भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योग की भूमिका

भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योग की भूमिका

भारतीय आर्थिक नियोजन (Indian Economic Planning) की रणनीति में, उद्योग (द्वितीयक क्षेत्र) को आर्थिक विकास का मुख्य इंजन (main engine of growth) माना गया है, विशेषकर स्वतंत्रता के बाद की प्रारंभिक योजनाओं में।


1. सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में योगदान का रुझान

आर्थिक विकास की प्रक्रिया के दौरान, द्वितीयक क्षेत्र (Secondary Sector) का सकल घरेलू उत्पाद (NDP/GDP) में हिस्सा लगातार बढ़ा है, जो अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन को दर्शाता है:

  • 1950-51 में, शुद्ध घरेलू उत्पाद (Net Domestic Product – NDP) में द्वितीयक क्षेत्र का योगदान लगभग 15.0 प्रतिशत था।
  • विनिर्माण (Manufacturing), जो द्वितीयक क्षेत्र का एक प्रमुख भाग है, उसका योगदान 1950-51 में 9.1 प्रतिशत था।
  • 1995-96 तक, द्वितीयक क्षेत्र का कुल शुद्ध घरेलू उत्पाद में योगदान बढ़कर 28.5 प्रतिशत हो गया था।
  • इसी अवधि तक, विनिर्माण क्षेत्र का हिस्सा बढ़कर 18.4 प्रतिशत हो गया।
  • निर्माण (Construction) का हिस्सा भी 1950-51 के 3.7 प्रतिशत से बढ़कर 1995-96 में 6.0 प्रतिशत हो गया था।

यह रुझान दर्शाता है कि औद्योगिक विकास आर्थिक संवृद्धि का एक महत्वपूर्ण कारक रहा है।

2. नियोजन रणनीति में उद्योगों का महत्व

भारत की पंचवर्षीय योजनाओं ने औद्योगिक विकास को प्राथमिकता दी, खासकर भारी उद्योगों को:

  • तीव्र औद्योगिकरण की रणनीति: भारतीय नियोजन की विकास रणनीति में स्व-पोषित अर्थव्यवस्था (Self-generating economy) प्राप्त करने के लिए भारी उद्योगों पर जोर दिया गया।
  • द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61) ने विशेष रूप से तीव्र औद्योगिकरण पर ध्यान केंद्रित किया। इस योजना का उद्देश्य मूल और भारी उद्योगों (Basic and Heavy Industries) के विकास के माध्यम से राष्ट्रीय आय और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि लाना था।
  • औद्योगिक नीति 1956: इस नीति में ‘समाजवादी समाज का स्वरूप’ (Socialist Pattern of Society) स्थापित करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र को महत्व दिया गया था।
  • सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90) के लक्ष्य के तहत औद्योगिक उत्पादन में 8.3 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर का लक्ष्य रखा गया था।

3. सार्वजनिक क्षेत्र की केंद्रीय भूमिका (Role of Public Sector)

नियोजन के प्रारंभिक दशकों में, भारतीय अर्थव्यवस्था में उद्योग के विकास में सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका केंद्रीय थी:

  • आधारभूत संरचना और पूँजी निर्माण: सार्वजनिक क्षेत्र पर आर्थिक आधारभूत संरचना (Economic Infrastructure), जैसे रेलवे, बिजली, इस्पात और सीमेंट उद्योगों के निर्माण का दायित्व था।
  • निवेश: 1950-51 से 1955-56 के बीच सार्वजनिक क्षेत्र में कुल निवेश (Outlay) का 30 प्रतिशत था।
  • क्षमता उपयोगिता और दक्षता की चुनौती: सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के सामने कुशल जनशक्ति (Trained manpower) की कमी, पूँजीगत वस्तुओं के अधिक उपयोग (Over-capitalisation), और खराब क्षमता उपयोगिता (Capacity Utilisation) जैसी समस्याएं थीं।

4. औद्योगिक विकास के उद्देश्य

औद्योगिक विकास केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं था, बल्कि व्यापक आर्थिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक था:

  • पूँजी संचय: औद्योगिक क्षेत्र पूंजी संचय (Capital Accumulation) की दर को बढ़ाने में सहायक होता है।
  • रोजगार सृजन: औद्योगिक विस्तार से, विशेष रूप से ग्रामीण विकास कार्यक्रमों और लघु/कुटीर उद्योगों के साथ संयोजन में, बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन की क्षमता है।
  • विदेशी मुद्रा को बचाना: आयात प्रतिस्थापन (Import Substitution) और निर्यात प्रोत्साहन (Export Promotion) के लक्ष्यों को प्राप्त करने में उद्योग महत्वपूर्ण हैं।
  • आर्थिक विविधीकरण (Diversification) और आधुनिकीकरण (Modernization): औद्योगिक विकास अर्थव्यवस्था को विविधीकृत करने और आधुनिक बनाने के लिए आवश्यक है।

5. औद्योगिक नीति 1991 के बाद

1991 की नई औद्योगिक नीति ने उद्योग की भूमिका में महत्वपूर्ण बदलाव लाए, जिसने निजी और विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया:

  • इस नीति ने औद्योगिक लाइसेंस प्रणाली को सरल बनाया।
  • इसने सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या को कम किया और निजी क्षेत्र के लिए बड़े पैमाने पर दरवाजे खोल दिए।
  • इस नीति का उद्देश्य एकाधिकार और प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम (MRTP Act) और विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (FERA) की सीमाओं को हटाना था।
  • विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Foreign Direct Investment) के लिए 51 प्रतिशत तक की हिस्सेदारी को स्वचालित अनुमोदन के तहत लाया गया।
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