प्रारंभिक दिल्ली सुल्तानों के प्रशासनिक और आर्थिक सुधार

प्रारंभिक दिल्ली सुल्तानों के प्रशासनिक और आर्थिक सुधार


प्रारंभिक दिल्ली सुल्तानों के प्रशासनिक और आर्थिक सुधार

I. कुतुबुद्दीन ऐबक (Qutubuddin Aibak) (1206–1210 ई.)

कुतुबुद्दीन ऐबक मामलुक वंश (गुलाम वंश) का संस्थापक और उत्तरी भारत में पहले स्वतंत्र तुर्की राज्य का संस्थापक था।

प्रशासनिक और राजनीतिक उपाय:

  • तुर्की शासन की नींव: उसने ‘सुल्तान’ की उपाधि धारण की और दिल्ली में तुर्की साम्राज्य स्थापित किया।
  • राजधानी: ऐबक ने लाहौर को राजधानी बनाया।
  • न्याय और व्यवस्था: उसने न्याय के महत्व पर जोर दिया और पूरे सल्तनत में व्यवस्था बनाए रखी (नोट: स्रोतों में ऐबक के बारे में विशेष विवरण सीमित हैं)।

आर्थिक और राजकोषीय उपाय:

  • मुद्रा: ऐबक ने सोने, चांदी, बिल्लन और तांबे के सिक्के जारी किए।
  • वह अपनी उदारता के कारण ‘लाख बख्श’ (लाखों का दाता) के नाम से जाना जाता था (पिछली चर्चा पर आधारित)।
  • उसने अब्बासी खलीफा का नाम सिक्कों पर अंकित करने की प्रथा को त्याग दिया।

II. इल्तुतमिश (Iltutmish) (1211–1236 ई.)

शम्स उद्-दीन इल्तुतमिश को भारत में तुर्की शासन का वास्तविक संस्थापक और सुदृढ़ीकरणकर्ता माना जाता है। उसने राजधानी को लाहौर से दिल्ली स्थानांतरित किया।

प्रशासनिक और राजनीतिक सुधार:

  • इक्ता प्रणाली (Iqta System): उसने इक्ता प्रणाली का आयोजन किया। इक्ता राजस्व का एक कार्य था जो सुल्तान की इच्छानुसार मुक्ति को सौंपा जाता था। इस प्रणाली ने राजनीतिक संरचना की एकता को खतरे में डाले बिना राजस्व संग्रह और वितरण के कार्यों को जोड़ा।
  • अभिजात वर्ग का निर्माण: उसने चहलगानी (चालीस तुर्की सैन्य नेताओं का एक समूह) नामक गुलामों के एक आधिकारिक अभिजात वर्ग की स्थापना की।
  • प्रशासनिक केंद्रीकरण: इल्तुतमिश के काल में प्रशासन को केंद्रीकृत करने की प्रक्रिया शुरू हुई और मजबूत हुई।

आर्थिक और मुद्रा सुधार:

  • मुद्रा का मानकीकरण: इल्तुतमिश को दिल्ली सल्तनत की मुद्रा प्रणाली को मानकीकृत करने का श्रेय दिया जाता है।
  • उसने चांदी का टंका (जो मध्यकालीन भारत में एक मानक सिक्का बन गया) और तांबे का जीतल जारी किया।
  • उत्तरी भारत में एक चांदी का टंका 48 जीतल के बराबर माना जाता था। सल्तनत की स्थापना के बाद सोने, चांदी और तांबे के सिक्कों की बड़े पैमाने पर ढलाई हुई, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के मुद्रीकरण की एक प्रक्रिया थी।

III. गयासुद्दीन बलबन (Ghiyas-ud-din Balban) (1266–1287 CE)

बलबन के सुधार मुख्य रूप से सुल्तान के अधिकार और प्रतिष्ठा को बहाल करने पर केंद्रित थे, जो इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद गिर गए थे।

प्रशासनिक और राजनीतिक सुधार:

  • चहलगानी का दमन: सल्तनत की स्थिरता में उनका सबसे बड़ा योगदान चहलगानी (चालीस के समूह) की शक्ति को तोड़ना था।
  • शक्तिशाली सेना: उसने आंतरिक अशांति और मंगोलों की जाँच के लिए एक मजबूत केंद्रीकृत सेना का निर्माण किया।
  • राजत्व का सिद्धांत: बलबन ने राजशाही की श्रेष्ठता और ईश्वरीय अनुग्रह को सिद्ध करने के लिए फ़ारसी दरबार के मॉडल से प्रभावित होकर सिजदा (सम्राट के सामने साष्टांग प्रणाम) और पैबोस (सम्राट के पैर चूमना) जैसे औपचारिक अभिवादन शुरू किए।
  • सैन्य विभाग: उसने सैन्य विभाग दीवान-ए-अर्ज़ की स्थापना की (पिछली चर्चा के आधार पर, हालाँकि नए स्रोतों में इसका उल्लेख नहीं है)।

IV. अलाउद्दीन खिलजी (Alauddin Khalji) (1296–1316 CE)

अलाउद्दीन खिलजी ने सल्तनत काल के सबसे व्यापक प्रशासनिक और आर्थिक सुधार लागू किए।

प्रशासनिक और राजनीतिक सुधार:

  • धर्म और राजनीति का पृथक्करण: वह धर्म को राजनीति से अलग करने वाला पहला तुर्की सुल्तान था (पिछली चर्चा के आधार पर “Kingship knows no Kinship” का अनुवाद)।
  • गुप्तचर प्रणाली: उसने जासूसी प्रणाली को पुनर्गठित किया, जिससे वह अमीरों की गतिविधियों की निगरानी कर सके (पिछली चर्चा के आधार पर)।
  • अमीरों पर नियंत्रण: उसने धार्मिक बंदोबस्त और भूमि के मुफ्त अनुदानों (इनाम और वक्फ) को जब्त करने का आदेश दिया।

सैन्य और आर्थिक सुधार:

  • राजस्व प्रणाली: उसने भू-राजस्व (खराज) को उपज के आधे (50%) के रूप में लगाया, जो उत्तरी भारत के एक बड़े क्षेत्र में लागू किया गया। यह कर भारत के कृषि इतिहास में उच्चतम दरों में से एक था।
  • भूमि की माप: उसने राजस्व को भूमि क्षेत्र के अनुपात में तय करने के लिए भूमि की माप (मसाहत) का आदेश दिया।
  • बिचौलियों का उन्मूलन: उसने राजस्व एकत्र करने से बिचौलिए ग्राम प्रमुखों (खूत, मुकद्दम, चौधरी) को हटा दिया। उसके कृषि संबंधी उपायों ने स्वाभाविक रूप से गाँव के मुखियाओं को प्रभावित किया।
  • खालिसा क्षेत्र का विस्तार: उसने शाही खजाने (खालिसा) के क्षेत्र का काफी विस्तार किया।
  • नए कर: उसने एक गृह कर (घरी) और एक चरागाह कर (चराई) लगाया।
  • बाजार नियंत्रण नीति: खिलजी की बाजार नियंत्रण नीति का मुख्य उद्देश्य सैनिकों के कम वेतन पर एक बड़ी सेना बनाए रखना था।
  • मूल्य निर्धारण: उसने लगभग सभी आवश्यक वस्तुओं के मूल्य निर्धारित किए।
    • उदाहरण के लिए, गेहूँ 7.5 जीतल प्रति मन, जौ 4 जीतल प्रति मन, चावल 5 जीतल प्रति मन, चना 5 जीतल प्रति मन और उड़द (Mash) 5 जीतल प्रति मन निर्धारित किया गया।
  • अनाज का नियंत्रण: उसने डोआब (Doab) और अन्य क्षेत्रों के मजिस्ट्रेटों और संग्राहकों (शाहनागन और मुत्सरीफान) को निर्देश दिया कि वे किसानों को तुरंत खेत के किनारे पर ही उपज बेचने के लिए बाध्य करें या तुरंत राजस्व एकत्र करें।

इस अवधि के दौरान, मुद्रा अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जो मुख्य रूप से सुल्तानों द्वारा लागू की गई नीतियों का परिणाम था।

नोट: अलाउद्दीन खिलजी के बाजार नियंत्रण ने व्यापार पर नियंत्रण सुनिश्चित किया, और इब्न बतूता के अनुसार, उसने चार केंद्रीकृत सरकारी बाजार स्थापित किए।

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