🌾 महारो राजस्थान! मरुधरा के वो जांबाज आंदोलन जिन्होंने सामंतशाही और ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दीं! 🏹
क्या आप जानते हैं कि राजस्थान की वीर भूमि पर केवल युद्ध ही नहीं लड़े गए, बल्कि यहाँ के स्वाभिमानी किसानों और आदिवासियों ने अन्याय व शोषण के खिलाफ विश्व के सबसे लंबे अहिंसक आंदोलनों की अमर गाथा भी लिखी है?
RPSC, RAS, SI, REET, या पटवारी की तैयारी करने वाले अभ्यर्थियों के लिए यह टॉपिक परीक्षा की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण और सबसे ज्यादा अंक दिलाने वाला है। आइए, राजस्थान के उन गौरवशाली किसान और जनजातीय आंदोलनों (Peasant and Tribal Movements) के इतिहास को विस्तार से और पूरी प्रामाणिकता के साथ समझते हैं, जिन्होंने इतिहास का रुख बदल दिया!
🌾 भाग A: राजस्थान के प्रमुख किसान आंदोलन (Peasant Movements)
रियासतकालीन दौर में राजस्थान की देशी रियासतों में किसान और ग्रामीण समाज भारी लगान, अनगिनत लाग-बाग और बेगार की जकड़न से बुरी तरह त्रस्त था।
1. बिजोलिया किसान आंदोलन (1897–1941) — “किसान आंदोलनों की जननी”
- ठिकाने का इतिहास: बिजोलिया मेवाड़ रियासत का प्रथम श्रेणी का ठिकाना था, जो वर्तमान भीलवाड़ा जिले में स्थित है। खानवा के युद्ध (1527 ई.) में राणा सांगा की सहायता करने के बदले अशोक परमार को “ऊपरमाल जागीर” दी गई थी, जिसका मुख्यालय बिजोलिया था।
- विशेषता: यह भारत का पहला संगठित, पूर्णतः अहिंसक और सर्वाधिक लंबा चलने वाला (लगभग 44 वर्ष) किसान आंदोलन था।
- शोषण का चरम: यहाँ के बहुसंख्यक किसान धाकड़ जाति के थे, जिन पर ठिकाने द्वारा 84 प्रकार के लाग-बाग (अतिरिक्त कर) और अत्यधिक लगान थोपा गया था।
- आंदोलन के तीन ऐतिहासिक चरण:
- प्रथम चरण (1897–1915): इसकी शुरुआत वर्ष 1897 में गिरधारीपुरा गाँव में गंगाराम धाकड़ के पिता के मृत्युभोज (नुक्ता) के अवसर पर एकत्रित किसानों की बैठक से हुई। किसानों ने मेवाड़ के महाराणा फतेह सिंह के समक्ष अपनी शिकायतें रखने हेतु नानजी पटेल और ठाकरी पटेल को उदयपुर भेजा। वर्ष 1903 में जागीरदार कृष्ण सिंह ने नया चंवरी कर (बेटी की शादी पर ₹5 का कर) और वर्ष 1906 में नए जागीरदार पृथ्वी सिंह ने तलवार-बंधाई कर (उत्तराधिकार शुल्क) लगा दिया, जिसके विरोध में किसानों ने ज़मीनें खाली छोड़ दीं। वर्ष 1913 में किसानों ने साधु सीताराम दास और फतेह करण चारण के नेतृत्व में खेतों को बिना जोते छोड़कर “कर नहीं” (No Tax) अभियान शुरू किया।
- द्वितीय चरण (1915–1923): वर्ष 1916 में राष्ट्रीय नेता विजय सिंह पथिक (मूल नाम भूप सिंह) ने बागडोर संभाली। उन्होंने ‘बिजोलिया किसान पंचायत’ और केंद्रीय ‘किसान पंचायत बोर्ड’ का गठन किया। इसी चरण में माणिक्य लाल वर्मा भी आंदोलन से जुड़े, जिन्होंने अपने ओजस्वी ‘पंछीड़ा’ गीत से किसानों में नया जोश भरा। अंततः वर्ष 1922 में ए.जी.जी. रॉबर्ट हॉलैंड की समिति के साथ किसानों का एक ऐतिहासिक समझौता हुआ।
- तृतीय चरण (1923–1941): वर्ष 1927 में पथिक जी के अलग होने के बाद कमान जमनालाल बजाज और हरिभाऊ उपाध्याय ने संभाली। अंततः वर्ष 1941 में मेवाड़ के प्रधानमंत्री सर टी. वी. राघवाचार्य और राजस्व मंत्री मोहन सिंह मेहता के साथ हुए समझौते के बाद किसानों को उनकी जब्त की गई ज़मीनें वापस मिलीं और आंदोलन समाप्त हुआ। इस संघर्ष में अंजना देवी, नारायणी देवी वर्मा, रमा देवी और जानकी देवी जैसी जांबाज महिलाओं ने भी सक्रिय रूप से भाग लिया।
2. बेगूं किसान आंदोलन (1921–1923)
- स्थान एवं नेतृत्व: बेगूं ठिकाना मेवाड़ रियासत का प्रथम श्रेणी ठिकाना था जो वर्तमान चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित है। बिजोलिया से प्रेरित होकर यहाँ के धाकड़ किसानों ने 1921 में मेनाल के भैरूकुण्ड से आंदोलन शुरू किया। आंदोलन का प्रारंभिक नेतृत्व रामनारायण चौधरी ने किया।
- बोल्शेविक समझौता: बेगूं के सामंत अनूप सिंह ने दबाव में आकर किसानों से एक समझौता किया, जिसे मेवाड़ महाराणा ने अस्वीकार कर दिया और इसे “बोल्शेविक समझौता” नाम देकर खारिज कर दिया।
- गोविंदपुरा गोलीकांड (13 जुलाई 1923): मामले की जांच के लिए आए ट्रेंच आयोग के अधिकारी ट्रेंच के आदेश पर गोविंदपुरा में शांतिपूर्वक एकत्र किसानों पर गोलियां बरसाई गईं, जिसमें रूपाजी धाकड़ और कृपाजी धाकड़ मौके पर ही शहीद हो गए।
3. बूंदी / बरड़ किसान आंदोलन (1922/23–1943)
- विशेषता: यह आंदोलन जागीरदारों के खिलाफ नहीं, बल्कि सीधे बूंदी राज्य प्रशासन की दमनकारी नीतियों और जबरन बेगार प्रथा के विरुद्ध था। इसका नेतृत्व पं. नयनूराम शर्मा ने किया था।
- डाबी हत्याकांड (2 अप्रैल 1923): किसानों की सभा पर पुलिस अधिकारी इकराम हुसैन के आदेश पर गोलियां चलाई गईं, जिसमें नानकजी भील और देवीलाल गुर्जर शहीद हो गए। नानकजी भील शहीद होते समय भी गर्व से ‘झंडा गीत’ गा रहे थे। उनकी याद में माणिक्य लाल वर्मा ने भावुक ‘अर्जी’ नामक गीत लिखा।
4. नीमूचाणा किसान आंदोलन (14 मई 1925) — “राजस्थान का जलियांवाला बाग”
- कारण: अलवर के महाराजा द्वारा लगान दरों में अत्यधिक वृद्धि करने के विरोध में राजपूत किसानों ने नीमूचाणा गाँव में विरोध सभा की। 14 मई 1925 को अलवर सेना की टुकड़ियों ने निहत्थे किसानों को घेरकर गोलियां चलाईं, जिसमें लगभग 156 किसान शहीद हुए। महात्मा गांधी ने इस नरसंहार की भर्त्सना करते हुए इसे ‘डायरवाद का दोहरा रूप’ (Dyerism Double Distilled) घोषित किया।
🏹 भाग B: जनजातीय और आदिवासी आंदोलन (Tribal Movements)
पहाड़ी और वन क्षेत्रों के भील, मीणा और गरासिया आदिवासियों का संघर्ष न केवल सामंती शोषण के खिलाफ था, बल्कि अपनी परंपरागत पहचान, वन-अधिकारों और सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए भी था।
1. भगत आंदोलन एवं गोविन्द गुरु (भीलों का मसीहा)
- क्रांतिकारी व्यक्तित्व: भीलों के महान सामाजिक-धार्मिक सुधारक गोविन्द गुरु का जन्म 1858 ई. में डूंगरपुर के बेड़सा/बांसिया गाँव में एक बंजारा परिवार में हुआ था। स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने आदिवासियों में शराबबंदी, कुरीतियों के अंत और आत्मसम्मान के लिए 1883 में ‘सम्प सभा’ की स्थापना की तथा ‘भगत पंथ’ चलाया।
- मानगढ़ हत्याकांड (17 नवम्बर 1913, बांसवाड़ा): मानगढ़ की पहाड़ी पर सम्प सभा का वार्षिक शांतिपूर्ण अधिवेशन चल रहा था, तभी ब्रिटिश सेना और ‘मेवाड़ भील कॉर्प्स’ ने पहाड़ी को घेरकर मशीनगनों से अंधाधुंध गोलियां बरसाईं। इस भीषण गोलीकांड में 1500 से अधिक भील आदिवासी शहीद हो गए। इसे “राजस्थान या वागड़ का जलियांवाला बाग हत्याकांड” कहा जाता है।
2. एकी / भोमट भील आंदोलन एवं मोतीलाल तेजावत
- नायक: आदिवासियों के ‘बावजी’ और मसीहा कहे जाने वाले मोतीलाल तेजावत (जन्म कोल्यारी गाँव के ओसवाल जैन परिवार में) ने भीलों को जागृत करने के लिए ‘वनवासी संघ’ की स्थापना की।
- मेवाड़ की पुकार: तेजावत जी ने वर्ष 1921 में चित्तौड़गढ़ के मातृकुण्डिया से ‘एकी आंदोलन’ (भोमट भील आंदोलन) शुरू किया। उन्होंने मेवाड़ के महाराणा के समक्ष 21 सूत्रीय मांगपत्र रखा, जिसे “मेवाड़ की पुकार” कहा जाता है। आंदोलन का नारा था— “ना हाकिम, ना हुकुम”।
- नीमड़ा हत्याकांड (6 मार्च 1922): साबरकांठा (विजयनगर/गुजरात सीमा) के नीमड़ा गाँव में भील सम्मेलन पर मेवाड़ भील कॉर्प्स के मेजर सटन के आदेश पर अंधाधुंध फायरिंग की गई, जिसमें 1200 से अधिक भील आदिवासी शहीद हो गए। इसे “मेवाड़ या राजस्थान का दूसरा जलियांवाला बाग” भी कहा जाता है।
3. मीणा आंदोलन — ‘जरायम पेशा’ काले कानून के विरुद्ध जंग
- काले कानून का दंश: ब्रिटिश सरकार ने मीणा जनजाति को दबाने के लिए वर्ष 1924 में ‘अपराधिक जनजाति अधिनियम’ लागू किया और वर्ष 1930 में जयपुर रियासत में ‘जरायम पेशा कानून’ लागू कर दिया, जिसके तहत प्रत्येक वयस्क मीणा को प्रतिदिन थाने में आकर हाजिरी लगाना अनिवार्य था।
- मुक्ति का संघर्ष: इसके खिलाफ वर्ष 1933 में ‘मीणा क्षेत्रीय महासभा’ का गठन हुआ। वर्ष 1944 में नीम का थाना (सीकर) में जैन मुनि मगन सागर जी (मीन पुराण के रचयिता) के नेतृत्व में एक ऐतिहासिक सम्मेलन आयोजित किया गया।
- बागावास सम्मेलन: 28 अक्टूबर 1946 को बागावास (जयपुर) में आयोजित सम्मेलन में 26,000 मीणा चौकीदारों ने सामूहिक रूप से अपने पदों से इस्तीफे दे दिए, जिसे “मुक्ति दिवस” के रूप में मनाया गया। आखिरकार, आज़ादी के बाद वर्ष 1952 में इस काले कानून को पूर्णतः समाप्त कर दिया गया।
📌 निष्कर्ष (Historical Lesson): ये ऐतिहासिक आंदोलन केवल करों में रियायत पाने की जंग नहीं थे, बल्कि इन्होंने राजस्थान की सोई हुई ग्रामीण और आदिवासी जनता में अधिकारों के प्रति सम्मान, संगठन की शक्ति और स्वाधीनता की ऐसी ज्योति जलाई जिसने अंततः राजशाही का अंत कर आधुनिक लोकतांत्रिक राजस्थान का मार्ग प्रशस्त किया!
मरुधरा के इन गुमनाम शहीदों और क्रांतिवीरों के सम्मान में इस पोस्ट को लाइक, कमेंट और शेयर ज़रूर करें! ✊🔥
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