National Debt राष्ट्रीय ऋण
भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में, ‘राष्ट्रीय ऋण’ को मुख्य रूप से विदेशी ऋण (External Debt) और आंतरिक/घरेलू उधार (Domestic Borrowing) के माध्यम से समझा जाता है, जो सरकार की वित्तीय देनदारियाँ होती हैं।
I. विदेशी ऋण (External Debt) का विस्तार और भार
विदेशी सहायता और ऋण ने भारत के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, यदि प्राप्त विदेशी पूंजी उत्पादक (productive) नहीं होती है, तो ऋण का भार बढ़ता जाता है।
1. विदेशी ऋण की मात्रा:
- आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992-97) के अंत तक, भारत का बाहरी ऋण (External Debt) $3,28,349$ करोड़ रुपये था, जो मार्च 1989 के $1,70,369$ करोड़ रुपये की तुलना में भारी वृद्धि दर्शाता है।
- 1990-91 में, कुल विदेशी ऋण (रुपया ऋण सहित) 94,492 करोड़ रुपये था।
- 1995-96 के संशोधित अनुमानों के अनुसार, कुल विदेशी ऋण (रुपया ऋण सहित) $3,15,435$ करोड़ रुपये था।
- विदेशी ऋण (रुपया ऋण सहित) $1991-92$ के $1,63,001$ करोड़ रुपये से बढ़कर $1996-97$ में $3,99,969$ करोड़ रुपये हो गया।
- विदेशी ऋण की वृद्धि दर रुपये के संदर्भ में 1991-92 से 1995-96 की अवधि के दौरान 104 प्रतिशत थी।
- सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के अनुपात में ऋण: 1992-93 में सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में विदेशी ऋण 41.1 प्रतिशत था, और 1994-95 में यह 39.8 प्रतिशत था।
2. ऋण सेवा अनुपात (Debt Service Ratio):
ऋण सेवा अनुपात यह दर्शाता है कि निर्यात से प्राप्त आय का कितना हिस्सा ऋण के भुगतान (मूलधन और ब्याज) पर खर्च होता है, और यह बाहरी ऋण के भार का संकेतक है।
- 1979-80 में यह अनुपात 12.5 प्रतिशत था, जो 1984-85 में गिरकर 11.2 प्रतिशत हो गया था।
- हालांकि, 1990-91 में यह अनुपात चालू प्राप्तियों (Current Receipts) के 38.2 प्रतिशत के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गया था।
- यह दर 1996-97 में 27 प्रतिशत पर थी।
- यह वांछनीय है कि कुल विदेशी ऋण भार देश की निर्यात कमाई (export earnings) के 20 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए।
3. विदेशी सहायता के प्रकार:
- विदेशी ऋण/सहायता अनुदान (Grants), अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से सहायता, विश्व बैंक (World Bank) और अंतर्राष्ट्रीय विकास संघ (IDA) से प्राप्त ऋणों के रूप में प्राप्त की जाती है।
- पांचवीं योजना के दौरान विदेशी सहायता को रियायती सहायता (Concessional aid) के रूप में महत्व दिया गया था।
II. बाह्य ऋण जाल (External Debt Trap)
स्रोतों में इस बात का उल्लेख है कि भारत बाह्य ऋण जाल (External debt trap) में फँसता हुआ प्रतीत होता है, जहाँ बढ़ते हुए ऋण के कारण पुनर्भुगतान की समस्या लगातार बनी रहती है।
- कुछ आलोचकों का मानना है कि उदारीकरण (Liberalisation) की नीति के परिणामस्वरूप, विदेशी सहयोग पर निर्भरता बढ़ गई है।
- एक अर्थशास्त्री ने कहा है कि भारत के बढ़ते हुए उपभोग और अनुत्पादक निवेश (Misutilization) से पुनर्भुगतान के बढ़ते बोझ के कारण भारत को ऋण जाल (Debt trap) से अधिक प्राप्त हुआ है।
III. घरेलू उधार और वित्तीय प्रबंधन
सरकार अपने खर्चों को पूरा करने के लिए घरेलू बाजार से भी उधार लेती है, जिसे बाजार ऋण (Market Borrowing) कहा जाता है। यह आंतरिक राष्ट्रीय ऋण का हिस्सा है।
- बाजार उधार:
- सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90) के लिए बाजार ऋण के माध्यम से 44,702 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा गया था।
- आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992-97) में, बाजार उधार और विभिन्न विविध पूंजी प्राप्तियों से 1,03,232 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि प्राप्त की गई।
- बाजार उधार को “अस्फ्रीतिकारी वित्त प्रबंधन (Non-inflationary pattern of finance)” के विकास के लिए एक साधन माना जाता है।
- 1997-98 (संशोधित अनुमान) में सरकार का कुल बाजार उधार 75,000 करोड़ रुपये था।
- राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit): राजकोषीय घाटा सरकार के कुल ऋण की आवश्यकताओं को दर्शाता है, जो भविष्य के ऋण का आधार बनता है।
- 1997-98 के संशोधित अनुमानों के अनुसार, सकल राजकोषीय घाटा (Gross Fiscal Deficit) 86,345 करोड़ रुपये था, जो बजट अनुमानों से काफी अधिक था।
- 1998-99 के लिए, राजकोषीय घाटा 91,025 करोड़ रुपये अनुमानित किया गया था।
- 1997-98 (संशोधित अनुमान) में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के अनुपात में सकल राजकोषीय घाटा 5.9 प्रतिशत था।
- कर राजस्व से घरेलू ऋण का वित्तपोषण:
- केंद्र सरकार के सकल कर राजस्व का लगभग 85 प्रतिशत ब्याज और वेतन (Interest and Committed Expenditure) के भुगतान पर खर्च होता है, जिससे योजनागत व्यय के लिए संसाधनों की कमी होती है।
- यह स्थिति यह भी दर्शाती है कि ऋण पर ब्याज (interest) और प्रतिबद्ध व्यय (committed expenditure) का अनुपात बढ़ रहा है, जिसका अर्थ है कि सरकार को अपने राजस्व का बड़ा हिस्सा पिछली देनदारियों को चुकाने में लगाना पड़ता है।