मुस्लिम-पूर्व भारतीय समाज (Pre-Muslim Indian Society)

मुस्लिम-पूर्व भारतीय समाज (Pre-Muslim Indian Society)


मुस्लिम-पूर्व भारतीय समाज (Pre-Muslim Indian Society)

I. ऐतिहासिक और आर्थिक संदर्भ

  • काल निर्धारण (Periodization): दिल्ली सल्तनत (1206 ईस्वी) की स्थापना से ठीक पहले की अवधि को अक्सर प्रारंभिक मध्यकालीन अवधि (लगभग 500-1200 ईस्वी) कहा जाता है। गोरी द्वारा उत्तरी भारत पर विजय को एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है।
  • आर्थिक संरचना (Economic Structure): प्रारंभिक मध्यकालीन अवधि के दौरान समग्र अर्थव्यवस्था तटीय कस्बों और भीतरी गाँवों के बीच वाणिज्य में गिरावट से चिह्नित थी।
    • सिक्कों की कमी और शहरी क्षय (urban decay) आर्थिक गिरावट के संकेतक थे। विशेष रूप से लगभग 650 ईस्वी से 1000 ईस्वी तक सोने के सिक्कों की कमी स्पष्ट थी।
    • दिल्ली सल्तनत की स्थापना के बाद, डी.डी. कोसांबी ने आर्थिक परिवर्तनों को भारतीय ‘सामंतवाद’ के तत्वों के गहनता (intensification) के रूप में देखा, न कि मूलभूत विचलन के रूप में।
  • कृषि संबंध और सामंती विशेषताएँ (Agrarian Relations – Feudal Characteristics):
    • गोरी विजय की पूर्व संध्या पर प्रचलित सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में शासक वर्ग पश्चिमी यूरोप के समकालीन सामंती अभिजात वर्ग के समान अत्यधिक ग्रामीण था।
    • शासक घरानों द्वारा भूमि अनुदान (land grants) की त्वरित प्रथा एक प्रमुख ऐतिहासिक विकास था। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप भूमि मध्यस्थों का उदय हुआ, जिसे भारतीय सामंती सामाजिक संरचना की मुख्य विशेषता माना जाता है।
    • इस सामंती संरचना ने एक बंद अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया और भूमि पर स्थानीय पदानुक्रम और अधिकार उत्पन्न किए।
    • किसान आबादी आमतौर पर श्रेष्ठ भूस्वामियों के प्रति अचल (immobility) और अधीन थी। जबरन श्रम (विष्टि, बेगार) संभवतः किसानों को अपने गाँवों में रहने के लिए मजबूर करता था।
    • ग्रामीण कृषि ढांचे में खुट्स (khuts), मुकद्दमों (muqaddams), और चौधरी (chaudharis) जैसे अभिजात वर्ग के व्यक्ति मौजूद थे।
  • व्यापार और शिल्प उत्पादन:
    • व्यापार में गिरावट के कारण कारीगरों और व्यापारियों की आवाजाही कभी-कभी रुक जाती थी।
    • गुप्तोत्तर काल में व्यापार और वाणिज्य स्थिर (stagnant), स्थानीयकृत, अचल, अधिक वंशानुगत, और अधिक विशिष्ट हो गए थे।
    • वैश्य वर्ण की स्थिति में गिरावट आई और वह शूद्र की स्थिति के करीब पहुँच गया, और व्यापारी (वाणिज्य) अक्सर भूमि अनुदानों के प्राप्तकर्ताओं के गिल्ड (guilds) में स्थानांतरित हो जाते थे।

II. सामाजिक संरचना: वर्ण और जाति

  • जाति व्यवस्था का प्रभुत्व: इस अवधि में भी सामाजिक भेदों को चिह्नित करने वाली प्रमुख श्रेणी जाति व्यवस्था ही बनी रही।
  • वंशानुक्रम पर जोर: रूढ़िवादी वर्ग ने जाति की स्थिति का निर्धारण करने के लिए संस्कृति या योग्यता के बजाय वंशानुक्रम (heredity) पर जोर दिया।
  • जातियों की बहुलता (Proliferation of Jatis): इस अवधि में जातियों (जाति समूहों) की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जिसे कानून निर्माताओं ने पारंपरिक चार-गुणा वर्ण व्यवस्था के भीतर संयोजन और क्रमपरिवर्तन के रूप में समझाया।
  • वर्ण पदानुक्रम (Varna Hierarchy):
    • ब्राह्मण: उन्होंने पदानुक्रमित समाज में सबसे उत्कृष्ट स्थान बनाए रखा। वे साक्षर और वैदिक तथा पौराणिक परंपराओं के व्याख्याकार के रूप में सम्मानित थे। उन्हें करों से छूट और जन्म से सम्मान जैसे विशेषाधिकार प्राप्त थे।
    • क्षत्रिय (राजपूतीकरण): “राजपूतीकरण” की प्रक्रिया में कृषि अर्थव्यवस्था से जुड़े समूहों द्वारा सत्ता का क्रमिक विस्तार शामिल था। ब्राह्मणों ने शासक परिवारों को प्राचीन क्षत्रिय वंशों से जोड़कर इस प्रक्रिया में सहायता की।
    • वैश्य: वैश्य वर्ण की स्थिति में गिरावट आई, जो शूद्र की स्थिति के करीब पहुँच गई। 8वीं शताब्दी तक, लेखकों का मानना था कि वैश्य और शूद्र में शायद ही कोई अंतर था।
    • शूद्र: उनका मुख्य कर्तव्य उच्च जातियों की सेवा करना था। उन्हें वेदों के पाठ से प्रतिबंधित किया गया था, लेकिन उन्हें पुराणों के पाठ को सुनने की अनुमति थी।
  • अस्पृश्यता (Untouchability):
    • प्रारंभिक मध्य युग के दौरान अस्पृश्यता की धारणा अभूतपूर्व ऊँचाई पर पहुँची।
    • मैनुअल शिल्प और “अशुद्ध” सेवाओं में लगे लोगों को शुद्रों से नीचे रखा गया, जिन्हें अंत्यज (Antyajas) कहा गया (जो प्रभावी रूप से पाँचवाँ वर्ण थे)।
    • चांडाल (chandala), हाडी और डोम जैसे समूह अंत्यजों से भी निम्न माने जाते थे। चांडालों को पारंपरिक रूप से समाज के मुख्य भाग से बाहर बसाया जाता था, जैसा कि 5वीं शताब्दी तक देखा गया था।

III. महिलाओं की स्थिति (Status of Women)

  • अधीनता और प्रजनन: महिलाएं जीवन के सभी चरणों में पुरुषों के अधीन बनी रहीं।
  • उनका प्राथमिक सामाजिक कर्तव्य संतान, विशेष रूप से पुरुष बच्चों का उत्पादन करना था।
  • विवाह और शिक्षा: लड़कियों के लिए बाल विवाह व्यापक रूप से प्रचलित थे। जबकि अधिकांश गरीब महिलाओं में शिक्षा का अभाव था, उच्च वर्ग की महिलाओं को अक्सर शिक्षा और प्रशिक्षण प्राप्त होता था।
  • सामाजिक बुराइयाँ: कई सामाजिक बुराइयाँ प्रचलित थीं:
    • सती (विधवा को जलाना) की प्रथा व्यापक रूप से प्रचलित थी।
    • राजपूतों में जौहर (सामूहिक आत्मदाह) की प्रथा आम थी।
    • उच्च वर्गों में पर्दा प्रथा (purdah) प्रचलित थी, जिसके तहत महिलाओं को आंतरिक कक्ष (अंतःपुर) तक सीमित रखा जाता था।
  • संपत्ति अधिकार: टीकाकारों ने विधवा के अधिकार को मान्यता दी कि वह पुत्रहीन पति की संपत्ति का निपटान कर सकती है, बशर्ते वह संपत्ति संयुक्त रूप से न हो।

सामाजिक परिवर्तन के लिए उपमा (Analogy for Social Transformation):

प्राचीन/प्रारंभिक ऐतिहासिक चरण से मुस्लिम विजय से ठीक पहले के समाज में बदलाव को एक जटिल, अत्यधिक केंद्रीकृत मशीन (प्रारंभिक केंद्रीकृत राज्य) के रूप में देखा जा सकता है जो टूटकर बिखर गई। एक बड़े कारखाने के फर्श के बजाय, पुर्जे कई छोटी कार्यशालाओं (क्षेत्रीय राज्यों और विकेन्द्रीकृत सत्ता केंद्रों) में विभाजित हो गए। नई सामाजिक व्यवस्थाएं (जैसे राजपूतीकरण और जातियों की बहुलता) शुरू की गईं, लेकिन समग्र आर्थिक गतिविधि कम हो गई और श्रमिकों को स्थानीय, कठोर भूमिकाओं में बंद कर दिया गया (अचल किसान और स्थानीयकृत व्यापार)। इससे एक खंडित, फिर भी कठोरता से संरचित समाज का निर्माण हुआ, जो स्थानीय शक्ति और विरासत में मिली स्थिति से परिभाषित था।

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