राजकोषीय नीति और मौद्रिक नीति Fiscal Policy and Monetary Policy

राजकोषीय नीति और मौद्रिक नीति Fiscal Policy and Monetary Policy

1. राजकोषीय नीति (Fiscal Policy)

राजकोषीय नीति, जो सरकार के राजस्व (Revenue) और व्यय (Expenditure) से संबंधित होती है, भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण रही है, विशेष रूप से नियोजन और संसाधन जुटाने (Resource Mobilisation) के संदर्भ में।

A. वित्तीय संसाधन जुटाना और कराधान (Resource Mobilisation and Taxation)

पंचवर्षीय योजनाओं के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधनों को जुटाने के लिए राजकोषीय उपायों का उपयोग किया जाता था।

  • अतिरिक्त कराधान (Additional Taxation): अतिरिक्त संसाधन जुटाव (Additional Resource Mobilisation) के तहत करों (Taxes) को लागू करने पर जोर दिया जाता था।
  • घरेलू बजटीय स्रोत (Domestic Budgetary Sources): योजनाओं के वित्तपोषण के लिए घरेलू बजटीय स्रोतों का उपयोग किया गया है। इसमें चालू राजस्व से अधिशेष (Surplus from current revenues), सरकारी उद्यमों का योगदान, बाजार ऋण (Market Borrowings), भविष्य निधि (Provident Funds), और अन्य गैर-सरकारी बचतें शामिल हैं।
  • कर राजस्व की सीमाएँ: हालाँकि कराधान संसाधन जुटाने का एक साधन है, करों को बढ़ाने पर कुछ सामाजिक और राजनीतिक दबावों के कारण कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं।

B. घाटा वित्तपोषण (Deficit Financing / न्यून वित्त प्रबंध)

राजकोषीय नीति का एक केंद्रीय पहलू घाटा वित्तपोषण (Deficit Financing or न्यून वित्त प्रबंध) रहा है, खासकर जब नियोजित परियोजनाओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं होते थे। यह सरकार द्वारा आरक्षित बैंक ऑफ़ इंडिया से प्राप्त किए गए अग्रिमों (Advances) और राजस्व से अधिक व्यय की पूर्ति से जुड़ा है।

विभिन्न योजनाओं में इसकी भूमिका:

  • प्रथम योजना (1951-56): न्यून वित्त प्रबंध (Deficit Financing) का उपयोग किया गया था।
  • पाँचवीं योजना (1974-79): योजना के कुल परिव्यय में 17 प्रतिशत न्यून वित्त प्रबंध से वित्तपोषित किया गया था।
  • सातवीं योजना (1985–90): इस योजना में अनुमानित 14,000 करोड़ रुपये का न्यून वित्त प्रबंध शामिल था, जो कुल वित्त प्रबंधन का 7.8 प्रतिशत था।
  • आठवीं योजना (1992–97): पिछली योजनाओं में उच्च न्यून वित्त प्रबंध के कारण उत्पन्न स्फीतिकारी प्रभावों को देखते हुए, आठवीं योजना के प्रारंभिक अनुमानों में इसे 20,000 करोड़ रुपये लक्षित किया गया था, लेकिन संशोधित योजना में इसे घटाकर शून्य (Zero) कर दिया गया था। यह घाटे को नियंत्रित करने और गैर-स्फीतिकारी स्वरूप (Non-inflationary pattern) पर जोर देने का प्रयास था।

C. राजकोषीय अनुशासन (Fiscal Discipline)

आठवीं योजना की प्रगति की समीक्षा में राजकोषीय अनुशासन (Fiscal Discipline) की आवश्यकता पर बल दिया गया था। इसका तात्पर्य यह था कि केंद्र और राज्य सरकारों को घाटे को कम करने तथा सार्वजनिक खर्च में संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है।

2. मौद्रिक नीति (Monetary Policy)

मौद्रिक नीति मुख्य रूप से रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (Reserve Bank of India) द्वारा देश में मुद्रा की आपूर्ति और ब्याज दरों को नियंत्रित करने के लिए उपयोग किए जाने वाले उपकरणों से संबंधित है।

  • रिज़र्व बैंक की भूमिका: भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया की मौद्रिक नीति एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • उद्देश्य – स्फीति नियंत्रण (Controlling Inflation): मौद्रिक नीति का प्राथमिक उद्देश्य स्फीतिकारी दबावों (Inflationary Pressures/Tendencies) को नियंत्रित करना रहा है।
    • विकासशील देशों में, संसाधनों की कमी के कारण स्फीतिकारी दबाव बने रहते हैं।
    • आर्थिक विकास की रणनीति में यह सुनिश्चित करना आवश्यक था कि योजनाएँ ऐसी मुद्रा स्फीतिकारी प्रवृत्तियाँ (Inflating tendencies) उत्पन्न न करें जो आर्थिक विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित करें।
  • उपकरणों का प्रयोग: मौद्रिक नीति मुद्रा की आपूर्ति (Money Supply) को प्रतिबंधित करती है और उपभोग वस्तुओं की आपूर्ति को नियंत्रित करने पर ध्यान केंद्रित करती है। यह कीन्स के सिद्धांत (Keynesian theory) में उल्लिखित बैंक दर में वृद्धि जैसे उपायों का उपयोग करती है।
  • पूँजी निर्माण में सहायक: मौद्रिक नीति घरेलू बचत (Domestic Savings) को प्रोत्साहित करने और अनुत्पादक उपभोग (Unproductive Consumption) पर खर्च को प्रतिबंधित करने के लिए आवश्यक है, जिससे पूँजी निर्माण को बढ़ावा मिल सके।

3. राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों का समन्वय

विकासशील देशों में आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने और संवृद्धि दर को बनाए रखने के लिए राजकोषीय और मौद्रिक दोनों नीतियों के बीच तालमेल आवश्यक है।

  • अल्पविकसित देशों में संसाधनों के अभाव के कारण स्फीतिकारी दबाव बढ़ते हैं, और ऐसी परिस्थितियों में, राजकोषीय उपायों (Fiscal measures) और मौद्रिक उपायों (Monetary measures) दोनों का सतर्क उपयोग ज़रूरी हो जाता है।
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