भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्र और उप-क्षेत्र, आय और रोजगार सृजन

भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्र और उप-क्षेत्र, आय और रोजगार सृजन (Sectors and Sub-sectors of the Indian Economy, Income and Employment Generation)


I. भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्र

भारतीय अर्थव्यवस्था को विकास और नियोजन (Planning) के संदर्भ में विभिन्न क्षेत्रों और उनके विकास के लक्ष्यों के माध्यम से समझा जा सकता है।

  1. नियोजन के प्रमुख उद्देश्य: भारत में आर्थिक नियोजन के चार प्रमुख उद्देश्य बताए गए हैं: (i) उत्पादन (Production) को अधिकतम सीमा तक बढ़ाना, (ii) पूर्ण रोजगार प्राप्त करना, (iii) आय की असमानताओं को समाप्त करना, और (iv) सामाजिक सुविधाओं की उपलब्धता करना।
  2. सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sector):
    • नियोजन के प्रारंभिक वर्षों में, 1956 की औद्योगिक नीति के बाद, सार्वजनिक क्षेत्र को विकास की गति देने में महत्वपूर्ण माना गया।
    • सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका आधारभूत संरचना (Infrastructure) और भारी उद्योगों (Heavy Industries) के विकास में थी, जबकि निजी क्षेत्र को उपभोक्ता वस्तुओं (Consumer Goods) के उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा गया।
    • सार्वजनिक क्षेत्र देश के आर्थिक विकास में कल्याणकारी राज्य (Welfare State) की स्थापना के अनुरूप है।
  3. निजी क्षेत्र (Private Sector):
    • निजी क्षेत्र लाभ कमाने की प्रेरणा (Profit motive) और व्यक्तिगत पहल पर आधारित होता है।
    • मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) में, निजी क्षेत्र भी उत्पादन, उपभोग और निवेश के संबंध में निर्णय लेता है।
  4. क्षेत्रीय विकास लक्ष्य (पंचवर्षीय योजनाओं के संदर्भ में):
    • कृषि और संबद्ध क्षेत्र (Agriculture and Allied Sectors): सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90) के दौरान, इस क्षेत्र के लिए 4% औसत वार्षिक वृद्धि दर प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया था। आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992-97) में, कृषि और संबद्ध क्षेत्र के लिए नियोजित वार्षिक वृद्धि दर 3.7% थी।
    • उद्योग और खनन (Industry and Mining): सातवीं योजना में औद्योगिक उत्पादन के लिए 8.3% की वृद्धि दर का लक्ष्य रखा गया था। विनिर्माण (Manufacturing) क्षेत्र में 8.5% वार्षिक वृद्धि दर का लक्ष्य रखा गया था।
    • आधारभूत क्षेत्र (Infrastructure): ऊर्जा (बिजली, गैस, पानी) और परिवहन (Transport) जैसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया। आठवीं योजना में बिजली, गैस और पानी के लिए 7.6% और परिवहन के लिए 7.5% की वृद्धि दर का लक्ष्य था।

II. आय और रोजगार सृजन (Income and Employment Generation)

  1. रोजगार और बेरोजगारी की समस्या:
    • आर्थिक विकास की समस्याओं में से एक बेरोजगारी (Unemployment) और अल्प-रोजगार (Underemployment) की समस्या है।
    • बेरोजगारी के दो मुख्य प्रकार हैं: (i) खुली बेरोजगारी (Open Unemployment), जहां व्यक्ति काम करने के लिए तैयार है लेकिन उसे काम नहीं मिल रहा है, और (ii) प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment), जो अक्सर कृषि क्षेत्र में पाई जाती है।
  2. रोजगार सृजन के लक्ष्य और प्रयास:
    • नियोजन का एक प्रमुख उद्देश्य आय की असमानता को दूर करते हुए पूर्ण रोजगार के लक्ष्य को प्राप्त करना था।
    • प्रच्छन्न बेरोजगारी को पूँजी निर्माण के स्रोत (Source of Saving Potential) के रूप में देखा जाता है, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में। इसका उपयोग सामाजिक रूप से लाभप्रद उत्पादक परिसंपत्तियों (Productive Assets) के निर्माण के लिए किया जा सकता है।
    • सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90) का उद्देश्य रोज़गार के अवसरों में औसत वार्षिक 4% की वृद्धि करना था।
    • आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992-97) के दौरान, रोज़गार की वृद्धि दर पिछले 3-4 दशकों की औसत वार्षिक वृद्धि दर की तुलना में अधिक थी। आठवीं योजना में 2.47% की औसत वार्षिक रोजगार वृद्धि दर हासिल करने का लक्ष्य रखा गया था।
    • गरीबी और बेरोजगारी को कम करने के लिए कई योजनाएं शुरू की गईं, जैसे राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम (National Rural Employment Programme)
    • योजनाओं के माध्यम से यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई कि आर्थिक विकास के कारण कृषि और छोटे उद्योगों में रोजगार के अवसर कम न हों।
  3. आय और आर्थिक विकास की गतिशीलता:
    • योजनाओं में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) या राष्ट्रीय आय (National Income) के लिए वृद्धि दर के लक्ष्य निर्धारित किए गए।
    • राष्ट्रीय आय के अनुमान केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन (CSO) और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (National Sample Survey) द्वारा तैयार किए जाते हैं।
    • पंचवर्षीय योजनाओं में वृद्धि दर के संकेत:
      • द्वितीय योजना के लक्ष्य के मुकाबले राष्ट्रीय आय में 19.5% की वृद्धि हुई और प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) में 8% की वृद्धि हुई।
      • पांचवीं योजना (1974-79) में राष्ट्रीय आय में 5.5% वार्षिक वृद्धि का लक्ष्य रखा गया था।
      • आठवीं पंचवर्षीय योजना में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर 5.6% हासिल करने का लक्ष्य था, जो पहले की तुलना में अधिक महत्वाकांक्षी था।
    • विदेशी सहयोग: विदेशी सहयोग भी आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है। यह पूँजी निर्माण (Capital accumulation) को बढ़ाने में मदद करता है।
    • पूँजी निर्माण (Capital Formation): पूँजी संचयन (Capital Accumulation) के लिए बचत (Saving) और निवेश (Investment) महत्वपूर्ण कारक हैं। भारतीय संदर्भ में, घरेलू बचत (Domestic savings) पर जोर दिया गया।

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