कक्षा 9 हिंदी के पाठ 6 ‘रीढ़ की हड्डी’ (लेखक: जगदीशचंद्र माथुर) के सभी प्रश्न और उत्तर
कक्षा 9 हिंदी (पाठ 6) — ‘रीढ़ की हड्डी’ (प्रश्न-उत्तर)
1. मेरे उत्तर मेरे तर्क (बहुविकल्पीय प्रश्न)
प्रश्न 1. एकांकी ‘रीढ़ की हड्डी’ का शीर्षक किसका प्रतीक है?
- (क) शरीर के एक आवश्यक अंग का
- (ख) व्यक्ति की ऊँचाई के आधार का
- (ग) आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का
- (घ) शारीरिक शक्ति और परिश्रम का
उत्तर: (ग) आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का
तर्क: यह शीर्षक केवल शारीरिक अंग का सूचक न होकर व्यक्ति के स्वाभिमान, साहस और नैतिक चरित्र की दृढ़ता को दर्शाता है।
प्रश्न 2. ‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी में किस पर व्यंग्य किया गया है?
- (क) पात्रों की निर्धनता और लाचारी पर
- (ख) पात्रों की भाषा और हास्य पर
- (ग) विवाह और अशिक्षा पर
- (घ) समाज की अनुचित मान्यताओं पर
उत्तर: (घ) समाज की अनुचित मान्यताओं पर
तर्क: एकांकी में स्त्रियों की शिक्षा तथा विवाह को लेकर समाज की संकुचित और पुरुष-प्रधान रूढ़िवादी सोच पर करारा प्रहार किया गया है।
प्रश्न 3. “घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं” यह वाक्य शंकर की किस छवि को उजागर करता है?
- (क) नैतिक साहस की कमी और चारित्रिक दुर्बलता
- (ख) अनुभव और विवेक की कमी
- (ग) चारित्रिक दृढ़ता और शारीरिक दुर्बलता
- (घ) उदासीनता और एकाकीपन
उत्तर: (क) नैतिक साहस की कमी और चारित्रिक दुर्बलता
तर्क: यह संवाद शंकर के व्यक्तित्वहीन होने, लड़कियों के हॉस्टल के चक्कर काटने की घटिया हरकत और उसमें नैतिक साहस व चरित्र की कमी को प्रकट करता है।
प्रश्न 4. “जी हाँ, मैं कॉलेज में पढ़ी हूँ। मैंने बी.ए. पास किया है।” उमा की दृष्टि में शिक्षा प्राप्त करने का सही अर्थ है?
- (क) बड़ी-बड़ी डिग्री प्राप्त करना
- (ख) कॉलेज में पढ़ना और नौकरी पाना
- (ग) माता-पिता और पति को प्रसन्न रखना
- (घ) आत्मबल और स्वतंत्र विचार रखना
उत्तर: (घ) आत्मबल और स्वतंत्र विचार रखना
तर्क: उमा शिक्षा को केवल डिग्री या दिखावा न मानकर आत्म-सम्मान, आत्मबल और सही-गलत को समझने का आधार मानती है।
प्रश्न 5. गोपालप्रसाद और रामस्वरूप में क्या-क्या समानताएँ हैं?
- (क) दोनों प्रगतिशील हैं और रूढ़ियों को नकारते हैं।
- (ख) दोनों दिखावे और परंपरा के शिकार हैं।
- (ग) दोनों शिक्षा और रूढ़ियों के समर्थक हैं।
- (घ) दोनों संगीत और स्वादिष्ट भोजन के प्रेमी हैं।
उत्तर: (ख) दोनों दिखावे और परंपरा के शिकार हैं।
तर्क: रामस्वरूप अपनी बेटी को पढ़ाते तो हैं, पर विवाह के समय सच छिपाते हैं; वहीं गोपालप्रसाद स्वयं वकील होकर भी कम पढ़ी-लिखी बहू चाहते हैं। दोनों ही सामाजिक दिखावे के शिकार हैं।
प्रश्न 6. इस एकांकी की संवाद शैली मुख्यतः कैसी है?
- (क) औपचारिक और शुष्क
- (ख) स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्ण
- (ग) काव्यात्मक और प्रश्नात्मक
- (घ) भावुक और संक्षिप्त
उत्तर: (ख) स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्ण
तर्क: एकांकी के संवाद आम बोलचाल की भाषा में लिखे गए हैं तथा समाज की कुरीतियों पर गहरा व्यंग्य करते हैं।
2. मेरी समझ मेरे विचार (विषय-आधारित प्रश्न-उत्तर)
प्रश्न 1. बाबू रामस्वरूप समाज में आधुनिक व्यवहार का दिखावा करते हैं, जबकि उनके विचार रूढ़िवादी हैं। इस अंतर्द्वंद्व के उदाहरण एकांकी में से खोजकर लिखिए।
उत्तर:
रामस्वरूप अपनी बेटी उमा को बी.ए. तक पढ़ाते हैं और घर में आधुनिक साज़-सामान, मेज़-पोश व चाय का इंतज़ाम करते हैं। परंतु जब विवाह की बात आती है, तो वे गोपालप्रसाद की पिछड़ी शर्तों के आगे झुक जाते हैं और उमा की उच्च शिक्षा की बात छिपाकर उसे केवल ‘मैट्रिक-पास’ बताते हैं। यह उनका दोहरा व्यवहार और अंतर्द्वंद्व दर्शाता है।
प्रश्न 2. ‘रीढ़ की हड्डी’ का संदर्भ दो अलग-अलग पात्रों के लिए भिन्न-भिन्न अर्थों में आया है, उनकी पहचान कीजिए और लिखिए।
उत्तर:
- शंकर के संदर्भ में: यहाँ ‘रीढ़ की हड्डी’ उसकी शारीरिक लाचारी (झुकी कमर) के साथ-साथ उसकी चारित्रिक दुर्बलता, व्यक्तित्वहीनता और स्वाभिमान की कमी को दर्शाती है।
- उमा / समाज के संदर्भ में: यहाँ यह आत्म-सम्मान, नैतिक दृढ़ता और नारी के स्वाभिमान का प्रतीक है।
प्रश्न 3. “मेरी समझ में तो ये पढ़ाई-लिखाई के जंजाल आते नहीं।” प्रेमा की इस सोच से उस समय की स्त्री-शिक्षा की स्थिति के विषय में क्या पता चलता है?
उत्तर:
प्रेमा के कथन से ज्ञात होता है कि उस समय समाज में महिलाओं की शिक्षा को निरर्थक और झंझट माना जाता था। पुरानी पीढ़ी की महिलाएँ भी यह मानती थीं कि लड़कियों के लिए केवल थोड़ी-बहुत हिंदी-गिनती पढ़ना और गृहस्थी संभालना ही पर्याप्त है।
प्रश्न 4. लेखक ने ‘रीढ़ की हड्डी’ शब्द को एकांकी के शीर्षक के रूप में क्यों चुना होगा? यदि आप इस एकांकी का दूसरा शीर्षक रखना चाहें, तो वह क्या होगा और क्यों?
उत्तर:
जिस प्रकार मानव शरीर को खड़ा रखने के लिए रीढ़ की हड्डी सबसे ज़रूरी अंग है, उसी प्रकार समाज और व्यक्ति में स्वाभिमान व नैतिक चरित्र का होना अति आवश्यक है।
- दूसरा सम्भावित शीर्षक: “स्वाभिमानी उमा” या “दिखावे की दुनिया”।
- कारण: यह शीर्षक उमा के निडर व्यक्तित्व और समाज के ढोंग व दोहरे मापदंड को सीधे उजागर करता है।
3. तुलना और विचार
प्रश्न 1. “गोपालप्रसाद : भला पूछिए इन अक्ल के ठेकेदारों से कि क्या लड़कों की पढ़ाई और लड़कियों की पढ़ाई एक बात है।” एकांकी में उन पंक्तियों को खोजिए जहाँ पात्रों के व्यवहार में लड़कों और लड़कियों के प्रति भिन्न-भिन्न दृष्टि अभिव्यक्त हुई है।
उत्तर:
एकांकी में गोपालप्रसाद कहते हैं:
- “मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं; शेर के बाल होते हैं, शेरनी के नहीं।”
- “जनाब, पुरुषों का काम तो है ही पढ़ना और काबिल होना… उच्च शिक्षा सिर्फ़ पुरुषों के लिए है।”
यह सोच समाज में व्याप्त पुरुष-प्रधान मानसिकता और लैंगिक भेदभाव (दोहरे मापदंड) को स्पष्ट करती है।
प्रश्न 2. “मुझे अपनी इज़्ज़त, अपने मान का ख़याल तो है। लेकिन इनसे पूछिए कि ये किस तरह अपना मुँह छिपाकर भागे थे।” उमा के व्यक्तित्व के विषय में क्या पता चलता है?
उत्तर:
इस कथन से उमा के स्वाभिमानी, साहसी, स्पष्टवादी और शिक्षित होने का पता चलता है। उसमें यह विशेषताएँ उसकी उच्च शिक्षा (बी.ए.), आत्मबल और सही-गलत की समझ के कारण आई हैं।
4. एकांकी का विस्तार
प्रश्न 1. एकांकी के अंत में रतन कहता है— “बाबूजी, मक्खन…” और परदा गिर जाता है। लेखक ने इस संवाद से एकांकी का अंत क्यों किया होगा?
उत्तर:
यह अंत एकांकी में तीखा व्यंग्य और हास्य पैदा करता है। बाबू रामस्वरूप जिस मक्खन के लिए पूरे नाटक में परेशान रहते हैं, वह तब आता है जब उमा के कड़वे सच के कारण शादी की बात टूट चुकी होती है और मेहमान जा चुके होते हैं। यह स्थिति की विडंबना को उजागर करता है।
प्रश्न 2. एकांकी में यदि परदा दोबारा उठ जाए तो अगला दृश्य क्या होगा? अनुमान लगाइए।
उत्तर:
परदा दोबारा उठने पर रामस्वरूप ग्लानि में डूबे होंगे। प्रेमा उमा को ढाँढस बँधाएगी और रामस्वरूप को अपनी गलती का अहसास होगा कि बेटी की शिक्षा छिपाना गलत था। वे उमा के साहस और स्वाभिमान पर गर्व महसूस करेंगे।
5. व्याकरण की बात (मुहावरे और वाक्य प्रयोग)
- भीगी बिल्ली बनना (भीगी बिल्ली की तरह आना): डर या लाचारी के कारण शांत होना।
- वाक्य प्रयोग: चोरी पकड़े जाने पर रमेश भीगी बिल्ली बन गया।
- मुँह फुलाना: रुठ जाना या नाराज़ होना।
- वाक्य प्रयोग: मनपसंद खिलौना न मिलने पर बच्चा मुँह फुलाकर बैठ गया।
- किस मर्ज़ की दवा होना: काम न आना / अनुपयोगी होना।
- वाक्य प्रयोग: जब तुम मुसीबत में दोस्त की मदद ही न कर सको, तो किस मर्ज़ की दवा हो?
- सिर चढ़ाना: बहुत अधिक छूट देना।
- वाक्य प्रयोग: बच्चों को हद से ज़्यादा सिर चढ़ाना सही नहीं होता।
- सब कुछ उगल देना: सारे भेद खोल देना।
- वाक्य प्रयोग: पुलिस की सख़्ती देखते ही चोर ने सब कुछ उगल दिया।
- काँटों में घसीटना: परेशानी या दुविधा में डालना।
- वाक्य प्रयोग: ऐसी छोटी-सी बात पर मुझे काँटों में घसीटना ठीक नहीं है।
- इज़्ज़त उतारना: अपमानित करना।
- वाक्य प्रयोग: भरी सभा में किसी की इज़्ज़त उतारना सभ्यता नहीं है।
- मुँह छिपाकर भागना: लज्जित होकर भाग जाना।
- वाक्य प्रयोग: अपनी पोल खुलते ही चालाक आदमी वहाँ से मुँह छिपाकर भाग गया।
6. संदर्भ में शब्द (कहावत का प्रयोग)
- कहावत: “बाप शेर है तो लड़का सवा शेर”
- सकारात्मक अर्थ में वाक्य प्रयोग:
- वाक्य: “पिता जी अगर राज्य स्तर के बेहतरीन खिलाड़ी थे, तो उनके बेटे ने ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर साबित कर दिया कि बाप शेर है तो लड़का सवा शेर।”