कक्षा 9 हिंदी पाठ 11 झाँसी की रानी सरल भावार्थ

कक्षा 9 हिंदी – पाठ 11: ‘झाँसी की रानी’ (पद-वार एवं पंक्ति-वार सरल भावार्थ)

कक्षा 9 हिंदी – पाठ 11: ‘झाँसी की रानी’ (पद-वार एवं पंक्ति-वार सरल भावार्थ)


सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित ‘झाँसी की रानी’ कविता भारत के 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इसमें रानी लक्ष्मीबाई के बाल्यकाल, विवाह, संघर्ष, अदम्य शौर्य और देश के लिए उनके वीरगति प्राप्त करने की पूरी गाथा का चित्रण किया गया है।


पद 1

काव्यांश:
सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पंक्ति-वार भावार्थ:

  • सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी: अंग्रेजों के अत्याचारों के कारण भारत के देशी राजाओं के सिंहासन डगमगाने लगे और राजवंश अंग्रेजों पर अत्यधिक क्रोधित (भृकुटी तानना) हो उठे।
  • बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी: लंबे समय की गुलामी से जो भारत कमजोर और निराश (बूढ़ा) हो चुका था, उसमें स्वतंत्रता की एक नई चेतना और उत्साह (नई जवानी) का संचार हुआ।
  • गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी: देशवासियों ने अपनी खोई हुई स्वतंत्रता के वास्तविक महत्व और मूल्य को समझ लिया था।
  • दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी: सभी भारतीयों ने अंग्रेज शासकों (फिरंगियों) को देश से बाहर खदेड़ने का दृढ़ निश्चय कर लिया था।
  • चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी: 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भारत की वर्षों पुरानी ज़ंग लगी तलवारें पुनः चमक उठीं।
  • बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी / खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी: बुंदेलखंड के लोकगायकों (हरबोलों) के मुख से हमने यही अमर गाथा सुनी है कि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई पुरुषों की भाँति पराक्रम के साथ मैदान में लड़ी थीं।

पद 2

काव्यांश:
कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथाएँ उसको याद ज़बानी थीं,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पंक्ति-वार भावार्थ:

  • कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन ‘छबीली’ थी: लक्ष्मीबाई कानपुर के नाना साहब की मुँहबोली बहन थीं, जिन्हें वे प्यार से ‘छबीली’ कहकर पुकारते थे।
  • लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी: उनका नाम लक्ष्मीबाई था और वे अपने पिता की इकलौती संतान थीं।
  • नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी: उनका बाल्यकाल नाना साहब के साथ ही पढ़ते और खेलते हुए बीता था।
  • बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी: सामान्य बालिकाओं के खिलौनों के स्थान पर भाला (बरछी), ढाल, तलवार (कृपाण) और कटारी ही उनकी सच्ची सहेलियाँ थीं।
  • वीर शिवाजी की गाथाएँ उसको याद ज़बानी थीं: उन्हें बचपन से ही मराठा वीर छत्रपति शिवाजी महाराज के शौर्य की कहानियाँ मुँह-ज़बानी याद थीं।
  • बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी…: बुंदेलखंड के गायकों से हमने झाँसी की रानी की इसी अद्वितीय वीरता की कहानी सुनी है।

पद 3

काव्यांश:
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवाड़।
महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पंक्ति-वार भावार्थ:

  • लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार: लक्ष्मीबाई को देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो वे साक्षात देवी लक्ष्मी, दुर्गा या स्वयं वीरता का रूप धारण करके आई हों।
  • देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार: युद्ध कौशल में उनके तलवार चलाने की निपुणता देखकर मराठा योद्धा प्रसन्नता और गर्व से भर जाते थे।
  • नकली युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार: बचपन में उनके प्रिय खेल नकली युद्ध लड़ना, सेना की चक्रव्यूह रचना करना और शिकार खेलना थे।
  • सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवाड़: शत्रु की सेना को घेरना और किलो को तोड़ना ही उनके पसंदीदा खेल थे।
  • महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी: महाराष्ट्र के राजवंशों की कुलदेवी माता भवानी ही रानी लक्ष्मीबाई की भी पूज्य देवी थीं।

पद 4

काव्यांश:
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुघड़ बुंदेलों की विरुदावली-सी वह आई झाँसी में।
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पंक्ति-वार भावार्थ:

  • हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में: वीरता की प्रतीक लक्ष्मीबाई की सगाई झाँसी के वैभवशाली राजा गंगाधर राव के साथ हुई।
  • ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में: विवाह सम्पन्न होने के बाद वे महारानी बनकर झाँसी पधारीं।
  • राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में: उनके आगमन से झाँसी के राजमहल में उत्सव का माहौल बन गया और चारों ओर आनंद छा गया।
  • सुघड़ बुंदेलों की विरुदावली-सी वह आई झाँसी में: उनका झाँसी आना ऐसा लगा मानो बुंदेलखंड के वीरों की यशोगाथा (विरुदावली) स्वयं साकार होकर आ गई हो।
  • चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी: उनका यह मिलन वैसा ही अलौकिक था जैसा चित्रा का अर्जुन से या भगवान शिव का माता भवानी से हुआ था।

पद 5

काव्यांश:
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं,
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निःसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पंक्ति-वार भावार्थ:

  • उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई: विवाह के पश्चात झाँसी के महलों में सौभाग्य और खुशियों का उजाला छ गया।
  • किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई: परंतु समय का क्रूर चक्र धीरे-धीरे झाँसी पर दुःखों के काले बादल घेर लाया।
  • तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं: नियति को हथियार चलाने वाले रानी के हाथों में सुहाग की चूड़ियाँ अधिक समय तक रास नहीं आईं।
  • रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई: राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गई और रानी कम उम्र में ही विधवा हो गईं; ईश्वर को भी उन पर दया न आई।
  • निःसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी: राजाजी बिना किसी संतान के ही चल बसे, जिससे रानी अत्यधिक दुःख और शोक में डूब गईं।

पद 6

काव्यांश:
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हर्षाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फ़ौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पंक्ति-वार भावार्थ:

  • बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हर्षाया: झाँसी के राजा के निधन से जब झाँसी का चिराग बुझ गया, तो अंग्रेज गवर्नर डलहौजी मन ही मन बहुत खुश हुआ।
  • राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया: उसने झाँसी को अंग्रेजी राज्य में मिलाने (‘हड़प नीति’) का यह सही मौका समझा।
  • फ़ौरन फ़ौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया: उसने तुरंत अपनी सेना भेजकर झाँसी के किले पर ब्रिटिश झंडा फहरा दिया।
  • लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया: झाँसी को उत्तराधिकारी से रहित पाकर ब्रिटिश शासन स्वयं उसका मालिक बन बैठा।
  • अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी: आंसुओं से भरी रानी लक्ष्मीबाई ने देखा कि उनकी प्रिय झाँसी अब पराई और अनाथ हो चुकी है।

पद 7

काव्यांश:
अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फिरंगी की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया,
राजाओं नवाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महारानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पंक्ति-वार भावार्थ:

  • अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फिरंगी की माया: अंग्रेज शासक बहुत कूटनीतिज्ञ और निष्ठुर थे; वे किसी की प्रार्थना नहीं सुनते थे।
  • व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया: शुरुआत में ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में केवल व्यापार की अनुमति और दया माँगने आई थी।
  • डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया: लेकिन डलहौजी के समय तक अंग्रेजों ने पूरे देश में अपना साम्राज्य फैला लिया और स्थिति पूरी तरह बदल दी।
  • राजाओं नवाबों को भी उसने पैरों ठुकराया: उन्होंने भारत के देशी राजाओं और नवाबों के मान-सम्मान को ठुकरा दिया।
  • रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महारानी थी: भारतीय रानियों की स्थिति दासी जैसी हो गई और ब्रिटेन की रानी भारत की मालिक बन बैठीं।

पद 8

काव्यांश:
छिनी राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदयपुर, तंजौर, सतारा, कर्नाटक की कौन बिसात,
जबकि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो यही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पंक्ति-वार भावार्थ:

  • छिनी राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों-बात: अंग्रेजों ने दिल्ली छीन ली और लखनऊ पर आसानी से अधिकार कर लिया।
  • कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात: पेशवा को बिठूर में नज़रबंद कर दिया गया और नागपुर पर भी धोखे से कब्ज़ा किया गया।
  • उदयपुर, तंजौर, सतारा, कर्नाटक की कौन बिसात: उदयपुर, तंजौर, सतारा और कर्नाटक जैसे राज्यों की अंग्रेजों के सामने क्या हैसियत थी।
  • जबकि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात: सिंध, पंजाब और बर्मा (ब्रह्म) पर भी अंग्रेजों का भीषण आक्रमण और शोषण हुआ था।
  • बंगाले, मद्रास आदि की भी तो यही कहानी थी: बंगाल और मद्रास प्रांतों का भी अंग्रेजों ने यही हाल किया था।

पद 9

काव्यांश:
रानी रोईं रनिवासों में बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने-कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे-आम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अख़बार,
‘नागपुर के ज़ेवर ले लो’ ‘लखनऊ के लो नौलख हार’।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पंक्ति-वार भावार्थ:

  • रानी रोईं रनिवासों में बेगम ग़म से थीं बेज़ार: भारतीय राजाओं की रानियाँ अपने महलों में रो रही थीं और नवाबों की बेगमों का दुःख से बुरा हाल था।
  • उनके गहने-कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार: अंग्रेज शासक उनके कीमती वस्त्र और आभूषण छीनकर कलकत्ता के बाज़ारों में बेचते थे।
  • सरे-आम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अख़बार / ‘नागपुर के ज़ेवर ले लो’ ‘लखनऊ के लो नौलख हार’: अंग्रेजों के समाचार पत्र खुलेआम विज्ञापन छापते थे— “नागपुर के ज़ेवर खरीद लो” और “लखनऊ का नौलखा हार ले लो”।
  • यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी: इस प्रकार भारतीय राजघरानों की महिलाओं की मर्यादा और इज़्ज़त विदेशी अंग्रेजों के हाथों नीलाम हो रही थी।

पद 10

काव्यांश:
कुटियों में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहन छबीली ने रण-चंडी का कर दिया प्रकट आह्वान।
हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पंक्ति-वार भावार्थ:

  • कुटियों में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान: एक तरफ़ निर्धनों की झोंपड़ियों में भारी दुःख था, तो दूसरी तरफ़ महलों में राजाओं के स्वाभिमान का अपमान हो रहा था।
  • वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान: भारतीय सैनिकों के दिलों में अपने शूरवीर पूर्वजों के प्रति गर्व था।
  • नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान: नाना धुंधूपंत क्रांति की सफलता के लिए सैन्य संसाधन जुटा रहे थे।
  • बहन छबीली ने रण-चंडी का कर दिया प्रकट आह्वान: उनकी बहन रानी लक्ष्मीबाई ने साक्षात दुर्गा (रणचंडी) बनकर अंग्रेजों से युद्ध का खुला आह्वान कर दिया।
  • हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी: स्वतंत्रता का महायज्ञ आरंभ हुआ, जिसका लक्ष्य भारतीयों के मन में देशभक्ति की सोई हुई चेतना को जगाना था।

पद 11

काव्यांश:
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिंगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं,
मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी।
जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसाई थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पंक्ति-वार भावार्थ:

  • महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी: इस विद्रोह में राजाओं (महलों) ने असंतोष की आग दी और आम जनता (झोंपड़ियों) ने उसे प्रचंड ज्वाला बना दिया।
  • यह स्वतंत्रता की चिंगारी अंतरतम से आई थी: यह आज़ादी की तड़प भारतीयों के हृदय की गहराइयों से निकली थी।
  • झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं: झाँसी, दिल्ली और लखनऊ में क्रांति की ज्वाला तेजी से फैल गई।
  • मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी: मेरठ, कानपुर और पटना में क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध जोरदार संघर्ष किया।
  • जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसाई थी: जबलपुर और कोल्हापुर जैसे सुदूर स्थानों में भी विद्रोह का वातावरण बन गया था।

पद 12

काव्यांश:
इस स्वतंत्रता-महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमद शाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास-गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो क़ुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पंक्ति-वार भावार्थ:

  • इस स्वतंत्रता-महायज्ञ में कई वीरवर आए काम: स्वतंत्रता के इस पावन संग्राम में देश के कई महान शूरवीरों ने वीरगति पाई।
  • नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम / अहमद शाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम: नाना धुंधूपंत, ताँतिया तोपे, अज़ीमुल्ला खाँ, अहमद शाह मौलवी और बिहार के कुँवर सिंह जैसे वीर सेनानी इसमें शामिल थे।
  • भारत के इतिहास-गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम: भारत के इतिहास के आकाश में इन सभी बलिदानियों के नाम सदा अमर रहेंगे।
  • लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो क़ुरबानी थी: यद्यपि अंग्रेजों के शासनकाल में उनके इस महान त्याग को ‘अपराध’ कहा गया, परंतु वे सच्चे देशभक्त थे।

पद 13

काव्यांश:
इनकी गाथा छोड़ चलें हम झाँसी के मैदानों में,
वहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ़्टिनेंट वॉकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में।
ज़ख़्मी होकर वॉकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पंक्ति-वार भावार्थ:

  • इनकी गाथा छोड़ चलें हम झाँसी के मैदानों में / वहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में: अन्य वीरों की कथा छोड़कर अब झाँसी के युद्ध मैदान चलते हैं, जहाँ रानी लक्ष्मीबाई वीरों के बीच वीर योद्धा बनकर खड़ी हैं।
  • लेफ़्टिनेंट वॉकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में: अंग्रेज सैन्य अधिकारी लेफ़्टिनेंट वॉकर अपने सैनिकों के साथ आगे बढ़ा।
  • रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में: रानी ने तुरंत म्यान से तलवार निकाल ली और दोनों के बीच भयानक युद्ध शुरू हो गया।
  • ज़ख़्मी होकर वॉकर भागा, उसे अजब हैरानी थी: रानी के भीषण प्रहारों से घायल होकर वॉकर मैदान छोड़कर भाग निकला; वह रानी की अदम्य क्षमता देखकर हैरान रह गया।

पद 14

काव्यांश:
रानी बढ़ी काल्पी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना-तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पंक्ति-वार भावार्थ:

  • रानी बढ़ी काल्पी आई, कर सौ मील निरंतर पार: रानी लगातार सौ मील का कठिन रास्ता तय करके काल्पी आ पहुँचीं।
  • घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार: लगातार दौड़ने से अत्यधिक थका उनका प्रिय घोड़ा ज़मीन पर गिर पड़ा और तुरंत मर गया।
  • यमुना-तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार: यमुना नदी के किनारे रानी ने अंग्रेजों की सेना को पुनः पराजित किया।
  • विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार / अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी: जीत हासिल कर रानी आगे बढ़ीं और ग्वालियर के किले पर अधिकार कर लिया; अंग्रेजों का सहयोगी सिंधिया अपनी राजधानी छोड़कर भाग खड़ा हुआ।

पद 15

काव्यांश:
विजय मिली, पर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सन्मुख था, उसने मुँह की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के सँग आई थीं,
युद्ध क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर, पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पंक्ति-वार भावार्थ:

  • विजय मिली, पर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी: ग्वालियर पर जीत के बाद अंग्रेजों की दूसरी विशाल सेना ने रानी को घेर लिया।
  • अबके जनरल स्मिथ सन्मुख था, उसने मुँह की खाई थी: इस बार अंग्रेज जनरल स्मिथ सामने से आया, परंतु रानी ने उसे भी बुरी तरह हराया।
  • काना और मंदरा सखियाँ रानी के सँग आई थीं / युद्ध क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी: रानी की दो बहादुर सहेलियाँ ‘काना’ और ‘मंदरा’ भी युद्ध में साथ थीं, जिन्होंने शत्रुओं का संहार किया।
  • पर, पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी: परंतु इसी बीच अंग्रेज जनरल ह्यूरोज़ अपनी सेना के साथ पीछे से आ पहुँचा और रानी शत्रुओं से घिर गईं।

पद 16

काव्यांश:
तो भी रानी मार-काटकर चलती बनी सैन्य के पार,
किंतु सामने नाला आया, था यह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गए सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर-गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पंक्ति-वार भावार्थ:

  • तो भी रानी मार-काटकर चलती बनी सैन्य के पार: फिर भी रानी शत्रुओं को काटती हुई ब्रिटिश सेना का घेरा तोड़कर आगे निकल गईं।
  • किंतु सामने नाला आया, था यह संकट विषम अपार: लेकिन दुर्भाग्य से आगे एक गहरा नाला आ गया, जो एक बड़ा संकट था।
  • घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गए सवार: नया घोड़ा नाला पार करने में अड़ गया और इतने में पीछे से कई अंग्रेज सैनिक आ पहुँचे।
  • रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार: रानी अकेली थीं और शत्रु अनगिनत; उन पर चारों तरफ़ से हथियारों के वार होने लगे।
  • घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर-गति पानी थी: वीरांगना सिंहनी की तरह लड़ती हुई रानी अंततः घायल होकर धरती पर गिर पड़ीं और मातृभूमि के लिए वीरगति प्राप्त की।

पद 17

काव्यांश:
रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी।
दिखरा गई पथ, सिखरा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पंक्ति-वार भावार्थ:

  • रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी: रानी लक्ष्मीबाई वीरगति प्राप्त कर परलोक सिधार गईं और चिता की अग्नि ही उनकी पवित्र सवारी बनी।
  • मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी: रानी की आत्मा का ओजस्वी प्रकाश ईश्वर के दिव्य तेज में लीन हो गया, जिसकी वे सच्ची हक़दार थीं।
  • अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी: वीरगति के समय उनकी आयु केवल 23 वर्ष थी; इतने कम समय में इतना महान कार्य करने वाली रानी साधारण मनुष्य न होकर अवतारी थीं।
  • हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी: वे स्वतंत्रता की देवी बनकर पराधीन भारतवासियों के मन में नया जीवन और चेतना भरने आई थीं।
  • दिखरा गई पथ, सिखरा गई हमको जो सीख सिखानी थी: वे हमें स्वाधीनता का मार्ग दिखा गईं और देशभक्ति तथा बलिदान का सच्चा पाठ पढ़ा गईं।

पद 18

काव्यांश:
जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥

पंक्ति-वार भावार्थ:

  • जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी: हे रानी! आप अमर हो गईं, हम समस्त भारतवासी सदैव आपके उपकार और बलिदान के प्रति आभारी रहेंगे।
  • यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी: आपका यह महान त्याग देश में कभी न मिटने वाली स्वतंत्रता की भावना को जगाकर रखेगा।
  • होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी / हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी: चाहे इतिहास खामोश हो जाए, चाहे सच को फाँसी चढ़ा दिया जाए या अंग्रेज अपनी विजय के मद में झाँसी को तोपों से नष्ट कर दें।
  • तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी: आपका कोई भौतिक स्मारक बने या न बने, आप स्वयं अपना सबसे बड़ा स्मारक हैं क्योंकि आपकी वीरता ही स्वयं में एक अमिट पहचान है।
  • बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी…: बुंदेलखंड के गायकों से हमने झाँसी की रानी की इसी अमर गाथा को सुना है।

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