स्पर्श‑भाग 1 पाठ 1 दुःख का अधिकार
📌 मौखिक उत्तर (प्रत्येक 1-2 पंक्ति)
- किसी व्यक्ति की पोशाक से हमें क्या पता चलता है?
पोशाक देखकर व्यक्ति की सामाजिक‑आर्थिक स्थिति, उसका दर्ज़ा व अधिकार सहज ही समझ जा सकते हैं। - खरबूजे बेचनेवाली स्त्री से कोई खरबूज़ बेचे क्यों नहीं ले रहा था?
वह अपने पुत्र की मृत्यु के अगले ही दिन बाज़ार आई थी; लोगों को डर था कि सूतक घर का खाना खा लेने से उनका धर्म दूषित हो जाएगा। - उस स्त्री को देखकर लेखक को कैसा महसूस हुआ?
फ़ुटपाथ पर सिर हथेलियों पर रखकर बिलखती बुढ़िया देखकर लेखक के हृदय में सहानुभूति तथा बेचैनी उठी। - बुढ़िया के लड़के की मृत्यु का कारण क्या था?
वह मुँह अँधेरे खेत से खरबूज़े तोड़ रहा था; उसका पैर एक साँप पर गिरा और उसे साँप ने डॅस लिया था। - बुढ़िया को कोई उधार क्यों नहीं देता?
उसका एकमात्र आमदनी करने वाला बेटा मर चुका था; इसलिए लोग शंका में थे कि ऋण वापस नहीं मिलेगा।
✍️ लिखित (क) 25-30 शब्दों में उत्तर
- मनुष्य के जीवन में पोशाक का महत्त्व क्या है?
पोशाक व्यक्ति की पहचान, सामाजिक-आर्थिक हैसियत और सम्मान दिखाती है; यह उसके अधिकारों का निर्धारण करती है और उसे आदर दिलवाती है। - कब पोशाक बाधा बन जाती है?
यदि हमारा पहनावा हमें नीचे श्रेणीवाले से मिलने या बुझककर सामने बैठने से रोके, संवाद में संकोच हो, तब वह बंधन बन जाती है। - लेखक उस स्त्री के रोने का कारण क्यों नहीं जान पाया?
सम्मानित पोशाक के कारण लेखक फुटपाथ पर नहीं बैठ सका; इसलिए बुढ़िया की तकलीफ़ सुनने या समझने से असमर्थ रहा। - भगवाना अपने परिवार का निर्वाह कैसे करता था?
उसने शहर के पास डेढ़ बीघा जमीन पर तरकारियाँ व खरबूज़े उगाए, मंडी या फुटपाथ पर इन्हें बेच कर घर चलाया। - लड़के की मृत्यु के दूसरे ही दिन बुढ़िया बाज़ार क्यों पहुंची?
अंतिम संस्कार की व्यय, आटा-अनाज खत्म होने व पोते-बहू की भूख से वह बेचारे हाल में ही खरबूज़ बेचने को विवश हुई। - लेखक को निजीक संभ्रांत महिला की याद क्यों आई?
उसे याद आया कि पास की अमीर महिला ने पुत्र की मृत्यु पर ढाई माह तक शोक मनाया; गोद में संतति, घर की आज़ादी—गरीब बुढ़िया इन्हें खो चुकी थी।
📝 लिखित (ख) 50-60 शब्दों में उत्तर
- बाज़ार के लोग खबाज़े बेचनेवाली स्त्री के बारे में क्या कह रहे थे?
बाज़ार में लोग बुढ़िया को ‘बेहया’, ‘लालची’ और ‘कमीनी’ कहकर ताने दे रहे थे, जैसे “देखो, अपने बेटे के मरने ही दिन पर भी यह दुकान लगा बैठी है”; कोई कहता, “जैसी नियत, वैसी बरकत”; कोई खीजकर कहता, “इनके लिए बेटी-बेटी, ईमान-धर्म रोटी से भी महत्त्वपूर्ण नहीं!” - पास-पड़ोस की दुकानों से पूछने पर लेखक को क्या पता चला?
लेखक को पता चला कि बुढ़िया का बेटा ‘भगवाना’ नामक युवक था, जो डेढ़ बीघा खेत में सब्ज़ियाँ उगाकर घर चलाता था; दुःख की बात यह कि साँप‑के काटने से उसकी मृत्यु हो गई, और अब घर में जीविकाप्रदाता कोई नहीं रहा। - लड़के को बचाने के लिए बुढ़िया माँ ने क्या उपाय किए?
उसने देहाती ओझा को बुलाया जो झाड़‑फूँक करने लगा, नाग देवता की पूजा की गई और घर का आटा अनाज दान‑दक्षिणा में दे देना पड़ा। बहुत विलाप और प्रयास के बावजूद विष का असर समाप्त न हुआ और उसे पुत्र खोना पड़ा। - लेखक ने बुढ़िया के दुःख का अंदाज़ा कैसे लगाया?
उसने गरीब बुढ़िया की पीड़ा को अपनी समाजी पैडोसी अमीर महिला की तराजू से तौला, जो ढाई माह तक पुत्र शोक में पड़ी रही थी; सोचकर वह समझ गया कि गरीब की स्थितियाँ उसे शोक करने तक न छोड़ती हैं। - पाठ का शीर्षक ‘दुःख का अधिकार’ कहाँ तक सार्थक है?
यह शीर्षक संतुलित है क्योंकि पाठ दिखाता है कि अमीर को दुःख व्यक्त करने की आज्ञा होती है पर गरीब के दुःख को लोग अनदेखा या उपहास मानते हैं; सबको शोक मनाने और दुःखी होने का अधिकार समता में होना चाहिए।
📘 (ग) के आशय स्पष्ट कीजिए
- “जैसे वायु की लहरें कटी हुई पतंग को सहसा भूमि पर नहीं गिर जाने देतीं…”
इसका आशय है: हमारी पोशाक और सम्मान उस फ्लाई-कागज पतंग की तरह कार्य करता है — जैसे हवा उसे सीधे गिरने से रोकती है, वैसे ही पहनावा हमें शोषित या गरीब से जुड़ने या झुकने से रोकता है। - “इनके लिए बेटा‑बेटी, खसम‑लुगाई, धर्म‑ईमान सय रोटी का टुकड़ा है।”
यह पंक्ति दिखाती है कि सर्वाधिक भूखमरी से जूझ रहा व्यक्ति जीने के लिए किसी भी हद तक सैद्धांतिक सिद्धांत त्यागने को तत्पर रहता है; धर्म, सामाजिक मर्यादा, रिश्ता सब न्यून प्राथमिकता पर आ जाता है। - “शोक करने, गम मनाने के लिए भी सहूलियत चाहिए और … दुःखी होने का भी एक अधिकार होता है।”
लेखक कहना चाहता है कि दुःख को व्यक्त करने के लिए परमुख रूप से समय, आर्थिक, सामाजिक सुविधा की आवश्यकता होती है; लेकिन गरीब बुढ़िया ऐसी स्थिति में भी बेटा खोने पर शोक करने का अवसर नहीं पा सकती। यह दुख व्यक्त करने का भी एक अधिकार है।