राजस्थान बोर्ड (RBSE) कक्षा 11 अर्थशास्त्र – अध्याय 1
अध्याय: स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर भारतीय अर्थव्यवस्था
अर्धवार्षिक परीक्षा विशेष स्टडी नोट्स (Exam Special Notes)
1. औपनिवेशिक शासन का मुख्य उद्देश्य
- मूल लक्ष्य: ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का मुख्य उद्देश्य भारत की अर्थव्यवस्था को इंग्लैंड में तेज़ी से विकसित हो रहे औद्योगिक आधार के लिए केवल एक कच्चे माल का प्रदायक (Raw Material Supplier) बनाना और वहाँ के कारखानों में बने तैयार माल का विशाल बाज़ार (Market) बनाना था।
- शोषणकारी स्वरूप: भारत की स्वतंत्र अर्थव्यवस्था को ब्रिटेन के आर्थिक हितों के संरक्षण और संवर्धन का साधन बना दिया गया।
2. निम्न-स्तरीय आर्थिक विकास तथा राष्ट्रीय आय
- राष्ट्रीय आय का आकलन: औपनिवेशिक सरकार ने कभी भी भारत की राष्ट्रीय आय या प्रति व्यक्ति आय का ईमानदारी से आकलन नहीं किया।
- व्यक्तिगत प्रयास: दादाभाई नौरोजी, विलियम डिग्बी, फाइंडले शिराज़, डॉ. वी.के.आर.वी. राव और आर.सी. देसाई ने निजी स्तर पर अनुमान लगाए।
- डॉ. वी.के.आर.वी. राव के आकलन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण और विश्वसनीय माने जाते हैं।
- संवृद्धि दर (Growth Rate): 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में भारत की राष्ट्रीय आय की वार्षिक वृद्धि दर 2% से कम तथा प्रति व्यक्ति उत्पाद वृद्धि दर मात्र 0.5% रही।
3. कृषि क्षेत्रक (Agricultural Sector)
- जनसंख्या की निर्भरता: देश की लगभग 85% जनसंख्या गाँवों में रहती थी और अपनी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर थी।
- कृषि में गतिहीनता के प्रमुख कारण:
- भू-व्यवस्था प्रणालियाँ (जमींदारी प्रथा): विशेष रूप से बंगाल प्रेसिडेंसी में लागू जमींदारी व्यवस्था में कृषि से होने वाले लाभ को जमींदार हड़प लेते थे। जमींदारों का मुख्य उद्देश्य निश्चित तिथि तक लगान वसूलना था।
- निम्न प्रौद्योगिकी व संसाधनों का अभाव: सिंचाई सुविधाओं का अभाव, उर्वरकों का नगण्य प्रयोग और निम्न स्तरीय तकनीक के कारण उत्पादकता बहुत कम थी।
- कृषि का व्यावसायीकरण (Commercialisation of Agriculture): किसानों को खाद्यान्न फसलों के स्थान पर नकदी/व्यावसायिक फसलों (जैसे नील, कपास) का उत्पादन करने के लिए बाध्य किया गया, जिसका उपयोग ब्रिटेन के कारखानों में कच्चे माल के रूप में होता था।
4. औद्योगिक क्षेत्रक एवं वि-औद्योगीकरण
- वि-औद्योगीकरण (De-industrialisation) का दोहरा उद्देश्य:
- भारत को इंग्लैंड के उद्योगों के लिए सस्ते कच्चे माल का निर्यातक बनाना।
- ब्रिटेन निर्मित अंतिम उत्पादों के लिए भारत को एक सुरक्षित बाज़ार बनाकर लाभ कमाना।
- पारंपरिक हस्तशिल्प का पतन:
- ब्रिटिश नीतियों के कारण भारत के विश्वप्रसिद्ध हस्तशिल्प और शिल्पकलाओं (जैसे ढाका का मलमल या ‘मलमल खास’) का पतन हो गया, जिससे देश में भारी बेरोज़गारी फैली।
- आधुनिक उद्योगों का धीमा विकास:
- 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में आधुनिक उद्योगों की धीमी शुरुआत हुई।
- सूती वस्त्र मिलें: मुख्य रूप से भारतीय उद्यमियों द्वारा महाराष्ट्र और गुजरात में स्थापित की गईं।
- पटसन (जूट) उद्योग: विदेशी पूँजीपतियों द्वारा बंगाल में केंद्रित था।
- लोहा एवं इस्पात उद्योग: वर्ष 1907 में टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) की स्थापना हुई।
- कमियाँ: पूँजीगत वस्तु उद्योगों (Capital Goods Industries) का अभाव रहा और सार्वजनिक क्षेत्रक केवल रेलवे, विद्युत उत्पादन, संचार व बंदरगाहों तक सीमित था।
5. विदेशी व्यापार तथा संपत्ति का निष्कासन
- व्यापार की संरचना: भारत कच्चे रेशम, कपास, ऊन, चीनी, नील और पटसन का निर्यातक तथा सूती/रेशमी वस्त्रों व हल्की मशीनों का आयातक बन कर रह गया।
- एकाधिकार नियंत्रण: भारत के कुल विदेशी व्यापार के आधे से अधिक भाग पर ब्रिटेन का नियंत्रण था; शेष व्यापार चीन, श्रीलंका और ईरान तक सीमित था।
- स्वेज़ नहर (Suez Canal) का प्रभाव: 1869 में स्वेज़ नहर के खुलने से भारत और ब्रिटेन के बीच परिवहन लागत घटी तथा ब्रिटिश नियंत्रण और सख्त हो गया।
- संपत्ति का निष्कासन (Drain of Wealth): भारत को विदेशी व्यापार से भारी ‘निर्यात अधिशेष’ (Export Surplus) प्राप्त होता था, लेकिन इसका लाभ भारत को नहीं मिला। इस अधिशेष का उपयोग ब्रिटिश सरकार के प्रशासनिक खर्चों, युद्धों के वित्तपोषण और अदृश्य मदों के आयात का भुगतान करने में किया जाता था।
6. जनांकिकीय परिस्थिति (Demographic Profile)
- प्रथम आधिकारिक जनगणना: वर्ष 1881 में संपन्न हुई।
- 1921 – महा-विभाजक वर्ष (Year of Great Divide): 1921 के पूर्व भारत जनांकिकीय संक्रमण के प्रथम सोपान में था; 1921 के बाद द्वितीय सोपान में प्रवेश किया।
- प्रमुख जनांकिकीय सूचक:
- साक्षरता दर: कुल साक्षरता 16% से कम थी, जबकि महिला साक्षरता मात्र 7% थी।
- शिशु मृत्यु दर (Infant Mortality Rate): अत्यधिक ऊँची थी — 218 प्रति हजार (वर्तमान में यह लगभग 28 प्रति हजार है)।
- जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy): केवल 32 वर्ष थी (वर्तमान के 70 वर्ष की तुलना में)।
- स्वास्थ्य सेवाएँ: अत्यंत अपर्याप्त थीं, जिससे जल व वायु जनित संक्रामक रोगों का प्रकोप रहता था।
7. व्यावसायिक संरचना (Occupational Structure)
- क्षेत्रकवार कार्यबल विभाजन:
- कृषि क्षेत्रक: 70–75% कार्यबल संलग्न था।
- विनिर्माण (औद्योगिक) क्षेत्रक: लगभग 10% कार्यबल।
- सेवा क्षेत्रक: 15–20% कार्यबल।
- क्षेत्रीय विषमताएँ: मद्रास प्रेसिडेंसी (तमिलनाडु, आंध्र, कर्नाटक, केरल), बंबई और बंगाल में कृषि पर निर्भरता में कमी आई तथा उद्योग/सेवा क्षेत्र में वृद्धि हुई, जबकि राजस्थान, पंजाब और ओडिशा में कृषि पर निर्भर श्रमिकों के अनुपात में वृद्धि देखी गई।
8. आधारिक संरचना (Infrastructure)
- विकास का वास्तविक उद्देश्य: रेलों, सड़कों, बंदरगाहों, डाक व तार का विकास जनसामान्य को सुविधा देने के लिए नहीं, बल्कि औपनिवेशिक हितों (सेना के आवागमन व कच्चे माल को बंदरगाहों तक पहुँचाने) के लिए किया गया था।
- रेलवे की शुरुआत: अंग्रेजों ने भारत में 1850 में रेलवे की शुरुआत की (पहली रेलगाड़ी 1854 में मुंबई से ठाणे चली)।
- प्रभाव: रेलवे से एक तरफ भौगोलिक व सांस्कृतिक बाधाएँ दूर हुईं, वहीं दूसरी तरफ कृषि के व्यावसायीकरण को बढ़ावा मिला जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आत्मनिर्भरता प्रभावित हुई।
- अन्य माध्यम:
- महँगी तार (Telegraph) व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य कानून एवं व्यवस्था बनाए रखना था।
- 1932 में टाटा एयरलाइंस की स्थापना के साथ भारत में विमानन क्षेत्रक की नींव पड़ी।
अर्धवार्षिक परीक्षा हेतु त्वरित दोहराव (Quick Revision Table)
| प्रमुख विषय/सूचक | औपनिवेशिक काल की स्थिति/आँकड़े |
|---|---|
| राष्ट्रीय आय संवृद्धि दर | 2% से कम (प्रति व्यक्ति आय वृद्धि: 0.5%) |
| कृषि पर निर्भर जनसंख्या | लगभग 85% (कार्यबल का 70-75%) |
| TISCO की स्थापना | वर्ष 1907 |
| स्वेज़ नहर का खुलना | वर्ष 1869 |
| प्रथम जनगणना | वर्ष 1881 |
| जनांकिकीय विभाजन वर्ष | वर्ष 1921 |
| कुल साक्षरता / महिला साक्षरता | <16% / ~7% |
| शिशु मृत्यु दर / जीवन प्रत्याशा | 218 प्रति हजार / 32 वर्ष |
| रेलवे की शुरुआत / प्रथम रेल | 1850 में शुरुआत / 1854 (मुंबई से ठाणे) |