कक्षा 11 अर्थशास्त्र अध्याय 2: भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990)
अध्याय 2: भारतीय अर्थव्यवस्था (1950-1990) – अर्धवार्षिक परीक्षा हेतु क्विक रिवीजन नोट्स
1. केंद्रीय आर्थिक समस्याएं एवं आर्थिक प्रणालियां (Economic Systems)
प्रत्येक समाज को तीन मूलभूत आर्थिक प्रश्नों के उत्तर तय करने होते हैं:
- किन वस्तुओं एवं सेवाओं का उत्पादन किया जाए?
- उत्पादन किस प्रकार किया जाए (श्रम-प्रधान या पूंजी-प्रधान)?
- उत्पादित वस्तुओं का वितरण किनके बीच किया जाए?
- पूंजीवादी अर्थव्यवस्था (Capitalist Economy): इसमें उत्पादन और वितरण का निर्णय बाज़ार की शक्तियों (माँग और पूर्ति) तथा व्यक्तियों की क्रय-शक्ति के आधार पर होता है।
- समाजवादी अर्थव्यवस्था (Socialist Economy): इसमें सरकार यह निर्णय लेती है कि समाज की आवश्यकताओं के अनुसार किन वस्तुओं का उत्पादन व वितरण किया जाए। इसमें निजी संपत्ति का स्थान नहीं होता (जैसे- चीन, क्यूबा)।
- मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy): इसमें बाज़ार और सरकार दोनों मिलकर आर्थिक निर्णय लेते हैं। भारत ने स्वतंत्रता के बाद मिश्रित अर्थव्यवस्था का मॉडल चुना, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्रक के साथ निजी क्षेत्रक और लोकतंत्र को स्थान दिया गया।
2. पंचवर्षीय योजनाओं के मुख्य लक्ष्य (Goals of Five-Year Plans)
भारत में वर्ष 1950 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में योजना आयोग (Planning Commission) की स्थापना की गई। पंचवर्षीय योजनाओं के चार प्रमुख लक्ष्य निर्धारित किए गए:
- संवृद्धि (Growth): देश में वस्तुओं और सेवाओं की उत्पादन क्षमता में वृद्धि करना। इसका प्रामाणिक सूचक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में निरंतर वृद्धि है।
- आधुनिकीकरण (Modernization): नई प्रौद्योगिकी (जैसे नई किस्म के बीज, आधुनिक मशीनें) को अपनाना तथा सामाजिक दृष्टिकोण में परिवर्तन लाना (जैसे महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार देना)।
- आत्मनिर्भरता (Self-reliance): उन वस्तुओं के आयात से बचना जिनका उत्पादन देश में ही संभव है, विशेषकर खाद्यान्न और प्रौद्योगिकी में विदेशी निर्भरता को समाप्त करना।
- समानता (Equity): धन और संपत्ति के वितरण की असमानताओं को कम करना तथा प्रत्येक नागरिक को भोजन, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना।
विशेष बिंदु (प्रो. पी. सी. महालनोबिस): प्रशांत चंद्र महालनोबिस को भारतीय योजना का निर्माता माना जाता है। उन्होंने द्वितीय पंचवर्षीय योजना का ढाँचा तैयार किया तथा कोलकाता में भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) की स्थापना की।
3. कृषि क्षेत्रक में नीतिगत पहल (1950-1990)
(क) भू-सुधार (Land Reforms)
- बिचौलियों का उन्मूलन: ज़मींदारी प्रथा को समाप्त कर वास्तविक काश्तकारों (किसानों) को भूमि का स्वामी बनाया गया, जिससे लगभग 200 लाख काश्तकारों का सरकार से सीधा संपर्क हुआ।
- भूमि की उच्चतम सीमा (Land Ceiling): किसी व्यक्ति के पास कृषि भूमि के स्वामित्व की अधिकतम सीमा तय की गई ताकि कुछ ही हाथों में भू-स्वामित्व का संकेंद्रण रोका जा सके।
- परिणाम: केरल और पश्चिम बंगाल में प्रतिबद्ध सरकारों के कारण भू-सुधार अत्यधिक सफल रहे, जबकि अन्य राज्यों में कानूनी कमियों के कारण विषमता बनी रही।
(ख) हरित क्रांति (Green Revolution)
- अर्थ: उच्च पैदावार वाली किस्म के बीजों (HYV Seeds – विशेष रूप से गेहूं और चावल), उर्वरकों, कीटनाशकों और नियमित सिंचाई का एक साथ प्रयोग कर कृषि उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि करना।
- प्रथम चरण (1960 के दशक के मध्य से 1970 के मध्य): इसका प्रभाव केवल पंजाब, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे समृद्ध राज्यों तथा मुख्यतः गेहूं की फसल तक सीमित था।
- द्वितीय चरण (1970 के दशक के मध्य से 1980 के मध्य): HYV तकनीक का विस्तार कई राज्यों तथा विभिन्न फसलों तक हुआ, जिससे भारत खाद्यान्न उत्पादन में पूर्णतः आत्मनिर्भर बन गया।
- विपणित अधिशेष (Marketed Surplus): कृषि उत्पादन का वह भाग जो किसानों द्वारा अपने स्वयं के उपभोग के बाद बाज़ार में बेचा जाता है।
(ग) कृषि सहायिकी (Subsidies) पर बहस
- पक्ष में तर्क: भारत में कृषि एक जोखिम भरा व्यवसाय है और अधिकांश किसान गरीब हैं। नई HYV तकनीक को अपनाने के जोखिम को कम करने के लिए सहायिकी आवश्यक है।
- विपक्ष में तर्क: सहायिकी का लाभ गरीब किसानों के स्थान पर उर्वरक उद्योगों और बड़े किसानों को अधिक मिलता है, जिससे सरकारी खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है।
4. औद्योगिक विकास एवं व्यापार नीति (1950-1990)
(क) औद्योगिक नीति प्रस्ताव, 1956 (IPR 1956)
यह द्वितीय पंचवर्षीय योजना का आधार बना। इसके तहत उद्योगों को तीन श्रेणियों में बांटा गया:
- प्रथम श्रेणी: पूर्णतः राज्य (सार्वजनिक क्षेत्रक) के स्वामित्व वाले उद्योग।
- द्वितीय श्रेणी: सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रक मिलकर काम करेंगे, लेकिन नई इकाइयों की शुरुआत राज्य करेगा।
- तृतीय श्रेणी: निजी क्षेत्रक के अंतर्गत आने वाले उद्योग, जिन्हें परमिट-लाइसेंस प्रणाली द्वारा नियंत्रित किया गया।
(ख) लघु उद्योग (Small Scale Industries – SSI)
- 1955 में कर्वे समिति (Karve Committee) ने ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने के लिए लघु उद्योगों के प्रयोग की सिफारिश की।
- लघु उद्योग अधिक श्रम-प्रधान (Labour-intensive) होते हैं, जिससे रोजगार सृजन अधिक होता है। 1950 में निवेश सीमा ₹5 लाख थी, जो बढ़कर ₹1 करोड़ तक की गई।
(ग) व्यापार नीति: आयात प्रतिस्थापन (Import Substitution)
- प्रथम सात योजनाओं में भारत ने अंतर्मुखी व्यापार नीति (Inward-looking trade policy) अपनाई, जिसे आयात प्रतिस्थापन कहा जाता है।
- इसका उद्देश्य विदेशों से आयात करने के बजाय उन वस्तुओं का देश के अंदर ही उत्पादन करना था।
- संरक्षण के तरीके:
- प्रशुल्क (Tariff): आयातित वस्तुओं पर लगाया गया कर, जिससे वे महंगी हो जाती हैं।
- कोटा (Quota): आयात की जाने वाली वस्तु की अधिकतम मात्रा का निर्धारण।
5. 1950-1990 की नीतियों का मूल्यांकन (Evaluation)
- उपलब्धियाँ:
- GDP में औद्योगिक क्षेत्रक का योगदान 1950-51 के 13% से बढ़कर 1990-91 में 24.6% हो गया और औद्योगिक वृद्धि दर 6% वार्षिक रही।
- हरित क्रांति के कारण भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हुआ तथा आपातकालीन बफर स्टॉक का निर्माण हो सका।
- सीमाएँ एवं कमियाँ:
- सार्वजनिक क्षेत्रक के कई उपक्रम भारी घाटे में रहे, फिर भी काम जारी रखने से राष्ट्रीय संसाधनों का अपव्यय हुआ।
- परमिट-लाइसेंस राज के कारण अत्यधिक नियमन हुआ और प्रतिस्पर्धा के स्थान पर लाइसेंस प्राप्त करने में समय नष्ट हुआ।
- 1990 तक भी देश की लगभग 65% जनसंख्या कृषि पर ही निर्भर रही।
इन सीमाओं और आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए वर्ष 1991 में नई आर्थिक नीति (NEP) की शुरुआत करनी पड़ी।