Class 10 Surdas सूरदास

Class 10 Surdas सूरदास

सूरदास के चारों पदों के शब्दार्थ और पंक्तिवार भावार्थ स्रोतों के आधार पर निम्नलिखित हैं:

प्रथम पद (ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी…)

शब्दार्थ:

  • बड़भागी: भाग्यवान
  • अपरस: अलिप्त, अछूता
  • तगा: धागा, बंधन
  • पुरइिनि पात: कमल का पत्ता
  • दागी: दाग या धब्बा
  • माहँ: में
  • प्रीति-नदी: प्रेम की नदी
  • पाउं: पैर
  • बोरयौ: डुबोया
  • पारागी: मुग्ध होना
  • गुर चाँटी ज्यों पागी: जिस प्रकार चींटी गुड़ में लिपटती है, वैसे ही हम कृष्ण के प्रेम में लीन हैं।

पंक्तिवार भावार्थ:

  1. ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी। – गोपियाँ उद्धव पर व्यंग्य करते हुए कहती हैं कि हे उद्धव! तुम सचमुच बहुत भाग्यशाली हो।
  2. अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी। – क्योंकि तुम प्रेम रूपी धागे के बंधन से पूरी तरह अछूते रहे हो और तुम्हारा मन किसी के अनुराग (प्रेम) में नहीं डूबा है।
  3. पुरइिनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी। – तुम उस कमल के पत्ते के समान हो जो रहता तो जल के भीतर है, पर उसके शरीर पर पानी की एक बूंद का दाग भी नहीं लगता।
  4. ज्यों जल माहँ तेल की गागरि, बूंद न ताकौं लागी। – या फिर उस तेल लगी हुई गागर (मटके) की तरह हो, जिसे जल में डुबोने पर भी उस पर पानी की एक बूंद नहीं ठहरती।
  5. प्रीति-नदी में पाउं न बोरयौ, दृष्टि न रूप परागी। – तुमने आज तक प्रेम की नदी में अपना पैर नहीं डुबोया और न ही तुम्हारी दृष्टि कृष्ण के रूप-सौंदर्य पर मुग्ध हुई है।
  6. ‘सूरदास’ अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यों पागी॥ – सूरदास के अनुसार गोपियाँ कहती हैं कि हम तो भोली-भाली अबलाएँ हैं, जो कृष्ण के प्रेम में उस तरह लिपटी हैं जैसे चींटी गुड़ से चिपक जाती है।

द्वितीय पद (मन की मन ही माँझ रही…)

शब्दार्थ:

  • माँझ: भीतर
  • अवाधि: समय
  • अधार: आधार
  • आवन: आगमन
  • बिथा: व्यथा/पीड़ा
  • बिरहिनि: वियोग में जीने वाली
  • बिरह दही: विरह की आग में जल रही हैं
  • गुहारि: रक्षा के लिए पुकारना
  • उत: उधर से
  • धीर: धैर्य
  • मरजादा न लही: मर्यादा नहीं रही/पालन नहीं किया।

पंक्तिवार भावार्थ:

  1. मन की मन ही माँझ रही। – गोपियाँ कहती हैं कि हमारे मन की प्रेम-भावनाएँ मन के अंदर ही दबकर रह गई हैं।
  2. कहिइ जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही। – हे उद्धव! अब तुम ही बताओ, हम अपनी यह व्यथा किससे जाकर कहें? प्रेम की बातें सबके सामने नहीं कही जा सकतीं।
  3. अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही। – अब तक हम कृष्ण के आने की अवधि (समय) को ही अपने जीवन का आधार मानकर तन और मन की इस पीड़ा को सहन कर रही थीं।
  4. vc bu tksx l¡nslfu lqfu-lqfu, fcjfgfu fcjg ngh। – लेकिन अब तुम्हारे इन योग-संदेशों को सुन-सुनकर हम विरहनियाँ विरह की आग में और जलने लगी हैं।
  5. pkgfr gqrha xqgkfj ftr¯g rSa, mr rSa èkkj cgh। – हम अपनी रक्षा के लिए जहाँ से गुहार लगाना (पुकारना) चाहती थीं, वहीं से योग की यह कष्टकारी धारा बह रही है।
  6. ‘lwjnkl’ vc èkhj èkj¯g D;kSa, ejtknk u ygh॥ – सूरदास के अनुसार गोपियाँ कहती हैं कि अब हम धैर्य क्यों धारण करें, जब कृष्ण ने ही प्रेम की मर्यादा का पालन नहीं किया है।

तृतीय पद (हमारैं हरि हारिल की लकरी…)

शब्दार्थ:

  • हारिल: एक पक्षी जो अपने पैरों में हमेशा लकड़ी दबाए रहता है।
  • नंद-नंदन: कृष्ण (नंद के पुत्र)
  • उर: हृदय
  • कन-कन: कृष्ण-कृष्ण
  • जकरी: रटती रहती हैं
  • करुई ककरी: कड़वी ककड़ी
  • ब्याधि: रोग/पीड़ा पहुँचाने वाली वस्तु
  • करी: भोगा/अनुभव किया
  • तिनहिं: उनको
  • चकरी: जिनका मन स्थिर नहीं रहता।

पंक्तिवार भावार्थ:

  1. हमारैं हरि हारिल की लकरी। – हमारे लिए भगवान कृष्ण हारिल पक्षी की उस लकड़ी के समान हैं, जिसे वह कभी नहीं छोड़ता।
  2. मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी। – हमने मन, कर्म और वचन से नंद के लाल कृष्ण को अपने हृदय में दृढ़तापूर्वक बसाया हुआ है।
  3. जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जकरी। – जागते, सोते, सपने में और दिन-रात हमारा मन केवल ‘कृष्ण-कृष्ण’ की रट लगाता रहता है।
  4. लुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यों करुई ककरी। – तुम्हारा यह योग-संदेश सुनकर ऐसा लगता है, जैसे कोई कड़वी ककड़ी खा ली हो।
  5. सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी। – तुम तो हमारे लिए ऐसी बीमारी (योग) ले आए हो, जिसे न हमने पहले कभी देखा, न सुना और न ही कभी भोगा है।
  6. यह तौ ‘सूर’ तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चक्री॥ – सूरदास के माध्यम से गोपियाँ कहती हैं कि यह योग का संदेश तो उन्हें ले जाकर दो, जिनका मन चकरी के समान अस्थिर रहता है।

चतुर्थ पद (हरि हैं राजनीति पढ़ि आए…)

शब्दार्थ:

  • मधुकर: उद्धव (भँवरे के माध्यम से संबोधन)
  • हुते: थे
  • पठाए: भेजा
  • आगे के: पहले के/पुराने
  • पर हित: दूसरों के कल्याण के लिए
  • डोलत धाए: दौड़ते-फिरते थे
  • फेरि: फिर से
  • अनीति: अन्याय

पंक्तिवार भावार्थ:

  1. हरि हैं राजनीति पढ़ि आए। – गोपियाँ कहती हैं कि कृष्ण अब राजनीति पढ़ आए हैं।
  2. समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए। – उद्धव (मधुकर) की बातें सुनकर हम सब समझ गईं और हमें कृष्ण का सारा समाचार मिल गया।
  3. इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए। – एक तो वे पहले से ही बहुत चतुर थे, ऊपर से अब उन्होंने बड़े-बड़े ग्रंथ पढ़ लिए हैं।
  4. बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-संदेस पठाए। – उनकी बुद्धि कितनी बढ़ गई है, यह इसी बात से पता चलता है कि उन्होंने हमारे लिए योग का संदेश भेजा है।
  5. ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए। – हे उद्धव! पहले के लोग बहुत भले थे, जो दूसरों के कल्याण के लिए दौड़ते-फिरते थे।
  6. अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए। – अब हम अपना वह मन वापस पा लेंगी, जिसे कृष्ण यहाँ से जाते समय चुरा ले गए थे।
  7. ते क्यों अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए। – वे स्वयं हम पर अन्याय क्यों कर रहे हैं, जिनका काम ही दूसरों को अन्याय से छुड़ाना है?
  8. राज धरम तौ यहै ‘सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए॥ – सूरदास के अनुसार गोपियाँ कहती हैं कि सच्चा राजधर्म तो वही है, जिसमें प्रजा को सताया न जाए।

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Class 10 Surdas सूरदास

प्रश्न सूरदास का जन्म कब हुआ ?
उत्तर सूरदास का जन्म सन् 1478 में माना जाता है ।
प्रश्न सूरदास का जन्म कहां हुआ माना जाता है ? उत्तर एक मान्यता के अनुसार सूरदास का जन्म मथुरा के निकट रुनकता या रेणुका क्षेत्र में हुआ , जबकि दूसरी मान्यता के अनुसार उनका जन्म दिल्ली के पास सीही स्थान माना जाता है।
प्रश्न सूरदास किसके शिष्य थे?
उत्तर सूरदास महाप्रभु वल्लभाचार्य के शिष्य थे।
प्रश्न सूरदास कौन से कवियों में ज्यादा प्रसिद्ध है ?
उत्तर सूरदास अष्टछाप कवियों में ज्यादा प्रसिद्ध है।
प्रश्न सूरदास कहां रहते थे ?
उत्तर वह मथुरा और वृंदावन के बीच गऊघाट पर रहते थे ।
प्रश्न सूरदास कौन से मंदिर में भजन-कीर्तन करते थे ?
उत्तर वह श्रीनाथजी के मंदिर में भजन-कीर्तन करते थे।
प्रश्न सूरदास का निधन कब और कहां हुआ था?
उत्तर उनका निधन सन् 1583 में पारसौली में हुआ था ।

प्रश्न सूरदास ने कौन – से तीन कौन से तीन ग्रंथ लिखे थे?
उत्तर सूरसागर , साहित्य लहरी और सूर सारावली।
प्रश्न सूरदास के तीनों ग्रंथों में से सर्वाधिक लोकप्रिय कौन सा ग्रंथ हुआ?
उत्तर सूरदास का ‘सूरसागर’ ग्रंथ सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ।
प्रश्न सूरदास कौन से श्रेष्ठ कवि माने जाते हैं?
उत्तर सूरदास ‘वात्सल्य’ और ‘श्रृंगार’ के श्रेष्ठ कवि माने जाते हैं ।
प्रश्न सूरदास की कविता में कौन-सी भाषा का रूप मिलता है?
उत्तर ब्रजभाषा का।

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