कक्षा 9 हिंदी स्पर्श पाठ 7 रहीम
✅ दोहा:
“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय।
टूटे से फिर न मिले, मिले गाँठ परिजाय॥”
🔍 शब्दार्थ:
- धागा प्रेम का – प्रेम/संबंध की डोर
- मत तोड़ो छिटकाय – उसे झटका देकर मत तोड़ो (क्रोध या हठ से)
- टूटे से फिर न मिले – एक बार टूट जाने पर वह पहले जैसा नहीं जुड़ता
- गाँठ परिजाय – यदि किसी तरह जोड़ा भी जाए, तो उसमें गाँठ रह जाती है (पहली सी सरलता और विश्वास नहीं लौटता)
🧠 भावार्थ (Meaning):
रहीम कहते हैं कि प्रेम की डोर (संबंध, दोस्ती, रिश्ते) बहुत नाज़ुक होती है।
इसे कभी क्रोध, हठ, या स्वार्थ से तोड़ना नहीं चाहिए।
क्योंकि एक बार टूट जाने पर वह डोर यदि जोड़ी भी जाए, तो उसमें गाँठ पड़ जाती है — यानी संबंध पहले जैसे सरल और विश्वासपूर्ण नहीं रह जाते।
📌 नीति सन्देश:
- रिश्तों और प्रेम में कोमलता, धैर्य और विश्वास बनाए रखना चाहिए।
- क्रोध या अहंकार में आकर रिश्ते तोड़ना हानिकारक है।
- टूटा हुआ संबंध जोड़ने पर भी उसमें दूरी और खटास बनी रहती है।
- प्रेम का मूल्य उसकी निरंतरता और सहजता में है।
🌿 सरल उदाहरण:
दो दोस्तों में झगड़े से रिश्ते टूट जाते हैं। बाद में समझौता हो भी जाए, लेकिन मन में गाँठ (संदेह/कटुता) रह जाती है। यही बात रहीम यहाँ दोहे में समझाते हैं।
दोहा:
“रहिमन निज मन की बिधा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाटि न लैहैं कोय।।”
🔍 शब्दार्थ:
- निज मन की बिधा – अपने मन की पीड़ा / दुख
- राखो गोय – छुपाकर रखो (गोपनीय रखो)
- अठिलैहैं – मुस्कराते हैं, मज़ाक बनाते हैं
- बाटि न लैहैं कोय – कोई उसमें भाग नहीं लेता, कोई सहायता नहीं करता
🧠 भावार्थ (Meaning):
रहीम कहते हैं कि अपने मन की पीड़ा को अपने ही मन में छिपाकर रखना चाहिए।
क्योंकि जब लोग उस दुख को सुनते हैं तो या तो मज़ाक उड़ाते हैं या मात्र सहानुभूति दिखाते हैं, लेकिन कोई भी उस दुख का भागी नहीं बनता, कोई मदद नहीं करता।
🧭 नीति सन्देश (Moral Message):
- हर दुख-दर्द सबको नहीं बताया जाता।
- लोग केवल सुनते हैं, हँसते हैं — पर मदद नहीं करते।
- इसीलिए अपने दुखों को चुपचाप सह लेना ही समझदारी है।
✅ दोहा:
“एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहिं सोंचिबो, फूलै फलै अघाय।।”
🔍 शब्दार्थ:
- एकै साधे सब सधै – यदि एक (मुख्य उद्देश्य) को साधो, तो सब कुछ अपने आप सध जाता है।
- सब साधे सब जाय – लेकिन यदि सब कुछ एक साथ साधना चाहो, तो कुछ भी नहीं मिलता।
- मूलहिं सोंचिबो – मूल (जड़/मूल कारण/मुख्य बात) पर ध्यान देना चाहिए।
- फूलै फलै अघाय – तब फूल और फल भरपूर मिलते हैं।
🧠 भावार्थ (Meaning):
रहीम कहते हैं कि यदि हम एक मुख्य लक्ष्य या काम पर ध्यान केंद्रित करें, तो बाकी सब कार्य अपने आप सफल हो जाते हैं।
लेकिन अगर हम एक साथ बहुत से काम करने लगें, तो कोई भी काम ठीक से नहीं होता।
जैसे पौधे की जड़ की सही देखभाल करें, तो वह स्वाभाविक रूप से फूल और फल से लद जाएगा। इसलिए, मूल बात (जड़) को समझकर उस पर काम करना चाहिए।
📌 नीति सन्देश:
- एक समय में एक ही मुख्य लक्ष्य रखें।
- फोकस और प्राथमिकता जरूरी है।
- यदि जड़ मजबूत होगी तो फूल-फल अपने आप मिलेंगे।
- अति-लालच या अति-उत्साह से सब हाथ से चला जाता है।
✅ दोहा:
“चित्रकूट में रबि रहे, रहिमन अवध-नरेस।
जा पर विपदा पड़त है, सो आवत यह देस।।”
🔍 शब्दार्थ:
- चित्रकूट – वह स्थान जहाँ श्रीराम ने वनवास काल का कुछ समय बिताया
- रबि – सूर्य समान तेजस्वी (यहाँ श्रीराम के लिए प्रयोग)
- अवध-नरेस – अयोध्या के राजा (श्रीराम)
- विपदा – संकट, मुसीबत
- देस – देश, स्थान
🧠 भावार्थ (Meaning):
रहीम कहते हैं कि श्रीराम अब चित्रकूट में रहते हैं, परंतु जिस किसी पर संकट आता है, वह उनकी शरण में चित्रकूट पहुंच जाता है।
भगवान राम का स्वभाव ऐसा है कि जो भी विपत्ति में होता है, वह उनकी शरण लेता है क्योंकि वह सबकी रक्षा करते हैं।
यह दोहा इस बात को दर्शाता है कि श्रीराम करुणा के स्रोत हैं – उनका दरबार दुखियों के लिए खुला है।
📌 नीति सन्देश:
- संकट के समय महान और करुणामयी लोगों की शरण लेनी चाहिए।
- भगवान या सद्गुणी व्यक्ति संकट में पड़े व्यक्ति की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं।
- सच्चे शासक या नेता वही होते हैं, जिनकी शरण में जनता संकट में जाती है।
✅ दोहा:
“दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोरे आहिं।
ज्यों रहीम नट कुंडली, सिमिटि कूदि चढ़ि जाहिं।।”
🔍 शब्दार्थ:
- दीरघ – गहरा, गंभीर
- अरथ – अर्थ, भाव
- आखर – अक्षर, शब्द
- नट – नर्तक, कलाकार (विशेषकर जो करतब दिखाता है)
- कुंडली – रस्सी या फंदा (जिससे नट करतब करता है)
- सिमिटि कूदि चढ़ि जाहिं – सिमटकर (संगठित होकर), फुर्ती से ऊपर चढ़ जाना
🧠 भावार्थ (Meaning):
रहीम कहते हैं कि दोहे की पंक्तियाँ देखने में छोटी होती हैं, उसमें अक्षर (शब्द) थोड़े होते हैं, लेकिन उसका भाव और अर्थ बहुत गहरा (दीरघ) होता है।
यह दोहा ठीक उसी तरह है जैसे कोई नट (कलाकार) एक छोटी सी रस्सी या कुंडली पर सिमटकर चढ़ जाता है — यानि छोटे में ही बड़ा कौशल और गहराई होती है।
📌 नीति सन्देश:
- कम शब्दों में गहन बात कहना ही कला है।
- दोहा भले ही छोटा हो, लेकिन उसका अर्थ अत्यंत गहरा होता है।
- साहित्य में सारगर्भितता (conciseness with depth) सबसे मूल्यवान गुण है।
🌿 सरल उदाहरण:
जैसे रहीम या कबीर के दोहे —
“बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।।”
कम शब्दों में जीवन का गहन सत्य छुपा होता है।
✅ दोहा:
“धनि रहीम जल पंक को, लघु जिय पिअत अघाय।
उदधि बड़ाई कौन है, जगत पिआसो जाय।।”
🔍 शब्दार्थ:
- धनि – धन्य (प्रशंसा योग्य)
- जल पंक – कीचड़युक्त पानी (छोटा स्रोत जैसे कुआँ, तालाब आदि)
- लघु जिय – छोटा प्राणी (यहाँ आम व्यक्ति या जीव)
- अघाय – तृप्त हो जाता है
- उदधि – समुद्र
- बड़ाई – बड़प्पन, महिमा
- जगत पिआसो जाय – संसार प्यासा ही रह जाता है (क्योंकि समुद्र का जल खारा होता है)
🧠 भावार्थ (Meaning):
रहीम कहते हैं कि धन्य है वह छोटा सा जलस्रोत (जैसे तालाब, कुआँ या पोखर), जिसका जल प्राणी पीकर तृप्त हो जाते हैं।
इसके विपरीत, समुद्र चाहे जितना बड़ा हो, पर उसका जल खारा होने के कारण कोई उसे नहीं पीता।
तो केवल बड़प्पन (आकार में) ही कुछ नहीं होता — सच्चा मूल्य तो उपयोगिता में होता है।
📌 नीति सन्देश:
- उपयोगी व्यक्ति ही सच्चा महान होता है, चाहे वह छोटा ही क्यों न हो।
- केवल बड़ा या शक्तिशाली होना पर्याप्त नहीं, यदि आप दूसरों के काम नहीं आते।
- विनम्रता और उपयोगिता ही जीवन की सच्ची सफलता है।
🌿 उदाहरण:
एक छोटा सा शिक्षक जो रोज बच्चों को शिक्षा देता है, समाज के लिए कहीं अधिक उपयोगी है,
बजाय उस बड़े पद पर बैठे व्यक्ति के, जो केवल दिखावा करता है लेकिन समाज को कुछ देता नहीं।
✅ दोहा:
“नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत।
ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछू न देत।।”
🔍 शब्दार्थ:
- नाद – स्वर, मधुर आवाज
- रीझि – प्रसन्न होकर, मोहित होकर
- तन देत मृग – हिरन स्वर पर मोहित होकर अपना शरीर (प्राण) तक दे देता है
- नर – मनुष्य
- धन हेत समेत – धन के लोभ में पूर्णतः लिप्त
- पशु से अधिक – पशु से भी गया-बीता
- कछू न देत – कुछ भी नहीं देता (दान, सहायता आदि)
🧠 भावार्थ (Meaning):
रहीम कहते हैं कि हिरन मधुर स्वर पर मोहित होकर प्राण तक दे देता है,
लेकिन मनुष्य तो धन के प्रति इतना आसक्त हो जाता है कि प्रसन्न होने पर भी किसी को कुछ नहीं देता।
इसलिए ऐसे स्वार्थी व्यक्ति पशु से भी अधिक निकृष्ट होते हैं,
क्योंकि कम से कम पशु तो कुछ भाव या त्याग दिखाता है, पर मनुष्य केवल स्वार्थ में डूबा होता है।
📌 नीति सन्देश:
- स्वार्थी और कंजूस व्यक्ति का हृदय कठोर हो जाता है।
- दान और सहायता ही मनुष्यता की पहचान है।
- केवल बाहरी प्रसन्नता या मुस्कान का कोई मूल्य नहीं, यदि वह किसी के काम न आए।
- त्याग और भावना पशु भी दिखाते हैं — मनुष्य को तो उससे ऊपर होना चाहिए।
🌿 सरल उदाहरण:
कभी-कभी हम देखते हैं कि कोई व्यक्ति बड़ी-बड़ी बातें करता है, हँसता है, खुश दिखता है, लेकिन जब किसी की सहायता या मदद की जरूरत होती है, तो वह पीछे हट जाता है। रहीम ऐसे लोगों की तुलना पशु से भी नीचे करते हैं।
✅ दोहा:
“बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय॥”
🔍 शब्दार्थ:
- बिगरी बात – खराब हो चुका काम, बिगड़ा हुआ संबंध या अवसर
- बनै नहीं – ठीक नहीं हो सकता
- लाख करौ किन कोय – चाहे लाख उपाय कर लो
- फाटे दूध – फटा हुआ दूध
- मथे न माखन होय – चाहे कितना भी मथो, उसमें कभी मक्खन (घी) नहीं बन सकता
🧠 भावार्थ (Meaning):
रहीम कहते हैं कि जब कोई काम या संबंध एक बार बिगड़ जाए, तो लाख कोशिश करने पर भी वह पहले जैसा नहीं बन सकता।
जैसे फटा हुआ दूध चाहे जितना मथा जाए, उसमें कभी मक्खन नहीं निकल सकता।
इसी प्रकार जीवन में कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं, जिन्हें समय पर न संभाला जाए, तो वे हमेशा के लिए बिगड़ जाती हैं।
📌 नीति सन्देश:
- जीवन और संबंधों में सावधानी व समय पर सजगता ज़रूरी है।
- एक बार बिगड़ी हुई स्थिति को संभालना कठिन या असंभव होता है।
- अवसर (Opportunity) खोने के बाद पछताना व्यर्थ है।
- “रोकथाम इलाज से बेहतर है।”
🌿 सरल उदाहरण:
अगर परीक्षा की तैयारी समय पर नहीं की गई, तो बाद में कितना भी प्रयास कर लो, परिणाम पहले जैसा नहीं होगा।
इसी तरह, यदि किसी मित्र को बहुत चोट पहुँचाई जाए, तो बाद में मनाने पर भी संबंध पहले जैसे सहज नहीं रहेंगे।
✅ दोहा:
“‘रहिमन’ देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।
जहाँ काम आवै सुई, कहा करै तरवारि॥”
🔍 शब्दार्थ:
- बड़ेन – बड़े व्यक्ति/बड़ी वस्तु
- लघु – छोटा व्यक्ति/छोटी वस्तु
- डारि – त्याग देना, तुच्छ समझना
- तरवारि – तलवार
🧠 भावार्थ (Meaning):
रहीम कहते हैं कि बड़े को देखकर छोटे को कभी तुच्छ या बेकार नहीं समझना चाहिए।
हर वस्तु और व्यक्ति का अपना अलग महत्व होता है।
जहाँ बारीक काम (जैसे कपड़े सीना) होता है, वहाँ सुई की आवश्यकता होती है, तलवार से वह काम कभी नहीं हो सकता।
📌 नीति सन्देश:
- छोटे या साधारण दिखने वाले व्यक्ति/वस्तु को कम मत आँको।
- प्रत्येक व्यक्ति और वस्तु का अपना महत्व होता है।
- परिस्थितियों के अनुसार छोटे का काम बड़ा और बड़े का काम छोटा हो सकता है।
- समाज में सभी की अपनी उपयोगिता है — चाहे वह बड़ा हो या छोटा।
🌿 सरल उदाहरण:
- जैसे घर में बड़ा हथौड़ा भी हो, लेकिन सुई के बिना कपड़े नहीं सी सकते।
- किसी संस्था में प्रमुख अधिकारी का महत्व है, लेकिन चपरासी/कर्मचारी भी उतना ही ज़रूरी है — बिना उसके व्यवस्था नहीं चलती।
✅ दोहा:
“रहिमन निज संपति बिना, कोउ न बिपति सहाय।
बिनु पानी ज्यों जलज को, नहिं रवि सके बचाय।।”
🔍 शब्दार्थ:
- निज संपति – अपनी संपत्ति या साधन (धन, बल, ज्ञान, सामर्थ्य)
- बिपति – विपत्ति, संकट
- सहाय – मददगार
- बिनु पानी – बिना जल के
- जलज – जल में उत्पन्न होने वाला (यहाँ कमल का फूल)
- रवि – सूर्य
- नहिं सके बचाय – नहीं बचा सकता
🧠 भावार्थ (Meaning):
रहीम कहते हैं कि अपने साधनों और सामर्थ्य के बिना, कोई भी व्यक्ति विपत्ति में आपकी सहायता नहीं करता।
जिस प्रकार कमल का फूल पानी के बिना जीवित नहीं रह सकता, उसे सूर्य भी नहीं बचा सकता,
उसी प्रकार मनुष्य को अपने संसाधनों पर ही निर्भर रहना चाहिए — दूसरों से बहुत उम्मीद नहीं रखनी चाहिए।
📌 नीति सन्देश:
- स्वावलंबी बनो, दूसरों के भरोसे न रहो।
- संकट के समय, केवल आपके अपने संसाधन, ज्ञान, और शक्ति ही काम आते हैं।
- दिखावटी शुभचिंतक या सिर्फ सहानुभूति जताने वाले लोग, असली संकट में कहीं दिखाई नहीं देते।
- यथार्थवादी बनो, और अपने बलबूते पर जीवन में आगे बढ़ो।
🌿 उदाहरण:
मान लीजिए कि किसी छात्र के पास परीक्षा की तैयारी के लिए खुद के नोट्स और समय प्रबंधन है —
वही सफल होगा। अगर वह दूसरों पर या दोस्तों की मदद पर निर्भर रहेगा, तो संकट में कोई भी उसकी मदद नहीं कर पाएगा।
✅ दोहा:
“रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुष, चून॥”
🔍 शब्दार्थ:
- पानी – यहाँ तीन अर्थों में प्रयोग हुआ है:
- जल (Water)
- मान (Self-respect / प्रतिष्ठा)
- रस/गुण (Essence)
- सून – खाली, निरर्थक
- मोती – बिना जल के सीप में मोती नहीं बनता
- मानुष – मनुष्य बिना आत्मसम्मान के व्यर्थ है
- चून – चूना (lime), पानी के बिना टिकता नहीं
🧠 भावार्थ (Meaning):
रहीम कहते हैं कि पानी (जल और मान दोनों) को संभालकर रखना चाहिए।
क्योंकि पानी (जल/मान) के बिना सब सूना है।
जब पानी (मान-सम्मान) चला जाता है, तो वह कभी वापस नहीं आता।
- मोती पानी (समुद्र के) बिना नहीं बनता,
- मनुष्य मान (सम्मान) के बिना व्यर्थ हो जाता है,
- और चूना भी पानी के बिना काम नहीं करता।
📌 नीति सन्देश:
- जल जीवन का आधार है — इसे बचाना चाहिए।
- मनुष्य का सम्मान और प्रतिष्ठा (self-respect) अमूल्य है, एक बार खो जाए तो लौटता नहीं।
- जीवन में गुण, रस और मान बनाए रखना ही असली मूल्य है।
🌿 सरल उदाहरण:
- यदि कोई व्यक्ति बहुत धनवान हो लेकिन उसका सम्मान (पानी) खो गया, तो वह समाज में मूल्यहीन हो जाता है।
- जैसे सूखी हुई सीप में कभी मोती नहीं बन सकता, उसी तरह सम्मान के बिना मनुष्य व्यर्थ है।