Class 10 Sanskrit षष्ठः पाठः सौहार्द प्रकृतेः शोभा संस्कृत प्रश्नोत्तर शब्दार्थ सारांश और शिक्षाएँ

Class 10 Sanskrit षष्ठः पाठः सौहार्द प्रकृतेः शोभा संस्कृत प्रश्नोत्तर शब्दार्थ सारांश और शिक्षाएँ


(पहला अनुच्छेद)

1️⃣
अयं पाठः परस्परं स्नेहसौहार्दपूर्ण व्यवहारः स्यादिति बोधयति।
अयम् = यह, पाठः = पाठ, परस्परम् = एक-दूसरे का, स्नेह = प्रेम, सौहार्दपूर्ण = सौहार्द से युक्त, व्यवहारः = व्यवहार, स्यात् = होना चाहिए, इति = ऐसा, बोधयति = सिखाता है।
👉 यह पाठ सिखाता है कि मनुष्यों का व्यवहार एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सौहार्द से भरा होना चाहिए।


2️⃣
सम्प्रति वयं पश्याम यत् समाजे जना आत्माभिमानिनः सञ्जाताः।
सम्प्रति = वर्तमान समय में, वयम् = हम, पश्याम = देखते हैं, यत् = कि, समाजे = समाज में, जना: = लोग, आत्माभिमानिनः = अहंकारी, सञ्जाताः = उत्पन्न हो गए हैं।
👉 आजकल हम देखते हैं कि समाज में लोग अत्यधिक अहंकारी हो गए हैं।


3️⃣
ते परस्परं तिरस्कुर्वन्ति।
ते = वे, परस्परम् = एक-दूसरे का, तिरस्कुर्वन्ति = तिरस्कार करते हैं / नीचा दिखाते हैं।
👉 वे एक-दूसरे का तिरस्कार करते हैं।


4️⃣
स्वार्थपूरणे सलग्नाः ते परेषां कल्याणविषये नैव किमपि चिन्तयन्ति।
स्वार्थपूरणे = अपने स्वार्थ की पूर्ति में, सलग्नाः = लगे हुए, ते = वे, परेषाम् = दूसरों के, कल्याणविषये = भलाई के विषय में, नैव = नहीं, किमपि = कुछ भी, चिन्तयन्ति = सोचते हैं।
👉 वे अपने स्वार्थ की पूर्ति में ही लगे रहते हैं और दूसरों के भले के विषय में कुछ भी नहीं सोचते।


5️⃣
तेषां जीवनोद्देश्यं अधुना इदं सञ्जातम् —
तेषाम् = उनका, जीवन-उद्देश्यं = जीवन का उद्देश्य, अधुना = अब, इदं = यह, सञ्जातम् = बन गया है।
👉 अब उनके जीवन का उद्देश्य यह बन गया है —


6️⃣
“नीचैरनीचैरतिनीचनीचैः सर्वैः उपायैः फलमेव साध्यम्।”
नीचैः = नीच उपायों से, अनीचैः = और अधिक नीच तरीकों से, अतिनीचनीचैः = अत्यन्त ही नीच उपायों से, सर्वैः = सभी प्रकार के, उपायैः = उपायों से, फलम् एव = केवल फल (लाभ) ही, साध्यम् = प्राप्त करने योग्य / लक्ष्य।
👉 किसी भी नीच या अधम उपाय से केवल परिणाम (लाभ) प्राप्त करना ही उनका लक्ष्य है।


7️⃣
अतः समाजे पारस्परिकस्नेहसवर्धनाय अस्मिन् पाठे पशुपक्षिणां माध्यमेन समाजे व्यवहृतम् आत्माभिमानं दर्शयन् —
अतः = इसलिए, समाजे = समाज में, पारस्परिक = परस्पर, स्नेह = प्रेम, सवर्धनाय = वृद्धि के लिए, अस्मिन् पाठे = इस पाठ में, पशुपक्षिणाम् = पशु-पक्षियों के, माध्यमेन = माध्यम से, समाजे व्यवहृतम् = समाज में प्रचलित, आत्माभिमानम् = अहंकार, दर्शयन् = दिखाते हुए।
👉 इसलिए समाज में परस्पर प्रेम की वृद्धि के लिए इस पाठ में पशु-पक्षियों के माध्यम से समाज में प्रचलित अहंकार को दिखाया गया है।


8️⃣
प्रकृतिमातुः माध्यमेन अन्ते निष्कर्षः स्थापितः यत् —
प्रकृति-मातुः = प्रकृति माता के, माध्यमेन = माध्यम से, अन्ते = अंत में, निष्कर्षः = परिणाम / निष्कर्ष, स्थापितः = बताया गया है, यत् = कि।
👉 प्रकृति माता के माध्यम से अंत में यह निष्कर्ष बताया गया है कि —


9️⃣
कालानुगुणं सर्वेषां महत्त्वं भवति, सर्वे अन्योन्याश्रिताः सन्ति।
कालानुगुणं = समय के अनुसार, सर्वेषाम् = सबका, महत्त्वं = महत्व, भवति = होता है, सर्वे = सब, अन्योन्याश्रिताः = एक-दूसरे पर आश्रित, सन्ति = होते हैं।
👉 समय के अनुसार सबका अपना-अपना महत्व होता है और सभी एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं।


🔟
अतः अस्माभिः स्वकल्याणाय परस्परं स्नेहेन मैत्रीपूर्णव्यवहारेण च भाव्यम्।
अतः = इसलिए, अस्माभिः = हमें, स्वकल्याणाय = अपने कल्याण के लिए, परस्परं = एक-दूसरे के साथ, स्नेहेन = प्रेमपूर्वक, मैत्रीपूर्ण-व्यवहारेण = मित्रतापूर्ण व्यवहार से, च = और, भाव्यम् = रहना चाहिए / करना चाहिए।
👉 इसलिए हमें अपने कल्याण के लिए एक-दूसरे के साथ प्रेम और मैत्रीपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।


बहुत सुंदर 👏
अब नीचे दिए गए संस्कृत अंश का लाइन-दर-लाइन + शब्द-दर-शब्द हिंदी अर्थ प्रस्तुत है —
यह भाग “वन का दृश्य और सिंह–वानर–पक्षी प्रसंग” है।


🌿 वनस्य दृश्यं… से अनुवाद और शब्दार्थ


1️⃣
वनस्य दृश्यं समीपे एवैका नदी वहति।
वनस्य = वन का, दृश्यं = दृश्य, समीपे = पास में / निकट, एव = ही, एका = एक, नदी = नदी, वहति = बहती है।
👉 वन का दृश्य है — पास ही एक नदी बह रही है।


2️⃣
एकः सिहः सुखेन विश्राम्यति,
एकः = एक, सिंहः = सिंह, सुखेन = सुख से, विश्राम्यति = विश्राम कर रहा है।
👉 एक सिंह सुख से विश्राम कर रहा है।


3️⃣
तदैव एकः वानरः आगत्य तस्य पुच्छ धुनाति।
तदा एव = उसी समय, एकः = एक, वानरः = बंदर, आगत्य = आकर, तस्य = उसका, पुच्छम् = पूंछ, धुनाति = हिलाता है / झटकता है।
👉 उसी समय एक बंदर आकर उसकी पूंछ हिलाने लगता है।


4️⃣
कुद्धः सिंहः तं प्रहर्तुमिच्छति,
कुद्धः = क्रोधित हुआ, सिंहः = सिंह, तं = उस (वानर को), प्रहर्तुम् = मारना / प्रहार करना, इच्छति = चाहता है।
👉 क्रोधित सिंह उसे मारना चाहता है।


5️⃣
परं वानरस्तु कूर्दित्वा वृक्षमारूढः।
परं = परन्तु, वानरः तु = किंतु बंदर, कूर्दित्वा = कूदकर, वृक्षम् = पेड़ पर, आरूढः = चढ़ गया।
👉 लेकिन बंदर कूदकर पेड़ पर चढ़ गया।


6️⃣
तदैव अन्यस्मात् वृक्षात् अपरः वानरः सिंहस्य कर्णमाकृष्य पुनः वृक्षोपरि आरोहति।
तदा एव = उसी समय, अन्यस्मात् = दूसरे, वृक्षात् = पेड़ से, अपरः = दूसरा, वानरः = बंदर, सिंहस्य = सिंह के, कर्णम् = कान को, आकृष्य = खींचकर, पुनः = फिर, वृक्ष-उपरि = पेड़ के ऊपर, आरोहति = चढ़ जाता है।
👉 उसी समय दूसरे पेड़ से दूसरा बंदर सिंह का कान खींचकर फिर पेड़ के ऊपर चढ़ जाता है।


7️⃣
एवमेव वानराः वारं वारं सिंहं तुदन्ति।
एवम् एव = इसी प्रकार, वानराः = बंदर, वारं वारं = बार-बार, सिंहं = सिंह को, तुदन्ति = चिढ़ाते / सताते हैं।
👉 इस प्रकार बंदर बार-बार सिंह को चिढ़ाते रहते हैं।


8️⃣
कुद्धः सिंहः इतस्ततः धावति, गर्जति,
कुद्धः = क्रोधित हुआ, सिंहः = सिंह, इतः ततः = इधर-उधर, धावति = दौड़ता है, गर्जति = गर्जना करता है।
👉 क्रोधित सिंह इधर-उधर दौड़ता और गरजता है।


9️⃣
परं किमपि कर्तुमसमर्थः एव तिष्ठति।
परं = किन्तु, किमपि = कुछ भी, कर्तुम् = करने में, असमर्थः = असमर्थ, एव = ही, तिष्ठति = ठहर जाता है / खड़ा रहता है।
👉 लेकिन वह कुछ भी करने में असमर्थ होकर वहीं खड़ा रह जाता है।


🔟
वानराः हसन्ति वृक्षोपरि च विविधाः पक्षिणः अपि सिंहस्य एतादृशीं दशां दृष्ट्वा हर्षमिश्रितं कलरवं कुर्वन्ति।
वानराः = बंदर, हसन्ति = हँसते हैं, वृक्ष-उपरि = पेड़ के ऊपर, च = और, विविधाः = भिन्न-भिन्न, पक्षिणः = पक्षी, अपि = भी, सिंहस्य = सिंह की, एतादृशीं = ऐसी, दशां = स्थिति, दृष्ट्वा = देखकर, हर्ष-मिश्रितं = आनंदमिश्रित, कलरवं = चहचहाहट, कुर्वन्ति = करते हैं।
👉 बंदर पेड़ पर बैठकर हँसते हैं और भिन्न-भिन्न पक्षी भी सिंह की इस दशा को देखकर खुशी से चहचहाने लगते हैं।


1️⃣1️⃣
निद्राभङ्गदुःखेन वनराजः सन् अपि तुच्छजीवैः आत्मनः एतादृश्या दुरवस्थया श्रान्तः सर्वजन्तून् दृष्ट्वा पृच्छति —
निद्रा-भङ्ग-दुःखेन = नींद टूट जाने के दुःख से, वनराजः = जंगल का राजा (सिंह), सन् = होकर, अपि = भी, तुच्छ-जीवैः = छोटे जीवों से, आत्मनः = अपने, एतादृश्या = ऐसी, दुरवस्थया = बुरी दशा से, श्रान्तः = थककर, सर्व-जन्तून् = सब जीवों को, दृष्ट्वा = देखकर, पृच्छति = पूछता है।
👉 नींद टूटने के दुःख से दुखी और छोटे जीवों से सताकर थका हुआ सिंह सब जीवों को देखकर पूछता है—


बहुत अच्छा 👏
अब नीचे दिए गए पूरे अंश (सिंह, वानर, काक, पिक संवाद) का लाइन-दर-लाइन और शब्द-दर-शब्द हिन्दी अर्थ सहित अनुवाद दिया गया है —
इससे विद्यार्थियों को अर्थ और भाव दोनों स्पष्ट रूप से समझ आएँगे।


🦁 संवाद — सिंह, वानर, काक, पिक


सिंहः

(क्रोधेन गर्जन्)
क्रोधेन = क्रोध से, गर्जन् = गरजते हुए।
👉 (क्रोध से गरजते हुए)

भोः! अहं वनराजः, किं भयं न जायते?
भोः! = अरे!, अहं = मैं, वनराजः = जंगल का राजा, किं = क्या, भयं = डर, न जायते = नहीं होता?
👉 अरे! मैं जंगल का राजा हूँ, क्या तुम्हें डर नहीं लगता?

किमर्थं मामेवं तुदन्ति सर्वे मिलित्वा ?
किमर्थम् = क्यों, माम् = मुझे, एवम् = इस प्रकार, तुदन्ति = सताते हैं / चिढ़ाते हैं, सर्वे = सब, मिलित्वा = मिलकर।
👉 सब मिलकर मुझे इस प्रकार क्यों सताते हो?


एकः वानरः

यतः त्वं वनराजः भवितुं तु सर्वथा अयोग्यः।
यतः = क्योंकि, त्वं = तू, वनराजः = जंगल का राजा, भवितुं = बनने के लिए, तु = तो, सर्वथा = बिल्कुल, अयोग्यः = अयोग्य है।
👉 क्योंकि तू जंगल का राजा बनने के बिल्कुल योग्य नहीं है।

राजा तु रक्षकः भवति परं भवान् तु भक्षकः।
राजा = राजा, तु = तो, रक्षकः = रक्षक होता है, भवति = होता है, परं = परंतु, भवान् = तू, तु = तो, भक्षकः = खाने वाला (भक्ष करने वाला) है।
👉 राजा तो प्रजा की रक्षा करता है, पर तू तो भक्षक है — सबको खा जाने वाला!

अपि च स्वरक्षायामपि समर्थः नासि, तर्हि कथम् अस्मान् रक्षिष्यसि ?
अपि च = और भी, स्वरक्षायाम् = अपनी रक्षा में, अपि = भी, समर्थः = समर्थ, नासि = नहीं है, तर्हि = तो फिर, कथम् = कैसे, अस्मान् = हमें, रक्षिष्यसि = बचाएगा।
👉 और तू अपनी रक्षा में भी समर्थ नहीं है, तो हमें कैसे बचा पाएगा?


अन्यः वानरः

किं न श्रुता त्वया पञ्चतन्त्रोक्तिः —
किम् = क्या, न = नहीं, श्रुता = सुनी, त्वया = तेरे द्वारा, पञ्चतन्त्र-उक्तिः = पंचतंत्र में कही हुई बात।
👉 क्या तूने पंचतंत्र की यह उक्ति नहीं सुनी?

“यो न रक्षति वित्रस्तान् पीड्यमानान् परैः सदा।
जन्तून् पार्थिवरूपेण स कृतान्तो न संशयः॥”**
यो = जो, न रक्षति = रक्षा नहीं करता, वित्रस्तान् = भयभीत लोगों की, पीड्यमानान् = सताए जा रहे लोगों की, परैः = दूसरों से, सदा = हमेशा।
जन्तून् = जीवों की, पार्थिवरूपेण = राजा के रूप में, सः = वह, कृतान्तः = मृत्यु समान / विनाशकारी है, न संशयः = इसमें कोई संदेह नहीं।
👉 जो राजा हमेशा भयभीत और सताए हुए प्राणियों की रक्षा नहीं करता, वह स्वयं मृत्यु के समान होता है — इसमें कोई संदेह नहीं।


काकः

आम्, सत्यं कथितं त्वया।
आम् = हाँ, सत्यं = सत्य, कथितं = कहा गया, त्वया = तेरे द्वारा।
👉 हाँ, तूने बिल्कुल सत्य कहा है।

वस्तुतः वनराजः भवितुं तु अहमेव योग्यः।
वस्तुतः = वास्तव में, वनराजः = जंगल का राजा, भवितुं = बनने के लिए, तु = तो, अहम् एव = केवल मैं ही, योग्यः = योग्य हूँ।
👉 वास्तव में जंगल का राजा बनने के लिए तो मैं ही योग्य हूँ।


पिकः (कोयल)

(उपहसन्) = हँसते हुए।

कथं त्वं योग्यः वनराजः भवितु,
कथं = कैसे, त्वं = तू, योग्यः = योग्य, वनराजः = जंगल का राजा, भवितु = बन सकता है।
👉 तू कैसे जंगल का राजा बनने योग्य है?

यत्र तत्र का-का इति कर्कशध्वनिना वातावरणम् आकुलीकरोषि।
यत्र तत्र = जहाँ-तहाँ, “का-का” इति = “का-का” ऐसा, कर्कश-ध्वनिना = कठोर आवाज़ से, वातावरणम् = वातावरण को, आकुलीकरोषि = भर देता है / अस्त-व्यस्त करता है।
👉 तू अपनी कर्कश “का-का” आवाज़ से हर जगह का वातावरण अस्त-व्यस्त कर देता है।

न रूपम्, न ध्वनिः अस्ति।
न = न तो, रूपम् = रूप (सुंदरता), न = न ही, ध्वनिः = स्वर, अस्ति = है।
👉 न तेरे पास रूप है, न मधुर स्वर।

कृष्णवर्णं मेध्यामेध्यभक्षकं त्वां कथं वनराजं मन्यामहे वयम् ?
कृष्णवर्णं = काला रंग वाला, मेध्य-अमेध्य-भक्षकं = पवित्र और अपवित्र दोनों प्रकार की चीजें खाने वाला, त्वां = तुझे, कथं = कैसे, वनराजं = वन का राजा, मन्यामहे = मानें, वयम् = हम?
👉 तू काले रंग का है और पवित्र-अपवित्र सब कुछ खाता है, हम तुझे कैसे जंगल का राजा मानें?


काकः

अरे! अरे! किं जल्पसि ?
अरे! अरे! = ओह! ओह!, किं = क्या, जल्पसि = बकवास करती है।
👉 ओ कोयल! क्या बकवास करती है?

यदि अहं कृष्णवर्णः, तर्हि त्वं किं गौराङ्गः ?
यदि = यदि / अगर, अहं = मैं, कृष्णवर्णः = काला हूँ, तर्हि = तो, त्वं = तू, किं = क्या, गौराङ्गः = गोरे रंग की है?
👉 अगर मैं काला हूँ तो क्या तू गोरी है?

अपि च विस्मर्यते किं यत् मम सत्यप्रियता तु जनानां कृते उदाहरणस्वरूपा।
अपि च = और क्या, विस्मर्यते = भुला दिया गया है, किं = क्या?, यत् = कि, मम = मेरी, सत्यप्रियता = सत्य से प्रेम, तु = तो, जनानाम् कृते = लोगों के लिए, उदाहरणस्वरूपा = उदाहरण है।
👉 और क्या यह बात भूल गई है कि मेरी सत्यप्रियता लोगों के लिए उदाहरण मानी जाती है?

‘अनृतं वदसि चेत् काकः दशेत्’ इति प्रकारेण।
अनृतं वदसि चेत् = यदि तुम झूठ बोलो, काकः दशेत् = तो कौआ काटेगा, इति प्रकारेण = इस प्रकार से (कहा जाता है)।
👉 इसलिए कहा भी जाता है — “यदि कोई झूठ बोले तो कौआ काट ले।”

अस्माकं परिश्रमः ऐक्यं च विश्व-प्रथितम्।
अस्माकं = हमारा, परिश्रमः = परिश्रम, ऐक्यं = एकता, च = और, विश्व-प्रथितम् = संसार में प्रसिद्ध है।
👉 हमारा परिश्रम और हमारी एकता संसार भर में प्रसिद्ध है।

अपि च काकचेष्टः विद्यार्थी एव आदर्शच्छात्रः मन्यते।
अपि च = और भी, काक-चेष्टः = कौए जैसी परिश्रमी चाल वाला, विद्यार्थीः एव = छात्र ही, आदर्श-छात्रः = आदर्श विद्यार्थी, मन्यते = माना जाता है।
👉 और “कौए जैसी चेष्टा करने वाला विद्यार्थी” ही आदर्श विद्यार्थी माना गया है।


पिकः

अलम् अलम् अतिविकत्थनेन।
अलम् अलम् = बस-बस (अब बहुत हुआ), अतिविकत्थनेन = अत्यधिक डींग मारने से।
👉 बस करो, बहुत डींगें हाँक लीं।

किं विस्मर्यते यत् — काकः कृष्णः, पिकः कृष्णः, को भेदः पिक-काकयोः?
किं = क्या, विस्मर्यते = भुला दिया गया है, यत् = कि, काकः = कौआ, कृष्णः = काला, पिकः = कोयल, कृष्णः = काला, कः = क्या, भेदः = अंतर, पिक-काकयोः = कोयल और कौए में?
👉 क्या यह भूल गई हो कि कौआ भी काला है और कोयल भी, फिर तुम दोनों में क्या भेद है?

वसन्त-समये प्राप्ते — काकः काकः, पिकः पिकः॥
वसन्त-समये = वसंत ऋतु में, प्राप्ते = आने पर, काकः = कौआ, काकः = कौआ ही रहता है (कर्कश), पिकः = कोयल, पिकः = कोयल ही (मधुर)।
👉 वसंत आने पर कौआ कौआ ही रहता है और कोयल कोयल ही — यही अंतर है!


काकः

रे परभृत्!
रे = ओ!, परभृत् = परभृत (दूसरों के द्वारा खिलाई जाने वाली, यानी कोयल)।
👉 ओ परभृत (दूसरों पर निर्भर कोयल)!

अहं यदि तव संततिं न पालयामि तर्हि कुत्र स्युः पिकाः ?
अहं = मैं, यदि = यदि, तव = तेरे, संततिं = बच्चों को, न पालयामि = नहीं पालूँ, तर्हि = तो, कुत्र = कहाँ, स्युः = होंगे, पिकाः = कोयलें।
👉 यदि मैं तेरे बच्चों को न पालूँ, तो तेरी जाति की कोयलें कहाँ होंगी?

अतः अहमेव करुणापरः पक्षि-सम्म्राट् काकः।
अतः = इसलिए, अहम् एव = मैं ही, करुणा-परः = दयालु, पक्षि-सम्म्राट् = पक्षियों का राजा, काकः = कौआ हूँ।
👉 इसलिए मैं ही दयालु और पक्षियों का राजा — कौआ हूँ।


बहुत अच्छा 👏
अब हम इस अंश का भी लाइन-बाय-लाइन (संस्कृत वाक्य के नीचे उसके शब्दार्थ) के साथ स्पष्ट हिंदी अर्थ करेंगे।
यह भाग “गज (हाथी), वानर, सिंह, बक, मयूर संवाद” से संबंधित है।


🐘 गजस्य आगमनम् (हाथी का प्रवेश)


1️⃣
गजः समीपतः एव आगच्छन् —
गजः = हाथी, समीपतः = पास से, एव = ही, आगच्छन् = आता हुआ।
👉 पास ही से एक हाथी आता हुआ दिखाई देता है।


2️⃣
अरे! अरे! सर्व सम्भाषणं शृण्वन् एव अहम् अत्र आगच्छम्।
अरे! अरे! = ओ ओ!, सर्व = सबका, सम्भाषणं = वार्तालाप / बातचीत, शृण्वन् एव = सुनते हुए ही, अहम् = मैं, अत्र = यहाँ, आगच्छम् = आया हूँ।
👉 ओ! ओ! मैं सबकी बातें सुनते हुए ही यहाँ आ गया हूँ।


3️⃣
अहं विशालकायः, बलशाली, पराक्रमी च।
अहं = मैं, विशालकायः = विशाल शरीर वाला, बलशाली = शक्तिशाली, पराक्रमी च = और वीर भी हूँ।
👉 मैं विशालकाय, बलशाली और पराक्रमी हूँ।


4️⃣
सिंहः वा स्यात् अथवा अन्यः कोऽपि, वन्यपशून् तु तुदन्तं जन्तुम् अहं स्वशुण्डेन पोथयित्वा मारयिष्यामि।
सिंहः वा स्यात् = चाहे सिंह ही हो, अथवा अन्यः = या कोई और, कोऽपि = कोई भी, वन्यपशून् = जंगल के पशुओं को, तु = तो, तुदन्तं = सताने वाले, जन्तुम् = प्राणी को, अहं = मैं, स्व-शुण्डेन = अपनी सूँड से, पोथयित्वा = पटक कर, मारयिष्यामि = मार दूँगा।
👉 चाहे सिंह हो या कोई और, जो भी जंगल के पशुओं को सताएगा, मैं अपनी सूँड से पटककर मार दूँगा।


5️⃣
किम् अन्यः कोऽपि अस्ति एतादृशः पराक्रमा ?
किम् = क्या, अन्यः = दूसरा, कोऽपि = कोई भी, अस्ति = है, एतादृशः = मेरे जैसा, पराक्रमा = पराक्रमी (वीर)?
👉 क्या मुझ जैसा वीर कोई और है?


6️⃣
अतः अहम् एव योग्यः वनराजपदाय।
अतः = इसलिए, अहम् एव = मैं ही, योग्यः = योग्य हूँ, वनराज-पदाय = वनराज (जंगल का राजा) पद के लिए।
👉 इसलिए जंगल का राजा बनने के लिए मैं ही योग्य हूँ।


🐒 वानरः

7️⃣
अरे! अरे! एवं वा —
अरे! अरे! = ओ ओ!, एवं वा = अच्छा तो यह देखो!
👉 ओ! ओ! अच्छा, देखो ज़रा!


(शीघ्रमेव गजस्यापि पुच्छं विधूय वृक्षोपरि आरोहति।)
शीघ्रमेव = तुरंत ही, गजस्य अपि = हाथी की भी, पुच्छं = पूँछ, विधूय = हिलाकर, वृक्ष-उपरि = पेड़ पर, आरोहति = चढ़ गया।
👉 वह बंदर तुरंत हाथी की पूँछ हिलाकर पेड़ पर चढ़ गया।


(गजः तं वृक्षमेव स्वशुण्डेन आलोडयितुम् इच्छति,
गजः = हाथी, तं = उस (वानर को), वृक्षम् एव = उसी पेड़ को, स्व-शुण्डेन = अपनी सूँड से, आलोडयितुम् = हिलाने के लिए, इच्छति = चाहता है।
👉 हाथी अपनी सूँड से उस पेड़ को हिलाना चाहता है।


परं वानरस्तु कूर्दित्वा अन्यं वृक्षम् आरोहति।)
परं = परंतु, वानरः तु = बंदर तो, कूर्दित्वा = कूदकर, अन्यं = दूसरे, वृक्षम् = पेड़ पर, आरोहति = चढ़ जाता है।
👉 लेकिन बंदर कूदकर दूसरे पेड़ पर चढ़ जाता है।


एवं गजं वृक्षात् वृक्षं प्रति धावन्तं दृष्ट्वा सिंहः अपि हसति वदति च।
एवम् = इस प्रकार, गजं = हाथी को, वृक्षात् वृक्षं प्रति = पेड़ से पेड़ की ओर, धावन्तं = दौड़ते हुए, दृष्ट्वा = देखकर, सिंहः = सिंह, अपि = भी, हसति = हँसता है, वदति च = और कहता है।
👉 हाथी को पेड़ से पेड़ की ओर दौड़ते हुए देखकर सिंह भी हँसता है और कहता है—


🦁 सिंहः

भोः गज! माम् अपि एवम् एव आतुदन् एते वानराः।
भोः = अरे!, गज! = हे हाथी!, माम् अपि = मुझे भी, एवम् एव = इसी प्रकार, आतुदन् = सताते हैं, एते = ये, वानराः = बंदर।
👉 हे गज! ये बंदर मुझे भी इसी प्रकार सताते हैं।


🐒 वानरः

एतस्मादेव तु कथयामि यत् अहमेव योग्यः वनराजपदाय।
एतस्मात् एव = इसी कारण से, तु = तो, कथयामि = मैं कहता हूँ, यत् = कि, अहम् एव = मैं ही, योग्यः = योग्य हूँ, वनराज-पदाय = वनराज पद के लिए।
👉 इसलिए मैं ही कहता हूँ कि जंगल का राजा बनने के लिए मैं ही योग्य हूँ।


येन विशालकायं पराक्रमिणं, भयंकरं चापि सिंहं गजं वा पराजेतुं समर्था अस्माकं जातिः।
येन = जिससे, विशालकायं = विशाल शरीर वाले, पराक्रमिणं = वीर, भयंकरं = डरावने, च अपि = और भी, सिंहं गजं वा = सिंह या हाथी को भी, पराजेतुं = हराने में, समर्था = समर्थ, अस्माकं जातिः = हमारी जाति (वानर जाति) है।
👉 हमारी जाति इतनी समर्थ है कि वह सिंह या हाथी जैसे बलवानों को भी हरा सकती है।


अतः वन्यजन्तूनां रक्षायै वयम् एव क्षमाः।
अतः = इसलिए, वन्यजन्तूनाम् = जंगल के प्राणियों की, रक्षायै = रक्षा के लिए, वयम् एव = हम ही, क्षमाः = योग्य / समर्थ हैं।
👉 इसलिए जंगल के सभी प्राणियों की रक्षा के लिए हम ही योग्य हैं।


🦩 (एतत् सर्वं श्रुत्वा नदी-मध्य-स्थितः एकः बकः)

एतत् सर्वं = यह सब, श्रुत्वा = सुनकर, नदी-मध्य-स्थितः = नदी के बीच में बैठा हुआ, एकः बकः = एक बगुला।
👉 यह सब बातें सुनकर, नदी के बीच में बैठा हुआ एक बगुला कहता है—


बकः

अरे! अरे! मां विहाय कथम् अन्यः कोऽपि राजा भवितुम् अर्हति ?
अरे! अरे! = ओ! ओ!, मां = मुझे, विहाय = छोड़कर, कथम् = कैसे, अन्यः कोऽपि = कोई और, राजा = राजा, भवितुम् = बनने में, अर्हति = योग्य है?
👉 ओ! ओ! मुझे छोड़कर कोई और कैसे राजा बनने योग्य हो सकता है?


अहं तु शीतले जले बहुकालपर्यन्तम् अविचलः ध्यानमग्नः स्थितप्रज्ञ इव स्थित्वा सर्वेषां रक्षायाः उपायान् चिन्तयिष्यामि।
अहं तु = मैं तो, शीतले जले = ठंडे जल में, बहु-काल-पर्यन्तम् = लंबे समय तक, अविचलः = बिना हिले, ध्यानमग्नः = ध्यान में लीन, स्थितप्रज्ञ इव = ज्ञानी व्यक्ति की भाँति, स्थित्वा = रहकर, सर्वेषां रक्षायाः = सबकी रक्षा के, उपायान् = उपायों को, चिन्तयिष्यामि = सोचूँगा।
👉 मैं ठंडे पानी में ध्यानमग्न होकर, अचल रहकर सबकी रक्षा के उपायों पर विचार करूँगा।


योजनां निर्माय च स्व-सभायां विविध-पदम्-अलंकुर्वाणैः जन्तुभिः च मिलित्वा रक्षोपायान् क्रियान्वितान् कारयिष्यामि।
योजनाम् = योजना, निर्माय = बनाकर, च = और, स्व-सभायाम् = अपनी सभा में, विविध-पदम्-अलंकुर्वाणैः = विभिन्न पदों से अलंकृत (पदाधिकारी) जन्तुभिः = जीवों के साथ, मिलित्वा = मिलकर, रक्षोपायान् = सुरक्षा के उपायों को, क्रियान्वितान् = क्रियान्वयन में, कारयिष्यामि = लगाऊँगा।
👉 मैं योजना बनाकर अपनी सभा में विभिन्न पदधारक जीवों के साथ मिलकर उन योजनाओं को लागू कराऊँगा।


अतः अहमेव वनराजपदप्राप्तये योग्यः।
अतः = इसलिए, अहम् एव = मैं ही, वनराज-पद-प्राप्तये = जंगल के राजा के पद को प्राप्त करने के लिए, योग्यः = योग्य हूँ।
👉 इसलिए जंगल के राजा के पद के लिए मैं ही योग्य हूँ।


🦚 मयूरः

(वृक्षोपरितः अट्टहासपूर्वकम्)
वृक्ष-उपरितः = पेड़ के ऊपर से, अट्टहास-पूर्वकम् = ज़ोर से हँसते हुए।
👉 पेड़ के ऊपर से ज़ोर से हँसते हुए मयूर बोला—


विरम विरम आत्मश्लाघायाः।
विरम विरम = रुक जा, आत्म-श्लाघायाः = अपनी प्रशंसा करने से।
👉 बस करो, अपनी बड़ाई करना बंद करो।


किं न जानासि यत् —
किं = क्या, न जानासि = नहीं जानते, यत् = कि।
👉 क्या तुम यह नहीं जानते कि —

यदि न स्यान् नरपतिः सम्यक् नेता ततः प्रजा। अकर्णधारा जलधौ विप्लवेतेह नौः इव॥
यदि = यदि, न स्यान् = न हो, नरपतिः = राजा, सम्यक् नेता = उचित नेतृत्व वाला, ततः = तो, प्रजा = प्रजा (जनता), अकर्णधारा = बिना पतवार की, जलधौ = सागर में, विप्लवेते = डूब जाती है, नौः इव = नौका की तरह।
👉 यदि राजा ठीक नेता न हो, तो प्रजा सागर में पतवारविहीन नाव की तरह डूब जाती है।


को न जानाति तव ध्यानावस्थाम्।
को न जानाति = कौन नहीं जानता, तव = तेरी, ध्यान- अवस्थाम् = ध्यान की अवस्था को।
👉 तेरे ध्यान की अवस्था कौन नहीं जानता?


‘स्थितप्रज्ञ’ इति व्याजेन वराकान् मीनान् छलेन अधिगृह्य क्रूरतया भक्षयसि।
‘स्थितप्रज्ञ’ इति व्याजेन = “स्थितप्रज्ञ” के नाम से दिखावा करके, वराकान् = बेचारे, मीनान् = मछलियों को, छलेन = छल से, अधिगृह्य = पकड़कर, क्रूरतया = निर्दयता से, भक्षयसि = खा जाता है।
👉 “स्थितप्रज्ञ” कहलाने का ढोंग कर तू बेचारी मछलियों को छल से पकड़कर निर्दयता से खा जाता है।


धिक् त्वाम्। तव कारणात् तु सर्वं पक्षिकुलम् एव अवमानितं जातम्।
धिक् त्वाम् = तुझ पर धिक्कार है, तव कारणात् तु = तेरे कारण ही, सर्वं पक्षि-कुलम् एव = पूरा पक्षी समाज ही, अवमानितं जातम् = अपमानित हो गया है।
👉 तुझ पर धिक्कार है! तेरे कारण पूरा पक्षी समाज ही अपमानित हो गया है।


बहुत बढ़िया 👍
अब नीचे दिए गए इस अंश — जिसमें वानर, मयूर, काक, बक, सिंह, और अंत में उल्लू की चर्चा है — का पूरा लाइन-दर-लाइन (शब्दार्थ सहित) अनुवाद प्रस्तुत है।
यह अंश अत्यंत सुंदर है और “वनराज पद के लिए प्रतियोगिता” का अंतिम संवाद है।


🐒 वानरः (सगर्वम्)


1️⃣
अत एव कथयामि यत् अहमेव योग्यः वनराजपदाय।
अत एव = इसी कारण से, कथयामि = मैं कहता हूँ, यत् = कि, अहम् एव = मैं ही, योग्यः = योग्य हूँ, वनराज-पदाय = वनराज (जंगल के राजा) के पद के लिए।
👉 इसलिए मैं कहता हूँ कि जंगल के राजा के पद के लिए मैं ही योग्य हूँ।


2️⃣
शीघ्रमेव मम राज्याभिषेकाय तत्परा भवन्तु सर्वे वन्यजीवा।
शीघ्रमेव = तुरंत ही, मम = मेरा, राज्याभिषेकाय = राज्याभिषेक करने के लिए, तत्परा = तैयार, भवन्तु = हो जाएँ, सर्वे = सभी, वन्य-जीवा = जंगल के प्राणी।
👉 शीघ्र ही मेरे राज्याभिषेक के लिए सब जंगल के प्राणी तैयार हो जाएँ।


🦚 मयूरः


3️⃣
अरे वानर! तूष्णीं भव।
अरे वानर! = हे बंदर!, तूष्णीं भव = चुप हो जा।
👉 ओ बंदर! चुप रह।


4️⃣
कथं त्वं योग्यः वनराजपदाय?
कथं = कैसे, त्वं = तू, योग्यः = योग्य है, वनराज-पदाय = जंगल के राजा के पद के लिए।
👉 तू जंगल का राजा बनने के योग्य कैसे है?


5️⃣
पश्यतु पश्यतु मम शिरसि राजमुकुटमिव शिखां स्थापयता विधात्रा एव अहं पक्षिराजः कृतः।
पश्यतु पश्यतु = देखो देखो!, मम = मेरे, शिरसि = सिर पर, राज-मुकुटम् इव = जैसे राजमुकुट, शिखां = कलगी / पंख, स्थापयता = रखकर, विधात्रा = विधाता (ईश्वर) द्वारा, एव = ही, अहम् = मैं, पक्षि-राजः = पक्षियों का राजा, कृतः = बनाया गया हूँ।
👉 देखो-देखो! विधाता ने मेरे सिर पर राजमुकुट जैसी कलगी रखकर मुझे पक्षियों का राजा बनाया है।


6️⃣
अतः वने निवसन्तं मां वनराजरूपेण अपि द्रष्टुं सज्जाः भवन्तु अधुना।
अतः = इसलिए, वने = वन में, निवसन्तं = रहने वाले, मां = मुझे, वनराज-रूपेण = वनराज के रूप में, अपि = भी, द्रष्टुं = देखने के लिए, सज्जाः = तैयार, भवन्तु = हो जाएँ, अधुना = अब।
👉 इसलिए अब वन में रहने वाले मुझे वनराज के रूप में देखने के लिए तैयार हो जाएँ।


7️⃣
यतः कथं कोऽप्यन्यः विधातुः निर्णयम् अन्यथा कर्तुं क्षमः।
यतः = क्योंकि, कथं = कैसे, कोऽपि अन्यः = कोई और, विधातुः = ईश्वर का, निर्णयम् = निर्णय, अन्यथा कर्तुम् = बदलने में, क्षमः = समर्थ है?
👉 क्योंकि ईश्वर के निर्णय को कौन बदल सकता है?


🐦 काकः (सव्यङ्ग्यम्)


8️⃣
अरे अहिभुक्।
अरे = ओ!, अहिभुक् = सर्पभक्षी (साँप खाने वाला)।
👉 ओ सर्पभक्षी!


9️⃣
नृत्यातिरिक्तं का तव विशेषता यत् त्वां वनराजपदाय योग्यं मन्यामहे वयम् ?
नृत्य-ातिरिक्तं = नृत्य के अतिरिक्त, का = क्या, तव = तेरी, विशेषता = विशेषता है, यत् = कि, त्वाम् = तुझे, वनराज-पदाय = वनराज पद के लिए, योग्यं = योग्य, मन्यामहे = मानें, वयम् = हम।
👉 नाचने के अतिरिक्त तेरी और क्या विशेषता है कि हम तुझे वनराज के पद के लिए योग्य मानें?


🦚 मयूरः


🔟
यतः मम नृत्यं तु प्रकृतेः आराधना।
यतः = क्योंकि, मम = मेरा, नृत्यं = नृत्य, तु = तो, प्रकृतेः = प्रकृति की, आराधना = पूजा / आराधना है।
👉 क्योंकि मेरा नृत्य तो प्रकृति की आराधना है।


1️⃣1️⃣
पश्य! पश्य! मम पिच्छानाम् अपूर्व सौंदर्यम्।
पश्य पश्य = देखो देखो!, मम = मेरे, पिच्छानाम् = पंखों का, अपूर्व = अद्भुत, सौंदर्यम् = सौंदर्य।
👉 देखो! मेरे पंखों का अद्भुत सौंदर्य।


(पिच्छानुद्घाट्य नृत्यमुद्रायां स्थितः सन्)
पिच्छान् उद्घाट्य = पंख फैलाकर, नृत्य-मुद्रायाम् = नृत्य की मुद्रा में, स्थितः सन् = खड़ा होकर।
👉 (पंख फैलाकर नृत्य मुद्रा में खड़ा हो गया।)


1️⃣2️⃣
न कोऽपि त्रैलोक्ये मत्सदृशः सुन्दरः।
न = कोई नहीं, कोऽपि = कोई भी, त्रैलोक्ये = तीनों लोकों में, मत्सदृशः = मेरे समान, सुन्दरः = सुंदर।
👉 तीनों लोकों में मुझ जैसा सुंदर कोई नहीं।


1️⃣3️⃣
वन्यजन्तूनाम् उपरि आक्रमणकर्तारं तु अहं स्वसौन्दर्येण नृत्येन च आकर्षितं कृत्वा वनात् बहिष्करिष्यामि।
वन्यजन्तूनाम् = जंगल के पशुओं पर, उपरि आक्रमणकर्तारं = आक्रमण करने वाले को, तु = तो, अहं = मैं, स्व-सौन्दर्येण = अपने सौंदर्य से, नृत्येन च = और नृत्य द्वारा, आकर्षितं कृत्वा = आकर्षित करके, वनात् = वन से, बहिष्करिष्यामि = बाहर निकाल दूँगा।
👉 मैं अपने सौंदर्य और नृत्य से शत्रुओं को आकर्षित करके वन से बाहर निकाल दूँगा।


1️⃣4️⃣
अतः अहमेव योग्यः वनराजपदाय।
अतः = इसलिए, अहम् एव = मैं ही, योग्यः = योग्य हूँ, वनराज-पदाय = वनराज पद के लिए।
👉 इसलिए मैं ही वनराज पद के लिए योग्य हूँ।


🐅 (एतस्मिन्नेव काले व्याघ्रचित्रकौ…)


1️⃣5️⃣
एतस्मिन् एव काले व्याघ्र-चित्रकौ अपि नदी-जलं पातुम् आगतौ।
एतस्मिन् एव काले = उसी समय, व्याघ्र-चित्रकौ = बाघ और चीता, अपि = भी, नदी-जलं = नदी का जल, पातुम् = पीने के लिए, आगतौ = आए।
👉 उसी समय बाघ और चीता भी नदी का जल पीने आए।


1️⃣6️⃣
एतं विवादं शृणुतः वदतः च।
एतं = इस, विवादं = विवाद को, शृणुतः = सुनते हुए, वदतः च = और बोलते हुए।
👉 वे यह विवाद सुनकर आपस में कहने लगे—


1️⃣7️⃣
व्याघ्र-चित्रकौ — अरे! किं वनराजपदाय सुपात्रं चीयते?
व्याघ्र-चित्रकौ = बाघ और चीता, अरे = ओ!, किं = क्या, वनराज-पदाय = जंगल के राजा के पद के लिए, सुपात्रं = योग्य पात्र, चीयते = चुना जा रहा है?
👉 ओ! क्या जंगल के राजा के पद के लिए कोई योग्य व्यक्ति चुना जा रहा है?


1️⃣8️⃣
एतदर्थं तु आवाम् एव योग्यौ।
एतदर्थं = इसी काम के लिए, तु = तो, आवाम् एव = हम दोनों ही, योग्यौ = योग्य हैं।
👉 इस पद के लिए तो हम दोनों ही योग्य हैं।


1️⃣9️⃣
यस्य कस्यापि चयनं कुर्वन्तु सर्वसम्मत्या।
यस्य कस्यापि = किसी एक का, चयनं = चयन, कुर्वन्तु = करें, सर्वसम्मत्या = सबकी सहमति से।
👉 सबकी सहमति से हम दोनों में से किसी एक का चयन कर लिया जाए।


🦁 सिंहः


2️⃣0️⃣
तूष्णीं भव भोः।
तूष्णीं भव = चुप हो जा, भोः = अरे!
👉 अरे! चुप हो जाओ।


2️⃣1️⃣
युवाम् अपि मत्सदृशौ भक्षकौ, न तु रक्षकौ।
युवाम् अपि = तुम दोनों भी, मत्सदृशौ = मेरी तरह, भक्षकौ = भक्षक (खाने वाले), न तु = लेकिन नहीं, रक्षकौ = रक्षक (सुरक्षा देने वाले)।
👉 तुम दोनों भी मेरी तरह भक्षक हो, रक्षक नहीं।


2️⃣2️⃣
एते वन्यजीवाः भक्षकं रक्षकपदयोग्यं न मन्यन्ते।
एते = ये, वन्यजीवाः = जंगल के प्राणी, भक्षकं = खाने वाले को, रक्षक-पद-योग्यं = रक्षक पद के योग्य, न मन्यन्ते = नहीं मानते।
👉 ये वन्यप्राणी भक्षक को रक्षक पद के योग्य नहीं मानते।


2️⃣3️⃣
अत एव विचार-विमर्शः प्रचलति।
अत एव = इसी कारण, विचार-विमर्शः = चर्चा, प्रचलति = चल रही है।
👉 इसलिए यह विचार-विमर्श चल रहा है।


🦩 बकः


2️⃣4️⃣
सर्वथा सम्यक् उक्तम् सिंह-महोदयेन।
सर्वथा = पूर्णतः, सम्यक् = ठीक, उक्तम् = कहा गया है, सिंह-महोदयेन = श्रीमान सिंह ने।
👉 श्रीमान सिंह ने बिल्कुल ठीक कहा है।


2️⃣5️⃣
वस्तुतः एव सिंहेन बहुकाल-पर्यन्तं शासनं कृतम्।
वस्तुतः एव = वास्तव में ही, सिंहेन = सिंह द्वारा, बहु-काल-पर्यन्तं = लंबे समय तक, शासनं = शासन, कृतम् = किया गया।
👉 वास्तव में सिंह ने बहुत समय तक शासन किया है।


2️⃣6️⃣
परम् अधुना तु कोऽपि पक्षी एव राजेति निश्चेतव्यम्।
परम् = परंतु, अधुना = अब, तु = तो, कोऽपि = कोई, पक्षी एव = पक्षी ही, राजा इति = राजा होगा, निश्चेतव्यम् = यह निश्चित किया जाना चाहिए।
👉 परंतु अब तो यह निश्चित करना चाहिए कि कोई पक्षी ही राजा होगा।


2️⃣7️⃣
अत्र तु सशीतिलेशस्य अपि अवकाशः एव नास्ति।
अत्र = यहाँ, तु = तो, स-शीतिल-ईशस्य = किसी शीतल स्वभाव वाले के लिए, अपि = भी, अवकाशः = अवसर, एव = भी, नास्ति = नहीं है।
👉 यहाँ किसी शीतल-स्वभाव वाले के लिए भी कोई अवसर नहीं है।


🐦 सर्वे पक्षिणः (उच्चैः)


2️⃣8️⃣
आम् आम् कश्चित् खगः एव वनराजः भविष्यति इति।
आम् आम् = हाँ हाँ!, कश्चित् = कोई न कोई, खगः एव = पक्षी ही, वनराजः भविष्यति = जंगल का राजा बनेगा, इति = ऐसा।
👉 हाँ-हाँ! अब कोई न कोई पक्षी ही जंगल का राजा बनेगा।


2️⃣9️⃣
परं कश्चिदपि खगः आत्मानं विना नान्यं कमपि अस्मै पदाय योग्यं चिन्तयन्ति।
परं = परंतु, कश्चित् अपि = प्रत्येक, खगः = पक्षी, आत्मानं विना = अपने सिवाय, न अन्यं = किसी अन्य को, कमपि = किसी को भी, अस्मै पदाय = इस पद के लिए, योग्यं = योग्य, चिन्तयन्ति = नहीं मानता।
👉 परंतु हर पक्षी अपने सिवाय किसी और को इस पद के लिए योग्य नहीं मानता।


3️⃣0️⃣
तर्हि कथं निर्णयः भवेत् ?
तर्हि = तो फिर, कथं = कैसे, निर्णयः = निर्णय, भवेत् = होगा?
👉 तो फिर निर्णय कैसे होगा?


3️⃣1️⃣
तदा तैः सर्वैः गहन-निद्रायां निश्चिन्तं स्वपन्तम् उलूकं वीक्ष्य विचारितम् —
तदा = तब, तैः सर्वैः = उन सबने, गहन-निद्रायाम् = गहरी नींद में, निश्चिन्तं = निश्चिंत होकर, स्वपन्तम् = सोते हुए, उलूकं = उल्लू को, वीक्ष्य = देखकर, विचारितम् = सोचा।
👉 तब सबने गहरी नींद में निश्चिंत सोते हुए उल्लू को देखकर सोचा—


3️⃣2️⃣
“यः एषः आत्मश्लाघा-हीनः पद-निर्लिप्तः उलूकः एव अस्माकं राजा भविष्यति।”
यः = जो, एषः = यह, आत्म-श्लाघा-हीनः = आत्मप्रशंसा से रहित, पद-निर्लिप्तः = पद से निरपेक्ष, उलूकः = उल्लू, एव = ही, अस्माकं = हमारा, राजा भविष्यति = राजा होगा।
👉 यह आत्मप्रशंसा से रहित और पद के लोभ से मुक्त उल्लू ही हमारा राजा होगा।


3️⃣3️⃣
परस्परम् आदिशन्ति च तदानीयन् नृपाभिषेकसम्बन्धिनः सम्भाराः इति।
परस्परम् = आपस में, आदिशन्ति = आदेश देने लगे, च = और, तदानीयन् = लाने के लिए, नृप-अभिषेक-सम्बन्धिनः = राज्याभिषेक से संबंधित, सम्भाराः = सामग्री, इति = ऐसा।
👉 और वे आपस में कहने लगे कि अब उसके राज्याभिषेक की सामग्री ले आओ।


बहुत अच्छा 👏 अब हम इस अंतिम भाग
जहाँ काक (कौआ) आपत्ति करता है, प्रकृति माता प्रवेश करती हैं और सभी जीवों को शिक्षा देती हैं
का विस्तृत लाइन-दर-लाइन संस्कृत से हिन्दी शब्दार्थ सहित अनुवाद करेंगे।


🐦 काकः


1️⃣
सर्वे पक्षिणः सज्जायै गन्तुमिच्छन्ति तर्हि सहसा एव —
सर्वे = सभी, पक्षिणः = पक्षी, सज्जायै = तैयार होने के लिए, गन्तुम् = जाने को, इच्छन्ति = चाहते हैं, तर्हि = तभी, सहसा एव = अचानक ही।
👉 जब सभी पक्षी तैयार होने के लिए जाने लगे, तभी अचानक—


2️⃣
(अट्टहासपूर्णस्वरेण) सर्वथा अयुक्तम् एतत् —
(अट्टहास-पूर्ण-स्वरेण) = ठहाका मारते हुए स्वर में, सर्वथा = बिल्कुल, अयुक्तम् = अनुचित, एतत् = यह।
👉 (हँसते हुए स्वर में) यह तो बिल्कुल अनुचित है!


3️⃣
यन् मयूर-हंस-कोकिल-चक्रवाक-शुक-सारसातिषु पक्षिप्रधानेषु विद्यमानेषु —
यन् = कि, मयूर-हंस-कोकिल-चक्रवाक-शुक-सारसातिषु = मयूर, हंस, कोयल, चक्रवाक, तोता, सारस आदि, पक्षि-प्रधानेषु = श्रेष्ठ पक्षियों में, विद्यमानेषु = विद्यमान होने पर भी।
👉 जबकि मयूर, हंस, कोकिल, सारस जैसे श्रेष्ठ पक्षी उपस्थित हैं भी।


4️⃣
दिवान्धस्य अस्य करालवक्त्रस्य अभिषेकार्थं सर्वे सज्जाः।
दिवा-अन्धस्य = दिन में अंधे (अर्थात उल्लू) के, अस्य = इस, कराल-वक्त्रस्य = भयानक मुख वाले के, अभिषेक-अर्थं = राज्याभिषेक के लिए, सर्वे = सब, सज्जाः = तैयार हैं।
👉 फिर भी सब लोग इस दिन-अंधे और भयानक मुख वाले उल्लू के राज्याभिषेक के लिए तैयार हैं!


5️⃣
पूर्ण-विनं यावत् निद्रायमाणः एषः कथं अस्मान् रक्षिष्यति ?
पूर्ण-विनं-यावत् = पूरा दिनभर, निद्रायमाणः = सोता रहता है, एषः = यह, कथं = कैसे, अस्मान् = हम सबकी, रक्षिष्यति = रक्षा करेगा?
👉 जो दिनभर सोता रहता है, वह हमारी रक्षा कैसे करेगा?


6️⃣
वस्तुतः तु स्वभावरौदम्, अत्युग्रं, क्रूरम्, अप्रियवादिनम्।
वस्तुतः तु = वास्तव में तो, स्वभाव-रौदम् = स्वभाव से कठोर, अत्युग्रं = बहुत उग्र, क्रूरम् = निर्दयी, अप्रिय-वादिनम् = अप्रिय बातें कहने वाला।
👉 यह स्वभाव से कठोर, उग्र, निर्दयी और अप्रिय बातें कहने वाला है।


7️⃣
उलूकं नृपतिं कृत्वा का नु सिद्धिः भविष्यति ॥
उलूकं = उल्लू को, नृपतिं = राजा बनाकर, का नु = क्या फिर, सिद्धिः = सफलता, भविष्यति = होगी?
👉 उल्लू को राजा बनाकर भला कैसी सफलता मिलेगी?


🌿 (ततः प्रविशति प्रकृतिमाता)

👉 तभी प्रकृति माता प्रवेश करती हैं।


👩‍🦰 प्रकृतिमाता (सस्नेहम्)


8️⃣
भोः भोः प्राणिनः।
भोः भोः = हे! हे!, प्राणिनः = जीवो!
👉 हे प्राणियों!


9️⃣
यूयम् सर्वे एव मे सन्ततयः।
यूयम् = तुम सब, सर्वे एव = सभी ही, मे = मेरे, सन्ततयः = संतान हो।
👉 तुम सब तो मेरी ही संतान हो।


🔟
कथं मिथः कलह कुरूथ ?
कथं = क्यों, मिथः = आपस में, कलह = झगड़ा, कुरूथ = करते हो?
👉 तुम आपस में झगड़ा क्यों कर रहे हो?


1️⃣1️⃣
वस्तुतः सर्वे वन्यजीविनः अन्योन्याश्रिताः।
वस्तुतः = वास्तव में, सर्वे = सभी, वन्यजीविनः = वन में रहने वाले जीव, अन्योन्याश्रिताः = एक-दूसरे पर आश्रित हैं।
👉 वास्तव में सभी वन्य जीव एक-दूसरे पर निर्भर हैं।


1️⃣2️⃣
सदैव स्मरत —
सदैव = सदा, स्मरत = याद रखो —
👉 हमेशा याद रखो —


1️⃣3️⃣
ददाति प्रतिगृह्णाति, गुह्यम् आख्याति पृच्छति।
ददाति = देता है, प्रतिगृह्णाति = लेता है, गुह्यम् = रहस्य, आख्याति = बताता है, पृच्छति = पूछता है।
👉 जो देता है, लेता है, रहस्य कहता है और पूछता भी है,


1️⃣4️⃣
भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्‌विधं प्रीतिलक्षणम् ॥
भुङ्क्ते = स्वयं खाता है, भोजयते च = और दूसरों को खिलाता है, एव = ही, षड्विधं = यह छह प्रकार का, प्रीति-लक्षणम् = प्रेम का लक्षण है।
👉 स्वयं खाए, दूसरों को खिलाए, यह छह प्रकार का प्रेम का लक्षण है।


🐦 सर्वे प्राणिनः (समवेतस्वरेण)


1️⃣5️⃣
मातः! कथयतु भवती सर्वथा सम्यक्, परं वयं भवतीं न जानीमः। भवत्याः परिचयः कः ?
मातः = हे माता!, कथयतु = कहिए, भवती = आप, सर्वथा सम्यक् = बिल्कुल ठीक कह रही हैं, परं = परंतु, वयं = हम, भवतीं = आपको, न जानीमः = नहीं जानते, भवत्याः परिचयः कः = आपका परिचय क्या है?
👉 हे माता! आप बिल्कुल ठीक कह रही हैं, परंतु हम आपको नहीं जानते — आप कौन हैं?


🌿 प्रकृतिमाता उत्तर देती हैं


1️⃣6️⃣
अहं प्रकृतिः युष्माकं सर्वेषां जननी।
अहं = मैं, प्रकृतिः = प्रकृति हूँ, युष्माकं सर्वेषां = तुम सबकी, जननी = माता।
👉 मैं प्रकृति हूँ — तुम सबकी जननी।


1️⃣7️⃣
यूयं सर्वे एव मे प्रियाः।
यूयं सर्वे एव = तुम सब ही, मे = मेरे, प्रियाः = प्रिय हो।
👉 तुम सब मेरे ही प्रिय हो।


1️⃣8️⃣
सर्वेषामेव मत्कृते महत्त्वं विद्यते यथासमयम्।
सर्वेषामेव = सभी का ही, मत्कृते = मेरे कारण, महत्त्वं = महत्व, विद्यते = है, यथा-समयम् = उचित समय पर।
👉 सबका महत्व मेरे कारण है और समय आने पर सब उपयोगी हैं।


1️⃣9️⃣
न तावत् कलहेन समयं वृथा यापयन्तु।
न तावत् = इसलिए नहीं, कलहेन = झगड़े से, समयं = समय, वृथा = व्यर्थ, यापयन्तु = गँवाओ।
👉 इसलिए झगड़ों में अपना समय व्यर्थ मत करो।


2️⃣0️⃣
अपि तु मिलित्वा एव मेधध्वं जीवनं च रसमयं कुरुध्वम्।
अपि तु = बल्कि, मिलित्वा एव = मिलकर ही, मेधध्वं = कार्य करो, जीवनं च = और जीवन को, रसमयं = आनंदमय, कुरुध्वम् = बनाओ।
👉 बल्कि मिल-जुलकर कार्य करो और जीवन को आनंदमय बनाओ।


2️⃣1️⃣
तद्यथा कथितम् —
तद्यथा = जैसा कि, कथितम् = कहा गया है —
👉 जैसा कहा गया है—


2️⃣2️⃣
प्रजासुखे सुखं राज्ञः, प्रजानां च हिते हितम्।
प्रजा-सुखे = प्रजा के सुख में, सुखं राज्ञः = राजा का सुख है, प्रजानां च हिते = प्रजा के हित में, हितम् = राजा का हित है।
👉 राजा का सुख प्रजा के सुख में है, और उसका हित प्रजा के हित में।


2️⃣3️⃣
नात्मप्रियं हितं राज्ञः, प्रजानां तु प्रियं हितम्॥
न = नहीं, आत्मप्रियं = स्वयं का प्रिय, हितं राज्ञः = राजा का भला, प्रजानां तु = बल्कि प्रजा का ही, प्रियं = जो अच्छा लगे, हितम् = वही हित है।
👉 राजा का हित अपने स्वार्थ में नहीं, बल्कि प्रजा के सुख में निहित है।


2️⃣4️⃣
अपि च —
अपि च = और भी —
👉 और भी एक बात सुनो —


2️⃣5️⃣
अगाधजलसञ्चारी न गर्वं याति रोहितः।
अगाध-जल-सञ्चारी = गहरे जल में चलने वाला, न गर्वं याति = घमंड नहीं करता, रोहितः = मछली (रोहित मीन)।
👉 गहरे पानी में रहने वाली रोहित मछली घमंड नहीं करती।


2️⃣6️⃣
अङ्गुष्ठोदक-मात्रेण शफरी फुर्कुरायते॥
अङ्गुष्ठ-उदक-मात्रेण = अंगूठे जितने पानी में, शफरी = छोटी मछली, फुर्कुरायते = इतराती है / घमंड करती है।
👉 जबकि थोड़े से पानी में रहने वाली छोटी मछली अकड़ दिखाती है।


2️⃣7️⃣
अतः भवन्तः सर्वेऽपि शफरीवत् एकैकस्य गुणस्य चर्चा विहाय, मिलित्वा प्रकृतिसौन्दर्याय वनरक्षायै च प्रयतन्ताम्।
अतः = इसलिए, भवन्तः सर्वे अपि = आप सब भी, शफरीवत् = छोटी मछली जैसे, एकैकस्य गुणस्य = अपने-अपने गुण की, चर्चा विहाय = डींगें हाँकना छोड़कर, मिलित्वा = मिलकर, प्रकृति-सौन्दर्याय = प्रकृति के सौंदर्य के लिए, वन-रक्षायै च = और वन की रक्षा के लिए, प्रयतन्ताम् = प्रयत्न करें।
👉 इसलिए आप सब अपने-अपने गुणों की डींगें छोड़कर मिल-जुलकर प्रकृति के सौंदर्य और वन की रक्षा के लिए प्रयत्न करें।


🌿 सर्वे प्राणिनः (एकस्वरेण)


2️⃣8️⃣
सर्वे प्रकृतिमातरं प्रणमन्ति।
सर्वे = सभी, प्रकृति- मातरं = प्रकृति माता को, प्रणमन्ति = प्रणाम करते हैं।
👉 सब जीव प्रकृति माता को प्रणाम करते हैं।


2️⃣9️⃣
मिलित्वा दृढसंकल्पपूर्वकं च गायन्ति —
मिलित्वा = मिलकर, दृढ-संकल्प-पूर्वकं = दृढ़ निश्चय से, च = और, गायन्ति = गाते हैं —
👉 सब मिलकर दृढ़ निश्चय के साथ गाते हैं—


3️⃣0️⃣ (श्लोक)
प्राणिनां जायते हानिः परस्परविवादतः।
प्राणिनाम् = जीवों की, जायते = होती है, हानिः = हानि, परस्पर-विवादतः = आपसी झगड़े से।
👉 आपसी झगड़े से जीवों का नुकसान होता है।


3️⃣1️⃣
अन्योन्य-सहयोगेन लाभः तेषां प्रजायते॥
अन्योन्य-सहयोगेन = परस्पर सहयोग से, लाभः = लाभ, तेषां = उनका, प्रजायते = उत्पन्न होता है।
👉 और परस्पर सहयोग से उनका लाभ होता है।


🌺 अर्थ-सारांश:
यह पाठ हमें सिखाता है कि

“प्रकृति में सभी जीव एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
मिल-जुलकर रहना और सहयोग करना ही सच्चा सुख और सौहार्द है।” 🌿


बहुत अच्छा 👏
यह रहा “षष्ठः पाठः — सौहार्द प्रकृतेः शोभा” का
📘 संक्षिप्त सारांश (Summary in Simple Hindi)
और 🎯 मुख्य शिक्षाएँ (Moral Teachings)
जो परीक्षा में उपयोगी होंगी।


📖 अध्याय सारांश : “सौहार्द प्रकृतेः शोभा”

यह अध्याय हमें प्रकृति और प्राणियों के आपसी सौहार्द (मित्रता) की महत्ता सिखाता है।
कहानी एक जंगल के दृश्य से शुरू होती है जहाँ सिंह, वानर, गज, काक, बक, मयूर आदि सभी अपने-आपको “वनराज” (जंगल का राजा) बनने योग्य बताते हैं।
हर जीव अपने गुणों का घमंड करता है और दूसरों की कमियों पर हँसता है।
कोई कहता है – “मैं शक्तिशाली हूँ”, कोई कहता है – “मैं सुंदर हूँ”, कोई कहता है – “मैं ध्यानमग्न और बुद्धिमान हूँ”।
इसी बीच उल्लू (उलूक) को राजा बनाने की बात उठती है, जिस पर सब पक्षी हँसते हैं और झगड़ने लगते हैं।

तभी प्रकृति माता प्रकट होती हैं।
वह सब जीवों से कहती हैं कि –

“तुम सब मेरी संतान हो। आपस में झगड़ा मत करो।
तुम सभी एक-दूसरे पर निर्भर हो, मिल-जुलकर रहो और प्रकृति की शोभा बढ़ाओ।”

प्रकृति माता उन्हें समझाती हैं कि –

“राजा या कोई भी व्यक्ति तभी सफल होता है जब वह दूसरों के हित की सोचता है,
न कि केवल अपने स्वार्थ की।”

अंत में सभी जीव समझ जाते हैं कि परस्पर सहयोग ही सुख का आधार है,
और सब मिलकर गाते हैं –

“प्राणिनां जायते हानिः परस्पर विवादतः,
अन्योन्य सहयोगेन लाभः तेषां प्रजायते।”

(झगड़े से हानि होती है, सहयोग से लाभ होता है।)


🌿 मुख्य शिक्षाएँ / Moral Teachings

1️⃣ सभी जीव एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
2️⃣ प्रकृति में एकता और सहयोग ही सुंदरता है।
3️⃣ अहंकार से नहीं, विनम्रता से समाज में सम्मान मिलता है।
4️⃣ दूसरों के कल्याण में ही हमारा कल्याण है।
5️⃣ परस्पर झगड़े से हानि और सहयोग से लाभ होता है।
6️⃣ राजा या नेता को अपने स्वार्थ से पहले जनता का हित देखना चाहिए।
7️⃣ मिल-जुलकर रहने से ही जीवन सुखद और रसमय बनता है।
8️⃣ प्रकृति हमारी जननी है – हमें उसका सम्मान और संरक्षण करना चाहिए।


बहुत बढ़िया 👏
यह रहे “षष्ठः पाठः — सौहार्द प्रकृतेः शोभा” के
📄 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Important Questions & Answers in Hindi)
जो परीक्षा में बार-बार पूछे जाते हैं और विद्यार्थियों के लिए बहुत उपयोगी हैं।


✳️ महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Q&A)

Q.1. ‘सौहार्द प्रकृतेः शोभा’ पाठ का मुख्य संदेश क्या है?
Ans. इस पाठ का मुख्य संदेश यह है कि सभी जीव एक-दूसरे पर निर्भर हैं और परस्पर प्रेम, सहयोग तथा सौहार्द से ही प्रकृति की शोभा बनी रहती है।


Q.2. सिंह को वानर क्यों सताते थे?
Ans. वानर सिंह की पूँछ खींचकर, कान पकड़कर उसे परेशान करते थे और पेड़ों पर चढ़कर हँसते थे, जिससे सिंह क्रोधित हो जाता था।


Q.3. गज (हाथी) ने क्या कहा?
Ans. गज ने कहा कि वह विशालकाय, बलशाली और पराक्रमी है, इसलिए जंगल का राजा बनने के लिए वही सबसे योग्य है।


Q.4. वानर ने अपने योग्य होने का क्या कारण बताया?
Ans. वानर ने कहा कि वह सिंह और गज जैसे शक्तिशाली प्राणियों को भी छल से पराजित कर सकता है, इसलिए वह वनराज पद के लिए योग्य है।


Q.5. बक (बगुले) ने अपने को वनराज पद का अधिकारी क्यों बताया?
Ans. बक ने कहा कि वह शीतल जल में ध्यानमग्न होकर सभी के रक्षण के उपाय सोचता है, इसलिए वह राजा बनने योग्य है।


Q.6. मयूर ने अपने योग्य होने का क्या कारण बताया?
Ans. मयूर ने कहा कि उसका नृत्य प्रकृति की आराधना है और वह अपने सौंदर्य व नृत्य से शत्रुओं को आकर्षित करके वन से बाहर निकाल सकता है।


Q.7. काक (कौआ) ने उलूक (उल्लू) को राजा बनाने का विरोध क्यों किया?
Ans. कौए ने कहा कि उल्लू दिन में अंधा और भयानक मुख वाला है, जो पूरा दिन सोता है; ऐसा जीव किसी की रक्षा नहीं कर सकता।


Q.8. प्रकृति माता ने सभी जीवों को क्या शिक्षा दी?
Ans. प्रकृति माता ने कहा कि सभी जीव मेरी संतान हैं; आपस में झगड़ो मत, बल्कि मिल-जुलकर रहो और प्रकृति की शोभा बढ़ाओ।


Q.9. “प्रजासुखे सुखं राज्ञः…” श्लोक का अर्थ लिखिए।
Ans. राजा का सुख प्रजा के सुख में है और प्रजा के हित में ही राजा का हित निहित है।


Q.10. “प्राणिनां जायते हानिः परस्परविवादतः…” श्लोक का भावार्थ लिखिए।
Ans. आपसी झगड़े से जीवों की हानि होती है और परस्पर सहयोग से उनका लाभ होता है।


Q.11. प्रकृति माता ने किस उदाहरण से जीवों को समझाया?
Ans. उन्होंने मछलियों का उदाहरण देकर बताया कि गहरे जल में रहने वाली बड़ी मछली घमंड नहीं करती, पर छोटी मछली थोड़े से पानी में अकड़ दिखाती है।


Q.12. पाठ का उपसंहार किस भावना के साथ होता है?
Ans. पाठ का अंत सभी जीवों के मिलकर प्रकृति माता को प्रणाम करने और आपसी सहयोग से जीवन को सुखमय बनाने की भावना के साथ होता है।


🌿 परीक्षा के लिए टिप:

“प्रकृति माता की शिक्षा” और “अंतिम श्लोक” दो सबसे महत्वपूर्ण अंश हैं,
जिनका अर्थ लिखने या समझाने का प्रश्न बार-बार आता है।


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