कक्षा 9 हिंदी दुख का अधिकार सारांश

कक्षा 9 हिंदी दुख का अधिकार सारांश

नमस्ते, आपके द्वारा दिए गए पाठ का सारांश यहाँ प्रस्तुत है:

“दुःख का अधिकार” कहानी, जिसके लेखक यशपाल हैं, समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और ऊँच-नीच के भेदभाव को उजागर करती है। यह कहानी बताती है कि दुःख की अनुभूति तो सभी को एक समान होती है, लेकिन दुःख मनाने का अधिकार और अवसर सबको नहीं मिलता

कहानी का सार

यह कहानी समाज में पोशाक के महत्व से शुरू होती है, जो मनुष्यों को विभिन्न श्रेणियों में बाँटती है और उनका दर्जा तथा अधिकार निश्चित करती है। कई बार यही पोशाक बंधन और अड़चन भी बन जाती है, जब हम समाज के निचले तबके के लोगों के दुःख को समझना चाहते हैं।

लेखक बाज़ार में फुटपाथ पर खरबूजे बेच रही एक अधेड़ उम्र की महिला को देखते हैं, जो अपने घुटनों में सिर रखकर फफक-फफक कर रो रही थी। बाज़ार के लोग उससे घृणा कर रहे थे और तरह-तरह की बातें बना रहे थे। कोई कह रहा था कि जवान बेटे को मरे एक दिन भी नहीं हुआ और यह बेशर्म दुकान लगाकर बैठ गई। वहीं, एक लाला जी कह रहे थे कि बेटे के मरने पर तेरह दिन का सूतक होता है और इसके खरबूजे खाने से दूसरों का धर्म-ईमान भ्रष्ट हो जाएगा। लेखक उस महिला के रोने का कारण जानना चाहते थे, पर अपनी पोशाक के कारण उसके पास बैठने में संकोच कर रहे थे।

पास-पड़ोस की दुकानों से पूछने पर लेखक को पता चला कि उस महिला का 23 वर्षीय जवान बेटा भगवाना था, जो शहर के पास डेढ़ बीघा ज़मीन पर खेती करके अपने परिवार का गुज़ारा करता था। परसों सुबह खेतों में खरबूजे चुनते समय उसे एक साँप ने डस लिया था। बुढ़िया माँ ने उसे बचाने के लिए ओझा को बुलाने से लेकर नागदेव की पूजा तक सब कुछ किया, जिसमें घर का सारा आटा और अनाज दान-दक्षिणा में चला गया। लेकिन भगवाना को बचाया नहीं जा सका।

बेटे के अंतिम संस्कार के लिए कफ़न का इंतज़ाम करने में घर में जो कुछ बचा था, वह भी खर्च हो गया, यहाँ तक कि माँ के हाथों के मामूली गहने (छन्नी-ककना) भी बिक गए। अगले ही दिन घर में बच्चे भूख से बिलबिलाने लगे और बहू बुख़ार से तप रही थी। कोई भी उस बुढ़िया को उधार देने को तैयार नहीं था। ऐसी मज़बूरी में, उसके पास बेटे द्वारा तोड़े गए खरबूजों को बाज़ार में बेचने के अलावा और कोई चारा नहीं था

इस गरीब महिला के दुःख को देखकर लेखक को अपने पड़ोस की एक अमीर महिला की याद आ गई, जिसका बेटा भी पिछले साल मर गया था। पुत्र-शोक में वह महिला ढाई महीने तक बिस्तर से नहीं उठ सकी थी। दो-दो डॉक्टर हर समय उसकी देखभाल में लगे रहते थे और पूरा शहर उसके दुःख से दुःखी था।

इन दोनों घटनाओं की तुलना करते हुए लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि शोक करने और गम मनाने के लिए भी सहूलियत (सुविधा) चाहिए। इस देश में ऐसे भी अभागे लोग हैं जिन्हें न तो दुःख मनाने का अधिकार है और न ही अवकाश। इस प्रकार, यह कहानी अमीरों की अमानवीयता और गरीबों की लाचारी को गहराई से उजागर करती है।

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