🚩 मारवाड़ का उत्थान: राठौड़ों का प्रारंभिक इतिहास, राव जोधा, मालदेव और महाराजा जसवंत सिंह प्रथम 🚩
“मरुधरा के इतिहास का वो महागाथा-काव्य, जिसने अपने शौर्य, अटल स्वाभिमान और खड़ग के प्रहार से मुगल सल्तनत और दिल्ली दरबार को बार-बार झुकने पर मजबूर कर दिया!” ⚔️✨
यदि आप UPSC, RPSC (RAS), REET, Patwar, First Grade या राजस्थान की किसी भी प्रशासनिक परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, या मरुधरा के इस गौरवशाली, वीरगाथा से ओत-प्रोत इतिहास को उसकी सम्पूर्ण गहराइयों और बारिकियों से समझना चाहते हैं, तो यह अत्यंत प्रामाणिक, विस्तृत और व्यापक नोट्स (Comprehensive Study Material) विशेष रूप से आपके लिए तैयार किए गए हैं।
🔍 1. राठौड़ शब्द की व्युत्पत्ति और प्रारंभिक इतिहास
🔹 क) शब्द की व्युत्पत्ति एवं कुल परंपरा
- ‘राष्ट्रकूट’ से राठौड़: भाषाई, अभिलेखीय और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार ‘राठौड़’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘राष्ट्रकूट’ शब्द से हुई है [30, 65]। प्राकृत में यह ‘रठ्ठउड़’ और कालांतर में ‘राठौड़’ बना।
- कुलदेवी और आराध्य देवी:
- मारवाड़ के राठौड़ राजवंश की कुलदेवी नागणेची माता (चक्रेश्वरी देवी) हैं, जिनकी 18 भुजाओं वाली काष्ठ (लकड़ी) की मूर्ति कर्नाटक से लाई गई थी [65]।
- इस राजवंश की आराध्य देवी चामुंडा माता हैं, जिनका मुख्य मंदिर मेहरानगढ़ दुर्ग में स्थित है [65]。
🔹 ख) उत्पत्ति के संबंध में विभिन्न ऐतिहासिक मत
राठौड़ों की उत्पत्ति के विषय में इतिहासकारों और चारण ख्यातों में गहरा मतभेद है:
- कन्नौज का संबंध (गहड़वाल मत): जोधपुर राज्य की ख्यात, मुहणोत नैणसी री ख्यात और कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार, मारवाड़ के राठौड़ कन्नौज के अंतिम प्रसिद्ध गहड़वाल शासक जयचंद के वंशज हैं [13, 19, 65]। 1194 ई. में चंदावर के युद्ध में मुहम्मद गौरी द्वारा जयचंद की पराजय के बाद उनके पौत्र राव सीहा राजपूताना की ओर आए [13, 19, 65]।
- सूर्यवंशी मत: जोधपुर की राजकीय ख्यातों और महाकवि जोधराज कृत ‘हम्मीर रासो’ में राठौड़ों को सूर्यवंशी माना गया है तथा इन्हें भगवान राम के पुत्र कुश का वंशज बताया गया है [65]।
- दक्षिण के राष्ट्रकूट मत: आधुनिक इतिहासकार डॉ. जी.एच. ओझा (गौरिशंकर हीराचंद ओझा) का मानना है कि मारवाड़ के राठौड़ कन्नौज के गहड़वालों से भिन्न थे और वे वास्तव में दक्षिण भारत के राष्ट्रकूटों के वंशज थे [19, 65]।
🔹 ग) कन्नौज से मारवाड़ आगमन: राव सीहा (1243-1273 ई.)
- संस्थापक/आदिपुरुष: राव सीहा (सेतराम के पुत्र और जयचंद के पौत्र) को मारवाड़ के राठौड़ राजवंश का मूलपुरुष, आदिपुरुष या संस्थापक स्वीकार किया जाता है [19, 65]।
- पाली को बनाया प्रथम केंद्र: 1240 ई. के आसपास, पालीवाल ब्राह्मणों ने पश्चिमी मरुधरा में भीलों, मीणों और मुस्लिम लुटेरों के अत्याचारों से तंग आकर राव सीहा से रक्षा की गुहार लगाई [19, 65]। राव सीहा ने भीनमाल को आक्रांताओं से मुक्त कराया और पाली को अपना पहला प्रमुख सैन्य व राजनीतिक केंद्र बनाया [65]।
- ‘राव’ की उपाधि: उन्होंने पाली के समीप ‘खोर’ नामक स्थान पर अधिकार कर वहाँ के कबीलाई सरदारों को पराजित किया और स्वयं को ‘राव’ के रूप में स्थापित किया [19, 65]।
- बीठू गाँव का लेख (1273 ई.) और बलिदान: पाली के निकट बीठू गाँव में राव सीहा का स्मारक पत्थर (देवल) स्थित है [65]। इस लेख (1273 ई.) के अनुसार, राव सीहा ने गायों और ब्राह्मणों की रक्षा करते हुए सिंध के मुस्लिम लुटेरों के विरुद्ध ‘लाख झंवर’ के भीषण युद्ध में वीरतापूर्वक लड़ते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया था [19, 65]।
🛡️ 2. मारवाड़ के राठौड़ साम्राज्य की सुदृढ़ स्थापना (राव चूंडा से रणमल तक)
राव सीहा के बाद मारवाड़ में राठौड़ सत्ता का धीरे-धीरे विस्तार हुआ:
- राव अस्थान (1273-1291 ई.): इन्होंने गुहिल शासकों से घनिष्ठ संबंध स्थापित किए और जलालुद्दीन खिलजी की सेना का मुकाबला किया [19]।
- राव धूहड़ (1291-1309 ई.): ये कर्नाटक से अपनी कुलदेवी चक्रेश्वरी माता की मूर्ति लेकर आए और बाड़मेर के नगाणा गाँव में स्थापित की, जिसके कारण देवी का नाम नागणेची माता पड़ा [65]।
- राव मल्लीनाथ (1374-1399 ई.): ये एक महान लोकदेवता और पराक्रमी योद्धा थे। इन्होंने महेवा (बाड़मेर) को अपनी राजधानी बनाया [73, 74]। इनके नाम पर बाड़मेर के क्षेत्र को आज भी ‘मालानी परगना’ कहा जाता है [74]।
- राव चूंडा (1384-1423 ई.) – साम्राज्य का वास्तविक विस्तार:
- मंडौर दहेज में मिलना: इंदा प्रतिहारों ने तुर्कों (मंडौर के सूबेदार) के अत्याचारों से मुक्ति पाने के लिए अपनी पुत्री का विवाह राव चूंडा से कर दिया और मंडौर का सुदृढ़ किला दहेज में दे दिया [30, 66]। चूंडा ने मंडौर को राठौड़ों की नई राजधानी बनाया [30, 66]।
- सामंती व्यवस्था का बीजारोपण: राव चूंडा को मारवाड़ में सामंती व्यवस्था (जागीरदारी प्रथा) का जनक माना जाता है, क्योंकि उन्होंने अपने भाइयों और सरदारों को जागीरें देकर प्रशासनिक जिम्मेदारियां सौंपीं [63, 66]。
- राव रणमल (1427-1438 ई.) – मेवाड़-मारवाड़ का संधिकाल:
- चूंडा के पुत्र रणमल को अपनी सौतेली माता के प्रभाव के कारण मारवाड़ की गद्दी नहीं मिली, जिससे वे मेवाड़ (चित्तौड़) चले गए [66]।
- उन्होंने अपनी बहन हंसाबाई का विवाह मेवाड़ के राणा लाखा से इस शर्त पर कराया कि हंसाबाई का पुत्र (मोकल) ही मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनेगा [66]।
- मोकल और कुंभा के प्रारंभिक काल में रणमल का मेवाड़ दरबार में अत्यधिक प्रभाव बढ़ गया, जिससे सिसोदिया सरदार नाराज हो गए [66]। अंततः 1438 ई. में कुंभा के निर्देश पर सिसोदिया सरदारों ने रणमल की प्रेमिका भारमली की सहायता से चित्तौड़ दुर्ग में रणमल की हत्या कर दी [66]।
🏰 3. राव जोधा (1438-1489 ई.): मारवाड़ के वास्तविक निर्माता
रणमल की हत्या के समय उनके पुत्र राव जोधा चित्तौड़ में ही थे [66]। चित्तौड़ से भागते समय प्रसिद्ध लोक-कथन गूंजा: “भाग जोधा भाग, थारो रणमल मार्यो जाये”। जोधा ने भागकर बीकानेर के समीप काहुनी गाँव में शरण ली और 15 वर्षों तक संघर्ष किया [66]।
🔹 क) मेवाड़-मारवाड़ का ऐतिहासिक संधिकाल: ‘आंवल-बांवल की संधि’ (1453 ई.)
- 15 वर्षों के कड़े संघर्ष के बाद जोधा ने 1453 ई. में पुनः सेना संगठित कर मंडौर पर अधिकार कर लिया [66]।
- इस दीर्घकालिक संघर्ष को समाप्त करने के लिए राव रणमल की बहन (और महाराणा कुंभा की दादी) हंसाबाई ने मध्यस्थता की [66]।
- संधि की शर्तें:
- मेवाड़ और मारवाड़ की सीमा का निर्धारण सोजत (पाली) को केंद्र मानकर किया गया [66]। (सोजत से आगे आंवल यानी मेवाड़ की हरी-भरी सीमा और बांवल यानी बबूल के कांटों वाली मरुधरा मारवाड़ की सीमा)।
- इस कूटनीतिक संधि को स्थाई पारिवारिक रिश्ते में बदलने के लिए राव जोधा ने अपनी पुत्री शृंगार देवी का विवाह महाराणा कुंभा के पुत्र रायमल से कर दिया [24, 66]। इसी शृंगार देवी ने चित्तौड़गढ़ में प्रसिद्ध घोसुंडी की बावड़ी का निर्माण करवाया था [71]।
🔹 ख) जोधपुर नगर की स्थापना और मेहरानगढ़ दुर्ग (1459 ई.)
- राजधानी का परिवर्तन: सुरक्षा और सामरिक दृष्टि से मंडौर की पहाड़ी खुली और असुरक्षित थी [66]। इसलिए जोधा ने 12 मई, 1459 ई. (जेठ सुदी एकादशी, शनिवार) को मण्डौर से अपनी राजधानी स्थानांतरित की [2, 8, 66]।
- जोधपुर नगर का शिलान्यास: उन्होंने मण्डौर से 6 मील दूर एक नई सुरक्षित पहाड़ी पर जोधपुर नगर की नींव रखी [2, 66]।
- मेहरानगढ़ दुर्ग (गिरि दुर्ग): उन्होंने चिड़ियाटूक पहाड़ी (जहाँ चिड़ियानाथ नामक सिद्ध संत रहते थे) पर भव्य मेहरानगढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया [66]।
- करणी माता का वरदान: इस अभेद्य दुर्ग की नींव प्रसिद्ध लोक देवी रिद्धि बाई (करणी माता) ने अपने पावन हाथों से रखी थी [66]।
- मानव बलि प्रथा: दुर्ग की सुरक्षा और शुभ शगुन के लिए राजाराम (राजिया) मेघवाल नामक व्यक्ति की दुर्ग की नींव में जीवित समाधि (बलि) दी गई थी, जिसके परिवार को जोधपुर राज्य द्वारा विशेष सम्मान और भूमि दी गई [66]।
- किले के उपनाम: मयूर की आकृति जैसी होने के कारण इसे ‘मयूरध्वज गढ़’, ‘गढ़चिंतामणि’, ‘कागमुखी’ और ‘मेहरानगढ़’ कहा जाता है [66]।
🔹 ग) सैनिक विजय और अन्य उपलब्धियां
- दिल्ली सल्तनत से मुकाबला: राव जोधा ने दिल्ली के सुल्तान बहलोल लोदी के सेनापति सारंग खान को परास्त कर अपनी सैन्य श्रेष्ठता स्थापित की [66]।
- वास्तुकला: राव जोधा की माता कोडमदे ने बीकानेर सीमा पर कोडमदेसर बावड़ी का निर्माण करवाया, जो पश्चिमी राजस्थान की सबसे प्राचीन बावड़ियों में से एक है [66]। उनकी रानी जसमादे ने जोधपुर में ऐतिहासिक राणीसर तालाब का निर्माण करवाया था [66]।
- साम्राज्य का विभाजन: राव जोधा के प्रतापी पुत्र राव बीका ने मारवाड़ से अलग होकर 1488 ई. में जंगलादेश में बीकानेर के स्वतंत्र राठौड़ राज्य की स्थापना की [77]। उनके दूसरे पुत्र राव दूदा ने मेड़ता में राठौड़ सत्ता की स्थापना की (जो प्रसिद्ध भक्त शिरोमणि मीराबाई के दादा थे) [66]。
🔥 4. राव मालदेव (1532-1562 ई.): मारवाड़ का शौर्य और पराक्रम का चरमोत्कर्ष
राव मालदेव मारवाड़ के राठौड़ इतिहास के सर्वाधिक महत्वाकांक्षी, सैन्यवादी और साम्राज्यवादी शासक थे। उन्हें मारवाड़ का पितृहंता शासक माना जाता है क्योंकि उन्होंने गद्दी प्राप्त करने के लिए अपने पिता राव गांगा की हत्या (झरोखे से धक्का देकर) की थी [87]।
🔹 क) साम्राज्य विस्तार और “हसमत वाला बादशाह”
- सोजत में राज्याभिषेक: पिता की मृत्यु के बाद मालदेव का राज्याभिषेक सोजत (पाली) में 1531/32 ई. में हुआ [87]। गद्दी पर बैठते समय मारवाड़ के प्रत्यक्ष नियंत्रण में केवल जोधपुर और सोजत के दो परगने थे [87]।
- खानवा युद्ध (1527 ई.): राज्याभिषेक से पूर्व, खानवा के युद्ध में युवराज के रूप में मालदेव ने महाराणा सांगा की सैन्य सहायता के लिए मारवाड़ की 4000 सैनिकों की राजपूत टुकड़ी का वीर नेतृत्व किया था [87]।
- 52 युद्धों का महानायक: मालदेव ने अपनी अद्वितीय सैन्य क्षमता से 52 युद्ध जीते और उनके साम्राज्य के अंतर्गत 58 परगने शामिल हो गए थे [17, 87]।
- विदेशी इतिहासकारों की दृष्टि: फारसी इतिहासकारों (जैसे अबुल फजल और निजामुद्दीन) ने मालदेव के वैभव, रौब और प्रभाव को देखकर उन्हें ‘हसमत वाला बादशाह’ और ‘हिन्दुस्तान का सबसे प्रतापी और शक्तिशाली शासक’ घोषित किया [87]。
🔹 ख) प्रमुख ऐतिहासिक सैन्य अभियान
- पाहोबा/साहेबा का युद्ध (1541-42 ई.): मालदेव ने बीकानेर के राठौड़ शासक राव जैतसी पर आक्रमण किया। इस भीषण युद्ध में राव जैतसी लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए और मालदेव ने बीकानेर दुर्ग पर अधिकार कर लिया [87]। राव जैतसी के पुत्र कल्याणमल अपनी जागीर वापस पाने के लिए दिल्ली के सुल्तान शेरशाह सूरी की शरण में चले गए [87]।
- मेड़ता का युद्ध: मालदेव ने मेड़ता के राव वीरमदेव को परास्त कर मेड़ता पर अधिकार कर लिया [87]। वीरमदेव भी मालदेव से बदला लेने के लिए शेरशाह सूरी से जा मिले [87]।
🔹 ग) शेरशाह सूरी से टकराव: ‘गिरी-सुमेल का महासंग्राम’ (5 जनवरी 1544 ई.)
- पृष्ठभूमि: कल्याणमल और वीरमदेव के उकसाने पर दिल्ली का महत्वाकांक्षी शासक शेरशाह सूरी 80,000 की विशाल टिड्डी दल सेना लेकर मारवाड़ पर आक्रमण करने बढ़ा [87]।
- जाली पत्रों का षड्यंत्र: अजमेर के निकट गिरी-सुमेल (जैतारण के पास, वर्तमान ब्यावर जिला) के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने खड़ी हो गईं [25, 26]। राजपूतों की व्यूह रचना और पराक्रम से भयभीत होकर शेरशाह ने सीधे युद्ध करने के बजाय कूटनीति का सहारा लिया। उसने मालदेव के महान और निष्ठावान सेनापतियों जैता और कूँपा के नाम जाली पत्र लिखवाकर मालदेव के शिविर में डलवा दिए, जिससे मालदेव को अपने सेनापतियों पर राजद्रोह का संदेह हो गया [26, 87]।
- मालदेव का पलायन: संदेह के गहरे साए में मालदेव युद्ध से पूर्व रात्रि को ही मुख्य सेना लेकर सुरक्षित सिवाणा (बाड़मेर/बालोतरा) के पहाड़ों की ओर चले गए [87]।
- जैता-कूँपा का अद्वितीय बलिदान: अपने ऊपर लगे विश्वासघात के कलंक को अपने रक्त से धोने के लिए वीर सेनापति जैता और कूँपा ने पीछे हटने से साफ मना कर दिया [87]। उन्होंने केवल 6,000 से 10,000 राजपूत सैनिकों के साथ शेरशाह सूरी की विशाल सेना पर काल बनकर धावा बोल दिया [87]।
- शेरशाह सूरी के ऐतिहासिक कथन:
- राजपूतों की तलवारें इस कदर बिजली बनकर टूटीं कि शेरशाह की सेना के पैर उखड़ गए और वह हारने ही वाला था, लेकिन ऐन वक्त पर जलाल खान जलवानी की अतिरिक्त सैन्य टुकड़ी के पहुँचने से पासा पलट गया [87]। युद्ध जीतने के बाद काँपते हुए शेरशाह सूरी के मुख से ऐतिहासिक शब्द निकले: “खुदा का शुक्र है कि किसी तरह फतह हासिल हो गई, वरना मैंने एक मुट्ठी बाजरे (मारवाड़ की रेतीली भूमि) के लिए सम्पूर्ण हिन्दुस्तान की बादशाहत ही खो दी होती।” [25, 26]
- जेता और कूंपा का अपूर्व रण-कौशल देखकर सूरी ने कहा था: “काश! जैता और कूँपा जैसे वीर सेनापति मेरे पास होते, तो मैं सम्पूर्ण ब्रह्मांड पर एकछत्र राज करता।”
🔹 घ) “रूठी रानी” उमादे का ऐतिहासिक प्रसंग
- मालदेव का विवाह जैसलमेर के रावल लूणकरण की पुत्री उमादे के साथ हुआ था [87]।
- विवाह की पहली ही रात मालदेव के व्यवहार से आहत होकर उमादे आजीवन मालदेव से रूठी रहीं [87]। इतिहास में उन्हें ‘रूठी रानी’ के नाम से जाना जाता है [87]।
- वे जोधपुर छोड़कर अजमेर के तारागढ़ दुर्ग में रहीं और बाद में मेवाड़ के कोसाना गाँव चली गईं [87]। 1562 ई. में जब मालदेव की मृत्यु हुई, तो उमादे ने मालदेव की पगड़ी के साथ सती होकर ‘अनुमरण’ किया, जो उनके अटूट स्वाभिमान और समर्पण को दर्शाता है [87]।
🔹 ङ) हुमायूं से संबंध
- चौसा और कन्नौज के युद्ध में शेरशाह सूरी से पराजित होकर जब मुगल सम्राट हुमायूं दर-दर भटक रहा था, तब मालदेव ने उसे जोगी तीर्थ नामक स्थान पर सहायता और शरण देने का संदेश भेजा था [87]। लेकिन हुमायूं के संदेहास्पद और विलंबित रवैये के कारण यह गठबंधन नहीं हो सका और हुमायूं अमरकोट की ओर चला गया [87]।
👑 5. महाराजा जसवंत सिंह प्रथम (1638-1678 ई.): स्वाभिमान और मुग़ल सत्ता को चुनौती
महाराजा जसवंत सिंह राठौड़ वंश के वो अत्यंत प्रतापी और स्वाभिमानी शासक थे, जिनकी आँखों की सुर्खी के आगे क्रूर मुगल बादशाह औरंगजेब भी हमेशा भयभीत और सशंकित रहता था [44, 46, 54]।
🔹 क) प्रारंभिक जीवन और मनसबदारी
- जन्म: जसवंत सिंह का जन्म 26 दिसम्बर, 1626 ई. को बुरहानपुर में हुआ था [1, 89]। इनके पिता महाराजा गजसिंह थे तथा माता मेवाड़ के प्रतापी घराने से सम्बन्धित रानी परतापदे सिसोदिनी थीं [1, 89]।
- राज्याभिषेक: पिता की मृत्यु के बाद इनका राज्याभिषेक आगरा में हुआ और शाहजहां ने इन्हें ‘महाराजा’ की सर्वोच्च पदवी से विभूषित किया तथा इनका मनसब 4000 से बढ़ाकर क्रमशः 6000 जात और सवार कर दिया [64]。
🔹 ख) उत्तराधिकार का युद्ध और ‘धर्मत का युद्ध’ (1658 ई.)
- जब शाहजहां गंभीर रूप से बीमार पड़ा, तो उसके चारों पुत्रों में दिल्ली के तख्त के लिए खूनी संघर्ष शुरू हो गया [64]।
- महाराजा जसवंत सिंह ने स्वामीभक्ति और धर्म का पालन करते हुए शाही सेनापति के रूप में शाहजहां के बड़े पुत्र दारा शिकोह का साथ दिया [64]।
- धर्मत का भीषण मुकाबला (मध्य प्रदेश): 1658 ई. में जसवंत सिंह के नेतृत्व वाली शाही सेना और औरंगजेब व मुराद की संयुक्त विद्रोही सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ [64]।
- युद्ध में शाही सेना के सहयोगी कासिम खान ने ऐन वक्त पर औरंगजेब से गुप्त संधि कर विश्वासघात किया और बारूद के कुओं में पानी डलवा दिया [64]।
- महाराजा जसवंत सिंह गंभीर रूप से घायल हो गए [64]। मारवाड़ के राठौड़ सरदारों ने उन्हें जबरन सुरक्षित रणभूमि से बाहर निकाला और जोधपुर भेजा [64]।
- इसके बाद रणभूमि की कमान रतलाम के संस्थापक राव रतन सिंह राठौड़ ने संभाली और 85 घाव खाकर वीरगति प्राप्त की [64]।
🔹 ग) “हाड़ी रानी जसवंत दे का स्वाभिमान”
- जब महाराजा जसवंत सिंह घायल और पराजित अवस्था में जोधपुर पहुँचे, तो उनकी पटरानी हाड़ी रानी जसवंत दे (महामाया/उदयपुरी रानी) ने मेहरानगढ़ दुर्ग के लोहे के विशाल द्वार खोलने से इनकार कर दिया [64]।
- रानी ने अत्यंत गर्व और स्वाभिमान से कहा: “क्षत्रिय या तो युद्ध जीतकर लौटते हैं या फिर वीरगति पाकर लाल कपड़ों में। अपनी पीठ दिखाकर भागने वाले पराजित राजा के लिए इस दुर्ग में कोई स्थान नहीं है। मैं चिता सजाकर सती हो जाऊँगी, परंतु पराजित राजा का मुंह नहीं देखूंगी।” [64]
- यह प्रतिज्ञा राजपूत नारियों के अपूर्व शौर्य को दर्शाती है। अंततः महाराजा की माता के समझाने और अगले युद्ध में पराजय का बदला लेने की शपथ के बाद ही दुर्ग के द्वार खोले गए [64]।
🔹 घ) औरंगजेब से निरंतर शत्रुता और देहांत
- खजवा का युद्ध (1659 ई.): औरंगजेब के राजा बनने के बाद भी जसवंत सिंह ने घुटने नहीं टेके। खजवा के युद्ध में उन्होंने औरंगजेब की सेना के पिछले हिस्से पर अचानक आक्रमण कर मुगल शिविर को बुरी तरह लूटा और औरंगजेब के मन में खौफ भर दिया [64]।
- शिवाजी महाराज से मध्यस्थता: दक्षिण भारत की सूबेदारी के दौरान जसवंत सिंह ने छत्रपति शिवाजी महाराज की सैन्य शक्ति का सम्मान किया और मुगलों व मराठों के बीच कूटनीतिक रूप से संधि कराने में महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभाई [64]。
- काबुल (जमरूद) प्रस्थान और देहांत: औरंगजेब जसवंत सिंह की मारवाड़ में मौजूदगी से इतना घबराता था कि उसने उन्हें राजधानी से दूर सुदूर अफगानिस्तान (काबुल) में कबीलाई विद्रोहों को दबाने के लिए भेज दिया [64]। वहीं 28 नवंबर, 1678 ई. को जमरूद (काबुल) नामक सैनिक चौकी पर मरुधरा के इस प्रतापी सूर्य का देहांत हो गया [64]।
- औरंगजेब का कथन: जसवंत सिंह की मृत्यु का समाचार सुनते ही औरंगजेब ने राहत की सांस ली और कुटिलतापूर्वक कहा: “आज कुफ्र (धर्म-विरोध) का दरवाजा टूट गया है।” (यानी औरंगजेब के साम्राज्य की राह का सबसे बड़ा रोड़ा हट गया) [64]।
🔹 ङ) कला और साहित्य को संरक्षण
- महाराजा स्वयं एक उत्कृष्ट संस्कृत और हिंदी के विद्वान थे। उन्होंने निम्नलिखित प्रसिद्ध ग्रंथों की रचना की [64]:
- ‘भाषा भूषण’ (अलंकार शास्त्र पर लिखित कालजयी ग्रंथ)
- ‘आनंद विलास’
- ‘सिद्धांत बोध’
- ‘प्रबोध चंद्रोदय’
- मुहणोत नैणसी का संरक्षण: महाराजा जसवंत सिंह के दीवान प्रसिद्ध इतिहासकार मुहणोत नैणसी थे, जिन्हें मुंशी देवी प्रसाद ने ‘राजपूताना का अबुल फजल’ कहा है [29, 31]。 नैणसी ने ‘मुहणोत नैणसी री ख्यात’ और ‘मारवाड़ रा परगना री विगत’ (जिसे राजस्थान का गजेटियर कहा जाता है) की रचना इसी काल में की थी [29, 31]।
🛡️ 6. मारवाड़ का 30 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम (वीर दुर्गादास राठौड़)
महाराजा जसवंत सिंह की मृत्यु के समय उनकी कोई संतान जीवित नहीं थी [64]। औरंगजेब ने इस अवसर का अनुचित लाभ उठाकर मारवाड़ को ‘खालसा’ (सीधे केंद्र के अधीन) घोषित कर दिया और जोधपुर पर कब्जा कर लिया [64]。
- अजीत सिंह का जन्म: जसवंत सिंह की मृत्यु के उपरांत लाहौर में उनकी गर्भवती रानियों ने दो पुत्रों को जन्म दिया, जिनमें से केवल अजीत सिंह जीवित बचे [64]।
- औरंगजेब का कुचक्र: औरंगजेब ने अजीत सिंह को राजा मानने से इनकार कर दिया और उन्हें दिल्ली की ‘नूरगढ़’ हवेली में बंधक बनाकर उनका धर्म परिवर्तन कराने की साजिश रची [64]।
- वीर दुर्गादास राठौड़ – ‘मारवाड़ का अणबिंद्या मोती’:
- दुर्गादास राठौड़ (आसकरण के पुत्र) ने अदम्य पराक्रम दिखाते हुए औरंगजेब की आंखों में धूल झोंकी।
- उन्होंने बाघेली महिला (गोरा धाय – जिन्हें ‘मारवाड़ की पन्ना धाय’ कहा जाता है) और मुकुंद दास खींची की मदद से नवजात अजीत सिंह को दिल्ली से सकुशल बाहर निकाला और सिरोही के कालिंद्री गाँव में गुप्त रूप से पाला।
- 30 वर्षीय संघर्ष (1678-1708 ई.): दुर्गादास ने मेवाड़ के महाराणा राजसिंह के साथ मिलकर मुगलों के खिलाफ अनवरत 30 वर्षों तक गुरिल्ला युद्ध लड़ा। उन्होंने औरंगजेब के विद्रोही पुत्र शहजादे अकबर को भी अपने साथ मिला लिया।
- अंततः 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के बाद 1708 ई. में देवारी समझौते के तहत अजीत सिंह को मारवाड़ का वैधानिक शासक घोषित किया गया। कर्नल टॉड ने दुर्गादास को ‘राठौड़ों का यूलिसेस’ कहा है।
📊 7. मारवाड़ के महानायकों की त्वरित समय-सीमा (Timeline Matrix)
| शासक (Ruler) | शासन काल (Reign) | महत्वपूर्ण युद्ध / संधि (Key Battles/Treaties) | मुख्य ऐतिहासिक योगदान / उपाधि (Key Contribution) |
|---|---|---|---|
| राव सीहा | 1243-1273 ई. | लाख झंवर का युद्ध (1273 ई.) | मारवाड़ के राठौड़ राजवंश के आदिपुरुष/मूल संस्थापक; बीठू गाँव का लेख। |
| राव चूंडा | 1384-1423 ई. | मंडौर पर अधिकार (दहेज में प्राप्त) | मंडौर को नई राजधानी बनाया; मारवाड़ में सामंती व्यवस्था की शुरुआत की। |
| राव जोधा | 1438-1489 ई. | आंवल-बांवल की संधि (1453 ई.) | 1459 ई. में जोधपुर नगर और मेहरानगढ़ दुर्ग (चिड़ियाटूक पहाड़ी) की स्थापना। |
| राव मालदेव | 1532-1562 ई. | साहेबा का युद्ध (1541-42 ई.), गिरी-सुमेल का युद्ध (1544 ई.) | “हसमत वाला बादशाह”, 52 युद्धों व 58 परगनों के विजेता, सिवाणा को शरणस्थली बनाया। |
| म. जसवंत सिंह I | 1638-1678 ई. | धर्मत का युद्ध (1658 ई.), खजवा का युद्ध (1659 ई.) | शाहजहां द्वारा ‘महाराजा’ की उपाधि, ‘भाषा भूषण’ के रचयिता, औरंगजेब द्वारा कुफ्र के द्वार की संज्ञा। |
🎯 8. अभ्यास हेतु परीक्षा-उपयोगी प्रश्न (High-Yield MCQs)
प्रश्न 1: “खुदा का शुक्र है कि किसी तरह फतह हासिल हो गई, वरना मैंने एक मुट्ठी बाजरे के लिए हिन्दुस्तान की बादशाहत ही खो दी होती।” यह प्रसिद्ध ऐतिहासिक कथन शेरशाह सूरी ने किस युद्ध के बाद कहा था? (A) पाहोबा/साहेबा का युद्ध (1541 ई.) (B) गिरी-सुमेल का युद्ध (1544 ई.) (C) धर्मत का युद्ध (1658 ई.) (D) खजवा का युद्ध (1659 ई.)
सही उत्तर: (B) व्याख्या: 5 जनवरी 1544 को जैतारण (ब्याँवर जिला) के पास गिरी-सुमेल के युद्ध में मालदेव के वीर सेनापतियों जैता और कूँपा के अदम्य शौर्य से भयभीत होकर शेरशाह ने जीत के बाद यह ऐतिहासिक वाक्य कहा था।
प्रश्न 2: मारवाड़ के किस शासक की मृत्यु पर मुगल सम्राट औरंगजेब ने कहा था कि “आज कुफ्र (धर्म-विरोध) का दरवाजा टूट गया”? (A) राव मालदेव (B) राव जोधा (C) महाराजा जसवंत सिंह प्रथम (D) महाराजा अजीत सिंह
सही उत्तर: (C) व्याख्या: 28 नवंबर 1678 ई. को जमरूद (काबुल) में महाराजा जसवंत सिंह प्रथम की मृत्यु पर उनके परम विरोधी औरंगजेब ने अत्यधिक राहत महसूस करते हुए यह कुटिल टिप्पणी की थी।
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