भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि और विकास की स्थिति का मूल्यांकन


भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि और विकास की स्थिति का मूल्यांकन (Evaluation of Growth and Development Status)

भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए, संवृद्धि (Growth) और विकास (Development) के बीच के अंतर को समझना आवश्यक है। आर्थिक संवृद्धि एक मात्रात्मक संकल्पना है जो वास्तविक राष्ट्रीय आय में वृद्धि पर ध्यान केंद्रित करती है, जबकि आर्थिक विकास एक गुणात्मक संकल्पना है जिसमें न केवल आय में वृद्धि होती है, बल्कि उत्पादन की संरचना और साधनों के आवंटन में परिवर्तन भी शामिल होते हैं।

1. संवृद्धि की दर का ऐतिहासिक मूल्यांकन

भारतीय नियोजन के पिछले 50 वर्षों की अवधि की समीक्षा दर्शाती है कि राष्ट्रीय आय में वृद्धि तो हुई है, लेकिन यह गति धीमी रही है, जिसे ‘हिंदू विकास दर’ के संदर्भ में भी मापा गया है।

  • हिंदू विकास दर (Hindu Rate of Growth): 1950-51 से 1980-81 की अवधि के दौरान, शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (Net National Product) की औसत वार्षिक वृद्धि दर 3.4 प्रतिशत रही। इसी अवधि में, प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि दर केवल 1.2 प्रतिशत थी।
  • योजनागत प्रदर्शन:
    • सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985–90): इस योजना के दौरान शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद (NNP) की वार्षिक वृद्धि दर 5.2 प्रतिशत रही, जबकि प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि दर 3.3 प्रतिशत थी।
    • आठवीं पंचवर्षीय योजना (1992–97): आठवीं योजना अवधि (1992–97) के दौरान, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की औसत वार्षिक वृद्धि दर 6.5 प्रतिशत रही। यह वृद्धि दर सर्वोच्च रही।
  • प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि: प्रति व्यक्ति शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद में 1950-51 से 1980-81 के दौरान 1.2 प्रतिशत की औसत वार्षिक वृद्धि हुई। यह वृद्धि 1991-92 से 1996-97 के दौरान बढ़कर 4.4 प्रतिशत हो गई।

2. पूंजी निर्माण और संरचनात्मक परिवर्तन

संवृद्धि को समर्थन देने के लिए पूंजी निर्माण (Capital Formation) में महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है, जो विकास का एक प्रमुख लक्ष्य था।

  • पूंजी निर्माण: सकल देशीय पूंजी निर्माण (Gross Domestic Capital Formation) 1950-51 में 8.7 प्रतिशत से बढ़कर 1996-97 में 25.8 प्रतिशत हो गया।
  • बचत दर: सकल देशीय बचत (Gross Domestic Savings) की दर 1950-51 में 9.3 प्रतिशत से बढ़कर 1996-97 में 25.6 प्रतिशत हो गई।
  • संरचनात्मक दोष/परिवर्तन की कमी: 1990 के दशक के मध्य तक भी, भारत की अधिकांश जनसंख्या (लगभग 70 प्रतिशत) कृषि पर निर्भर थी। यह कृषि पर निर्भरता एक अल्पविकसित अर्थव्यवस्था (Underdeveloped Economy) का मूल लक्षण है।

3. सामाजिक और मानवीय विकास का मूल्यांकन

आर्थिक विकास का तात्पर्य केवल आय में वृद्धि नहीं है, बल्कि गरीबी, असमानता, और जीवन की गुणवत्ता में सुधार है।

  • गरीबी और असमानता (Poverty and Inequality):
    • यह एक प्रमुख समस्या रही है कि संवृद्धि के बावजूद गरीबी और बेरोजगारी की समस्याएँ बनी हुई हैं।
    • विकासशील देशों में आय और धन के वितरण की असमानता (Redistribution of Income) एक प्रमुख चुनौती बनी हुई है।
  • बेरोज़गारी (Unemployment): बेरोज़गारी और अल्परोज़गार (Underemployment) की समस्या बनी हुई है। अनुमान था कि आठवीं योजना के अंत तक बेरोज़गार व्यक्तियों का बैकलॉग बढ़कर 53 मिलियन (5 करोड़ 30 लाख) हो जाएगा।
  • रोज़गार विहीन संवृद्धि (Jobless Growth): भारत के विकास को ‘रोज़गार विहीन विकास’ (Jobless growth) के रूप में आलोचना मिली है। इसका मतलब है कि उत्पादन में वृद्धि तो हुई, लेकिन रोज़गार में उतनी वृद्धि नहीं हुई।
  • उपभोग में सुधार: 1951 में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न का उपभोग 395 ग्राम प्रति दिन था, जो 1980-81 में बढ़कर 464 ग्राम हो गया।
  • जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy): जन्म के समय औसत जीवन प्रत्याशा 1950-51 में 32 वर्ष से बढ़कर 1995-96 में 61 वर्ष हो गई।
  • शिशु मृत्यु दर (Infant Mortality Rate): शिशु मृत्यु दर 1951 में 1000 जीवित जन्मों पर 146 से घटकर 1995-96 में 79 हो गई।
  • साक्षरता (Literacy): 1993 में 15-35 आयु वर्ग में पुरुषों की साक्षरता दर बढ़कर 86 प्रतिशत हो गई।

4. विकास प्रक्रिया की प्रमुख आलोचनाएँ

भारतीय विकास मॉडल को कई नकारात्मक प्रभावों के कारण आलोचना का सामना करना पड़ा है:

  1. निष्पीडक विकास (Ruthless Growth): यह विकास लाभों को गरीबों और कमजोर वर्गों तक नहीं पहुँचाता है।
  2. मूक विकास (Voiceless Growth): यह विकास सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में सहभागिता और सशक्तिकरण को बढ़ावा नहीं देता है।
  3. जड़ विहीन विकास (Rootless Growth): यह विकास सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों को नष्ट करता है।
  4. भविष्य विहीन विकास (Futureless Growth): यह विकास पर्यावरणीय संतुलन को बिगाड़ता है।
  5. विदेशी निर्भरता: योजना के तहत आर्थिक विकास के लिए भारत को विदेशी सहायता (Foreign aid) और विदेशी पूंजी (Foreign capital) पर निर्भर रहना पड़ा है, हालांकि आत्मनिर्भरता (Self-reliance) एक प्रमुख उद्देश्य था।

संक्षेप में, भारतीय अर्थव्यवस्था ने संवृद्धि की उच्च दरें (विशेषकर आठवीं योजना में) हासिल की हैं और पूंजी निर्माण में सुधार किया है, लेकिन यह विकास गरीबी उन्मूलन, बेरोज़गारी और आय की असमानता जैसे महत्वपूर्ण सामाजिक उद्देश्यों को पूरी तरह से हल करने में विफल रहा है, जिसके कारण विकास प्रक्रिया की प्रकृति पर आलोचनाएँ सामने आई हैं।

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