कक्षा 11 अर्थशास्त्र अध्याय 4 भारत में मानव पूंजी का निर्माण
1. मुख्य अवधारणाएं और परिभाषाएं
- मानव संसाधन (Human Resource): किसी देश की कुल जनसंख्या की वह क्षमता, ज्ञान और कार्य-कौशल जो देश की उत्पादन प्रक्रिया में योगदान दे सकती है।
- मानव पूंजी (Human Capital): किसी देश में एक समय विशेष पर निहित कौशल, क्षमता, ज्ञान तथा तकनीकी विशेषज्ञता का कुल भंडार मानव पूंजी कहलाता है (जैसे— डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, किसान, नर्स आदि)।
- मानव पूंजी निर्माण (Human Capital Formation): मानव संसाधनों को शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल प्रशिक्षण में निवेश करके दक्ष व उत्पादक मानव पूंजी में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को ‘मानव पूंजी निर्माण’ कहते हैं।
2. मानव पूंजी निर्माण के प्रमुख स्रोत
मानव पूंजी का निर्माण करने के लिए निम्नलिखित 5 प्रमुख घटकों पर व्यय/निवेश किया जाता है:
- शिक्षा पर व्यय (Expenditure on Education): यह मानव पूंजी निर्माण का सबसे प्रमुख स्रोत है। शिक्षा में निवेश से व्यक्ति की भविष्य की आय अर्जित करने की क्षमता और श्रम-कौशल बढ़ता है। यह उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा, बेहतर चयन क्षमता और नई तकनीकों को अपनाने में मदद करता है।
- स्वास्थ्य पर व्यय (Expenditure on Health): एक स्वस्थ श्रमिक अधिक समय तक बिना रुकावट के कार्य कर सकता है, जिससे उत्पादकता में वृद्धि होती है। इसके प्रमुख रूप हैं:
- प्रतिषेधी चिकित्सा (Preventive Medicine): टीकाकरण।
- चिकित्सीय इलाज (Curative Medicine): बीमारियों का इलाज।
- सामाजिक चिकित्सा (Social Medicine): स्वास्थ्य संबंधी साक्षरता व ज्ञान का प्रसार।
- स्वच्छ पेयजल तथा स्वच्छता सुविधाएं।
- कार्य के दौरान प्रशिक्षण (On-the-job Training): फर्में अपने कर्मचारियों को कार्यस्थल पर ही अनुभवी कर्मियों की देखरेख में या बाहरी संस्थानों में प्रशिक्षण देती हैं। प्रशिक्षण से श्रम उत्पादकता बढ़ती है, जिससे फर्म को लागत से अधिक लाभ प्राप्त होता है।
- प्रवसन / पलायन पर व्यय (Expenditure on Migration): लोग उच्च आय और रोजगार की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर या विदेशों में प्रवास करते हैं। इसमें परिवहन, रहने का खर्च तथा सांस्कृतिक बदलाव की मानसिक लागत आती है, लेकिन नई जगह की अतिरिक्त कमाई इन सभी लागतों से अधिक होती है।
- सूचना प्राप्त करने पर व्यय (Expenditure on Information): श्रम बाजार (विभिन्न नौकरियों के वेतनमान) तथा शिक्षा व स्वास्थ्य बाजारों से संबंधित जानकारी जुटाने पर किया गया व्यय सही निवेश निर्णय लेने में सहायक होता है।
3. भौतिक पूंजी और मानव पूंजी में अंतर
| तुलना का आधार | भौतिक पूंजी (Physical Capital) | मानव पूंजी (Human Capital) |
|---|---|---|
| दृश्यता (Visibility) | यह दृश्य (Tangible) होती है और इसे बाजार में खरीदा-बेचा जा सकता है। | यह अदृश्य (Intangible) होती है तथा स्वामी के शरीर और मस्तिष्क में निहित होती है। |
| स्वामी से पृथक्करण | इसे इसके स्वामी से अलग किया जा सकता है (जैसे— कारखाने, मशीनें)। | इसे इसके स्वामी से अलग नहीं किया जा सकता; केवल इसकी सेवाओं की बिक्री की जा सकती है। |
| गतिशीलता (Mobility) | इसका विश्वभर में निर्बाध आवागमन संभव होता है। | राष्ट्रों की सीमाओं, संस्कृति और नागरिकता के कारण इसका आवागमन सीमित होता है। |
| मूल्य ह्रास (Depreciation) | निरंतर प्रयोग और तकनीकी परिवर्तन से इसमें घिसावट/ह्रास होता है। | आयु के साथ इसमें ह्रास होता है, जिसे शिक्षा व स्वास्थ्य में निरंतर निवेश से दूर किया जा सकता है। |
| हितलाभ (Benefits) | इससे केवल निजी लाभ उत्पन्न होता है। | इससे निजी लाभ के साथ-साथ सामाजिक (बाह्य) हितलाभ भी प्राप्त होते हैं (जैसे— लोकतांत्रिक भागीदारी, स्वच्छता)। |
4. मानव पूंजी और मानव विकास में अंतर
- मानव पूंजी (Human Capital): शिक्षा और स्वास्थ्य को केवल श्रम की उत्पादकता और वस्तुओं व सेवाओं के उत्पादन में वृद्धि करने का साधन (Means) मानती है। यदि शिक्षा या स्वास्थ्य से उत्पादकता में वृद्धि न हो, तो यह दृष्टिकोण इसे अनुत्पादक मानता है।
- मानव विकास (Human Development): यह शिक्षा और स्वास्थ्य को मानव कल्याण का अभिन्न अंग और साध्य (Ends) मानती है। इस दृष्टिकोण के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को साक्षर होने और स्वस्थ जीवन जीने का मौलिक अधिकार है, चाहे उससे सीधे तौर पर उत्पादकता बढ़े या न बढ़े।
5. भारत में शिक्षा एवं स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता
- दीर्घकालिक प्रभाव: शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के प्रभाव दीर्घकालिक होते हैं; गलत संस्थान या अनुपयुक्त सेवाओं के चयन से होने वाली हानि की भरपाई आसानी से नहीं की जा सकती।
- निजी क्षेत्र के एकाधिकार व शोषण पर रोक: उपभोक्ताओं को सेवाओं की लागत और गुणवत्ता की पूर्ण जानकारी न होने के कारण निजी प्रदाता एकाधिकार स्थापित कर शोषण कर सकते हैं।
- सामाजिक न्याय और समानता: भारत में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली विशाल जनसंख्या महंगी निजी सेवाओं का भार वहन नहीं कर सकती, इसलिए सरकार द्वारा मुफ्त या रियायती दर पर बुनियादी सुविधाएं देना आवश्यक है।
प्रमुख नियामक संस्थाएं (Regulatory Bodies):
- शिक्षा क्षेत्र: शिक्षा मंत्रालय, NCERT (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद), UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग), AICTE (अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद)।
- स्वास्थ्य क्षेत्र: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, NMC (राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग), ICMR (भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद)।
6. भारत में शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय और प्रमुख उपलब्धियां
- सरकारी व्यय के आंकड़े:
- कुल सरकारी व्यय में शिक्षा का हिस्सा 1952 के 7.92% से बढ़कर 2020 में 16.54% हो गया।
- सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में शैक्षणिक व्यय का प्रतिशत 1952 के 0.64% से बढ़कर 2020 में 4.47% हुआ।
- शिक्षा आयोग (कोठारी आयोग, 1964-66): आयोग ने सिफारिश की थी कि शैक्षणिक उपलब्धियों में उल्लेखनीय सुधार लाने के लिए जीडीपी (GDP) का कम से कम 6% शिक्षा पर खर्च किया जाना चाहिए।
- तापस मजूमदार समिति (1999): समिति ने 6-14 वर्ष के सभी बच्चों को स्कूली शिक्षा में शामिल करने के लिए 10 वर्षों की अवधि में लगभग ₹1.3 लाख करोड़ व्यय का अनुमान लगाया था।
- शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act 2009): 6 से 14 वर्ष के आयु वर्ग के सभी बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा को कानूनी अधिकार बनाया गया।
- शिक्षा उपकर (Education Cess): प्राथमिक शिक्षा के वित्तपोषण के लिए केंद्र सरकार सभी केंद्रीय करों पर 2% शिक्षा उपकर वसूलती है।
- क्षेत्रीय/राज्यवार असमानता: वर्ष 2020-21 में प्रारंभिक शिक्षा पर प्रति विद्यार्थी सार्वजनिक व्यय सिक्किम में ₹96,968 था, जबकि बिहार में यह केवल ₹10,710 था।
शैक्षणिक उपलब्धियां एवं चुनौतियां:
- साक्षरता दर: साक्षरता दर 1951 के 16.67% से बढ़कर 2017-18 में 78% हो गई है।
- लिंग समानता: पुरुषों और महिलाओं के बीच साक्षरता का अंतर लगातार घट रहा है।
- उच्च शिक्षा में कम पहुंच (नुकीला पिरामिड): भारत में शिक्षा का पिरामिड बहुत नुकीला है, जो दर्शाता है कि बहुत कम लोग उच्च शिक्षा स्तर तक पहुंच पाते हैं।
- शिक्षित बेरोजगारी: स्नातकों तथा उच्च शिक्षित युवाओं (विशेषकर ग्रामीण महिलाओं) में बेरोजगारी का उच्च स्तर एक प्रमुख समस्या बना हुआ है।
7. भावी संभावनाएँ एवं निष्कर्ष
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020): एआई (AI), बिग डेटा, मशीन लर्निंग और डेटा साइंस जैसी नई प्रौद्योगिकियों के दौर में भारत को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था (Knowledge Economy) के रूप में विकसित करने के लिए बहु-विषयक अध्ययन और कौशल विकास पर बल देती है।
- निष्कर्ष: भारत के पास विशाल वैज्ञानिक और तकनीकी जनशक्ति उपलब्ध है। आर्थिक विकास और सामाजिक समता हासिल करने के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता में सुधार करना और इन्हें समाज के सभी वर्गों के लिए सुलभ बनाना अनिवार्य है।