कक्षा 11 अर्थशास्त्र अध्याय 3: उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण: एक समीक्षा
(परीक्षा हेतु त्वरित नोट्स)
1. 1991 के वित्तीय/आर्थिक संकट की पृष्ठभूमि और कारण
- अकुशल वित्तीय प्रबंधन (1980 का दशक): सरकार का व्यय उसकी आय (कर व सार्वजनिक उपक्रमों के राजस्व) से लगातार अधिक होता गया, जिससे घाटे के वित्तीय प्रबंधन और आंतरिक/बाहरी ऋणों पर निर्भरता बढ़ी.
- भुगतान संतुलन संकट (Balance of Payments Crisis): भारत के पास आवश्यक वस्तुओं (जैसे पेट्रोलियम) के आयात का भुगतान करने के लिए मात्र 15 दिनों (2 सप्ताह) का विदेशी मुद्रा भंडार शेष बचा था.
- मुद्रास्फीति (Inflation): आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में तीव्र वृद्धि हुई.
- अंतर्राष्ट्रीय ऋण संकट: अंतर्राष्ट्रीय उधारदाताओं का ब्याज चुकाने के लिए भी भारत के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा नहीं बची थी तथा कोई भी विदेशी संस्था भारत में निवेश नहीं करना चाहती थी.
- IMF और विश्व बैंक से ऋण: इस संकट से उबरने के लिए भारत सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक (IBRD / विश्व बैंक) तथा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से 7 बिलियन डॉलर का ऋण लिया.
- शर्तें व नई आर्थिक नीति (NEP): ऋण प्राप्त करने के लिए इन संस्थाओं ने भारत के सामने शर्तें रखीं कि सरकार अर्थव्यवस्था में उदारीकरण करेगी, निजी क्षेत्र पर लगे प्रतिबंध हटाएगी और विदेशी व्यापार से अवरोध समाप्त करेगी. इसके तहत 1991 में नई आर्थिक नीति (NEP) की घोषणा की गई.
2. नई आर्थिक नीति (NEP 1991) के प्रमुख घटक
नई आर्थिक नीति के उपायों को दो प्रमुख समूहों में विभाजित किया गया है:
- स्थायित्वकारी उपाय (Stabilisation Measures): ये अल्पकालिक उपाय थे, जिनका मुख्य उद्देश्य भुगतान संतुलन की त्रुटियों को दूर करना और बढ़ती मुद्रास्फीति/महंगाई पर अंकुश लगाना था.
- संरचनात्मक सुधार के उपाय (Structural Reform Measures): ये दीर्घकालिक उपाय थे, जिनका उद्देश्य अर्थव्यवस्था की कार्यकुशलता में सुधार करना तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को बढ़ाना था. इनके मुख्य तीन उपवर्ग हैं — उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG).
3. उदारीकरण (Liberalisation)
परिभाषा: आर्थिक गतिविधियों के नियमन के लिए बनाए गए सरकारी नियमों, प्रतिबंधों व नियंत्रणों को हटाकर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों को मुक्त करने की नीति को उदारीकरण कहते हैं.
प्रमुख क्षेत्रों में किए गए सुधार:
- औद्योगिक क्षेत्रक में सुधार (Industrial Sector Reforms):
- अनाारक्षण एवं लाइसेंसिंग की समाप्ति: अल्कोहल, सिगरेट, जोखिम भरे रसायन, औद्योगिक विस्फोटक, इलेक्ट्रॉनिक्स, विमानन तथा औषधि-भेषज — इन 6 उत्पाद श्रेणियों को छोड़कर अन्य सभी उद्योगों के लिए लाइसेंसिंग व्यवस्था समाप्त कर दी गई.
- सार्वजनिक क्षेत्र का संकुचन: सार्वजनिक क्षेत्रक के लिए अब केवल परमाणु ऊर्जा उत्पादन और रेल परिवहन जैसी मुख्य गतिविधियां ही सुरक्षित रखी गईं.
- लघु उद्योगों द्वारा उत्पादित अधिकांश वस्तुओं को अनारक्षित श्रेणी में लाया गया और अधिकांश उद्योगों में बाजार को कीमतों के निर्धारण की अनुमति दी गई.
- वित्तीय क्षेत्रक में सुधार (Financial Sector Reforms):
- RBI की भूमिका में परिवर्तन: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की भूमिका को वित्तीय क्षेत्रक के ‘नियंत्रक’ की जगह ‘सुविधाप्रदाता/सहायक’ में बदल दिया गया.
- निजी (भारतीय व विदेशी) बैंकों की स्थापना की अनुमति दी गई तथा बैंकों की क्षमता में विदेशी भागीदारी की सीमा बढ़ाकर 74% कर दी गई.
- विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) जैसे म्यूचुअल फंड और पेंशन कोष को भी भारतीय वित्तीय बाजारों में निवेश की अनुमति मिली.
- कर सुधार / राजकोषीय नीति (Tax Reforms):
- प्रत्यक्ष करों (जैसे व्यक्तिगत आयकर व निगम कर) की दरों में निरंतर कमी की गई ताकि कर-वंचन (Tax Evasion) रुके और स्वैच्छिक कर भुगतान को बढ़ावा मिले.
- अप्रत्यक्ष करों का सरलीकरण किया गया. वर्ष 2016 में संविधान संशोधन द्वारा वस्तु एवं सेवा कर (GST) की शुरुआत की गई, जिसका उद्देश्य “एक राष्ट्र, एक टैक्स, एक बाजार” का निर्माण करना था.
- विदेशी विनिमय सुधार (Foreign Exchange Reforms):
- 1991 में भुगतान संतुलन की समस्या के समाधान हेतु रुपये का अवमूल्यन (Devaluation) किया गया.
- विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये के विनिमय मूल्य का निर्धारण बाजार की मांग और पूर्ति की शक्तियों पर छोड़ दिया गया.
- व्यापार एवं निवेश नीति सुधार (Trade & Investment Reforms):
- आयात-निर्यात पर से परिमाणात्मक प्रतिबंधों (Quantitative Restrictions) की समाप्ति की गई.
- प्रशुल्क (टैरिफ) दरों में भारी कटौती की गई और आयात लाइसेंसिंग प्रक्रिया समाप्त कर दी गई.
- अप्रैल 2001 से कृषि एवं उपभोक्ता वस्तुओं के आयात को भी मात्रात्मक प्रतिबंधों से मुक्त कर दिया गया.
4. निजीकरण (Privatisation)
परिभाषा: किसी सार्वजनिक उपक्रम के स्वामित्व, प्रबंधन या नियंत्रण को सरकार द्वारा निजी क्षेत्रक को सौंपना निजीकरण कहलाता है.
- विनिवेश (Disinvestment): जब सरकार किसी सार्वजनिक क्षेत्रक के उद्यमों की इक्विटी (शेयरों) का एक भाग या संपूर्ण हिस्सा जनसामान्य या निजी क्षेत्र को बेच देती है, तो उसे विनिवेश कहा जाता है.
- उद्देश्य: वित्तीय अनुशासन बढ़ाना, आधुनिकीकरण में सहायता करना और निजी पूंजी व प्रबंधन क्षमताओं का उपयोग करना.
- नवरत्न/महारत्न/लघुरत्न नीति: सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) की कार्यकुशलता व प्रतिस्पर्धात्मकता सुधारने के लिए उन्हें व्यावसायिक स्वायत्तता दी गई तथा विशिष्ट दर्जा प्रदान किया गया:
- महारत्न (Maharatna): जैसे — Indian Oil Corporation Limited (IOCL), Steel Authority of India Limited (SAIL).
- नवरत्न (Navratna): जैसे — Hindustan Aeronautics Limited (HAL), Mahanagar Telephone Nigam Limited (MTNL).
- लघुरत्न (Miniratna): जैसे — BSNL, Airports Authority of India (AAI), IRCTC.
5. वैश्वीकरण (Globalisation)
परिभाषा: देश की अर्थव्यवस्था को विश्व अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करना, ताकि सीमाओं के पार वस्तुओं, सेवाओं, पूंजी, श्रम और सूचनाओं का निर्बाध प्रवाह हो सके, वैश्वीकरण कहलाता है.
- बाह्य प्राप्तण / बाहरी स्रोतकरण (Outsourcing):
- वैश्वीकरण का एक प्रमुख परिणाम, जिसमें कोई कंपनी अपनी नियमित सेवाओं (जैसे कानूनी सलाह, आईटी सेवाएं, कॉल सेंटर, बीपीओ, शिक्षण, परामर्श आदि) को बाहरी देशों/संस्थाओं से प्राप्त करती है.
- भारत अपनी कम मजदूरी दरों तथा कुशल श्रम शक्ति की उपलब्धता के कारण विश्व में बाह्य प्राप्तण (Outsourcing) का एक मुख्य गंतव्य केंद्र बन गया है.
- विश्व व्यापार संगठन (WTO):
- GATT (व्यापार और सीमा शुल्क महासंधि) की स्थापना 1948 में 23 देशों द्वारा की गई थी, जिसके स्थान पर 1995 में विश्व व्यापार संगठन (WTO) का गठन हुआ.
- उद्देश्य: एक नियम-आधारित न्यायपूर्ण विश्व व्यापार व्यवस्था बनाना, सभी सदस्य देशों को समान अवसर प्रदान करना, सेवाओं के व्यापार को प्रोत्साहन देना और पर्यावरण का संरक्षण करना.
6. सुधारकालीन अर्थव्यवस्था का मूल्यांकन (Appraisal)
A. सकारात्मक प्रभाव / उपलब्धियां (Achievements):
- GDP वृद्धि दर में बढ़ोतरी: भारत की जीडीपी वृद्धि दर 1980-91 के 5.6% से बढ़कर 2021-22 में 9.4% तक पहुंची.
- सेवा क्षेत्रक का तीव्र विकास: जीडीपी की उच्च वृद्धि मुख्य रूप से सेवा क्षेत्रक (Service Sector) के विस्तार से संचालित हुई.
- विदेशी निवेश में वृद्धि: कुल विदेशी निवेश (FDI व FII) 1990-91 के 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2022-23 में लगभग 23 बिलियन डॉलर हो गया.
- विदेशी मुद्रा भंडार में रिकॉर्ड उछाल: विदेशी मुद्रा भंडार 1990-91 के मात्र 6 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2023-24 में 646 बिलियन डॉलर हो गया.
- निर्यात में अग्रणी पहचान: भारत ऑटोमोबाइल, दवाओं, आईटी उत्पादों और इंजीनियरिंग सामानों के एक सफल निर्यातकर्ता के रूप में उभरा.
B. सीमाएं व आलोचनाएं (Limitations & Weaknesses):
- रोजगार विहीन समृद्धि (Jobless Growth): जीडीपी में तो वृद्धि हुई, लेकिन अर्थव्यवस्था में रोजगार के पर्याप्त अवसरों का सृजन नहीं हो सका.
- कृषि क्षेत्रक की उपेक्षा: सुधारों से कृषि क्षेत्र को कोई विशेष लाभ नहीं हुआ; सिंचाई व बुनियादी ढांचे में सार्वजनिक निवेश घटा, उर्वरक सब्सिडी घटने से लागत बढ़ी और आयात शुल्क घटने से भारतीय किसानों को विदेशी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा.
- औद्योगिक वृद्धि में सुस्ती: सस्ते आयातित माल की बाढ़ के कारण घरेलू उद्योगों की मांग घट गई और बुनियादी ढांचे में अपर्याप्त निवेश रहा.
- विनिवेश नीति पर सवाल: आलोचकों के अनुसार सार्वजनिक उपक्रमों की परिसंपत्तियों को औने-पौने दामों में निजी क्षेत्र को बेचा गया और प्राप्त राजस्व का प्रयोग विकास कार्यों के बजाय बजट के राजकोषीय घाटे को भरने में किया गया.
- असंतुलित एवं असमान विकास: सुधारों का लाभ केवल दूरसंचार, आईटी, वित्त और मनोरंजन जैसे सीमित क्षेत्रों तथा उच्च आय वर्ग तक ही सीमित रहा, जबकि कृषि व विनिर्माण जैसे बुनियादी क्षेत्र पिछड़ गए.
7. अर्धवार्षिक परीक्षा हेतु मुख्य अंतर एवं परिभाषाएं
- अवमूल्यन (Devaluation): सरकार द्वारा स्वदेशी मुद्रा के मूल्य को विदेशी मुद्राओं की तुलना में आधिकारिक रूप से कम करना.
- प्रशुल्क (Tariff) व गैर-प्रशुल्क (Non-tariff) अवरोध: प्रशुल्क वे कर हैं जो आयातित वस्तुओं पर लगाए जाते हैं, जबकि गैर-प्रशुल्क अवरोधों में आयात की मात्रा या कोटा सीमित करना (परिमाणात्मक प्रतिबंध) शामिल है.
- प्रत्यक्ष कर बनाम अप्रत्यक्ष कर: प्रत्यक्ष कर व्यक्तियों व कंपनियों की आय व लाभ पर सीधे लगते हैं (जैसे आयकर, निगम कर), जबकि अप्रत्यक्ष कर वस्तुओं और सेवाओं के विक्रय पर लगाए जाते हैं (जैसे GST).