ग्रामीण भारत में ग्राम पंचायत का ऐतिहासिक अवलोकन

ग्रामीण भारत में ग्राम पंचायत का ऐतिहासिक अवलोकन

ग्रामीण भारत में पंचायती राज व्यवस्था का इतिहास सदियों पुराना है। इसका विकास वैदिक काल से लेकर आधुनिक संवैधानिक संशोधन तक विभिन्न चरणों में हुआ है। नीचे इसका विस्तृत ऐतिहासिक अवलोकन दिया गया है:

1. प्राचीन काल (Ancient Period)

भारत में पंचायती राज की जड़ें प्राचीन इतिहास में मिलती हैं। गाँव को प्रशासन की बुनियादी इकाई माना जाता था।

  • वैदिक युग: प्राचीन संस्कृत शास्त्रों में ‘पंचायतन’ शब्द का उल्लेख मिलता है, जिसका अर्थ पाँच व्यक्तियों का समूह है, जिसमें एक आध्यात्मिक व्यक्ति भी शामिल होता था। ऋग्वेद में स्थानीय स्व-इकाइयों के रूप में ‘सभा’, ‘समिति’ और ‘विदथ’ का उल्लेख मिलता है, जो स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक निकाय थे,।
  • महाकाव्य काल (रामायण और महाभारत): रामायण में प्रशासन दो भागों- ‘पुर’ (नगर) और ‘जनपद’ (ग्राम) में विभाजित था। महाभारत के ‘शांति पर्व’ में भी ग्राम स्वशासन का उल्लेख है,। महाभारत के अनुसार, ग्राम के ऊपर 10, 20, 100 और 1,000 गाँवों के समूह की इकाइयाँ थीं, जिनके प्रमुख क्रमशः ‘दशप’, ‘विशंपति’, ‘शत ग्राम अध्यक्ष’ आदि कहलाते थे। ‘ग्रामिक’ गाँव का मुख्य अधिकारी होता था,।
  • मौर्य और गुप्त काल: कौटिल्य के अर्थशास्त्र में ग्राम पंचायतों का विस्तृत वर्णन है। गाँव के मुखिया को ‘ग्रामिक’ कहा जाता था और वह बड़ों की परिषद (Council of Elders) की सहायता से कार्य करता था। गुप्त काल में भी यह व्यवस्था जारी रही, जहाँ ज़िला अधिकारी को ‘विषयपति’ और ग्राम प्रधान को ‘ग्रामपति’ कहा जाता था,।
  • चोल साम्राज्य: दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य (900-1300 ई.) में ग्रामीण स्वशासन अत्यधिक संगठित था। उर (Ur) और महासभा (Mahasabha) जैसी संस्थाएँ थीं, और सदस्यों का चुनाव लॉटरी प्रणाली (कुडवोलाई) द्वारा किया जाता था,।

2. मध्यकाल (Medieval Period)

मध्यकाल में मुगल शासन के दौरान, गाँव प्रशासन की सबसे छोटी इकाई बना रहा, लेकिन इसकी स्वायत्तता में कुछ कमी आई।

  • सल्तनत और मुगल काल: गाँव के प्रशासन के लिए तीन मुख्य अधिकारी होते थे – मुकद्दम (प्रशासन के लिए), पटवारी (राजस्व संग्रह के लिए), और चौधरी (विवादों के समाधान के लिए),।
  • जातिवाद और सामंतवादी व्यवस्था के कारण मुगल काल में ग्रामीण स्वशासन धीरे-धीरे कमज़ोर होने लगा। हालांकि, मुगलों ने प्राचीन रीति-रिवाजों में बहुत कम हस्तक्षेप किया।

3. ब्रिटिश काल (British Period)

ब्रिटिश शासन की शुरुआत में ग्राम पंचायतों की स्वायत्तता समाप्त हो गई और वे कमज़ोर हो गईं,। हालाँकि, बाद में औपनिवेशिक प्रशासन की आवश्यकताओं के कारण कुछ सुधार किए गए:

  • मेयो प्रस्ताव (1870): लॉर्ड मेयो ने स्थानीय संस्थाओं की शक्तियों और उत्तरदायित्वों में वृद्धि कर उनके विकास को गति दी, ताकि प्रशासनिक दक्षता बढ़ाई जा सके,।
  • लॉर्ड रिपन का प्रस्ताव (1882): लॉर्ड रिपन को ‘भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक’ माना जाता है। 1882 में उन्होंने स्थानीय स्वशासन का प्रस्ताव दिया, जिसे ‘मैग्ना कार्टा’ कहा जाता है। इसमें निर्वाचित गैर-सरकारी सदस्यों वाले स्थानीय बोर्डों की स्थापना का प्रावधान था,।
  • रॉयल कमीशन (1907): सी.ई.एच. होबहाउस की अध्यक्षता में बने इस आयोग ने ग्राम स्तर पर पंचायतों के महत्त्व को पहचाना,।
  • मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (1919): इसके तहत स्थानीय सरकार के विषय को प्रांतों के अधिकार क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिया गया,।
  • भारत सरकार अधिनियम (1935): इसके तहत प्रांतीय स्वायत्तता दी गई, जिससे निर्वाचित प्रांतीय सरकारों ने स्थानीय स्वशासन को और लोकतांत्रिक बनाने के प्रयास किए,।

4. स्वतंत्रता के बाद (Post-Independence Period – 1947-1992)

स्वतंत्रता के बाद, महात्मा गांधी के ‘ग्राम स्वराज’ के सपने को साकार करने के लिए कई प्रयास किए गए, हालाँकि संविधान निर्माता डॉ. बी.आर. अंबेडकर इसके प्रति आशंकित थे,।

  • संविधान में स्थान: काफी बहस के बाद, संविधान के अनुच्छेद 40 (नीति निर्देशक तत्त्व) में यह प्रावधान किया गया कि “राज्य ग्राम पंचायतों को व्यवस्थित करने के लिए कदम उठाएगा”,।
  • सामुदायिक विकास कार्यक्रम (1952): 2 अक्टूबर 1952 को सामुदायिक विकास कार्यक्रम (CDP) और 1953 में राष्ट्रीय विस्तार सेवा (NES) की शुरुआत की गई, लेकिन जनभागीदारी की कमी के कारण ये बहुत सफल नहीं हुए,।

प्रमुख समितियाँ: पंचायती राज व्यवस्था में सुधार के लिए समय-समय पर कई समितियाँ गठित की गईं:

  1. बलवंत राय मेहता समिति (1957): इसने ‘लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण’ की सिफारिश की और त्रि-स्तरीय (Three-tier) संरचना का सुझाव दिया: ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत, ब्लॉक स्तर पर पंचायत समिति, और ज़िला स्तर पर ज़िला परिषद। 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान (नागौर) में पहली बार इसका उद्घाटन किया गया,,।
  2. अशोक मेहता समिति (1977): इसने गिरती हुई व्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए द्वि-स्तरीय (Two-tier) प्रणाली (ज़िला परिषद और मंडल पंचायत) की सिफारिश की,।
  3. जी.वी.के. राव समिति (1985): इसने ज़िले को योजना की बुनियादी इकाई बनाने और नियमित चुनाव कराने की सिफारिश की। इसने पंचायती राज को ‘बिना जड़ की घास’ कहा था,।
  4. एल.एम. सिंघवी समिति (1986): इसने पंचायतों को ‘संवैधानिक दर्जा’ देने की सिफारिश की ताकि वे अधिक प्रभावी हो सकें,।

5. 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम (1992)

एल.एम. सिंघवी समिति और पी.के. थुंगन समिति की सिफारिशों के आधार पर, संसद ने 73वाँ संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया, जो 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ। इसने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया,,।

मुख्य विशेषताएँ:

  • संवैधानिक दर्जा: संविधान में एक नया भाग-IX और 11वीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसमें पंचायतों के 29 कार्यात्मक विषय शामिल हैं,।
  • ग्राम सभा: इसे पंचायती राज प्रणाली की नींव माना गया, जिसमें गाँव के सभी पंजीकृत मतदाता शामिल होते हैं,।
  • त्रि-स्तरीय प्रणाली: सभी राज्यों (20 लाख से अधिक आबादी वाले) में गाँव, मध्यवर्ती और ज़िला स्तर पर पंचायतों का गठन अनिवार्य किया गया,।
  • चुनाव और आरक्षण: सभी स्तरों पर सदस्यों का प्रत्यक्ष चुनाव और अध्यक्षों का अप्रत्यक्ष (ग्राम स्तर को छोड़कर) चुनाव। अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और महिलाओं (कम से कम एक-तिहाई) के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया,।
  • कार्यकाल: पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष निर्धारित किया गया।
  • वित्त और चुनाव आयोग: राज्य वित्त आयोग और राज्य चुनाव आयोग के गठन का प्रावधान किया गया।

निष्कर्ष

प्राचीन काल की ‘लघु गणराज्यों’ से लेकर 1992 के संवैधानिक संशोधन तक, भारत में ग्राम पंचायतों का सफर लंबा रहा है। 73वें संशोधन ने इसे भारतीय लोकतंत्र का तीसरा स्तर बनाकर महात्मा गांधी के ‘ग्राम स्वराज’ के सपने को संस्थागत रूप दिया है,।

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