भारत की मिट्टियाँ: प्रकार, वितरण और विशेषताएँ (Soil Types, Distribution and Characteristics): विस्तृत नोट्स
1. मृदा की परिभाषा एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Introduction & Historical Context)
(क) मृदा की संकल्पना (Concept of Soil)
मृदा (Soil) भूपर्पटी की सबसे ऊपरी असंगठित, पतली और सक्रिय परत है, जो मूल चट्टानों के अपक्षय (Weathering), खनिजों, जैविक पदार्थों (ह्यूमस), जल और वायु के जटिल भौतिक-रासायनिक मिश्रण से बनती है। यह पृथ्वी पर जीवन का आधार है और पादप जगत के विकास के लिए पोषक तत्व प्रदान करती है।
(ख) मृदा के रासायनिक गुण – pH मान (Chemical Properties – pH Value)
मृदा की रासायनिक प्रकृति फसलों के विकास और पोषक तत्वों की उपलब्धता को सीधे निर्धारित करती है। रासायनिक दृष्टिकोण से मृदा को तीन भागों में विभाजित किया जाता है:
- अम्लीय मृदा (Acidic Soil): जिसका pH मान 7 से कम (pH < 7) होता है। अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में निक्षालन के कारण मिट्टी अम्लीय हो जाती है।
- उदासीन मृदा (Neutral Soil): जिसका pH मान 7 के बराबर होता है।
- क्षारीय मृदा (Alkaline Soil): जिसका pH मान 7 से अधिक (pH > 7) होता है। शुष्क व अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में केशिक क्रिया (Capillary Action) के कारण लवण सतह पर आ जाते हैं।
- अनुकूलतम मान: कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, अधिकांश खाद्यान्न फसलों के संतुलित और सर्वोत्तम विकास के लिए 6.5 pH मान वाली मिट्टी को सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है।
(ग) भारतीय मृदा के वर्गीकरण का इतिहास (History of Soil Classification)
- प्रारंभिक वैज्ञानिक प्रयास: भारत में मिट्टी का पहला वैज्ञानिक वर्गीकरण जॉन ऑगस्टस वोएल्कर (1893) तथा लेदर (1898) द्वारा किया गया था, जिन्होंने भारतीय मृदाओं को मुख्य रूप से 4 श्रेणियों (जलोढ़, काली, लाल और लैटेराइट) में विभाजित किया था।
- ICAR का प्रामाणिक वर्गीकरण: स्वतंत्रता के पश्चात, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने वर्ष 1953 में ‘अखिल भारतीय भूमि उपयोग तथा मृदा सर्वेक्षण संगठन’ की स्थापना की। इस संगठन ने देश की भौगोलिक, भूगर्भीय और जलवायुविक विविधताओं के आधार पर भारतीय मिट्टियों को 8 प्रमुख व्यापक श्रेणियों में वर्गीकृत किया, जो आज भी सर्वाधिक प्रामाणिक माना जाता है।
2. भारत की मिट्टियों का विस्तृत वर्गीकरण (Detailed Classification of Indian Soils)
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा वर्गीकृत भारत की 8 प्रमुख मिट्टियों का विस्तृत विवरण निम्नलिखित है:
(क) जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil) [कुल क्षेत्रफल: ~43.36% से 45.6%]
यह भारत का सबसे विस्तृत, महत्वपूर्ण और उपजाऊ मृदा समूह है, जो उत्तर भारत के विशाल मैदान और तटीय मैदानी भागों को आच्छादित करता है।
- उत्पति व निर्माण: इसका निर्माण मुख्य रूप से नदियों (सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र और उनकी सहायक नदियों) द्वारा पहाड़ी क्षेत्रों से काटकर लाए गए जलोढ़ अवसादों और तटीय भागों में समुद्री लहरों के निक्षेपण (Deposition) से हुआ है।
- भौगोलिक उप-विभाग: इसे क्षेत्रीय स्थिति के आधार पर नदीय जलोढ़, तटीय जलोढ़, डेल्टाई जलोढ़ और पर्वतों के गिरिपद क्षेत्र में तराई मिट्टी के रूप में विभाजित किया जाता है।
- रासायनिक विशेषताएं: रासायनिक रूप से इस मिट्टी में पोटाश और चूने की प्रचुरता पाई जाती है, परंतु नाइट्रोजन, फास्फोरस और जैविक पदार्थों (ह्यूमस) की भारी कमी होती है।
- अनुकूल फसलें: धान (चावल), गेहूँ, गन्ना, तंबाकू, जूट, कपास, मक्का और विभिन्न तिलहन व दलहन फसलें।
* बांगर और खादर में तुलनात्मक अंतर (Comparison Table):
विश्वविद्यालय परीक्षा में अक्सर इन दोनों के बीच का अंतर पूछा जाता है:
| लक्षण / आधार | बांगर (Bhangar) | खादर (Khadar) |
|---|---|---|
| मृदा की आयु | यह पुरानी जलोढ़ मिट्टी (Older Alluvium) है। | यह नवीन जलोढ़ मिट्टी (Newer Alluvium) है। |
| बाढ़ का प्रभाव | यह मैदान का उच्च भाग है, जहाँ प्रतिवर्ष बाढ़ का पानी नहीं पहुँच पाता। | यह नदी के निकट का निचला मैदान है, जो प्रतिवर्ष बाढ़ के पानी से डूब जाता है। |
| संरचना व तत्व | इसमें चूनेदार कंकड़ों (कैल्शियम कार्बोनेट ग्रंथियों) की प्रचुरता होती है। | यह अत्यधिक बारीक, बलुई, गाद युक्त और चिकनी (Clayey) मिट्टी है। |
| प्राकृतिक उपजाऊपन | यह अपेक्षाकृत कम उपजाऊ होती है; इसमें सघन कृषि हेतु रासायनिक खादों की आवश्यकता होती है। | यह अत्यधिक उपजाऊ होती है। बाढ़ के पानी के साथ हर वर्ष नई परत जमा होने से इसका प्राकृतिक नवीनीकरण होता रहता है। |
(ख) काली या रेगुर मिट्टी (Black or Regur Soil) [कुल क्षेत्रफल: ~15%]
इस मिट्टी को इसकी विशिष्टताओं के कारण ‘रेगुर’ (Regur), ‘कपास मृदा’ (Black Cotton Soil) और ‘उष्णकटिबंधीय चेरनोजम’ भी कहा जाता है।
- उत्पत्ति व निर्माण: इसका निर्माण मुख्य रूप से क्रेटेशियस काल (Cretaceous Period) में हुए दरारी ज्वालामुखी विस्फोट से निकले बेसाल्टिक लावा चट्टानों के अपक्षय (विखंडन) से हुआ है।
- भौगोलिक विस्तार: यह मुख्यतः दक्कन के लावा पठार पर पाई जाती है, जिसके अंतर्गत महाराष्ट्र (सर्वाधिक), गुजरात का काठियावाड़, मध्य प्रदेश का मालवा पठार, उत्तरी कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्से शामिल हैं।
- भौतिक विशेषताएं:
- इसके कण अत्यधिक महीन (चिकनी या क्ले युक्त) होते हैं।
- इसकी जल धारण क्षमता (Water Retention Capacity) सर्वाधिक होती है। गीली होने पर यह चिपचिपी और फूल जाती है।
- शुष्क ऋतु में नमी समाप्त होने पर यह अत्यधिक सिकुड़ जाती है, जिससे इसमें गहरी और चौड़ी दरारें पड़ जाती हैं। इन दरारों के कारण हवा मृदा की गहराई तक प्रवेश कर जाती है, जिसे ‘स्वतः जुताई वाली मिट्टी’ (Self-Ploughing Soil) कहा जाता है।
- रासायनिक विशेषताएं: यह लोहा, चूना, कैल्शियम, पोटाश, एल्युमिनियम और मैग्नीशियम कार्बोनेट से समृद्ध होती है, परंतु इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस और ह्यूमस की भारी कमी पाई जाती है। इसका काला रंग ‘टिटेनीफेरस मैग्नेटाइट’ और लौह-यौगिकों की उपस्थिति के कारण होता है।
- अनुकूल फसलें: कपास (Cotton), सोयाबीन, ज्वार, अलसी, खट्टे फल (संतरा, नींबू) और तंबाकू।
(ग) लाल और पीली मिट्टी (Red and Yellow Soil) [कुल क्षेत्रफल: ~18.5% से 28%]
यह प्रायद्वीपीय भारत के कम वर्षा वाले क्षेत्रों में विकसित होने वाला दूसरा सबसे बड़ा मृदा समूह है।
- उत्पत्ति व निर्माण: इसका निर्माण प्राचीन रवेदार आग्नेय और रूपांतरित चट्टानों (जैसे ग्रेनाइट, नीस और शिस्ट) के विखंडन और अपक्षय से हुआ है।
- रंग का कारण: इस मिट्टी का लाल रंग इसमें मौजूद फेरिक ऑक्साइड (लोहे के ऑक्साइड) के फैलाव के कारण होता है। जब यह मिट्टी जलियोजित (Hydrated / जल के संपर्क में) अवस्था में होती है, तो यह पीली दिखाई देती है।
- भौगोलिक विस्तार: इसका सर्वाधिक विस्तार तमिलनाडु में पाया जाता है। इसके अतिरिक्त यह कर्नाटक, दक्षिणी आंध्र प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड (छोटा नागपुर पठार) और दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में विस्तृत है।
- रासायनिक व भौतिक गुण: यह प्रकृति में सामान्यतः अम्लीय होती है। इसमें लोहा, सिलिका और पोटाश प्रचुर मात्रा में होते हैं, परंतु नाइट्रोजन, फास्फोरस, चूना और ह्यूमस की अत्यधिक कमी होती है।
- अनुकूल फसलें: बाजरा, ज्वार, मूंगफली, आलू, तंबाकू और दलहनी फसलें (दालें)।
(घ) लैटेराइट मिट्टी (Laterite Soil) [कुल क्षेत्रफल: ~2.62% से 4.30%]
- शब्दोत्पत्ति: ‘लैटेराइट’ शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द ‘Later’ से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘ईंट’ (Brick) होता है। इस मिट्टी का सर्वप्रथम वैज्ञानिक अध्ययन एफ. बुकानन द्वारा वर्ष 1905 में किया गया था।
- उत्पत्ति व निर्माण: यह मिट्टी अत्यधिक वर्षा (200 सेमी से अधिक) और उच्च तापमान वाले उष्णकटिबंधीय मानसूनी क्षेत्रों में विकसित होती है। भारी वर्षा के कारण मिट्टी की ऊपरी परत से सिलिका और चूना छनकर नीचे की परतों में चले जाते हैं, जिसे तीव्र निक्षालन (Leaching) प्रक्रिया कहते हैं। सतह पर केवल लोहे और एल्युमिनियम के हाइड्रेटेड ऑक्साइड ही शेष बच जाते हैं।
- भौगोलिक विस्तार: यह मुख्य रूप से पश्चिमी घाट के पर्वतीय क्षेत्रों (केरल, कर्नाटक, कोंकण तट), पूर्वी घाट, ओडिशा, मेघालय की पहाड़ियों और असम के पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है।
- विशेषताएं: यह सूखने पर ईंट के समान अत्यधिक कठोर हो जाती है। यह अत्यधिक अम्लीय (कम pH मान वाली) होती है। इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस, चूना, पोटाश और मैग्नीशियम की भारी कमी पाई जाती है।
- अनुकूल फसलें: काजू (Cashew – जिसके लिए यह सर्वोत्तम है), चाय, कॉफी, रबर, नारियल और सिनकोना।
(ङ) शुष्क एवं मरुस्थलीय मिट्टी (Arid and Desert Soil) [कुल क्षेत्रफल: ~4.30%]
यह पश्चिमी भारत के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों की विशिष्ट मिट्टी है।
- उत्पत्ति व विशेषताएं: तीव्र वाष्पीकरण, अत्यधिक उच्च तापमान और न्यून वर्षा के कारण इस मिट्टी में नमी और जैविक पदार्थों (ह्यूमस) का पूर्णतः अभाव होता है।
- भौतिक व रासायनिक गुण: इसकी बनावट रेतीली से बजरी युक्त होती है। इसमें घुलनशील लवणों और फॉस्फेट की प्रचुरता होती है, परंतु नाइट्रोजन व कार्बनिक तत्वों की भारी कमी होती है। इसका pH मान 7.2 से 9.2 के मध्य होता है (अर्थात यह अत्यधिक क्षारीय होती है)। इस मिट्टी की निचली परतों में कैल्शियम (चूने के कंकर) की मात्रा बढ़ती जाती है, जिससे जल का नीचे की ओर रिसाव अवरुद्ध हो जाता है।
- भौगोलिक विस्तार: पश्चिमी राजस्थान (थार मरुस्थल), उत्तरी गुजरात (कच्छ का रण), दक्षिणी पंजाब और हरियाणा के अर्ध-शुष्क भाग।
- अनुकूल फसलें: मोटे अनाज जैसे—बाजरा, ज्वार, जौ, मूंग, ग्वार और मोठ। आधुनिक सिंचाई सुविधाओं (जैसे इंदिरा गांधी नहर) के सहारे इसमें गेहूँ, कपास और सरसों की भी अच्छी पैदावार ली जा रही है।
(च) पर्वतीय या वन मिट्टी (Mountain and Forest Soil) [कुल क्षेत्रफल: ~7.94% से 8.67%]
यह मिट्टी मुख्यतः पहाड़ी ढलानों और सघन वनों वाले पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाती है।
- भौतिक विशेषताएं: तीव्र ढालों पर होने के कारण इस मिट्टी की परत बहुत पतली होती है और इसकी मृदा परिच्छेदिका (Soil Profile) पूरी तरह विकसित नहीं हो पाती। यह अपरदन (Erosion) के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होती है।
- रासायनिक विशेषताएं: जंगलों के पेड़-पौधों की पत्तियों के सड़ने-गलने के कारण इसमें जैविक पदार्थ (ह्यूमस) प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, परंतु फास्फोरस, पोटाश और चूने जैसे खनिज पोषक तत्वों की भारी कमी होती है।
- भौगोलिक विस्तार: हिमालयी राज्य और केंद्रशासित प्रदेश (जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश) तथा पश्चिमी घाट और नीलगिरी की ढलानें।
- अनुकूल फसलें: सेब, नाशपाती, आड़ू, चाय, कॉफी और मसाले। कश्मीर की घाटी में पाई जाने वाली विशेष पर्वतीय मिट्टी जिसे ‘करेवा’ (Karewa) कहा जाता है, विश्व प्रसिद्ध केसर (जाफरान) की खेती के लिए अत्यंत अनुकूल है।
(छ) लवणीय तथा क्षारीय मिट्टी (Saline and Alkaline Soil) [कुल क्षेत्रफल: ~1.29%]
इसे स्थानीय भाषाओं में ‘रेह’, ‘कल्लर’, ‘ऊसर’, ‘चौपान’ या ‘कार्ल’ के नामों से भी जाना जाता है।
- उत्पत्ति व निर्माण: अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में अत्यधिक सिंचाई, जलभराव (Water Logging) और दोषपूर्ण कृषि पद्धतियों के कारण भूमि के नीचे के लवण केशिक क्रिया (Capillary Action) द्वारा धरातल पर आ जाते हैं। इससे सफेद सोडियम, कैल्शियम और मैग्नीशियम लवणों की एक पतली परत मिट्टी के ऊपर जमा हो जाती है।
- भौगोलिक विस्तार: पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और गुजरात के शुष्क भागों में इसका विस्तार लगातार बढ़ रहा है।
- उपचार व सुधार: इस मिट्टी को कृषि योग्य बनाने के लिए खेतों में जिप्सम (Gypsum) और चूने (Lime) का छिड़काव किया जाता है। सुधार के पश्चात इसमें धान, जौ, चुकंदर और लवण-सहिष्णु फसलों की खेती की जा सकती है।
(ज) पीट और दलदली मिट्टी (Peaty and Marshy Soil) [कुल क्षेत्रफल: ~2.17%]
- उत्पत्ति व विशेषताएं: यह मिट्टी अत्यधिक वर्षा, उच्च आर्द्रता और जलभराव वाले क्षेत्रों में भारी मात्रा में जैविक पदार्थों (ह्यूमस) के सड़ने-गलने और संचय से बनती है।
- भौतिक-रासायनिक गुण: यह गहरे काले रंग की, अत्यंत भारी और अत्यधिक अम्लीय प्रकृति (pH मान 3.5 से 4 के मध्य) वाली होती है। इसमें लवणों की मात्रा बहुत अधिक होती है। ह्यूमस की प्रचुरता (लगभग 40-50%) होती है, परंतु पोटाश और फास्फेट की भारी कमी पाई जाती है।
- भौगोलिक विस्तार: पश्चिम बंगाल का सुंदरवन डेल्टा, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के तटीय दलदली क्षेत्र, बिहार का उत्तरी भाग और केरल का दक्षिणी भाग (जहाँ इसे स्थानीय रूप से ‘कायल’ या ‘कर्री’ कहा जाता है)।
- अनुकूल फसलें: धान (चावल), जूट की खेती और मैंग्रोव (ज्वारीय) वनस्पति के विकास के लिए यह सर्वोत्तम मानी जाती है।
3. भारतीय मिट्टियों की मुख्य समस्याएं एवं संरक्षण (Soil Degradation & Conservation)
भारतीय कृषि व्यवस्था के समक्ष मृदा अवकर्षण (Soil Degradation) एक बहुत बड़ी चुनौती है, जिसे निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत समझा जा सकता है:
(क) मृदा अपरदन (Soil Erosion) – ‘रेंगती हुई मृत्यु’
- संकल्पना: प्राकृतिक कारकों (जल, वायु) या मानवीय हस्तक्षेप द्वारा मिट्टी की उपजाऊ ऊपरी परत का कटकर बह जाना या उड़ जाना ‘मृदा अपरदन’ कहलाता है। मृदा अपरदन को कृषि की ‘रेंगती हुई मृत्यु’ (Creeping Death) कहा जाता है, क्योंकि यह अत्यंत धीमी गति से उपजाऊ भूमि को बंजर बना देता है।
- अवनलिका अपरदन (Gully Erosion): तीव्र गति से बहते जल द्वारा मिट्टी में गहरी खाइयाँ या नालियाँ बना दी जाती हैं। भारत में मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमा पर बहने वाली चंबल नदी का बेसिन अवनलिका अपरदन का सबसे भयानक उदाहरण है, जिसे ‘चंबल के बीहड़’ (Chambal Badlands / Ravines) कहा जाता है।
(ख) मृदा अवकर्षण (Soil Degradation)
अत्यधिक रासायनिक खादों के प्रयोग, लवणीकरण (Salinization) और अनियंत्रित चराई के कारण उपजाऊ मिट्टी धीरे-धीरे बंजर और मरुस्थलीय भूमि में परिवर्तित हो रही है।
(ग) मृदा संरक्षण के वैज्ञानिक उपाय (Soil Conservation Methods)
मृदा की उर्वरता बनाए रखने और कटाव को रोकने के लिए निम्नलिखित वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाया जाना आवश्यक है:
- समोच्च रेखीय जुताई (Contour Farming): पर्वतीय ढलानों पर ढाल के विपरीत आड़ी जुताई करना जिससे जल प्रवाह धीमा हो सके।
- पट्टिका कृषि (Strip Cropping): ढालू भूमि पर फसलों को पट्टियों (Strips) में उगाना ताकि बहते पानी की गति रोकी जा सके।
- रक्षक मेखला (Shelter Belts): शुष्क और मरुस्थलीय क्षेत्रों में खेतों की सीमाओं पर पेड़ों और झाड़ियों की कतारें लगाना ताकि तेज हवाएं उपजाऊ मिट्टी को उड़ाकर न ले जा सकें।
- फसल चक्रण (Crop Rotation): भूमि की प्राकृतिक नाइट्रोजन क्षमता को बनाए रखने के लिए लगातार एक ही फसल उगाने के स्थान पर खाद्यान्न फसलों के बीच में दलहनी फसलों (जैसे चना, मूंग, सोयाबीन) को उगाना।
(घ) प्रमुख सरकारी प्रयास
- मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (Soil Health Card Scheme): वर्ष 2015 में शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य किसानों को उनके खेत की मिट्टी के पोषक तत्वों की जांच कर संतुलित मात्रा में उर्वरक उपयोग करने हेतु मार्गदर्शन देना है (नारा: “स्वस्थ धरा, खेत हरा”)।
- परंपरागत कृषि विकास योजना: देश में रासायनिक खादों के स्थान पर जैविक खेती (Organic Farming) और प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा देना।
4. विश्वविद्यालय परीक्षा हेतु विशेष मार्गदर्शन (Exam Tips)
छात्र मुख्य परीक्षा में उत्कृष्ट अंक प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित रणनीतियों का पालन करें:
- मानचित्र अंकन (Map Work): दीर्घ-उत्तरीय (निबंधात्मक) प्रश्नों के उत्तर में भारत का एक सुंदर और स्पष्ट आउटलाइन मानचित्र अवश्य बनाएं। मानचित्र में 8 प्रमुख मिट्टियों के भौगोलिक वितरण को अलग-अलग शेडिंग या प्रतीकों द्वारा प्रदर्शित करें।
- प्रतिशत व आंकड़ों को हाईलाइट करना: उत्तर लिखते समय प्रत्येक मिट्टी के कुल क्षेत्रफल का प्रतिशत (जैसे: जलोढ़ ~43.36%, काली ~15%, लाल ~18.5%-28%) और रासायनिक तत्वों की प्रचुरता/कमी को काले पेन से अंडरलाइन करें।
- तुलनात्मक अंतर के लिए तालिका: परीक्षा में ‘बांगर और खादर’ में अंतर पूछे जाने पर हमेशा ऊपर नोट्स में दी गई तुलनात्मक तालिका के प्रारूप का ही उपयोग करें। इससे परीक्षक पर उत्कृष्ट प्रभाव पड़ता है और पूर्ण अंक मिलते हैं।