18वीं शताब्दी में मराठा विजयनगर साम्राज्य और अन्य भारतीय राज्य और समाज

यह नोट्स 18वीं शताब्दी के दौरान भारत की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर केंद्रित हैं, जिसमें प्रमुख क्षेत्रीय शक्तियाँ, विशेषकर मराठा साम्राज्य और अन्य राज्यों की स्थिति शामिल है।

I. 18वीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य

18वीं शताब्दी के मध्य में मराठे मुगल साम्राज्य को चुनौती देने वाली सबसे शक्तिशाली ताकत के रूप में उभरे।

1. पेशवाओं का उत्कर्ष और विस्तार

  • छत्रपति शिवाजी महाराज (1674 में छत्रपति का ताज पहनाया गया) ने हिंदवी-स्वराज्य की स्थापना की, जो 17वीं शताब्दी में शुरू हुआ था।
  • औरंगज़ेब की मृत्यु (1707) के बाद, पेशवा (प्रधानमंत्री) वास्तविक शासक बन गए, जबकि छत्रपति (जैसे शाहू, 1707-1749) की शक्ति कम हो गई।
  • बालाजी विश्वनाथ ने वंशानुगत पेशवा पद की स्थापना की (1713)।
  • बाजी राव I (1720-1740) के नेतृत्व में, मराठा शक्ति का विस्तार उत्तरी क्षेत्रों में हुआ।
  • बालाजी बाजी राव (नाना साहेब, 1740-1761) के शासनकाल के दौरान, मराठा शक्ति अपने रचनात्मक शिखर पर पहुँची। उन्होंने दक्कन और उत्तर भारत के बड़े क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।
  • 1759 तक, मराठा प्रभाव दक्षिण में तमिलनाडु से लेकर उत्तर में पेशावर तक फैल चुका था।

2. मराठा संघ और प्रशासन

  • मराठा साम्राज्य पेशवाओं के अधीन अर्ध-स्वायत्त राज्यों के एक ढीले संघ (Confederacy) के रूप में संचालित होता था।
  • इस संघ में प्रमुख मराठा परिवार थे: सिंधिया (ग्वालियर), होल्कर (इंदौर), गायकवाड़ (बड़ौदा), और भोंसले (नागपुर), जो पेशवा की सर्वोच्चता को मानते थे।
  • राजस्व के स्रोत: मराठों की आय के मुख्य स्रोत चौथ (राजस्व का 25% वार्षिक कर) और सरदेशमुखी (10% अतिरिक्त अधिभार) थे, जो अक्सर मुगल क्षेत्रों या दक्कन सल्तनत पर लगाए जाते थे।
  • प्रशासनिक केंद्र: पेशवाओं का केंद्रीय सचिवालय पुणे में स्थित हजूर दफ्तर कहलाता था।
  • स्थानीय प्रशासन: स्थानीय प्रशासन में कामविसदार जैसे योग्यता-आधारित ब्राह्मण कुलीनों का वर्चस्व था, जो कर निर्धारण और संग्रह की देखरेख करते थे।

3. मराठा संकट

  • पानीपत का तीसरा युद्ध (1761): बालाजी बाजी राव के काल में, मराठों को अहमद शाह अब्दाली के हाथों एक विनाशकारी हार मिली, जिसने उत्तर भारत में उनकी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं पर रोक लगा दी।
  • पतन के कारण: माधव राव I की मृत्यु (1772) के बाद कमजोर उत्तराधिकारी, सिंधिया और होल्कर जैसे क्षेत्रीय प्रमुखों के बीच आंतरिक प्रतिद्वंद्विता और सैन्य आधुनिकीकरण (जैसे तोपखाने) को अपनाने में विफलता ने मराठा शक्ति को कमजोर कर दिया।

II. विजयनगर साम्राज्य की स्थिति (18वीं शताब्दी में)

  • विजयनगर साम्राज्य 18वीं शताब्दी में प्रत्यक्ष रूप से एक एकीकृत शक्ति के रूप में अस्तित्व में नहीं था, क्योंकि इसका पतन 17वीं शताब्दी के मध्य तक हो चुका था।
  • नायका प्रणाली: इस साम्राज्य में सैन्य प्रमुखों (अमरनायकों) को सैन्य सेवा के बदले भूमि राजस्व का अधिकार (अमरम) दिया जाता था, जो सामंती व्यवस्था का एक रूप था।
  • उत्तराधिकारी: मैसूर, केरल और हैदराबाद जैसे क्षेत्रीय राज्य विजयनगर और दक्कन सल्तनतों के खंडहरों पर विकसित हुए। उदाहरण के लिए, हैदर अली (मैसूर) ने पुराने वाडेयार राजवंश की जगह ली, जो पहले विजयनगर के एक वायसराय थे।
  • आर्थिक भूमिका: विजयनगर में मंदिर महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्र थे, जो बैंकिंग कार्य करते थे, ऋण देते थे, और सिंचाई परियोजनाओं में निवेश करते थे (जैसे दासवनदा या कट्टु-कोडगे)।

III. 18वीं शताब्दी में अन्य भारतीय राज्य

मुगल शक्ति के पतन के कारण तीन प्रकार के क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ:

1. उत्तराधिकारी राज्य (Successor States)

ये राज्य मुगल प्रांतों से अलग हुए थे, लेकिन इन्होंने मुगल प्रशासनिक परंपराओं को जारी रखा।

  • हैदराबाद: निज़ाम-उल-मुल्क (चिन किलिच खाँ) ने 1724 में स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। हालांकि, उन्होंने नाममात्र के लिए मुगल सम्राट के प्रति निष्ठा बनाए रखी। हैदराबाद में जागीरें वंशानुगत हो गईं, और बैंकरों तथा वकीलों (बिचौलियों) ने राजनीतिक प्रभाव हासिल किया।
  • अवध: सआदत खान ने 1722 में स्वायत्तता हासिल की। उन्होंने जागीरदारी व्यवस्था में सुधार किया और स्थानीय जेंट्री (शेखज़ादा, अफगान और हिंदू) को प्रशासन और सेना में पद दिए, जिससे एक क्षेत्रीय शासक समूह का उदय हुआ। अवध में आंतरिक समृद्धि थी।

2. नए राज्य (New States)

ये राज्य मुगलों के खिलाफ विद्रोहों से उपजे थे, अक्सर किसानों के आंदोलनों से जुड़े थे।

  • सिख: गुरु गोबिंद सिंह के बाद, सिखों ने एक सैन्य भाईचारे (खालसा) का रूप ले लिया। 18वीं शताब्दी में, उन्होंने 12 मिस्लों (संघों) की स्थापना की। रणजीत सिंह के अधीन, उन्होंने एक संप्रभु राजशाही स्थापित की। सिख शासकों ने अपने प्रशासन में धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाया।
  • जाट: जाटों ने 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विद्रोह किया। सूरजमल ने भरतपुर राज्य को मजबूत किया, लेकिन जाट राज्य सामंती बना रहा और राजस्व मांगें उच्च रहीं।

3. स्वतंत्र राज्य (Independent Kingdoms)

  • मैसूर: हैदर अली (1761 में शासक) ने मैसूर की शक्ति की नींव रखी। उन्होंने आधुनिक सेना बनाने के लिए फ्रांसीसी विशेषज्ञों को नियुक्त किया। उन्होंने किसानों के हितों की रक्षा के लिए राजस्व किसानों को मना किया और राजस्व प्रणाली को मजबूत किया। उनके पुत्र टीपू सुल्तान ने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया, नई मुद्रा और कैलेंडर की शुरुआत की।
  • केरल: त्रावणकोर के राजा मार्तंड वर्मा (1729 के बाद) ने एक आधुनिक सेना (पश्चिमी तर्ज पर प्रशिक्षित) की मदद से डचों को बाहर निकाला और अपने क्षेत्र का विस्तार किया।

IV. 18वीं शताब्दी में समाज और अर्थव्यवस्था

18वीं शताब्दी को पारंपरिक रूप से अराजकता का “अंधकारमय युग” कहा जाता था, लेकिन आधुनिक इतिहासकारों का मानना है कि इस दौरान क्षेत्रीय विविधता के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक निरंतरता और परिवर्तन भी हुए।

1. सामाजिक संरचना

  • जाति व्यवस्था: हिंदू समाज में जाति व्यवस्था अत्यंत कठोर थी, जिसमें अंतर्विवाह और पेशे के नियम सख्त थे। हालांकि, आर्थिक दबावों और नए प्रशासनिक नवाचारों के कारण कुछ बदलाव भी आए।
  • महिलाएं: समाज मुख्य रूप से पितृसत्तात्मक था (केरल को छोड़कर)। पर्दा प्रथा उच्च वर्ग में व्यापक रूप से फैली थी। बाल विवाह, दहेज प्रथा और बहुविवाह भी प्रचलित थे। सती प्रथा कुछ उच्च जातियों में प्रचलित थी, जिसे पेशवाओं ने अपने प्रभुत्व में हतोत्साहित करने का प्रयास किया।
  • गुलामी: गुलामी भारतीय समाज की एक प्रमुख विशेषता थी, और गुलामों को घरेलू काम के लिए वंशानुगत संपत्ति माना जाता था।
  • शिक्षा और कला: शिक्षा (टोल और मदरसों में) मुख्य रूप से उच्च वर्ग में लोकप्रिय थी, लेकिन शाही संरक्षण की कमी के कारण कला (चित्रकला, वास्तुकला) और साहित्य में गिरावट आई। हालांकि, उर्दू और क्षेत्रीय भाषाओं (जैसे पंजाबी, मराठी, तेलुगु, बंगाली) का विकास हुआ।

2. अर्थव्यवस्था

  • कृषि और भू-राजस्व: अर्थव्यवस्था की मूल इकाई आत्मनिर्भर गाँव थी। भू-राजस्व राज्य की आय का मुख्य स्रोत था। किसानों को उच्च राजस्व मांग और नकदी फसलों (जैसे नील, अफीम) की खेती के लिए मजबूर किया गया, जिससे खाद्य फसल उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। तकनीकी रूप से, कृषि पिछड़ी थी।
  • व्यापार और उद्योग: ढाका, अहमदाबाद और मुर्शिदाबाद के कपड़ा उद्योग (सूती, रेशमी) महत्वपूर्ण थे। आंतरिक और विदेशी व्यापार विकसित था। बैंकरों (जगत सेठ, वीर जी वोहरा) ने राजस्व और वित्त में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे हुंडी (विनिमय पत्र) पर आधारित बैंकिंग प्रणाली सक्रिय हुई।
  • शहरीकरण: पुराने मुगल केंद्र (दिल्ली, आगरा, लाहौर) कमजोर हो गए, जबकि क्षेत्रीय राजधानियाँ (जैसे लखनऊ, हैदराबाद, मद्रास, कलकत्ता) व्यापारिक केंद्रों के रूप में उभरीं और नए सामाजिक-आर्थिक पदानुक्रमों का जन्म हुआ।
  • तकनीकी पिछड़ापन: 18वीं शताब्दी में भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी में पश्चिम से बहुत पीछे रह गया।
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