कक्षा 10 हिंदी कृतिका अध्याय 1 माता का आँचल

Mata Ka Anchal – Comprehensive Study Notes
Class 10 – Hindi
Chapter 1

माता का अँचल

(उपन्यास: देहाती दुनिया – शिवपूजन सहाय)

1. पात्र और परिचय (Introduction)

  • यह हिंदी का पहला आंचलिक उपन्यास माना जाता है।
  • मुख्य पात्र: भोलानाथ (बचपन का नाम)।
  • वास्तविक नाम: तारकेश्वरनाथ
  • कहानी 1930 के दशक की ग्रामीण संस्कृति और बाल-मनोविज्ञान पर आधारित है।

2. पिता के साथ गहरा जुड़ाव (Father’s Bond)

भोलानाथ का दिन पिता के साथ शुरू होता था:

  • दिनचर्या: सुबह जल्दी उठना, नहाना, पूजा में बैठना।
  • तिलक: पिताजी चौड़े माथे पर भभूत का त्रिपुंड लगाते थे। लंबी जटाओं के कारण वे ‘बम-भोला’ दिखते थे।
  • राम-भक्ति:
    • ‘रामनामा बही’ में 1000 बार राम-नाम लिखना।
    • आटे की गोलियों पर राम-नाम लिखकर गंगा में मछलियों को खिलाना (500 बार)।
राम राम 🐟
मछलियों को दाना

3. पिता का प्रेम और खेल (Playtime)

  • कंधे की सवारी: गंगा तट से लौटते समय पिता के कंधे पर बैठना और पेड़ों की डालों पर झूला झूलना
  • कुश्ती (Wrestling): पिताजी जानबूझकर शिथिल (ढीले) पड़ जाते थे ताकि भोलानाथ जीत सकें।
  • मूँछों का खेल: भोलानाथ जब उनकी छाती पर चढ़कर मूँछें उखाड़ते, तो पिताजी बनावटी रोना रोते थे।
  • चुम्मा (Kisses): दाढ़ी गड़ाकर ‘खट्टा’ और ‘मीठा’ चुम्मा लेना।
Imp: बच्चा पिता के साथ सुरक्षित और खुश महसूस करता था, लेकिन यह रिश्ता ‘बाहरी’ दुनिया और खेलकूद का ज्यादा था।
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4. माँ का लाड़ और भोजन (Mother’s Love)

  • पिताजी ‘गोरस-भात’ (दूध-चावल) सानकर फूल के कटोरे में खिलाते थे।
  • लेकिन माँ संतुष्ट नहीं होती थीं। उनका मानना था:
“जब खाएगा बड़े-बड़े कौर, तब पाएगा दुनिया में ठौर”
  • माँ अलग-अलग पक्षियों (तोता, मैना, हंस, कबूतर) के नाम लेकर बनावटी कौर खिलाती थीं—”जल्दी खा लो नहीं तो उड़ जाएँगे!”
  • तैयार करना: रोने के बावजूद सिर में कड़वा तेल, काजल की बिंदी, चोटी गूँथना और रंगीन कुरता-टोपी पहनाना। भोलानाथ ‘कन्हैया’ बन जाते थे।

5. बचपन के खेल और तमाशे (Games)

भोलानाथ अपने ‘हमजोलियों’ (मित्रों) के साथ तरह-तरह के नाटक करते थे:

A. मिठाई की दुकान

चबूतरे पर दुकान लगती। ढेले के लड्डू, पत्तों की पूरी-कचौरियाँ, गीली मिट्टी की जलेबियाँ।
पिताजी भी आकर दो-चार पैसे की ‘मिठाई’ खरीद लेते थे।

B. घरौंदा और ज्योनार (Feast)

धूल की मेड़, तिनकों का छप्पर, दातून के खंभे। पानी का घी और बालू की चीनी।
जब पंगत (line) बैठती, तो बाबूजी भी अंत में बैठ जाते। बच्चे हँसकर घरौंदा तोड़कर भाग जाते।

C. बरात और खेती

कनस्तर का बाजा, चूहेदानी की पालकी। बाबूजी दुल्हन का मुँह देखने आते तो सब भाग जाते। खेती के खेल में गाते थे:

“ऊँच नीच में बई कियारी, जो उपजी सो भई हमारी”

6. शरारतें और तुकबंदियाँ (Mischief)

  • दूल्हे को चिढ़ाना: “रहरी में रहरी पुरान रहरी, डोला के कनिया हमार मेहरी”।
  • मूसन तिवारी (Old Teacher) को चिढ़ाना: बैजू ने चिढ़ाया—
“बुढ़वा बेईमान माँगे करैला का चोखा”
  • तिवारी जी ने स्कूल में शिकायत की। गुरुजी ने बैजू और भोलानाथ को पकड़ने के लिए लड़के भेजे। खूब पिटाई हुई, लेकिन पिताजी ने आकर बचा लिया।
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7. आंधी और आम (The Storm)

  • एक दिन जोर की आंधी आई। आकाश काला हो गया।
  • बच्चे बाग की ओर दौड़ पड़े ताकि टपके हुए (गोपी) आम चुन सकें।
  • बारिश में वे पेड़ों की जड़ों से चिपक गए (जैसे कुत्ते के कान में किलनी)।

8. मुख्य घटना: साँप और डर (The Climax)

1. टीले पर खेल: बारिश रुकने के बाद बच्चे टीले पर गए और चूहों के बिल में पानी डालने लगे।

2. साँप निकला: “गणेश जी के चूहे की रक्षा के लिए शिवजी का साँप निकल आया।”

3. बेतहाशा भागना: बच्चे डरकर भागे। कोई औंधा गिरा, किसी का सिर फूटा। पैरों के तलवे काँटों से छलनी हो गए। पूरा शरीर लहूलुहान था।

Danger!

9. माँ का आँचल (Safe Haven)

  • भोलानाथ दौड़ते हुए घर आए। पिताजी ओसारे (Veranda) में हुक्का पी रहे थे और पुकारा भी।
  • लेकिन भोलानाथ रुके नहीं, सीधे माँ की गोद में जाकर छिपे।
  • माँ की प्रतिक्रिया:
    • माँ चावल साफ कर रही थीं। बच्चे को काँपते देख वह रो पड़ीं।
    • सब काम छोड़ दिया। अधीर होकर कारण पूछने लगीं।
    • झटपट हल्दी पीसकर घावों पर लगाई।
  • पिताजी दौड़े आए और बच्चे को अपनी गोद में लेना चाहा।
  • निष्कर्ष: भोलानाथ ने माँ के आँचल की ‘प्रेम और शांति’ की छाया नहीं छोड़ी।

मूल भाव (Central Theme)

यह पाठ दर्शाता है कि बच्चा चाहे पिता के साथ कितना भी खेले और समय बिताए, पर जब उस पर भारी विपत्ति (Crisis) आती है, तो उसे केवल माँ की ममता और उसके आँचल में ही सुरक्षा महसूस होती है।

– “माता का आँचल”

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