कक्षा 9 हिंदी के पाठ 10: “भारति, जय, विजयकरे!” (लेखक: सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’) के सभी प्रश्न-उत्तर, भावार्थ और व्याकरण अभ्यास
कक्षा 9 हिंदी पाठ 10: भारति, जय, विजयकरे! — संपूर्ण प्रश्न-उत्तर एवं अभ्यास कार्य
कविता का नाम: भारति, जय, विजयकरे!
कवि: सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
1. शब्द-संपदा (महत्वपूर्ण शब्दार्थ)
- भारती / भारत्त: भारत माता, वाणी की देवी सरस्वती
- कनक: सोना
- शस्य: फसल, अन्न, उपज
- पदतल: पैरों के नीचे, तलवा
- शतदल: कमल का फूल
- गर्जितोर्म्य: गरजती हुई तरंगों वाला समुद्र
- शुचि: पवित्र, शुद्ध, निर्मल
- युगल: जोड़ा (दोनों)
- स्तव: स्तुति, प्रशंसा
- तरु: वृक्ष, पेड़
- तृण: तिनका, घास
- वसन: वस्त्र, कपड़ा
- अंचल: प्रांत, तट, आंचल
- खचित: जड़ा हुआ, अंकित
- सुमन: पुष्प, फूल
- धवल: स्वच्छ, निर्मल, सफेद
- हिम-तुषार: बर्फ, पाला
- प्रणव / ओंकार: परमेश्वर की पावन ध्वनि ‘ॐ’
- मुखरित: गुंजायमान, बजता हुआ
2. मेरे उत्तर मेरे तर्क (बहुविकल्पीय प्रश्न – MCQs)
प्रश्न 1. “भारत्त, जर्, त्वजर्करे” कविता में विशेष रूप से—
(क) भारत की भौगोलिक संरचना की प्रशस्ति की गई है।
(ख) भारत की सांस्कृतिक विविधता बताई गई है।
(ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।
(घ) भारत के खनिज पदार्थों के बारे में बताया गया है।
उत्तर: (ग) भारत के ज्ञान, प्रकृति और संपन्नता की प्रशंसा की गई है।
तर्क: कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य (गंगा, समुद्र, हिमालय), ज्ञान-चेतना (प्रणव ओंकार) और कृषि-समृद्धि (कनक-शस्य-कमलधरे) की वंदना की गई है।
प्रश्न 2. “कनक-शस्य-कमल धरे” पंक्ति का भावार्थ है—
(क) भारत की धन-धान्य संपन्नता
(ख) भारत की नदियों का सौंदर्य
(ग) भारत के लोक-जीवन की सुंदरता
(घ) भारत की सैन्य शक्ति और औद्योगिक विकास
उत्तर: (क) भारत की धन-धान्य संपन्नता
तर्क: ‘कनक-शस्य’ का अर्थ सोने जैसी फसलें और ‘कमलधरे’ का अर्थ समृद्धि धारण करने वाली है, जो भारत की धन-धान्य और कृषि संपन्नता को दर्शाता है।
प्रश्न 3. समस्त विश्व में भारत के महत्व का उद्घोष करने वाली पंक्तियाँ हैं—
(क) गंगा ज्योतिर्ज्वल-कण/ धवल धार हार गले
(ख) गर्जितोर्म्य सागर-जल/ धोता शुचि चरण युगल
(ग) भारत्त, जर्, त्वजर्करे/ किक-शस्र्-क्मलधरे!
(घ) ध्वनित दिशाएँ उदार/ शतमुख-शतरव-मुखरे!
उत्तर: (घ) ध्वनित दिशाएँ उदार/ शतमुख-शतरव-मुखरे!
तर्क: इन पंक्तियों का अर्थ है कि भारत का ज्ञान और उदार विचार चारों दिशाओं में सैकड़ों ध्वनियों व स्वरों के साथ गूंज रहा है, जो विश्व स्तर पर भारत के महत्व को प्रकट करता है।
प्रश्न 4. कविता की भाषा और शैली किस विशेषता से संपन्न है?
(क) सरल, बोल-चाल की भाषा
(ख) संस्कृतनिष्ठ और सामासिकयुक्त
(ग) सरस और हास्य-व्यंग्यपूर्ण
(घ) संवादात्मक और विश्लेषणात्मक
उत्तर: (ख) संस्कृतनिष्ठ और सामासिकयुक्त
तर्क: इस कविता में संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली और ‘कनक-शस्य-कमलधरे’, ‘गर्जितोर्म्य’ जैसे सामासिक पदों का प्रचुर प्रयोग हुआ है।
प्रश्न 5. भारत के वस्त्रों में ‘तरु-तृण-वन-लता’ और गले में ‘गंगा-धारा’ को चित्रित कर कवि किस प्रकार की चेतना का संदेश देते हैं?
(क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक
(ख) राष्ट्रीयता और देशप्रेम
(ग) ऐतिहासिक और भौगोलिक
(घ) सामाजिक और राजनीतिक
उत्तर: (क) पर्यावरणीय और सांस्कृतिक
तर्क: प्राकृतिक संपदा (वृक्ष, लताएँ) को वस्त्र और पवित्र गंगा को गले का हार मानना पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता और सांस्कृतिक धरोहर की चेतना का संदेश देता है।
3. अर्थ और भाव (पंक्तियों का भावार्थ)
प्रश्न (क) पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए:
“लंका पदतल शतदल,
गर्जितोर्म्य सागर-जल
धोता शुचि चरण युगल!”
भावार्थ: कवि कहते हैं कि भारत भूमि के दक्षिण में स्थित श्रीलंका इसके चरणों के नीचे कमल पुष्प के समान सुशोभित है। गर्जन करती हुई सागर की विशाल लहरें भारत माता के दोनों पवित्र चरणों को निरंतर धोकर उनकी वंदना कर रही हैं।
प्रश्न (ख) पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए:
“प्राण प्रणव ओंकार,
ध्वनित दिशाएँ उदार,
शतमुख-शतरव-मुखरे!”
भावार्थ: कवि के अनुसार, भारत का प्राण पवित्र ‘ओंकार’ (ज्ञान और ईश्वर की ध्वनि) है। भारत की उदार चेतना और समृद्ध विचार सभी दिशाओं में फैले हुए हैं तथा सैकड़ों मुखों व ध्वनियों से यह पावन भूमि सदा गुंजायमान रहती है।
4. मेरी समझ मेरे विचार (प्रश्न-उत्तर)
प्रश्न 1. कविता में कवि की किस भावना की अभिव्यक्ति मिलती है?
उत्तर: कविता में कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की अगाध राष्ट्रीय भावना, देशप्रेम और भारत वंदना की अभिव्यक्ति मिलती है। कवि भारत भूमि को एक जीवित चेतन सत्ता एवं देवी के रूप में मानकर उसकी प्राकृतिक सुंदरता, कृषि-समृद्धि और ज्ञान परंपरा की जय-जयकार करते हैं।
प्रश्न 2. कविता में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किस प्रकार किया गया है? क्या आप मानते हैं कि प्रकृति का संरक्षण करना भी देशप्रेम का काम है? क्यों?
उत्तर: कविता में हिमालय को भारत का श्वेत मुकुट, गंगा नदी की निर्मल धारा को गले का हार, वनों व लताओं को वस्त्र और समुद्र को चरण धोते हुए चित्रित करके भारत के प्राकृतिक सौंदर्य का अनुपम वर्णन किया गया है।
हाँ, प्रकृति का संरक्षण करना भी देशप्रेम का अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है। नदियाँ, पर्वत और वन ही किसी देश की वास्तविक जीवनधारा होते हैं; इनका संरक्षण करके ही हम अपने देश के अस्तित्व और भावी पीढ़ी को सुरक्षित रख सकते हैं।
प्रश्न 3. “कनक-शस्य-कमलधरे!” पंक्ति भारतभूमि की किन-किन विशेषताओं की ओर संकेत कर रही है?
उत्तर: यह पंक्ति भारत भूमि की दो प्रमुख विशेषताओं की ओर संकेत करती है:
- कनक-शस्य: भारत की उपजाऊ भूमि और सोने जैसी लहलहाती फसलों (कृषि-समृद्धि) को दर्शाती है।
- कमलधरे: भारत की सांस्कृतिक पवित्रता, कला, सौंदर्य और लक्ष्मी/सरस्वती स्वरूप समृद्धि को प्रकट करती है।
प्रश्न 4. “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” पंक्ति में हिमालय को भारत का मुकुट बताया गया है, क्यों?
उत्तर: उत्तर में स्थित हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियाँ मुकुट की भांति सुशोभित होती हैं। जिस प्रकार मुकुट मस्तक पर सबसे ऊपर रहकर सम्मान और गौरव का प्रतीक होता है, उसी प्रकार हिमालय भारत की सीमा पर प्रहरी बनकर देश के गौरव और सौंदर्य को सर्वोच्च स्थान प्रदान करता है।
5. कविता का सौंदर्य एवं व्याकरण (समास व अलंकार)
(क) सामासिक पद एवं समास विग्रह
- शतदल: शत (सौ) दलों (पंखुड़ियों) का समूह — द्विगु समास / बहुव्रीहि समास (कमल)
- ज्योतिर्ज्वल: ज्योति के समान उज्ज्वल — कर्मधारय समास
- शतमुख: शत (सौ) हैं मुख जिसके — बहुव्रीहि समास
- सागरजल: सागर का जल — तत्पुरुष समास
(ख) अलंकार पहचान
- अनुप्रास अलंकार की पंक्तियाँ:
- “शतमुख-शतरव-मुखरे!” (‘श’ वर्ण की पुनरावृत्ति)
- “तरु-तृण-वन-लता वसन” (‘त’ वर्ण की पुनरावृत्ति)
- रूपक अलंकार की पंक्तियाँ:
- “मुकुट शुभ्र हिम-तुषार” (हिमालय को भारत का ‘मुकुट’ माना गया है)
- “गंगा ज्योतिर्ज्वल-कण धवल धार हार गले” (गंगा की धारा को भारत के गले का ‘हार’ माना गया है)
- “तरु-तृण-वन-लता वसन” (पेड़-पौधों व लताओं को भारत माता के ‘वस्त्र’ का रूप दिया गया है)