीकार कर लिया और सितंबर 1932 में ‘पूना पैक्ट’ पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत दमित वर्गों (बाद में अनुसूचित जाति के रूप में जाने गए) को प्रांतीय और केंद्रीय विधायी परिषदों में आरक्षित सीटें दी गईं, परंतु उनका चुनाव सामान्य निर्वाचन क्षेत्र (general electorate) के माध्यम से ही होना तय हुआ।
- ग. मुस्लिम राजनीतिक संगठनों का रुख:
- असंतोष व अलगाव की भावना: असहयोग-खिलाफत आंदोलन के धीमे पड़ने के बाद मुसलमानों का एक बहुत बड़ा हिस्सा कांग्रेस से कटा हुआ महसूस करने लगा था। 1920 के दशक के मध्य से कांग्रेस स्पष्ट रूप से हिंदू महासभा जैसे हिंदू धार्मिक राष्ट्रवादी संगठनों के करीब दिखने लगी थी।
- सांप्रदायिक तनाव: दोनों समुदायों के बीच संबंधों के बिगड़ने से विभिन्न शहरों में भीषण हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक दंगे हुए, जिसने दोनों के बीच की दूरी को और बढ़ा दिया।
- प्रतिनिधित्व का मुद्दा: मुस्लिम लीग के प्रमुख नेता मोहम्मद अली जिन्ना पृथक निर्वाचन क्षेत्र की मांग छोड़ने के लिए तैयार थे, बशर्ते मुसलमानों को केंद्रीय असेंबली में आरक्षित सीटें दी जाएं और मुस्लिम-बहुल प्रांतों (बंगाल और पंजाब) में उनकी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया जाए। परंतु 1928 में सर्वदलीय सम्मेलन (All Parties Conference) में हिंदू महासभा के एम.आर. जयकर द्वारा इस समझौते का कड़ा विरोध किए जाने के कारण एकता की सभी उम्मीदें समाप्त हो गईं।
- अविश्वास का माहौल: सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत संदेह और अविश्वास के इसी माहौल में हुई। अधिकांश मुस्लिम नेताओं और बुद्धिजीवियों को भय था कि हिंदू बहुसंख्यक समाज के वर्चस्व में एक अल्पसंख्यक के रूप में उनकी संस्कृति और पहचान कहीं विलीन न हो जाए।
📝 Topic 6: The Sense of Collective Belonging
(सामूहिक अपनेपन का भाव – राष्ट्रवाद के सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक पहलू)
Format 1: Simple English Notes (For Exam Copies)
- How does Nationalism Spread?
- Nationalism spreads when people begin to believe that they are all part of the same nation, and when they discover some unity that binds them together.
- This collective belonging comes from united struggles (like protests and movements) but also from cultural processes such as history, fiction, folklore, songs, and popular symbols.
- 1. The Image of Bharat Mata:
- First Creation: The identity of India was first visually represented through the image of Bharat Mata. This image was first created by Bankim Chandra Chattopadhyay in the 1870s.
- Vande Mataram: Bankim Chandra wrote the hymn ‘Vande Mataram’ in the 1870s. He later included it in his famous novel Anandamath, and it was widely sung during the Swadeshi movement in Bengal.
- Abanindranath Tagore’s Painting (1905): Inspired by the Swadeshi movement, Abanindranath Tagore painted his famous portrait of Bharat Mata.
- In this painting, Bharat Mata is shown as an ascetic (saintly) figure. She is calm, composed, divine, and spiritual.
- She is shown dispensing learning (knowledge), food, and clothing. The mala in her hand highlights her ascetic quality.
- Evolution of the Image: In later years, the image took many different forms by different artists, often showing her with a trishul, standing beside a lion and an elephant as symbols of power and authority.
- 2. Revival of Indian Folklore:
- Nationalists believed that folk tales, songs, and legends gave a true picture of traditional Indian culture, which had been damaged by outside (British) forces.
- In Bengal: Rabindranath Tagore himself led the folk revival movement by collecting ballads, nursery rhymes, and myths.
- In Madras: Natesa Sastri published a massive four-volume collection of Tamil folk tales called The Folklore of Southern India. He believed folklore was “national literature” and the most trustworthy reflection of people’s real thoughts.
- 3. Nationalist Flags (Icons and Symbols):
- The Swadeshi Flag (Bengal): Designed during the Swadeshi movement, it was a tricolour flag (red, green, and yellow). It had eight lotuses (representing the eight provinces of British India) and a crescent moon (representing Hindus and Muslims).
- The Swaraj Flag (1921): Mahatma Gandhi designed the Swaraj flag by 1921. It was a tricolour (red, green, and white) with a spinning wheel (charkha) in the centre, representing the Gandhian ideal of self-help. Carrying this flag aloft during marches became a symbol of defiance against the British.
- 4. Reinterpretation of History:
- The British looked at Indians as backward, primitive, and incapable of ruling themselves.
- In response, Indian historians began looking into the past to discover India’s great achievements.
- They wrote about the glorious ancient times when art, architecture, science, mathematics, religion, philosophy, and trade flourished. They argued that this gold-age was followed by a history of decline when India was colonised.
- These writings urged Indians to take pride in their past achievements and struggle for freedom.
- The Problem with Glorification:
- When the past being glorified was mainly Hindu, and the images used were drawn from Hindu iconography (symbols), people of other communities (like Muslims) began to feel left out.
Format 2: देवनागरी मिक्स / Hinglish Notes (Class में समझाने के लिए)
- Collective Belonging (सामूहिक अपनेपन) की भावना कैसे आई?
- नेशनलिज्म (राष्ट्रवाद) तब फैलता है जब देश के लोगों को लगने लगता है कि वे सब एक ही देश का हिस्सा हैं और उनके बीच कोई मजबूत कड़ी (unity) है।
- यह भावना केवल बड़ी लड़ाइयों (movements) से ही नहीं आई, बल्कि इसमें सांस्कृतिक प्रक्रियाओं (cultural processes) जैसे—इतिहास (history), लोककथाओं (folklore), गीतों (songs) और प्रतीकों (symbols) का बहुत बड़ा रोल था.
- 1. भारत माता की छवि (The Image of Bharat Mata):
- पहली रचना: देश की पहचान को सबसे पहले ‘Bharat Mata’ की तस्वीर के रूप में पेश किया गया ताकि लोग देश को महसूस कर सकें। यह इमेज सबसे पहले 1870 के दशक में Bankim Chandra Chattopadhyay ने बनाई थी.
- वन्दे मातरम्: बंकिम चंद्र ने ही 1870 के दशक में ‘Vande Mataram’ गीत लिखा था। बाद में इसे उन्होंने अपने उपन्यास Anandamath (आनंदमठ) में शामिल किया। बंगाल के स्वदेशी आंदोलन में यह गीत हर देशभक्त की जुबान पर था।
- Abanindranath Tagore की पेंटिंग (1905): स्वदेशी आंदोलन से प्रेरित होकर अवनिंद्रनाथ टैगोर ने भारत माता की एक बेहद प्रसिद्ध पेंटिंग बनाई।
- इस पेंटिंग में भारत माता को एक सन्यासिनी (ascetic figure) के रूप में दिखाया गया था, जो शांत, गंभीर, दैवीय (divine) और आध्यात्मिक (spiritual) लग रही थीं।
- उनके हाथों में शिक्षा, भोजन और कपड़ा (learning, food, clothing) थे और एक हाथ में माला थी जो उनकी तपस्या को दर्शाती थी।
- बाद के बदलाव: आगे चलकर कई अन्य कलाकारों ने भारत माता के कई रूप बनाए, जिसमें उन्हें त्रिशूल के साथ और शेर व हाथी (शक्ति के प्रतीक) के पास खड़े दिखाया गया.
- 2. लोककथाओं का पुनरुद्धार (Revival of Folklore):
- राष्ट्रवादियों का मानना था कि गाँवों की पुरानी लोककथाएं और गीत हमारी असली संस्कृति की पहचान कराते हैं, जिसे बाहरी ताकतों (अंग्रेजों) ने भ्रष्ट और खराब कर दिया था। अपनी राष्ट्रीय पहचान को वापस पाने के लिए इसे बचाना बहुत जरूरी था।
- बंगाल में: Rabindranath Tagore खुद गाँव-गाँव घूमकर पुरानी लोककथाएं, लोरी (ballads) और मिथक इकट्ठे करने लगे और इस आंदोलन का नेतृत्व किया।
- मद्रास में: Natesa Sastri ने चार खंडों (volumes) में तमिल लोककथाओं की एक बड़ी किताब लिखी, जिसका नाम था—The Folklore of Southern India। उनका मानना था कि लोककथा ही ‘राष्ट्रीय साहित्य’ (national literature) होती है, जो लोगों के विचारों का सबसे सच्चा आईना है।
- 3. तिरंगा झंडा (Icons and Symbols):
- स्वदेशी झंडा (Bengal): स्वदेशी आंदोलन के समय बंगाल में एक तिरंगा (लाल, हरा और पीला) डिजाइन किया गया था। इसमें ब्रिटिश भारत के आठ प्रांतों को दर्शाते हुए आठ कमल (eight lotuses) और हिंदू-मुस्लिम एकता को दर्शाने वाला आधा चाँद (crescent moon) था।
- स्वराज फ्लैग (1921): गांधीजी ने 1921 तक अपना ‘Swaraj Flag’ तैयार कर लिया था। यह भी तिरंगा था (लाल, हरा और सफेद)। इसके बीच में गांधीवादी आदर्श ‘आत्मनिर्भरता’ को दिखाता हुआ चर्खा (spinning wheel) बना था। रैलियों और जुलूसों में इस झंडे को हाथ में ऊँचा उठाकर चलना अंग्रेजों के खिलाफ बगावत (defiance) का प्रतीक बन गया था.
- 4. इतिहास की नई व्याख्या (Reinterpretation of History):
- अंग्रेज भारतीयों को पिछड़ा, असभ्य और खुद पर राज करने के अयोग्य (primitive & incapable of governing) मानते थे।
- इसके जवाब में भारतीय इतिहासकारों ने अतीत (past) की महान खोजों को सामने लाना शुरू किया।
- उन्होंने प्राचीन भारत के उस स्वर्ण काल (glorious ancient times) के बारे में लिखा जब हमारे देश में कला, विज्ञान, गणित, धर्म, दर्शन (philosophy) और व्यापार बहुत समृद्ध थे। उन्होंने बताया कि इस गौरवशाली काल के बाद देश का पतन हुआ क्योंकि अंग्रेजों ने हमें गुलाम बना लिया था।
- इन इतिहास की किताबों ने देशवासियों से अपने इतिहास पर गर्व करने और आजादी के लिए संघर्ष करने की अपील की।
- इसकी सीमा / समस्या:
- इस इतिहास और प्रतीकों की एक समस्या यह थी कि इसमें ज्यादातर हिंदू इतिहास और हिंदू प्रतीकों (Hindu iconography) को ही बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया था, जिससे अन्य अल्पसंख्यक समुदायों (जैसे मुसलमानों) के लोग खुद को देश से अलग महसूस करने लगे.
Format 3: हिन्दी नोट्स (गहरी समझ के लिए)
- सामूहिक अपनेपन का भाव:
- राष्ट्रवाद की भावना तब पनपती है जब लोग यह महसूस करने लगते हैं कि वे सब एक ही राष्ट्र के अंग हैं और उनके बीच कोई साझा सूत्र है जो उन्हें परस्पर बांधता है।
- यह सामूहिक अपनेपन की भावना आंशिक रूप से साझा संघर्षों (औपनिवेशिक शासन के विरोध) के माध्यम से पैदा हुई। इसके अतिरिक्त, इतिहास, साहित्य, लोककथाओं, गीतों, चित्रों और प्रतीकों जैसे विविध सांस्कृतिक माध्यमों ने भी राष्ट्रवाद को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- 1. भारत माता की छवि:
- राष्ट्र की दृश्य पहचान: किसी भी राष्ट्र की पहचान को प्रायः किसी आकृति या चित्र के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। बीसवीं सदी में राष्ट्रवाद के विकास के साथ भारत की पहचान को भी ‘भारत माता’ की छवि से जोड़ा जाने लगा।
- वन्दे मातरम् गीत: भारत माता की पहली छवि का निर्माण बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1870 के दशक में किया गया, जब उन्होंने मातृभूमि की स्तुति के रूप में ‘वन्दे मातरम्’ गीत लिखा। बाद में इसे उन्होंने अपने प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया और बंगाल के स्वदेशी आंदोलन में यह गीत अत्यधिक लोकप्रिय हुआ।
- अवनिंद्रनाथ टैगोर का योगदान (1905): स्वदेशी आंदोलन से प्रेरित होकर अवनिंद्रनाथ टैगोर ने भारत माता की विख्यात पेंटिंग बनाई।
- इस चित्र में भारत माता को एक संन्यासिनी के रूप में दर्शाया गया है। वह शांत, गंभीर, अलौकिक और आध्यात्मिक दिखाई देती हैं।
- उन्हें शिक्षा, अन्न और वस्त्र (ज्ञान, भोजन, कपड़े) प्रदान करते हुए दिखाया गया है, तथा उनके एक हाथ में माला उनके तपस्वी गुण को रेखांकित करती है।
- छवि का विविधीकरण: बाद के वर्षों में यह छवि विभिन्न कलाकारों द्वारा अनेक रूपों में चित्रित की गई। वे लोकप्रिय चित्रों में त्रिशूल धारण किए हुए तथा शक्ति और सत्ता के प्रतीकों—सिंह व हाथी के साथ दिखाई देने लगीं। इस मातृ छवि के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित करना ही राष्ट्रवाद का प्रमाण माना जाने लगा।
- 2. भारतीय लोककथाओं का पुनरुद्धार:
- राष्ट्रवादियों का मानना था कि प्राचीन लोकगीत, गाथाएं और लोककथाएं हमारी उस पारंपरिक संस्कृति की वास्तविक छवि प्रस्तुत करती हैं, जो बाहरी शक्तियों (अंग्रेजों) के प्रभाव के कारण विकृत व क्षतिग्रस्त हो चुकी थी। अपनी राष्ट्रीय पहचान को पुनर्जीवित करने और अतीत के प्रति गौरव का भाव जगाने के लिए लोक परंपराओं का संरक्षण आवश्यक था।
- बंगाल में: रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वयं लोकगाथाओं, शिशु गीतों (nursery rhymes) और मिथकों को एकत्र करना शुरू किया और लोक परंपराओं के पुनरुद्धार के आंदोलन का नेतृत्व किया।
- मद्रास में: नटेसा शास्त्री ने तमिल लोककथाओं का एक विशाल चार-खंडों का संग्रह ‘द फ़ोकलोरे ऑफ़ सदर्न इंडिया’ (The Folklore of Southern India) प्रकाशित किया। उनका दृढ़ विश्वास था कि लोकगीत ही ‘राष्ट्रीय साहित्य’ हैं और यह लोगों के वास्तविक विचारों व विशेषताओं की सबसे विश्वसनीय अभिव्यक्ति है।
- 3. राष्ट्रीय ध्वज (चिह्न और प्रतीक):
- स्वदेशी आंदोलन का ध्वज (बंगाल): बंगाल में स्वदेशी आंदोलन के दौरान एक तिरंगा ध्वज (लाल, हरा और पीला) तैयार किया गया। इसमें ब्रिटिश भारत के आठ प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते हुए आठ कमल के फूल और हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक अर्धचंद्र दर्शाया गया था।
- स्वराज ध्वज (1921): वर्ष 1921 तक गांधीजी ने ‘स्वराज ध्वज’ तैयार कर लिया था। यह भी एक तिरंगा (लाल, हरा और सफेद) था जिसके केंद्र में गांधीवादी आदर्श ‘स्वावलंबन’ को प्रदर्शित करता हुआ चरखा अंकित था। जुलूसों और सभाओं के दौरान इस ध्वज को हाथ में लेकर ऊँचा चलना ब्रिटिश शासन के प्रति अवज्ञा और प्रतिरोध का प्रतीक बन गया था।
- 4. इतिहास की पुनर्व्याख्या:
- ब्रिटिश शासक भारतीयों को पिछड़ा, आदिम (primitive) और अपना शासन स्वयं चलाने में अक्षम मानते थे।
- इसके विरोध में भारतीय इतिहासकारों ने देश के महान अतीत की खोज शुरू की और भारत की प्राचीन उपलब्धियों के बारे में लिखना प्रारंभ किया।
- उन्होंने उस गौरवशाली प्राचीन काल का वर्णन किया जब भारत में कला, वास्तुकला, विज्ञान, गणित, धर्म, संस्कृति, दर्शन, कानून और व्यापार का चरम विकास हुआ था। उनका तर्क था कि इस महान युग के बाद देश के पतन का दौर शुरू हुआ, जब भारत को उपनिवेश बना लिया गया।
- इतिहास की इन व्याख्याओं ने देशवासियों से अपने इतिहास पर गर्व करने और औपनिवेशिक शासन के दमन से मुक्ति के लिए संघर्ष करने का आह्वान किया।
- गौरव गान की सीमाएं व चुनौतियां:
- राष्ट्र की इस एकता की कोशिशों में एक बड़ी समस्या यह थी कि जब अतीत का गौरव गान किया गया तो वह मुख्य रूप से हिंदू इतिहास पर आधारित था, और जिन प्रतीकों व चित्रों का उपयोग किया गया वे हिंदू धार्मिक स्रोतों (Hindu iconography) से लिए गए थे। इसके कारण अन्य समुदायों के लोग खुद को उपेक्षित व अलग-थलग महसूस करने लगे।