छत्तीसगढ़ी लोकगीत: एक परिचय

छत्तीसगढ़ी लोकगीत: एक परिचय

डॉ. जीवन यदु द्वारा लिखित लेख “छत्तीसगढ़ी लोकगीत” छत्तीसगढ़ी लोकगीतों की समृद्ध परंपरा से परिचित कराता है और इस अनूठी संस्कृति को इसकी विविधता और समृद्धि के साथ बचाए रखने हेतु प्रेरित करता है।

लोकगीत की परिभाषा और प्रकृति

• लोकगीत ‘लोक’ की आंतरिकता की लयबद्ध और संगीतमय अभिव्यक्ति है।

• ‘लोक’ ने अपनी आंतरिकता को अभिव्यक्त करने के लिए विभिन्न माध्यम अपनाए, और यह अभिव्यक्ति कभी भी युगीन व्यवस्थाओं के दबावों से मुक्त नहीं रही।

• लोकगीत ‘लोक’ की सांस्कृतिक यात्रा का एक ऐसा साक्षी है, जो अपनी परंपरा में नवीनता का पक्षधर होता है।

• वर्तमान के लोकगीत-संगीत आदिम गीत-संगीत नहीं हैं, हालाँकि उन्होंने उनसे रस अवश्य ग्रहण किया होगा।

• मनुष्य के शिकारी जीवन से पशुपालक व्यवस्था में प्रवेश के बाद ही लोकगीत और लोकसंगीत ने रूप ग्रहण किया था।

• समय के साथ, कृषि व्यवस्था और सामंती व्यवस्था से गुजरते हुए, ये गीत आज के जटिल युग में अपने परिवर्तित रूप में पहुँचे हैं। लोक की आंतरिकता पर इन सभी व्यवस्थाओं का प्रभाव रहा है, और लोकगीतों में इन व्यवस्थाओं की स्मृतियाँ और अवशेष आज भी मिलते हैं।

• लोकमानस एक-सा होता है, इसलिए लोकगीतों की आंतरिक और बाह्य बुनावट को क्षेत्रीय अंतर बहुत अधिक प्रभावित नहीं करते।

• लोकगीत सामाजिक व्यवस्थाओं और परंपराओं की देन हैं। इनकी रचना किसी विशिष्ट व्यक्ति द्वारा नहीं, बल्कि उन सामान्य व्यक्तियों द्वारा होती है जिनका व्यक्तित्व सामाजिक व्यक्तित्व में पूरी तरह समाहित हो चुका होता है।

• लोकगीतकारों और लोकगायकों के माध्यम से एक पूरी जाति अपनी बात एकजुट होकर प्रस्तुत करती है। यही कारण है कि लोकगीतों में किसी व्यक्ति विशेष के बजाय पूरी जाति का व्यक्तित्व परिलक्षित होता है।

छत्तीसगढ़ी लोकगीतों की विशेषताएँ

1. सामूहिकता: लोकगीत किसी अकेले व्यक्ति की पुकार या ‘अरण्यरोदन’ नहीं होते। वे सामूहिक भावना और सहयोग के विचार पर आधारित होते हैं।

2. सहज संप्रेषणीयता: ये गीत सहज रूप से संप्रेषित होते हैं क्योंकि वे किसी एक व्यक्ति की अभिव्यक्ति नहीं होते, समूह की मानसिकता पर आधारित होते हैं, मनोरंजन का साधन होते हैं, और लोकजीवन की सहजता उन्हें असहज नहीं होने देती।

3. भावनात्मक गहराई: इनमें सुख और दुःख दोनों का समाजीकरण होता है। ये शब्द और धुन दोनों में मस्ती से भरे होते हैं, जिससे लोकजीवन अपने दुःखों को भी भूल जाता है।

4. ऐतिहासिकता और सांस्कृतिक धरोहर: लोकगीतों में इतिहास छिपा होता है, केवल उनके भावों में ही नहीं, बल्कि उनके शब्दों में भी इतिहास की झलक मिलती है। ये लोक की सांस्कृतिक यात्रा के साक्षी होते हैं और लोकसंस्कारों की पूरी छाप इन पर होती है।

5. विविध विषय-वस्तु: इनमें शृंगार और प्रेम की खुली अभिव्यक्ति मिलती है। ये सामाजिक सहयोग और लोकस्वभाव को दर्शाते हैं।

6. व्यंग्यात्मक स्वर: लोकगीतों में विरोध का स्वर अक्सर व्यंग्य के रूप में फूटता है, जैसे जमींदारी प्रथा या अंग्रेजी शासन के प्रति।

7. चित्रात्मक वर्णन: कई लोकगीतों में चित्रों की रचना इतनी सजीव होती है कि श्रोताओं को घटना अपनी आँखों के सामने घटती हुई प्रतीत होती है।

8. परिवर्तन और विकास: लोकसाहित्य अपने परिवर्तन में ही विकास पाता है और इतिहास का हमकदम होता है। लोकगीतकार अपने युगबोध को स्वर देते हैं।

छत्तीसगढ़ी लोकगीतों के प्रमुख उदाहरण

1. सुवागीत (Suwa Geet)

    ◦ अवसर: दीपावली के अवसर पर छत्तीसगढ़ में यह गीत गाने की परंपरा है।

    ◦ विषय: इसमें नारी पीड़ा का वर्णन होता है, जो समूची नारी जाति की पीड़ा बन जाती है। यह मध्ययुगीन नारी पीड़ा को दर्शाता है, जब स्त्री होना ही पीड़ादायक माना जाता था।

    ◦ उदाहरण: “चंदा सुरुज तोर पैंया परत हंव, तिरिया जनम झन देबे न रे सुवा ना। पहिली गवन करि मेंझरी बैठा रे सुवा ना, धनि छोड़ चले बनिझार।” (अर्थ: हे चाँद और सूरज, मैं तुम्हारे पाँव पड़ती हूँ, अगले जन्म में मुझे स्त्री मत बनाना। गवन कराने के बाद मैं पहली बार अपने पति के घर आई हूँ, और मेरे पति मुझे यहाँ अकेली छोड़कर खुद काम पर चले गए हैं।)।

2. राउत नाचा (Raut Nacha)

    ◦ अवसर: यह दीपावली के समय ‘मंडई’ में गाया जाता है।

    ◦ विषय: इसके दोहों में सामंती व्यवस्था की झलक मिलती है, जैसे ‘रंगमहल’ और ‘मालिक’ जैसे शब्द। राउत अपने दोहों के माध्यम से ‘ठाकुर’ (जमींदार) पर भी व्यंग्य करते हैं।

    ◦ उदाहरण: “गाय बइला के सींग म, मै हां देखंव माटी। ठाकुर पहिरे सोना चांदी, ठकुराइन पहिरे घांटी।” (अर्थ: गाय-बैल के सींग में मैं माटी देखता हूँ, ठाकुर सोना-चाँदी पहनते हैं और ठकुराइन घंटी।)।

3. जंवारा-गीत (Janwara Geet)

    ◦ विषय: इस लोकगीत में देवी माँ की कल्पना अत्यंत सादगीपूर्ण तरीके से, अपनी खुद की माँ के समान की गई है। सोने-चाँदी के गहनों के बजाय फूलों के गहनों का वर्णन होता है, जो लोक की सादगी और सत्य को दर्शाता है।

    ◦ उदाहरण: “माता फूल गजरा गूंथव हो मालिन के देहरी, हो फूल गजरा। काहसुं फूल के गजरा, काहसुं फूल के हार। काहसुं फूल के तोर माथ मटुकिया, सोलहों सिंगार। चंपा फूल के गजरा चमेली फूल के हार। चमेली फूल के माथ मटुकिया, सोलहों सिंगार।”।

4. बाँस गीत (Baans Geet)

    ◦ गायक: यह गीत विशेष रूप से गोपालक जातियों द्वारा गाया जाता है।

    ◦ विषय: इसमें धरती, अहीरों, गाय-भैंसों, और यादव कुल को प्रणाम किया जाता है, जो उनकी आजीविका और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा है।

    ◦ उदाहरण: “पहिली धरती अउ पिरथी, दूसर बंदव अहिरान। तीसर बंदव गाय-भैंस ला, काटय चोला के अपराध। चौथे बंदव नोई कसेली, राउत के करे प्रतिपाल। पांचवे बंदव अहिर पिलोना, जनमे हे गोपी ग्वाल।”।

5. विवाह संस्कार के गीत

    ◦ विषय: ये गीत लोकसंस्कारों को चित्रित करते हैं और इनमें सभी रिश्तेदारों को जगह दी जाती है, जो सामाजिक सहयोग और आत्मीय वातावरण के लोकस्वभाव को दर्शाता है।

    ◦ उदाहरण: “दद्दा तोर लानिस हरदी-सुपारी ओ, दाई लानय तिला तेल। कोनो चढ़ाथय तोर मन भर हरदी ओ, कोनो देबय अंचरा के छांव। फूफू चढ़ाव तोर तन भर हरदी ओ, दाई देबय अंचरा के छांव।”।

6. पंडवानी (Pandwani)

    ◦ विषय: यह एक कथात्मक लोकगीत विधा है जिसमें चित्रों की रचना विशेष रूप से देखने को मिलती है। इसमें राजा विराट के साले और सेनापति कीचक के शृंगार का वर्णन या सेना-प्रयाण के दृश्यों का चित्रात्मक वर्णन होता है।

    ◦ उदाहरण: “रानी के नेवता कीचक पावय थी, साजे सिंगार राजा चलत हावय न, माथे म मुकुट राजा बांधत हावय थी, कानस म कुंडल राजा पहिरत हावय थी, गले म गजमुत्ता के हार सोहय थी,”।

    ◦ उदाहरण: “लुहंगी, सांव संलगनी, हाथी गदगद, गदगद, घोड़ा सरपट, पैदल रटपट, सेना करिन पयान।”।

7. जसगीत (Jasgeet)

    ◦ विषय: यह भक्ति संबंधी गीत है जिसमें देवी माँ से आशीर्वाद मांगा जाता है।

लोकगीतों में आधुनिक युगबोध

• छत्तीसगढ़ी लोकगीत युगबोध को स्वर देते हैं, जैसे अंग्रेजी शासन के दौरान के गीत।

उदाहरण: “पीपर के पाना गलर- गलिया। अंगरेजवा के राज कलर- गलिया।”।

उदाहरण: “नरवा के तीर हा दिखत हस हरियर। टोपी वाला नइ दिखय, बदे हस नरियर।” (अर्थात् नदी के किनारे हरे-भरे हो गए हैं, मुझे टोपी वाला (अंग्रेज) नहीं दिख रहा है, इसके लिए मैंने नारियल के साथ मन्नत मांगी है।)।

• नाचा-गम्मतों में लोकगायक ज्वलंत समस्याओं को लेकर जीवंत अभिव्यक्ति देते हैं।

• इस तरह छत्तीसगढ़ी लोकगीतों के माध्यम से यहाँ के समग्र लोकजीवन और लोकसंस्कृति को समझा जा सकता है।

अतिरिक्त जानकारी एवं अभ्यास के बिंदु

समानताएँ: क्षेत्रीय लोकगीतों में पाई जाने वाली समानताएँ।

वर्गीकरण: ऐसे लोकगीतों की सूची बनाना जो केवल पुरुषों, केवल महिलाओं, या पुरुषों और महिलाओं द्वारा सम्मिलित रूप से गाए जाते हैं।

विविध पर्वों पर गीत: विभिन्न पर्वों पर गाए जाने वाले लोकगीतों की जानकारी।

विवाह गीत: विवाह गीतों में हास्य-व्यंग्य के उदाहरण।

नृत्य और वेशभूषा: सुवा, पंथी, करमा और राउत नाचा में नृत्य की पोशाक और प्रयुक्त अन्य सामग्रियाँ।

लोककथाओं पर आधारित गीत: लोककथाओं के आधार पर रचे गए लोकगीतों के नाम।

शब्दार्थ: लोकगीतों में प्रयुक्त विशिष्ट शब्दों (जैसे साक्षी, रूपांतरित, लान्छित, मयारू, नुून, दूब फोरा, फुफु, घंटी, असीस, कलर-गलिया, नोई, कसेली) का अर्थ समझना।

भाषा संबंधी अभ्यास: ‘इक’ प्रत्यय वाले शब्द, एक से अधिक अर्थ वाले शब्द, पुल्लिंग-स्त्रीलिंग शब्द, ‘लोक’ शब्द से नए शब्द बनाना।

परियोजना कार्य: छत्तीसगढ़ी विवाह गीतों का संकलन, नृत्यों के चित्रों का संकलन।

आपके प्रश्न “इस पाठ के महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर लिखो” के जवाब में, दिए गए स्रोतों के आधार पर छत्तीसगढ़ी लोकगीत से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर यहाँ दिए गए हैं:

यह पाठ्यपुस्तक भाषा-शिक्षण के नए संदर्भों को सामने रखकर लिखी गई है, जहाँ पाठ के प्रश्नों से बच्चों को विषय-वस्तु को बेहतर ढंग से समझने के अवसर मिलते हैं।


पाठ 2-1: छत्तीसगढ़ी लोकगीत (लेखक: डॉ. जीवन यदु)

पाठ से (From the Lesson)

  1. क्षेत्रीय लोकगीतों में पाई जाने वाली समानताएँ क्या-क्या हो सकती हैं?
    • लोकमानस एक-सा होता है, इसलिए लोकगीतों की आंतरिक और बाह्य बुनावट को क्षेत्रीय अंतर अधिक प्रभावित नहीं करते।
    • इनमें सुख और दुःख दोनों का समाजीकरण होता है।
    • इन गीतों में इतिहास छिपा होता है, न केवल उनके भावों में, बल्कि उनके शब्दों में भी इतिहास की झलक होती है।
    • लोकसंस्कारों की पूरी छाप इन गीतों पर होती है, जो लोकस्वभाव में घुलकर लोकचरित्र में शामिल हो चुके हैं।
    • ये गीत सामूहिक भावना और सहयोग के विचार पर आधारित होते हैं, अकेले व्यक्ति की पुकार या ‘अरण्यरोदन’ नहीं होते।
    • ये सहज संप्रेषणीय होते हैं क्योंकि ये समूह की मानसिकता पर आधारित होते हैं और लोकजीवन की सहजता इन्हें असहज नहीं होने देती।
  2. सुवागीत की विशेषताएँ लिखिए।
    • यह छत्तीसगढ़ में दीपावली के अवसर पर गाने की एक परंपरा है।
    • इन गीतों में नारी पीड़ा का वर्णन होता है, जो समूची नारी जाति की पीड़ा बन जाती है।
    • यह मध्ययुगीन नारी पीड़ा को दर्शाता है, जब स्त्री होना अपने आप में पीड़ादायक माना जाता था।
    • इन गीतों में इतिहास छिपा होता है, न केवल उनके भावों में, बल्कि उनके शब्दों में भी इतिहास की झलक होती है।
  3. राउत नाचा के दोहों में से उदाहरणार्थ कोई दोहा लिखिए जिससे सामंती व्यवस्था की याद आती हो।
    • एक दोहा है: “गाय बइला के सींग म, मै हां देखंव माटी। ठाकुर पहिरे सोना चांदी, ठकुराइन पहिरे घांटी।
    • इस दोहे में ठाकुर द्वारा सोना-चाँदी पहनने और ठकुराइन द्वारा घंटी पहनने का वर्णन सामंती व्यवस्था की झलक देता है, जबकि राउत स्वयं गाय-बैलों की मिट्टी देखते हैं।
  4. ‘मतरारी’ क्या है?
    • ‘मतरारी’ यादव जाति के द्वारा भाईदूज के दिन मनाया जाने वाला एक पर्व है, जिसे ‘मातर-पर्व’ भी कहते हैं।
  5. छत्तीसगढ़ के भक्ति संबंधी लोकगीत कौन-कौन से हैं?
    • जंवारा-गीत: इस लोकगीत में देवी माँ की कल्पना अत्यंत सादगीपूर्ण तरीके से, अपनी खुद की माँ के समान की गई है।
    • बाँस गीत: इस गीत में धरती, अहीरों, गाय-भैंसों और यादव कुल को प्रणाम किया जाता है, जो उनकी आजीविका और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा है।
    • जसगीत: यह भक्ति संबंधी गीत है जिसमें देवी माँ से आशीर्वाद मांगा जाता है।
  6. लोकगीत सहज संप्रेष्य क्यों होते हैं?
    • लोकगीत सहज संप्रेष्य होते हैं क्योंकि वे किसी एक व्यक्ति की अभिव्यक्ति नहीं होते, बल्कि समूह की मानसिकता पर आधारित होते हैं।
    • ये मनोरंजन का साधन होते हैं और लोकजीवन की सहजता उन्हें असहज नहीं होने देती।
    • इनमें सुख और दुःख दोनों का समाजीकरण होता है, जिससे लोकजीवन अपने दुःखों को भी भूल जाता है।
    • इन गीतों के लय और शब्द हर आदमी के हृदय को छू सकते हैं।
  7. पाठ में दिए गए कौन-कौन से लोकगीत पर्वों से संबंधित हैं?
    • सुवागीत: दीपावली के अवसर पर गाया जाता है।
    • राउत नाचा (या इसके दोहे): दीपावली के समय ‘मंडई’ में गाया जाता है।
    • जंवारा-गीत और जसगीत: ये भक्ति संबंधी गीत हैं जो देवी पूजा के अवसरों पर गाए जाते हैं।
    • विवाह संस्कार के गीत: विवाह जैसे सामाजिक पर्वों पर गाए जाते हैं।
    • बाँस गीत: गोपालक जातियों द्वारा अपने विशिष्ट पर्वों और परंपराओं पर गाया जाता है।

पाठ से आगे (Beyond the Lesson)

  1. आपके आस-पास ऐसे कौन-कौन से लोकगीत हैं जो-
    • (क) केवल पुरुषों द्वारा गाए जाते हैं?
      • स्रोत में सीधे तौर पर वर्गीकृत नहीं किया गया है, लेकिन राउत नाचा और बाँस गीत परंपरागत रूप से पुरुष प्रधान आयोजनों और गोपालक जातियों द्वारा गाए जाते हैं।
    • (ख) केवल महिलाओं द्वारा गाए जाते हैं?
      • सुवागीत
    • (ग) पुरुषों और महिलाओं द्वारा सम्मिलित रूप से गाए जाते हैं?
      • विवाह संस्कार के गीत में सभी रिश्तेदार शामिल होते हैं, जो सामाजिक सहयोग को दर्शाता है।
  2. जैसे होली के अवसर पर ‘फाग गीत’ गाए जाते हैं, वैसे ही अन्य पर्वों पर कौन-कौन से लोकगीत गाए जाते हैं?
    • दीपावली: सुवागीत और राउत नाचा के दोहे।
    • देवी पूजा/नवरात्रि: जंवारा-गीत और जसगीत।
    • विवाह: विवाह संस्कार के गीत।
    • गोपालक जातियों के पर्व: बाँस गीत।
    • भाईदूज (यादव जाति): मतरारी पर्व (संदर्भित)।
  3. विवाह गीतों में हास्य-व्यंग्य कहाँ देखने को मिलता है? उदाहरण सहित लिखिए।
    • दिए गए स्रोतों में विवाह गीतों के उदाहरण सामाजिक सहयोग और आत्मीय वातावरण को दर्शाते हैं, उनमें हास्य-व्यंग्य का प्रत्यक्ष उदाहरण नहीं दिया गया है। पाठ में विरोध का स्वर व्यंग्य के रूप में जमींदारी प्रथा या अंग्रेजी शासन के संदर्भ में आता है।
  4. सुवागीतों का संकलन कर उनके विषय को लिखिए।
    • स्रोतों में सुवागीत का एक उदाहरण दिया गया है, जिसका मुख्य विषय नारी पीड़ा है। यह मध्ययुगीन नारी की पीड़ा को दर्शाता है, जब स्त्री होना ही कष्टदायक माना जाता था। विशेष रूप से, पति के काम के लिए दूर चले जाने पर अकेली बैठी पत्नी के दुख का वर्णन है। (अधिक संकलन के लिए बाहरी स्रोतों की आवश्यकता होगी)।
  5. सुवा, पंथी, करमा और राउत नाचा में गीत के साथ किए जा रहे नृत्य की पोशाक और प्रयुक्त अन्य सामग्रियों की सूची बनाइए।
    • स्रोतों में सुवागीत और राउत नाचा का उल्लेख है। सुवागीत में महिलाएँ तोते (सुवा) की आकृति के साथ नृत्य करती हैं। राउत नाचा दीपावली के समय होता है। पंथी और करमा का उल्लेख केवल अभ्यास प्रश्न में है। किसी भी नृत्य की पोशाक या प्रयुक्त अन्य सामग्रियों का विस्तृत विवरण स्रोतों में नहीं दिया गया है
  6. लोककथाओं के आधार पर रचे गए लोकगीतों के नाम लिखिए।
    • पंडवानी एक कथात्मक लोकगीत विधा है जो लोककथाओं (महाभारत की कथाओं) के आधार पर रची गई है। इसमें राजा विराट के साले कीचक के शृंगार या सेना के प्रस्थान जैसे दृश्यों का वर्णन मिलता है।
  7. पंडवानी में गाई गई कथा के किसी एक प्रसंग को अपने शब्दों में लिखिए।
    • पंडवानी में राजा विराट के साले और सेनापति कीचक के शृंगार का एक प्रसंग वर्णित है। इसमें कीचक का माथे पर मुकुट बाँधना, कानों में कुंडल पहनना और गले में गजमुक्ता का हार पहनना जैसे चित्रमय वर्णन मिलते हैं, जब वह सैरंध्री (द्रौपदी) के कक्ष में गया था।

भाषा के बारे में (About Language)

  1. सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, वास्तविक आदि शब्द पाठ में आए हैं। इनमें मूल शब्दों में ‘इक’ प्रत्यय लगा है। इनके मूल शब्दों को पहचानकर लिखिए तथा ऐसे ही तीन उदाहरण और लिखिए।
    • सामाजिक: मूल शब्द ‘समाज’।
    • सांस्कृतिक: मूल शब्द ‘संस्कृति’।
    • आर्थिक: मूल शब्द ‘अर्थ’।
    • वास्तविक: मूल शब्द ‘वास्तव’ (या ‘वास्तविकता’)।
    • तीन अतिरिक्त उदाहरण (ये शब्द सीधे पाठ में ‘इक’ प्रत्यय के उदाहरण के रूप में नहीं हैं, बल्कि यह सामान्य व्याकरण से हैं):
      • मौखिक (मुख + इक)
      • वैचारिक (विचार + इक)
      • धार्मिक (धर्म + इक)
  2. ‘अर्थ’ तथा ‘रस’ ऐसे शब्द हैं जिनके एक से अधिक अर्थ हैं। आप ऐसे ही और पाँच शब्द खोजकर लिखिए।
    • काल: समय, मृत्यु (उदा. ‘काल बली’)
    • पत्र: पत्ता, चिट्ठी (उदा. ‘पीपर के पाना’, ‘चुनाव पत्र’)
    • भाव: भावना, दर (उदा. ‘उनके भावों में ही नहीं’, ‘गंभीर भाव’)
    • उत्तर: जवाब, दिशा (उदा. ‘वहाँ से उत्तर आया’, ‘जवाब दो’)
    • हार: पराजय, माला (उदा. ‘गजमुक्ता के हार’, ‘हार कर बैठ जाते हैं’)
  3. पाठ से निम्नलिखित शब्द लिए गए हैं। इन्हें स्त्रीलिंग और पुल्लिंग शब्दों के रूप में पहचानकर अलग कीजिए।प्रकाश, व्यवस्था, माध्यम, परंपरा, नवीनता, संगीत, रस, लोकगीत, स्मृतियाँ, प्रतिक्रियाएँ।
    • पुल्लिंग शब्द: प्रकाश, माध्यम, संगीत, रस, लोकगीत
    • स्त्रीलिंग शब्द: व्यवस्था, परंपरा, नवीनता, स्मृतियाँ, प्रतिक्रियाएँ
  4. निम्नलिखित शब्दों का उपयोग करते हुए एक कहानी लिखिए:शिकारी, किसान, चरवाहा, जंगल, बांसुरी, संगीत, वन्य-पशु, चिड़िया, शेर, चरवाहा, राजा, भय, पुरस्कार, प्रसन्नता, दरबार।
    • यह प्रश्न रचनात्मक लेखन पर आधारित है, और इसका उत्तर दिए गए स्रोतों में प्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध नहीं है। छात्रों को स्वयं कहानी लिखनी होगी।
  5. ‘लोक’ शब्द में ‘गीत’ जोड़कर बना लोकगीत। आप ‘लोक’ शब्द के साथ अन्य शब्द जोड़कर कितने शब्द बना सकते हैं? लिखिए।
    • लोकगीत
    • लोकमानस
    • लोकसाहित्य
    • लोकजीवन
    • लोकसंस्कार
    • लोकस्वभाव
    • लोकचरित्र
    • लोककथा
    • लोककला (संदर्भित)
    • लोकसंस्कृति
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