साखी (कबीरदास)
पाठ का सार (Introduction)
‘साखी’ शब्द ‘साक्षी’ का तद्भव रूप है, जिसका अर्थ है— प्रत्यक्ष ज्ञान। कबीर के अनुसार अनुभव ज्ञान ही सर्वोपरी है। उन्होंने अपनी साखियों के माध्यम से समाज के पाखंडों पर चोट की है और आत्मा-परमात्मा के प्रेम को दर्शाया है।
मुख्य साखियाँ एवं भावार्थ
“ऐसी बाँणी बोलिये, मन का आपा खोइ।”
भाव: हमें अहंकार त्याग कर ऐसी मीठी वाणी बोलनी चाहिए जिससे हमें खुद शांति मिले और दूसरों को भी सुख प्राप्त हो।
“कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि।”
भाव: जैसे मृग अपनी ही नाभि में छिपी कस्तूरी को जंगल में ढूँढता है, वैसे ही ईश्वर हमारे हृदय (घट-घट) में है, पर हम उसे बाहर खोजते हैं।
“निंदक नेड़ा राखिये, आँगणि कुटी बँधाइ।”
भाव: आलोचक को हमेशा अपने पास रखना चाहिए क्योंकि वह बिना साबुन और पानी के हमारे स्वभाव को निर्मल बना देता है।
भाषा शैली
- भाषा: सधुक्कड़ी (पचमेल खिचड़ी)
- अलंकार: अनुप्रास, रूपक, और पुनरुक्ति प्रकाश।
- छंद: दोहा।
शब्द-अर्थ
- बाँणी: वाणी (बोली)
- आपा: अहंकार
- कुंडलि: नाभि
- नेड़ा: पास/निकट
- भुवंगम: साँप
Concept Map
Topper’s Tip:
साखियों में कबीर ने तद्भव शब्दों का अधिक प्रयोग किया है। उत्तर लिखते समय इस बिंदु को ज़रूर लिखें!