कक्षा 11 अर्थशास्त्र अध्याय 6 रोजगार—संवृद्धि, अनौपचारीकरण एवं अन्य मुद्दे
(परीक्षा विशेष नोट्स)
1. मुख्य अवधारणाएँ एवं परिभाषाएँ (Key Concepts & Definitions)
- श्रमिक (Worker): वे सभी व्यक्ति जो सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) में योगदान देने वाली विभिन्न आर्थिक क्रियाओं में संलग्न हैं, श्रमिक कहलाते हैं। इसमें नियोक्ता द्वारा भुगतान पाने वाले कर्मचारियों के साथ-साथ स्वनिर्ोजित व्यक्ति भी शामिल हैं।
- ध्यान दें: यदि कोई श्रमिक बीमारी, चोट, खराब मौसम या सामाजिक-धार्मिक उत्सवों के कारण अस्थायी रूप से काम पर नहीं आ पाता है या मुख्य श्रमिकों की सहायता करता है, तो उसे भी श्रमिक ही माना जाता है।
- राष्ट्रीय आय में योगदान: सकल घरेलू उत्पाद (GDP) किसी देश में एक वर्ष में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का कुल मौद्रिक मूल्य होता है। सकल राष्ट्रीय उत्पाद में योगदान देने वाले सभी कार्य आर्थिक क्रियाएँ कहलाते हैं।
- कार्य करने का उद्देश्य: लोग अपनी आजीविका चलाने, आत्म-संतोष प्राप्त करने, राष्ट्र निर्माण में योगदान देने तथा अपने आश्रितों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कार्य करते हैं।
2. श्रमिक-जनसंख्या अनुपात (Worker-Population Ratio)
श्रमिक-जनसंख्या अनुपात का प्रयोग देश में रोजगार की स्थिति का विश्लेषण करने के लिए एक प्रमुख सूचक के रूप में किया जाता है। यह दर्शाता है कि कुल जनसंख्या का कितना अनुपात वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन में सक्रिय रूप से योगदान दे रहा है।
\[\text{श्रमिक-जनसंख्या अनुपात} = \left( \frac{\text{देश में कार्यरत कुल श्रमिकों की संख्या}}{\text{देश की कुल जनसंख्या}} \right) \times 100\]
भारत में कार्यकर्ता-जनसंख्या अनुपात (2023-24 के आंकड़े):
| लिंग | ग्रामीण क्षेत्र | शहरी क्षेत्र | कुल (संपूर्ण भारत) |
|---|---|---|---|
| पुरुष | 56.3% | 56.4% | 56.4% |
| स्त्री | 34.8% | 20.7% | 30.7% |
| कुल (Total) | 45.6% | 38.9% | 43.7% |
(स्रोत: भारत सरकार 2023-24 आंकड़े)
ग्रामीण और शहरी अनुपात में अंतर के कारण:
- ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च अनुपात (45.6%): ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च आय के सीमित अवसर होते हैं। लोग शैक्षणिक या व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थानों में अधिक समय तक नहीं रह पाते और आर्थिक तंगी के कारण कम उम्र में ही काम में लग जाते हैं।
- शहरी क्षेत्रों में कम अनुपात (38.9%): शहरों में एक बड़ा वर्ग शैक्षणिक संस्थानों में अध्ययन करने में सक्षम होता है तथा अपनी योग्यता के अनुरूप बेहतर रोजगार की तलाश में रहता है।
- महिला कार्यबल की स्थिति: शहरी महिलाओं (20.7%) की तुलना में ग्रामीण महिलाओं (34.8%) का अनुपात अधिक है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएँ कृषि और पशुपालन गतिविधियों में पारिवारिक आय के सहयोग हेतु भाग लेती हैं। इसके अतिरिक्त, महिलाओं द्वारा किए जाने वाले घरेलू अवैतनिक कार्यों को राष्ट्रीय आय या श्रमबल में नहीं गिना जाता, जिससे महिला श्रमबल का सही आकलन नहीं हो पाता है।
3. रोजगार की स्थिति के अनुसार श्रमिकों का वर्गीकरण
रोजगार की प्रकृति और गुणवत्ता के आधार पर श्रमिकों को तीन मुख्य श्रेणियों में बांटा जाता है:
- स्वनिर्ोजित (Self-Employed): जो व्यक्ति अपने स्वयं के उद्यम के स्वामी और संचालक होते हैं (जैसे—दुकानदार, स्वतंत्र किसान, बुनकर)।
- भारत में आजीविका का यह सबसे प्रमुख स्रोत है, जहाँ लगभग 58% (58.4%) कार्यबल स्वनिर्ोजित है।
- नियमित वेतनभोगी कर्मचारी (Regular Salaried Employees): जब किसी श्रमिक को कोई व्यक्ति या उद्यम नियमित रूप से काम पर रखता है और उसे स्थायी वेतन या मजदूरी देता है (जैसे—अस्पताल की नर्स, बैंक कैशियर, शिक्षक)।
- यह भारत की कुल श्रमशक्ति का लगभग 22% (21.7%) भाग है। पुरुषों में इनका अनुपात (21.7%) महिलाओं (16%) की तुलना में अधिक है।
- अनियत/आकस्मिक दिहाड़ी मजदूर (Casual Wage Workers): जो व्यक्ति दूसरों के खेतों या निर्माण स्थलों आदि में अस्थायी रूप से कार्य करते हैं और उनके बदले दिहाड़ी/पारिश्रमिक प्राप्त करते हैं।
- भारत में लगभग 20% (19.9%) श्रमिक इस श्रेणी में आते हैं। यह वर्ग आर्थिक रूप से सबसे असुरक्षित माना जाता है।
4. क्षेत्रक अनुसार रोजगार का वितरण (Industrial Sector-wise Distribution)
आर्थिक गतिविधियों को तीन प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रकों में विभाजित किया जाता है:
- प्राथमिक क्षेत्रक (Primary Sector): कृषि, वानिकी, खनन, उत्खनन और मत्स्य पालन।
- द्वितीयक क्षेत्रक (Secondary Sector): विनिर्माण, निर्माण कार्य, बिजली, गैस और जलापूर्ति।
- तृतीयक / सेवा क्षेत्रक (Tertiary / Services Sector): व्यापार, वाणिज्य, परिवहन, भंडारण और अन्य सेवाएँ।
2023-24 के प्रमुख क्षेत्रकवार आंकड़े (प्रतिशत में):
- प्राथमिक क्षेत्रक: भारत के 46.1% श्रमिक प्राथमिक क्षेत्रक में कार्यरत हैं। ग्रामीण भारत की लगभग 60% (59.8%) श्रमशक्ति कृषि व संबद्ध कार्यों पर निर्भर है। महिला श्रमिकों का सर्वाधिक संकेंद्रण (60.9%) प्राथमिक क्षेत्रक में ही है।
- द्वितीयक क्षेत्रक: कुल श्रमशक्ति का 24.1% भाग इसमें नियोजित है।
- तृतीयक / सेवा क्षेत्रक: देश के 29.8% श्रमिक सेवा क्षेत्रक में कार्यरत हैं। शहरी क्षेत्रों में 64.4% श्रमिक सेवा क्षेत्रक से ही रोजगार प्राप्त करते हैं।
5. रोजगार वृद्धि तथा संरचनात्मक प्रवृत्तियाँ
(क) रोजगारहीन संवृद्धि (Jobless Growth)
1951 से 2023 के दौरान भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में निरंतर सकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई, परंतु रोजगार की वृद्धि दर अधिकांश समय 2% या उससे कम के निम्न स्तर पर बनी रही।
- परिभाषा: जब किसी अर्थव्यवस्था में बिना अतिरिक्त नए रोजगार अवसरों का पर्याप्त सृजन किए ही वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन (GDP) बढ़ता है, तो इस स्थिति को ‘रोजगारहीन संवृद्धि’ कहा जाता है।
(ख) श्रमबल का अनियतीकरण (Casualisation of Workforce)
पिछले दशकों में श्रमिकों का स्व-नियोजन तथा नियमित वेतनभोगी रोजगार से हटकर अनियत दिहाड़ी मजदूरी (Casual Labour) वाले कार्यों की ओर स्थानांतरित होने की प्रक्रिया को श्रमबल का अनियतीकरण कहते हैं। इससे मजदूरों की नौकरी की सुरक्षा समाप्त होती है तथा उनकी आर्थिक दशा अधिक नाजुक हो जाती है।
6. भारतीय श्रमबल का अनौपचारीकरण (Informalisation of Workforce)
भारत में कार्यबल को औपचारिक (संगठित) और अनौपचारिक (असंगठित) दो क्षेत्रों में बाँटा गया है:
| आधार | औपचारिक (संगठित) क्षेत्रक | अनौपचारिक (असंगठित) क्षेत्रक |
|---|---|---|
| परिभाषा | सभी सार्वजनिक क्षेत्रक उपक्रम और 10 या अधिक श्रमिकों को रोजगार देने वाले निजी प्रतिष्ठान। | 10 से कम कर्मचारियों वाले निजी उद्यम, छोटे किसान, रेहड़ी-पटरी वाले और दिहाड़ी मजदूर। |
| श्रमिकों का अनुपात | भारत के केवल 11% (लगभग 59 मिलियन) श्रमिक औपचारिक क्षेत्रक में हैं। | देश के लगभग 89% श्रमिक अनौपचारिक क्षेत्रक में काम कर रहे हैं। |
| सामाजिक सुरक्षा व लाभ | पीएफ (PF), पेंशन, ग्रेच्युटी, मातृत्व लाभ तथा श्रम कानूनों का कानूनी संरक्षण प्राप्त होता है। | कोई सामाजिक सुरक्षा लाभ, पेंशन, मातृत्व लाभ या श्रम कानून का संरक्षण नहीं मिलता। |
| आजीविका व श्रम संघ | नियमित आय तथा श्रम संघ (Trade Union) गठित करने का अधिकार होता है। | अनिश्चित आय, पुरानी तकनीक का प्रयोग तथा नौकरी से कभी भी निकाला जा सकता है। |
7. बेरोजगारी (Unemployment) एवं इसके प्रमुख प्रकार
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के अनुसार, बेरोजगारी वह अवस्था है जिसमें कोई व्यक्ति काम के अभाव में बिना काम के रह जाता है, जबकि वह प्रचलित मजदूरी दर पर काम करने की इच्छा और तत्परता रखता है।
बेरोजगारी के प्रमुख प्रकार:
- खुली बेरोजगारी (Open Unemployment): वह स्थिति जिसमें कोई व्यक्ति काम करने की इच्छा और योग्यता रखता है, परंतु उसे आधा दिन या एक घंटे का भी काम नहीं मिल पाता और वह पूरी तरह से बेकार रहता है।
- प्रच्छन्न या छिपी हुई बेरोजगारी (Disguised Unemployment):
- जब किसी कार्य में आवश्यकता से अधिक श्रमिक लगे होते हैं, तो इसे प्रच्छन्न बेरोजगारी कहते हैं।
- यदि इनमें से कुछ श्रमिकों को काम से हटा भी दिया जाए, तो भी कुल उत्पादन में कोई कमी नहीं आती (अर्थात् अतिरिक्त श्रमिकों की सीमांत उत्पादकता शून्य होती है)।
- यह मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र में पाई जाती है।
- मौसमी बेरोजगारी (Seasonal Unemployment):
- कृषि कार्यों की मौसमी प्रकृति के कारण किसानों व कृषि मजदूरों को वर्ष के कुछ महीनों (जैसे फसल की बुआई व कटाई के बीच का समय) में काम नहीं मिलता और वे बेरोजगार हो जाते हैं।
8. सरकार एवं रोजगार सृजन (Government & Employment Generation)
सरकार रोजगार अवसरों के सृजन के लिए दो प्रकार से प्रयास करती है:
- प्रत्यक्ष रोजगार सृजन (Direct Generation): अपने प्रशासनिक विभागों, सरकारी अस्पतालों, स्कूलों तथा सार्वजनिक उद्यमों (जैसे सरकारी इस्पात संयंत्र, बैंक, परिवहन) में सीधी भर्तियां करके।
- अप्रत्यक्ष रोजगार सृजन (Indirect Generation): जब सरकारी उपक्रमों में उत्पादन बढ़ता है, तो उन्हें कच्चा माल व सेवाएँ उपलब्ध कराने वाले निजी उद्यमों में भी उत्पादन और नए रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।
प्रमुख रोजगार सृजन कार्यक्रम:
- मनरेगा (MGNREGA – 2005): महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत ग्रामीण परिवारों के वयस्क सदस्यों को वर्ष में कम से कम 100 दिन के अकुशल शारीरिक श्रम वाले रोजगार की कानूनी गारंटी दी जाती है।
- अन्य परिसंपत्ति निर्माण कार्यक्रम: प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण आवास, जलापूर्ति, और ग्रामीण सड़कों के निर्माण से जुड़े गरीबी निवारण कार्यक्रमों के माध्यम से रोजगार का सृजन किया जाता है।
💡 अर्धवार्षिक परीक्षा हेतु त्वरित पुनरीक्षण बिंदु (Quick Exam Recap)
- श्रमिक की परिभाषा: आर्थिक क्रियाओं में संलग्न प्रत्येक व्यक्ति जो राष्ट्रीय आय में योगदान देता है, श्रमिक कहलाता है।
- श्रमिक-जनसंख्या अनुपात सूत्र: \((\text{कुल श्रमिक} / \text{कुल जनसंख्या}) \times 100\)।
- रोजगारहीन संवृद्धि: GDP वृद्धि दर का उच्च होना परंतु रोजगार सृजन दर का नगण्य या कम रहना।
- औपचारिक क्षेत्रक की शर्त: सार्वजनिक उपक्रम + 10 या उससे अधिक कर्मचारियों वाले निजी उपक्रम।
- भारत में अनौपचारिक कार्यबल: लगभग 89% श्रमिक असंगठित/अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं।
- प्रच्छन्न बेरोजगारी: कृषि क्षेत्र में सीमांत उत्पादकता का शून्य होना।
- मनरेगा गारंटी: 100 दिनों के अकुशल दिहाड़ी रोजगार की गारंटी।